रविवार, 19 फ़रवरी 2017

अरंडी के तेल के गुण, औषधीय उपयोग

   

    एरंड का पेड़ (गुल्म) छोटा, 5 से 12 फुट ऊँचा होता है। पत्ते हरापन या ललाई लिये, 1-1 फुट के घेरे में, गोलाकार, कटे हुए, अँगुलियों सहित हथेली के आकार-से, 4-12 इच्च लम्बे और पीले डंठल पर लगे होते हैं। फूल पीलापन लिये गुच्छे में मोटे डंठल पर रहते हैं। एरण्ड के फल गोल, कई एक साथ, कोमल काँटों से युक्त, कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर धूसर वर्ण के होते हैं। वे पक जाने पर सूर्य की गर्मी से फट जाते हैं। प्रत्येक एरण्ड के फल में तीन-तीन बीज, ललाई लिये काले रंग के, सफेद चितकबरे होते हैं।
    अरंडी तेल बहुत सारे गुणों से भरपूर होता है फिर वो फ़ायदा बालों के लिए हो, हमारे शरीर के लिए हो या फिर हमारी त्वचा के लिए हो, अरंडी का तेल से आप जैसा चाहे फायदा ले सकते है। ज्यादातर अरंडी तेल का इस्तेमाल बालों से जुड़ी समस्याओं के लिए किया जाता है लेकिन स्वास्थय से जुड़ी समस्या जैसे जोड़ों का दर्द, त्वचा रोग और कब्ज जैसी समस्याओं में भी इसका प्रयोग हितकारी होता है। यदि आपके बाल ख़राब हो रहे है, झड़ रहे तो आप आज से ही अरंडी के तेल का इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए । यह तेल बालों की समस्या से आपको कोसों दूर रखेगा क्योंकि यह तेल बालों से जुड़ी हर समस्या का निवारण बहुत जल्दी करता है । प्रदूषण का, हमारे खान-पान का प्रभाव हमारे बालों पर अधिक पड़ता है और बालों की समस्या होना आज एक आम सी बात हो गई है, हर दूसरा इंसान इस समस्या से परेशान है। कैस्टर ऑइल एक तरह का चिपचिपा तेल होता है। लेकिन बालों के लिए भी यह औषधि मानी जाती है। अरंडी तेल का हमारी हर तरह से मदद करता है तो आइए जानते है इसके कई फायदों के बारे में
एरण्ड के गुण : 
   यह स्वाद में मीठा, चरपरा, कसैला, पचने पर मीठा, भारी, चिकना, गर्म और तीक्ष्ण होता है। इसका मुख्य प्रभाव वातनाड़ी-संस्थान पर पड़ता है। यह शोथहर-पीड़ानाशक, विरेचक, हृदयबलदायक, श्वासकष्टहर, मूत्रविशोधक, कामोत्तेजक, गर्भाशय और शुक्र-शोधक तथा बलदायक है।
वजन कम करना-
   अरंडी तेल आपका वज़न कम करने में भी आपकी मदद कर सकता है। कैसे : अगर आप अपना वज़न कम करना चाहते है तो आप रोज़ सुबह खली पेट सबसे पहले दो चम्म्च अरंडी के तेल का सेवन करें, लेकिन आप ऐसा 10 दिनों में से 5 दिन ही करना है। क्योंकि अरंडी का तेल अधिक लेने से आपको दस्त भी हो सकता है ।
पेट का स्वास्थ्य -
  अरण्डी के तेल का कम मात्रा मे सेवन करना पेट की समस्याएँ जैसे कमजोर पाचन, indigestion (बदहजमी), फ़ूड poisoning, कब्ज (कॉन्स्टिपेशन), पेट मे कीड़े आदि को ठीक कर आपके पेट की सेहत बेहतर करने में मददगार होता है| हल्के गर्म तेल की पेट पर मसाज से पाचन और stomach health पर पॉज़िटिव effect देखने को मिलता है|
आमवात : 
आमवात की (सटेज्म) गाँठों में सूजन और दर्द होने पर 1 तोला अरण्डी तेल में 3 माशा सोंठ का चूर्ण मिलाकर देने से लाभ होता है।
2. कमर-दर्द :
    एरण्ड-बीजों का छिलका निकाल उसकी आधा पाव (10 तोला) गिरी एक सेर गाय के दूध में पीसकर पकायें। मावा (खोया) जैसा बन जाने पर उतार लें। यह 1-2 तोला तक सुबह-शाम सेवन करने से कमर-दर्द, गृध्रसी (साइटिका) और पक्षाघात में आराम होता है।
* टिटनेस : 
धनुस्तम्भ, हिस्टीरिया, आक्षेप और जकड़न में अरण्डी-तेल से मालिश कर सेंकना चाहिए।
* रक्त-आमातिसार :
 एरण्ड की जड़ को दूध के साथ पीने से रक्त-आमातिसार मिट जाता है।
*श्लीपद :
 श्लीपद (फायोलेरिया) पर अरण्डी-तेल गोमूत्र में मिलाकर एक मास तक पीने से लाभ होता है।

* वृक्कशूल-पथरी :
 दर्द गुर्दा (वृक्कशूल) और उदरशूल में एरण्ड की जड़ का काढ़ा सोंठ डालकर पीने से लाभ होता है। इसमें हींग और नमक मिलाने से पथरी भी निकल जाती है।
* मलबन्ध-बवासीर : मलबन्ध कब्ज बवासीर और आँव में अरण्डी का तेल 5 तोला पिलाने से लाभ होता है। उससे विरेचन होकर वायु का अनुलोमन हो जाता है।
* शोथ : 
किसी स्थान पर शोथ (सूजन) या वेदना (दर्द) हो, वहाँ अरण्डी-तेल लगाकर उसी के पत्तों को गर्म करके बाँध देना चाहिए।
* योनि-शूल : 
योनि-शूल में अरण्डी-तेल में रूई का फाहा भिगोकर योनि में रखने पर लाभ होता है। प्रसवकाल के कष्ट में भी इसका प्रयोग करना चाहिए।
* अाँखों की जलन : 
कभी आँखों में सोडा, चूना, आक आदि का दूध पड़ जाय तो 1-2 बूंद अरण्डी-तेल आँखों में डालने से जलन और दर्द में शीघ्र आराम हो जाता है।* चर्म रोग : एरण्ड के जड़ को पानी में उबाल कर उस पानी को त्वचा पर लगाने या धोने से चर्म रोग का नाश होता है।
*. बालों के लिए वरदान :
 रोजाना सिर के बालों की मालिश एरण्ड के तेल से करने पर बाल काले, घने, चमकीले और जिनके बाल कम हो गए हों पुनः वापिस आ जाते हैं।
*काँच खा लेने पर : काँच खा लेने पर एरण्ड का तेल पिला देने से नुकसान नहीं होता।
Rheumatism का उपचार
अरंडी का तेल Ricinoleic, Oleic और Linoleic acidsसे भरपूर होता है| साथ ही इसमें फॅटी acids भी पाया जाते हाइन| ये सभी गुण Rheumatism जैसे arthritis, gout आदि के लक्षण जैसे दर्द, inflammation और सुजन को कम करने मे असरदार होते हैं
पीठ मे दर्द का इलाज (backpain home treatment)
यदि आपकी कमर या पीठ मे दर्द हो रहा है तो इसमें भी अरंडी के तेल का इस्तेमाल करके आप उस दर्द से निजात पा सकते हैं| यह तेल backache के लिए एक आसन और सुरक्षित होम रेमेडी होती है| बस आपको हल्का गरम तेल अपनी पीठ पर मलना है और उसपर कुछ देर hot pad लगाके रखना है ताकि सेक (हीट) से तेल स्किन के अंदर समा कर inflammation , सूजन और दर्द को कम कर सके| ऐसा रोजाना रात को 3 दिन करने से आपको लाभ मिलेगा और दर्द का अंत होगा तुरंत|इम्युनिटी सिस्टम में सुधार करता है : नेचुरोपैथी कराने वाले लोगों को कैस्टर ऑयल से इम्युनिटी सिस्टम मज़बूत करने में मदद मिलती है। ये व्हाइट ब्लड सेल्स को बढ़ाकर आपके शरीर को इन्फेक्शन से लड़ने की शक्ति देता है।
कब्ज़ से राहत दिलाता है : 
ये तेल रिसिनोलिक एसिड जारी करने में मदद करता है, जो आंत में मौजूद है। एसिड जारी करने के बाद, यह एक लैक्सटिव के रूप में अच्छी तरह से काम करता है। ये तेल गर्म होता है, इसलिए ये मल त्याग के प्रक्रिया को आसान बनाने और आंतरिक प्रणाली को साफ रखने में सहायक होता है।
गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छा :
 कैस्टर ऑयल गर्भाशय संकुचन पर दबाव डालकर लेबर के लिए प्रेरित करता है। इसमें रिसिनोलिक एसिड होता है, जो गर्भाशय में ईपी3 प्रोस्टेनोइड रिसेप्टर को सक्रिय करता है, जिससे प्रसव को आसान और सहज बनाने में मदद मिलती है।
अल्सर से छुटकारा दिलाने में सहायक : 
कैस्टर ऑयल को बेकिंग सोडा के साथ मिलाकर लगाने से मिनटों अल्सर से राहत मिलती है। ये कॉर्न के प्रभावी इलाज में भी सहायक है। इसमें फैटी एसिड होता है, जिसे त्वचा आसानी से अवशोषित कर लेती है। ये ओवेरियन सिस्ट को भी खत्म करता है।
जोड़ों के दर्द को कम करता है : इसका एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव पड़ता है, जिस वजह से ये गठिया के इलाज में सहायक है। इसके अलावा इस तेल की मालिश करने से जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों में सूजन और नसों के बेचैनी को कम करने में मदद मिलती है।
बालों की समस्‍या दूर करने के लिए अरंडी का तेल प्रयोग करना बहुत ही कारगर है. अरंडी का तेल बालों के बढ़ने में वृद्धि करता है. पतले हो रहे बालों को घना करने में मदद करता है. बालों का नुकसान दिखना कम करता है और बालों के नुकसान को रोकता है. सूखे बालों को पोषण और उन्हें चमक और उछाल देता है. बालों को घनापन और चमक देता है जिसके परिणामस्वरुप बाल स्वस्थ दिखते है. बालों और सिर की त्वचा को गहराई से कंडिशनिंग और नमी देता है. सिर की त्वचा का सूखापन रोकता है.
प्रयोग
उंगलियों के प्रयोग से, बाल की जड़ों और सिर की त्वचा पर उच्च मात्रा में अरंडी के तेल लगाए.
सिर की त्वचा पर तेल समान रूप से वितरित हो रहा है,यह सुनिश्चित करे.
बाकी बालों में तेल लगाने से बचें क्योंकि तेल के गाढ़ेपन से बालों से तेल धोकर निकालने में मुश्किल हो सकती है.
सिर की त्वचा पर लगाने के बाद, एक प्लास्टिक की टोपी के साथ अपने बालों को ढके और एक तौलिया में लपेटे.
तेल को कम से कम 15 से 20 मिनट तक रहने दे या रात भर भी रख सकते हैं.
बाद में अरंडी के तेल को निकालने के लिए शैम्पू के साथ धोले|.
यह उपाय हप्ते में एक बार करे और छह से आठ सप्ताह तक ऐसा करे जिससे अच्छे परिणाम दिखेंगे.
श्वेत एरण्ड : बुखार, बलगम, पेट में दर्द, शरीर में किसी भी अंग में सूजन, शरीर में दर्द, सिर दर्द, कमर में दर्द, अंडकोष वृद्धि को ठीक करने के काम आती है।
रक्त एरण्ड : पेट में कीड़े, बवासीर ( Piles ), भूख ना लगना, पीलिया संबंधी रोगों को ठीक करता है
एरण्ड के फूल : एरण्ड के फूल लाल बैंगनी रंग के एक लिंगी होते हैं। एरण्ड के फूल सर्दी के सभी रोगों जैसे सर्दी-जुकाम, ठण्ड से बुखार, बदन दर्द बलगम आदि के लिए लाभदायक है।
Menstrual problems करे दूर
यदि आपको पीरियड यानि मासिक धर्म आने में प्राब्लम है, या पीरियड में देर हो रही है या पीरियड बंद हो और अधिक दर्द हो रही है तो अरंडी का तेल उपयोग करके आप इन सभी प्रॉब्लम्स से छुटकारा पा सकते हैं| अरण्डी के तेल में emmenagogue गुण होते हाइन जो कई पीरियड सम्बंधित प्रॉब्लम्स को दूर करे हैं|
Castor oil for skin care
यदि आपकी स्किन sunburn के कारण सूज गयी है तो उसे पर अरंड का तेल लगाइए| इस तेल के एंटी इनफ्लमेटरी गुण इनफ्लमेशन कम करके आपको आराम देंगे| साथ ही sunburnके कारण काली पड़ी स्किन को वापिस सही tone मे लाने मे मदद भी मिलेगी|
यदि प्रेग्नेन्सी या मोटापे के कारण आपके पेट या कमर पर स्ट्रेच मार्क्स पड़ गये हो तो रोजाना अरंडी के तेल की मसाज करे|. 2 महीने मे वो गायब हो जायेंगे|
Ringworm या दाद होने पर एक चम्मच castor oil को 2 चम्मच कोकनट आयल मे मिलकर स्किन पर लगाने से दाद खाज खुजी दूर हो जाती है|
इसे मस्से पर लगाने से भी फ़ायदा होता है|
रेग्युलर इसका इस्तेमाल त्वचा पर करने पर age spots और फ्रेकल्स भी दूर होते हैं|
यदि आपका चेहरा, हाथ, एड़ियाँ, टाँगे आदि खुश्क (ड्राइ) रहते हैं तो आप अपनी त्वचा को अच्छे से सॉफ करके रात को सोने से पहले अरण्डी के तेल को लगा कर सो जायें| ये नुस्ख़ा आपकी स्किन को नम करने के साथ उसे सॉफ्ट, सिल्की, कोमल, मुलायम बना देगा|
इस तेल से चेहरे पर मसाज करने से आप कुछ ही मिनिट्स मे ग्लोयिंग फेस पा सकते हैं| मसाज से ब्लड फ्लो अच्छा होगा साथ ही आपकी स्किन को पोषण मिलेगा जिससे आपके फेस पर पिंक ग्लो आ जाएगा|
यदि आपकी त्वचा काली है या उस पर blackspots, dark patch, काले दाग धब्बे आदि हैं तो उस जगह पर अरण्डी का तेल रोज मलने से वो ब्लैक मार्क्स धीरे धीरे मिट जायेंगे| ऐसा castor oil के स्किन whitening गुण के कारण होता है| इतना ही नही ये आयल उस जगह पर नए टिश्यू की growth को प्रमोट करवाता है फलसवरूप डार्क और डॅमेज्ड टिश्यूस दूर हो जाते हैं और सॉफ निखरी त्वचा बाहर आ जाती है|
क्या आपके फेस पर असमय wrinkles और छोटी छोटी धारियाँ (फाइन लाइन्स) पड़ गयी हैं? आप रोजाना रात को इस आयिल से अपने सॉफ फेशियल स्किन पर मसाज करिए| इसके anti-ageing गुण signs of ageing को हटाने में काफ़ी मददगार साबित होते हैं|
चेहरे की त्वचा के लिए अरंडी के तेल के बहुत फायदे हैं जैसे की ये आयिल collagen production को तेज करवाता है इसलिए उम्र बढ़ने के प्रभाव कम करके ये आपकी स्किन को टाइट और यंगर लुकिंग रखने मे सहायता करता है|
अरण्डी आयल के मेडिसिनल गुणों के कारण इसे बहुत सारी स्किन प्रॉब्लम्स को ठीक करने मे उपयोग किया जाता है| इस oil को इसके moisturizing और हीलिंग गुणों के कारण skin care मे सदियों से उसे किया जा रहा है| ये wrinkles, acne, पिंपल्स, फेस के खुश्की (ड्राइनेस्), dark marks, acne scars और दूसरी त्वचा सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने मे असरदार माना जाता है| नीचे अरंडी के तेल के skin and face care uses दिए गये हैं|
castor oil में कमाल के घाव भरने वाले गुण पाए जाते हैं और ये गुण इसमे पाए जाने वेल यूनीक रायसीनोलिक फैटी एसिड के कारण होते हैं| ये फॅटी एसिड अरण्डी के अलावा किसी और तेल या नॅचुरल स्त्रोत मे नही पाया जाता|
आपको इसके स्किन को moisturize करने वाले गुणों के बारे मे तो पता ही है लेकिन इसमे इसके अलावा अनडीसाईंलेनिक एसिड होते हैं जिनसे इस तेल को कमाल के एंटी बॅक्टीरियल गुण मिलते हैं|. और यही गुण फेस पर acne और संक्रमण को रोकने मे काम आते हैं| साथ ही इस आयिoilल के anti inflammatory गुण मुहासे से सम्बंधित सोज को ठीक करके उसे जल्दी ठीक होने मे मदद करते हैं|

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

तिल्ली बढ़ जाने (स्प्लेनोमेगाली) के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार



तिल्ली (Spleen) पेट के निचले भाग में पीछे बाईं ओर स्थित होती है | यह पेट की सभी ग्रंथियों में बड़ी और नलिकारहित है | इसका स्वरूप अंडाकार तथा लम्बाई लगभग तीन से पांच इंच होती है | तिल्ली शरीर के कोमल और भुरभुरे ऊतकों का समूह है | इसका रंग लाल होता है |
तिल्ली का मुख्य रोग इसका आकार बढ़ जाना है | विशेष रूप से टॉयफाइड और मलेरिया आदि बुखारों में इसके बढ़ जाने का भय रहता है |
शुरू में इस रोग का उपचार करना आसान होता है, परंतु बाद में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह रोग मनुष्य को बेचैनी एवं कष्ट प्रदान करता है। तिल्ली में वृद्धि (स्प्लेनोमेगाली) होने से पेट के विकार, खून में कमी तथा धातुक्षय की शिकायत शुरू हो जाती है।
इस रोग की उत्पत्ति मलेरिया के कारण होती है। मलेरिया रोग में शरीर के रक्तकणों की अत्यधिक हानि होने से तिल्ली पर अधिक जोर पड़ता है। ऐसी स्थिति में जब रक्तकण तिल्ली में एकत्र होते हैं तो तिल्ली बढ़ जाती है।
तिल्ली वृद्धि में स्पर्श से उक्त भाग ठोस और उभरा हुआ दिखाई देता है। इसमें पीड़ा नहीं होती, परंतु यथासमय उपचार न करने पर आमाशय प्रभावित हो जाता है। ऐसे में पेट फूलने लगता है। इसके साथ ही हल्का ज्वर, खांसी, अरुचि, पेट में कब्ज, वायु प्रकोप, अग्निमांद्य, रक्ताल्पता और धातुक्षय आदि विकार उत्पन्न होने लगते हैं। अधिक लापरवाही से इस रोग के साथ-साथ जलोदर भी हो जाता है।
तिल्ली की खराबी में अजवायन और सेंधा नमक : 
अजवायन का चूर्ण दो ग्राम, सेंधा नमक आधा ग्राम मिलाकर (अथवा अजवायन का चूर्ण अकेला ही) दोनों समय भोजन के पश्चात गर्म पानी के साथ लेने से प्लीहा (तिल्ली spleen) की विकृति दूर होती है।
इससे उदर-शूल बंद होता है। पाचन समय भोजन क्रिया ठीक होती है। कृमिजन्य सभी विकार तथा अजीर्णादि रोग दो-तीन दिन में ही दूर हो जाते है। पतले दस्त होते है तो वे भी बंद हो जाते है। जुकाम में भी लाभ होता है।
तिल्ली अथवा जिगर या फिर तिल्ली और जिगर दोनों के बढ़ने पर :
   पुराना गुड डेढ़ ग्राम और बड़ी पीली हरड़ के छिलके का चूर्ण बराबर वजन मिलाकर एक गोली बनाये और ऐसी दिन में दो बार प्रात: सायं हल्के गर्म पानी के साथ एक महीने तक ले। इससे यकृत और प्लीहा यदि दोनों ही बढे हुए हो, तो भी ठीक हो जाते है। इस प्रयोग को तीन दिन तक प्रयोग करने से अम्लपित्त का भी नाश होता हैं।
प्लीहा वृद्धि (बढ़ी हुई तिल्ली) :
अपराजिता की जड़ बहुत दस्तावर है। इसकी जड़ को दूसरी दस्तावर और मूत्रजनक औषधियों के साथ देने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है|
अन्य घरेलु उपयोग :
गिलोय के दो चम्मच रस में 3 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण और एक-दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से तिल्ली का विकार दूर होता है।
बड़ी हरड़, सेंधा नमक और पीपल का चूर्ण पुराने गुड़ के साथ खाने से तिल्ली में आराम होता है।
त्रिफला, सोंठ, 
*कालीमिर्च, पीपल, सहिजन की छाल, दारुहल्दी, कुटकी, गिलोय एवं पुनर्नवा के समभाग का काढ़ा बनाकर पी जाएं।
*1/2 ग्राम नौसादर को गरम पानी के साथ सुबह के वक्त लेने से रोगी को शीघ्र लाभ होता है।
*दो अंजीर को जामुन के सिरके में डुबोकर नित्य प्रात:काल खाएं| तिल्ली का रोग ठीक हो जाएगा। 
* कच्चे बथुए का रस निकालकर अथवा बथुए को उबालकर उसका पानी पीने से तिल्ली ठीक हो जाती है | इसमें स्वादानुसार नमक भी मिला सकते हैं |
* आम का रस भी तिल्ली की सूजन और उसके घाव को ठीक करता है | 70 ग्राम आम के रस में 15 ग्राम शहद मिलाकर, प्रात:काल सेवन करते रहने से दो-तीन सप्ताह में तिल्ली ठीक हो जाती है | निरंतर इसका प्रयोग करते समय खटाई से बचे |
*. पेट पर लगातार एक माह तक चिकनी गीली मिट्टी लगाते रहने से भी तिल्ली रोग में लाभ होता है |
*. तिल्ली के विकार में नियमित रूप से पपीते का सेवन लाभदायक है |
* गाजर में राई आदि मिलाकर बनाया गया अचार खिलाने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
* 25 ग्राम करेले के रस में थोड़ा सा पानी मिलाकर दिन में दो-तीन बार पीने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
* लम्बे बैंगनों की सब्जी नियमित खाने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक होती है |
*पहाड़ी नीबू दो भागों में काटकर उसमें थोड़ा काला नमक मिश्रित कर हीटर या अंगीठी की आंच पर हल्का गर्म करके चूसने से लाभ होता है |
* गुड़ और बड़ी हरड़ के छिलके को कूट-पीसकर गोलियां बना लें | प्रातः-सायं हल्के गरम पानी से एक महीने तक सेवन करने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
* छोटे कागजी नीबू को चार भागों में काट लें | एक भाग में काली मिर्च, दूसरे भाग में काला नमक, तीसरे में सोंठ और चौथे हिस्से में मिश्री अथवा चीनी भर दें | रातभर के लिए ढककर रखें | प्रातःकाल जलपान से एक घंटा पहले, हल्की आंच पर गरम करके चूसने से लाभ होता है |
*. तिल्ली के विकार में नियमित रूप से पपीते का सेवन लाभदायक है |
*सेंधा नमक और अजवायन ( Rock Salt and Parsley ) : आप प्रतिदिन 2 ग्राम अजवायन में ½ ग्राम सेंधा नमक मिलाएं और उन्हें अच्छी तरह पीसकर पाउडर तैयार करें. इस पाउडर को आप गर्म पानी के साथ लें आपको तिल्ली की वृद्धि में अवश्य लाभ मिलेगा.
*त्रिफला और काली मिर्च ( Triphala and Black Pepper ) :
 आपको एक काढ़ा तैयार करना है जिसके लिए आपको कुछ जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी जो इस प्रकार है. आप सौंठ, दारुहल्दी, गियोल, सहिजन की छल, पीपल, त्रिफला, काली मिर्च और पुनर्नवा. इस सामग्री के मिश्रण से आप एक काढ़ा तैयार कर लें और उसे पी जायें. शीघ्र ही आपको प्लीहा रोग से मुक्ति मिलेगी.
गिलोय और शहद : 3 ग्राम पीपल लेकर उसका पाउडर बना लें और उसमे 2 चम्मच गियोल के रस के मिलाएं. इसके ऊपर से आप 2 चम्मच शहद के भी डाल लें और इस मिश्रण को चाटें. इससे भी आपको तिल्ली विकार से आराम मिलता है.

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

शहद सेवन करने के साथ रखें सावधानी! Keep taking honey with caution!

    

   शहद को आयुर्वेद में अमृत माना गया है। रोजाना सही ढंग से शहद लेना सेहत के लिए अच्छा होता है। लेकिन गलत तरीके से शहद का सेवन करने से फायदे की जगह नुकसान भी हो सकता है। इसलिए जब भी शहद का सेवन करें नीचे लिखी बातों को जरूर ध्यान में रखें।
*मांस, मछली के साथ शहद का सेवन जहर के समान है।



* शहद में पानी या दूध बराबर मात्रा में हानिकारक है।
* चीनी के साथ शहद मिलाना अमृत में विष मिलाने के समान है।
* एक साथ अधिक मात्रा में शहद न लें। ऐसा करना नुकसानदायक होता है। शहद दिन में दो या तीन बार एक चम्मच लें।
*घी, तेल, मक्खन में शहद जहर के समान है।
* शहद खाकर किसी तरह की परेशानी महसूस हो रही हो तो नींबू का सेवन करें।
* चाय, कॉफी में शहद का उपयोग नहीं करना चाहिए। शहद का इनके साथ सेवन जहर के समान काम करता है।
* अमरूद, गन्ना, अंगूर, खट्टे फलों के साथ शहद अमृत है।
* इसे आग पर कभी न तपायें।

जहर के समान है खाली पेट ये चीजें खाना This stuff is poison to eat on an empty stomach

   जरूरत से ज्यादा और बेवक्त खाया खाना जहर के सामान होता है। इससे पेट खराब या अन्य कई परेशानियां हो सकती है। खाने-पीने की ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जिन्हें अगर खाली पेट खा लिया जाए तो सेहत का खराब होना तय है।
आज हम आपको उन्हीं चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं जो खाली पेट खानी जहर के सामान होती है। 




सोडा-

ज्यादा कार्बोनेट की वजह से एसि़ड की समस्या होती है। सोडा खाली पेट में अम्ल के साथ मिलकर पेट में दर्द की वजह बनता है। इसके अलावा इससे सीने और आंतों में जलन भी होती है।
कच्चा टमाटर-
कच्चा टमाटर खाना यूं तो बहुत ही फायदेमंद होता है लेकिन इसे सुबह खाली पेट खाने से बचें क्योंकि इसमें मौजूद खट्टा अम्ल पेट में उपस्थित गैस्ट्रोइंटस्टानइल एसिड के साथ क्रिया करके पेट दर्द, गैस और सीने में जलन पैदा करता है। खाली पेट टमाटर खाने से पथरी होने का खतरा भी दोगुना हो -जाता है।



शकरकंद-

शकरकंद आपको भले ही कितनी भी पसंद क्यों न हो लेकिन उसे खाली पेट खाने से बचना चाहिए। शकरकंद में टैनीन और पैक्टीन पाया जाता है, जिससे खाली पेट खाने से गैस्ट्रिक एसिड की परेशानी होती है। इससे सीने में जलन और गैस की प्रॉबलम भी होती है।
केला-
वैसे तो केले को अगर दूध के साथ खाया जाए तो वजन बढ़ता है लेकिन इसे खाली पेट खाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे शरीर में मैग्नीशियम की मात्रा दोगुनी हो जाती है। शरीर में मौजूद कैल्शियम के साथ रसायनिक प्रक्रिया बनाती है। इससे बदहजमी, गैस और एसिड की समस्या होती है।
दवाइयां-
कुछ खास दवाइयों को छोड़कर ज्यादातर दवाइयां खाना खाने के बाद ही खाई जाती है। इसका कारण यही है कि इन दवाओं में मौजूद तत्व शरीर के तत्वों के साथ सीधे घुलकर रसायनिक क्रिया करते हैं, जिसके भयंकर परिणाम होते हैं इसलिए कोई भी दवा लेने से पहले डॉक्टर से जरूर राय लेनी चाहिए।

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

घरेलू उपायों से टांसिल को करें दूर Domestic measures to remove the tonsils


     गले के प्रवेश द्वार के दोनों ओर मांस की एक-एक गांठ होती है| यह बिलकुल लसीका ग्रंथि की तरह होती है| इसी को टांसिल कहते हैं| इस रोग के कारण खाने-पीने में बड़ी तकलीफ होती है| यहां तक की थूक को निगलने में भी कष्ट होता है|गले पर कपड़ा तक सहन नहीं होता| यदि कोई व्यक्ति रोगी को जूठा भोजन-पानी आदि का सेवन कर ले तो उसे भी टांसिल हो सकता है|
   टांसिल गले में होने वाली समस्या है। किसी भी प्रकार का संक्रमण या इन्फेक्शन टांसिल की समस्या का कारण बन सकता है । टांसिल रोग की समस्या वहां ज्यादा पैदा होती है ,जहां का वातावरण शुद्ध नहीं होता ,वायु के द्वारा निरन्तर जहरीले तत्त्व हमारे शरीर के अंदर प्रविष्टि करते है। इस रोग के होने के कई कारण ओर भी हो सकते है जैसे खाने-पीने में लापरवाही, कभी कुछ ज्यादा ठंडे पदार्थ का सेवन कर लेना ।इस रोग के होने के कारण गले में दर्द होना शुरू हो जाता है।


टांसिल (गिल्टियां) का कारण

    टांसिल सूजने या बढ़ने का मुख्य कारण गरिष्ठ पदार्थों जैसे-मैदा, चावल, आलू, मिठाइयां, उरद की दाल, चीनी आदि का अधिक सेवन करना है| अधिक खट्टी चीजें तथा अम्लीय पदार्थ खाने से भी टांसिल बढ़ जाते हैं| इन चीजों में अम्लीयता का अंश अधिक होने से पेट में कब्ज हो जाता है तथा वायु बढ़ जाती है| इससे टांसिल में विषैला विकार उत्पन्न हो जाता है| गले और शरीर में ठंड लगने के कारण भी टांसिल बढ़ जाते हैं| शरीर में खून की अधिकता, मौसम में अचानक परिवर्तन, गरमी-सर्दी का बुखार, दूषित पर्यावरण में निवास तथा बासी भोजन करने के कारण भी टांसिल हो जाता है|
टांसिल (गिल्टियां) की पहचान
    टांसिल बढ़ जाने पर गले में सूजन आ जाती है| गले तथा गलपटों में बार-बार दर्द की लहर दौड़ती है| जीभ पर मैल जम जाती है तथा दुर्गंध भरी श्वास बाहर निकलती है| सिर एवं गरदन में दर्द शुरू हो जाता है| गरदन के दोनों तरफ लसिका ग्रंथियां बढ़ जाती हैं| यदि उन पर उंगली रखी जाए तो दर्द होता है| सांस लेने में भी कठिनाई होती है| सारे शरीर में दर्द, स्वर भंग, व्याकुलता, आलस्य आदि के लक्षण साफ-साफ दिखाई देते हैं| गलपटे सूजते ही ठंड लगती है और बुखार आ जाता है|
* गुनगुने पानी में नींबू का रस डालकर उसमें नमक,शहद डालकर इसके सेवन से टांसिल से राहत पाई जा सकती है।
*बर्फ के कुछ टुकड़े को एक कपड़े में डालकर टॉन्सिल वाली जगह पर रख कर सेंके।
* सिंघाड़े में आयोडीन की प्रचुर मात्रा होती है। इसलिए नियमित रूप से सिंघाड़े खाने से गले को लाभ मिलता है और टान्सिल से मुक्ति।
पान, मुलहठी और लौंग
*पान का पत्ता, आधा चम्मच मुलहठी का चूर्ण, दो लौंग तथा 4-5 दाने पीपरमेंट-इन सबको एक कप पानी में औटाकर काढ़ा बनाकर पिएं|*पीपल के पेड़ के हरे पत्तों का दूध एक चम्मच निकालकर गरम पानी में घोल लें| फिर इस पानी से गरारे करें|
*गरम पानी और शहतूत



*गरम पानी में दो चम्मच शहतूत के पत्तों का रस डालकर गरारे करें|

* गन्ने के जूस के साथ हरड़ का चूर्ण लेकर पीने से गला दर्द और टान्सिल जल्दी ठीक हो जाते हैं।
*गरम पानी में लहसुन को बारीक पीसकर मिला लें और इस पानी से कुछ दिनों तक लगातार गरारे करने से टान्सिल की बीमारी ठीक हो जाएगी।
*रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में थोड़ी सी हल्दी और काली मिर्च पाउडर डालकर इसका सेवन करने से टांसिल से राहत पाई जा सकती है।
*तुलसी और लौंग
तुलसी के चार-पांच पत्ते तथा दो लौंग पानी में डालकर उबालें| फिर छानकर इस पानी में गरारे करें|
पानी, अदरक और हल्दी-
सादे पानी में अदरक का रस तथा पिसी हुई हल्दी डालकर रात को सोते समय सेवन करें|
* पानी में चाय की पत्तियों को उबालकर उसका गरारे करने से भी टान्सिल का रोग ठीक हो जाता है।
* गले में दर्द, सूजन और टान्सिल को दूर करने के लिए गरम पानी में नमक डालकर गरारे करें।
*अनानास के सेवन करने से थोड़े ही दिनों में टान्सिल खत्म हो जाते हैं।
फिटकिरी, माजूफल, शहद और पानी-
लाल फिटकिरी तथा माजूफल - दोनों 10-10 ग्राम लेकर एक कप पानी में उबाल लें| जब पानी आधा कप रह जाए तो छानकर उसमें एक चम्मच शुद्ध शहद डालें| इसे रुई की फुरेरी से टांसिल में लगाएं|

फिटकिरी और अजवायन-



फिटकिरी का चूर्ण तथा अजवायन का चूर्ण - दोनों को पानी में घोलकर गाढ़ा-गाढ़ा लेप गले के बाहर करें|
गरम पानी-
गरम पानी में थोड़ी-सी चायपत्ती डालकर छान लें| फिर इस पानी से दिन में तीन बार गरारे करें|
दालचीनी और शहद-
दालचीनी को पीसकर उसमें थोड़ा शहद मिला लें| फिर इसे टांसिल पर लगाएं| लार नीचे टपका दें|
तुलसी और शहद-
आधा चम्मच तुलसी की मंजरी को शहद में मिलाकर सुबह-शाम चाटने से टांसिल सूख जाते हैं|
* नियमित गाजर का रस पीते रहने से गले का दर्द और टान्सिल खत्म हो जाता है।
गरम पानी और सेंधा नमक-
गरम पानी में दो चुटकी सेंधा नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें| फिर उस पानी से दिनभर में तीन-चार बार कुल्ला करें|
* फिटकरी और नमक को गरम पानी में डालकर गरारे करते रहने से टान्सिल ठीक हो जाते हैं।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

गाजर के फायदेह: HEALTH BENEFITS OF CARROTS.




गाजर में ढेरों औषधीय गुण छिपे हुए हैं। चिकित्सकों के मुताबिक गाजर गरम तथा तर होने के कारण यह पेशाब लाने वाली, कफ निकालने वाली, दिमाग को बल देने वाली, वीर्यवर्धक तथा मन को प्रसन्न रखने वाली होती है। गाजर को कच्चा तथा उबालकर सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।
गाजर का रस शरीर की ताकत व आत्मबल को बढ़ाता है। गाजर ह्रदय की धमनियों को ठीक रखती है| वह बीमारियाँ जिनमें मीठा लेना मना होता है, जैसे मधुमेह आदि को छोड़कर प्राय: प्रत्येक रोग में गाजर का इस्तमाल किया जा सकता है। फल-सब्जियों में मिलने वाले मिनरल, विटामिन्स तथा खनिज इनको कुदरती रूप में ही खाने से हमारे शरीर में आसानी से पहुँच पाते हैं। उबालकर, छीलकर या तेल में तलकर इनके काफी गुण नष्ट हो जाते है ,इसलिए कोशिश करें की फल-सब्जियों को कच्चा छिलके सहित ही खाएं | शरीर के अंगों का निर्माण खाद्य पदार्थों से प्राप्त होने वाले खनिजो और लवणों से होता है। हमारे शरीर की सफाई शरीर से निकलने वाले पसीने, मल, कफ से होती है।
गाजर शरीर से गंदे पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है। और तो और, अल्सर जैसी खतरनाक बीमारी में भी गाजर फायदा करती है। कमजोरी से अगर आपको चक्कर आते हों तो गाजर खाना आपके लिए संजीवनी बूटी का काम करेगा।
गाजर के जूस से मिलेगी राहत-
पीरियड्स के दौरान अगर आपको भी इन तकलीफों का सामना करना पड़ता है तो गाजर का जूस पीना आपके लिए बहुत फायदेमंद रहेगा. गाजर का जूस काफी आसानी से मिल भी जाता है. अगर जूस न पीना चाहें तो गाजर खाना भी उतना ही फायदा देगा. किसी भी रूप में गाजर का सेवन करना पीरियड्स के दौरान फायदेमंद रहता है. ये ब्लड-फ्लो को ठीक रखता है, दर्द में राहत देता है और चिड़चिड़ाहट को भी कम करता है.



आयरन से भरपूर -

पीरियड्स के दौरान खून निकलने से अनीमिया की समस्या भी हो सकती है. ऐसे में आयरन की मात्रा लेते रहना फायदेमंद रहेगा.यह एक सबसे प्रमुख कारण है जिसकी वजह से पीरियड्स में गाजर खाने की सलाह दी जाती है.

दर्द से आराम दिलाये- 

गाजर न केवल ब्लड फ्लो को नियंत्रित करने का काम करता है बल्क‍ि इस दौरान होने वाले दर्द में भी राहत दिलाता है. साथ ही मूड को भी ठीक रखता है. आप चाहें तो गाजर को चबा-चबाकर खा सकती हैं लेकिन अगर दर्द बहुत ज्यादा है और आप कुछ भी करने की हालत में नहीं हैं तो इसका जूस फायदेमंद रहेगा. दिन में एक या दो गिलास गाजर का जूस पीने से दर्द में राहत मिलेगी.
बीटा कैरोटीन से भरपूर -
पीरियड्स के दौरान बीटा कैरोटीन से भरपूर चीजों का सेवन करना फायदेमंद रहता है. ये हैवी ब्लड फ्लो को नियंत्रित करने का काम करता है.
*गाजर में विटामिन ‘ई’ प्रचुर मात्रा में होता है। इसमें एक विशेष गुण यह रहता है कि इसके सेवन से नवीन रक्त का निर्माण शीघ्रता एवं प्रचुरता के साथ होता है। इसलिए यह प्रकृति-प्रदत्त उत्तम टॉनिक का कार्य भी करती है। इससे रक्त में कैंसर के कोष विकसित नहीं हो पाते। गाजर के जूस का कुछ दिनों तक सेवन करते रहने से खांसी, दमा, पेशाब की जलन तथा पथरी से पीड़ित व्यक्तियों को लाभ मिलता है। गाजर के पाक तथा मुरब्बे का सेवन करने से शरीर पुष्ट बनता है।
*क्‍या आपको पता है कि पुरुषों के पास अब एक नहीं बल्‍कि ऐसे अनेको कारण है जिससे वह अब गाजर को अपनी प्‍लेट में शामिल कर सकते हैं। केवल सेब ही नहीं बल्‍कि गाजर भी डॉक्‍टर से दूर रखती है। गाजर भी उन्‍हीं सब्‍जियों में से सबसे लाभदायक है जो आपको बाजार में मिलती हैं। हम सोंचते हैं कि गाजर में भला ऐसा क्‍या है तो इसका जवाब है बीटा कैरोटीन, जो कि पुरषों के लिये हर लिजाह से अच्‍छी होती है।
*स्वदेशी चिकित्सा पद्धति में ‘आयुर्वेद’ गाजर को यौन शक्तिवर्धक टॉनिक मानती है। गाजर और मूली के रस को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर नियमित पीते रहने से लिंग की दुर्बलता दूर होने के साथ यौन शक्ति में अत्यन्त लाभ होता है। दुबले एवं शुक्र दौर्बल्य से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह प्रकृति प्रदत्त बेहतरीन तोहफा है। ऐसे व्यक्तियों को गाजर का पाक या खीर कुछ दिनों के लिए लगातार सेवन करना चाहिए। शहद में तैयार किया गया गाजर का मुरब्बा अत्यंत कामोत्तेजक होता है।
*बच्चों के दांत निकलने के समय गाजर के रस को पिलाते रहने से दांत आसानी से निकल जाते हैं तथा दूध भी उचित रूप से हजम होने लगता है। बच्चा जब चलने के लायक हो जाए तो उसे गाजर और संतरे का रस मिलाकर देने से वह ताकतवर बनकर शीघ्रता से चलने लगता है। गाजर के रस का पान हमेशा दोपहर में ही करना अत्यधिक लाभप्रद होता है। हमेशा ताजा गाजरों का ही रसपान करना चाहिए। रसपान के तुरन्त बाद या पहले भोजन नहीं करना चाहिए।
*शरीर में खनिज नहीं पहुँचने से शरीर की सफाई पूरी तरह से नहीं होती है | सब्जियाँ जैसे गाजर, मूली, टमाटर ,नींबू (Lemon) से प्राप्त मिनरल रोग-निवारक और शारीरिक सुन्दरता बढ़ाने वाले होते है। (Alkaline) क्षारीय होने से गाजर रक्त साफ करती है। गाजर के गुण दूध तथा Cod liver oil और लाल पाम के तेल के गुणों के समान होते हैं। जो लोग Cod liver oil लेना नहीं चाहते हों, वे गाजर से समान लाभ ले सकते हैं। गाजर और सेब के गुण भी मिलते-जुलते हैं।



*एक्‍सपट्स का कहना है कि पुरुषों को हफ्ते में दो दिन गाजर जरुर खानी चाहिये। इससे उन्‍हें कई तरह की बीमारियों से लड़ने की शक्‍ति प्राप्‍त होगी। यह पीलिया की प्राकृतिक औषधि है। इसका सेवन ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर ) और पेट के कैंसर में भी लाभदायक है। इसके सेवन से कोषों और धमनियों को संजीवन मिलता है। गाजर में बिटा-केरोटिन नामक औषधीय तत्व होता है, जो कैंसर पर नियंत्रण करने में उपयोगी है।

स्‍पर्म की क्‍वालिटी बढाए-
बताया जाता है कि गाजर खाने से स्‍पर्म की क्‍वालिटी सुधरती है। अगर आप अपनी फेमिली शुरु करने की सोंच रहे हैं तो आपको कच्‍ची गाजर खाना शुरु कर देनी चाहिये।
पाचन के लिये अगर आपको पाचन संबन्‍धी समस्‍या है तो आप दिन में दो लाल गाजर खाएं, इससे आपका पेट एक दम सही रहेगा
गाजर के फायदे और इसकी रोगों से लड़ने की शक्ति-
लगातार उम्र बढ़ने से शरीर कमजोर होता जाता है। इस कमजोरी की पूर्ति गाजर से हो जाती है जिसके कारण रोग अपने आप ही दूर हो जाते हैं। गाजर के रस या जूस से रक्त में बढ़ोतरी होती हैं |
गाजर का रस पीने से पाचन तन्त्र मजबूत होता है। गाजर के गूदे के बीच में सख्त लम्बी लकड़ी होती है, इसमें बीटा-कैरोटिन नामक औषधीय तत्व पाया जाता है। यह कैंसर नियंत्रण करने में उपयोगी है।



कच्ची गाजर चबाकर खाने से सबसे ज्यादा लाभ होता है। गाजर की पत्तियों में गाजर से 6 गुना अधिक आयरन होता है।

*अगर कोई लम्बी बीमारी से बाहर निकला है तो उसके शरीर में कई प्रकार के विटामिन की कमी हो जाती है उसकी क्षतिपूर्ति करने में गाजर का जूस बहुत ही प्रभावकारी है। इससे रोगी चुस्त, ताजगी से भरपूर और शक्तिशाली बनता है।
रक्तवर्धक गाजर कई रंग की होती है। सभी प्रकार की गाजरों के गुण समान होते हैं। काली गाजर में आयरन अधिक होने से यह सबसे अच्छी होती है। पतली और छोटी गाजर स्वादिष्ट, पौष्टिक और गुणों से भरपूर होती है।
रक्तवर्धक—
गाजर, पालक, चुकन्दर का मिश्रित रस एक-एक गिलास प्रतिदिन दो बार पीने से खून बढ़ता है।
नेत्र ज्योति कम होना-
विटामिन ‘ए’ की कमी से नेत्रज्योति कमजोर होते-होते व्यक्ति अंधा भी हो सकता है। गाजर विटामिन ‘ए’ का भण्डार है। लम्बे समय तक गाजर और पालक का एक गिलास रस पीते रहने से चश्मा भी हट सकता है।
*घी में और खुले बर्तन में तेज आंच पर पकाने से विटामिन ए पूरी तरह नष्ट हो जाता है | तो अगर आप आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए गाजर का सेवन करना चाहते है तो काली गाजर का रस ही पियें |
गाजर के रस के लाभ –
गाजर और पालक के रस में भुना हुआ जीरा, काला नमक मिलाकर पीने से इसकी गुणवत्ता बढ़ जाती है। गाजर का रस हर प्रकार के ज्वर, दुर्बलता, नाड़ी सम्बन्धी रोग, अवसाद की अवस्था में लाभदायक है।
*सर्दी के मौसम में गाजर के सेवन से शरीर गर्म रहता है और सर्दी से बचाव होता है।
गाजर में दूध के समान गुण हैं। गाजर का रस दूध से भी उत्तम है। दूध नहीं मिलने पर गाजर सेवन करके दूध के सारे गुण प्राप्त किये जा सकते हैं।
*गाजर के रस में शहद मिलाकर पीने से शक्ति बढ़ती है, शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली यानि (immune system) मजबूत होता है| गाजर के रस में मिश्री व काली मिर्च मिलाकर पीने से खाँसी ठीक हो जाती है तथा ठंड से उत्पन्न कफ भी दूर होता है।
*गाजर के छोटे-छोटे टुकड़े 150 ग्राम, तीन टुकड़े लहसुन, पाँच लौंग लेकर सबकी चटनी बनाकर प्रतिदिन एक बार सुबह खाने से सर्दियों में होने वाली बीमारिया जैसे जुकाम, कफ आदि दूर रहते है |
गाजर के और आंवला के रस में काला नमक मिलाकर प्रतिदिन पियें। इससे पेशाब की जलन और अन्य बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।
*गाजर के हरे पत्तों से सब्जी बनती है। गाजर की सब्जी बनाते समय पानी नहीं फेंके क्योकि उसमे काफी पोषक तत्व होते है।
*गाजर कद्दूकस करके दूध में उबालकर प्रतिदिन लें। यह बहुत पौष्टिक आहार होता है |

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

गुलाब के फूल के औषधीय गुण Medicinal properties of roses


गुलाब बेहद सुंदर और खुशबूदार पौधा है जो अपने इन गुणों की वजह से सभी लोगों को अच्छा लगता है। लेकिन क्या आपको पता है यह पौधा अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। गुलाब का पौधा व गुलाब का फूल पूरे भारत में मिलता है। यह फूल विटामिन सी से भरपूर होता है। साथ ही साथ गुलाब के फूलों का रस खून को साफ भी करता है। गुलाब का शर्बत दिमाग को शीतल और शक्ति देता है। आयुर्वेद में गुलाब को महाकुमारी, शतपत्री व तरूणी आदि नामों से जाना जाता है।गुलाब के फूल को कोमलता और सुंदरता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत फूल ही नहीं है, बल्कि कई तरह के औषधिय गुणों से भी भरपूर है। गुलाब की सुगंध ही नहीं इसके आंतरिक गुण भी उतने ही अच्छे हैं। इसके फूल में कई रोगों के उपचार की क्षमता है।
*दरअसल गुलाब लैक्सेटिव और ड्यूरेटिक गुणों से भरपूर है, जिससे यह मेटाबॉलिज्म ठीक करता है और पेट के टॉक्सिन हटाता है। इससे वजन घटाने में मदद मिलती है| आज हम आपको गुलाब के फूल के ऐसे ही कई उपयोगों के बारे में बताने जा रहे है|
इसकी हर पंखुड़ी में समाए हैं अनगिनत गुण। त्वचा को सुंदर बनाने से लेकर शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने में गुलाब बहुत काम आता है|
*लाल गुलाब के फूल हमारी ऊर्जा में वृद्धि करते हैं। ये हमारी ‘एड्रीनल ग्रंथि’ को प्रभावित करते हैं। लाल गुलाब की पंखुड़ियों से निर्मित गुलकंद हमारे उदर विकारों को दूर कर शरीर की गर्मी को कम करता है। इसके नियमित सेवन से हमारे होंठ गुलाब की पंखुड़ी जैसे ही लाल बनते हैं। फूलों से बने मुकुट को किसी निश्चित समय के लिए पहनना ‘पुष्प आयुर्वेद’ की उपचार पद्धति का हिस्सा रहा है। प्राचीन वैद्यों में ‘चक्रम’, ‘भगवान’ आदि को पुष्प चिकित्सा में महारत हासिल थी। उन्होंने इस पद्वति का सफलतापूर्वक सुनियोजित तरीके से प्रयोग किया। फूलों की सुगंध, उन्हें तोड़ने के समय, दवा में प्रयोग की विधि, दवा लगाने में किस तरह की चीजों का प्रयोग करना चाहिए आदि का पता देती है। वर्तमान समय में सेहत और पर्यटन के बढ़ते महत्व के कारण पुष्प आयुर्वेद को एक नई पहचान मिली है। निजी क्षेत्र के बहुत सारे आयुर्वेदिक संस्थान इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ा रहे हैं। ऋषिकेश स्थित ‘आनंदा’ तथा केरल में अनेक पर्यटक स्वास्थ्य गृहों में पुष्प चिकित्सा का प्रयोग हो रहा है। उत्तरांचल के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भी विभिन्न आश्रम इस विधि को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में फूलों का प्रयोग किया जा रहा है।



*गुलाब के फूल की पंखुड़ियां खाने से मसूढ़े और दांत मजबूत होते हैं। मुंह की बदबू दूर होती है और पायरिया रोग से भी निजात मिल जाती है।

*गुलाब आंखों के लिए, जलन और मुंख संबंधी कई विकारों को दूर करता है। फिटकरी में गुलाबजल को मिलाकर इस्तेमाल करने से कई रोग खत्म होते हैं। विटामिन सी की कमी को दूर करने के लिए गुलकंद एक बेहद उपयोगी दवा का भी काम करती है
गुलाब के फूल (Rose) के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण
*वजन घटाने में फायदेमंद
गुलाब में मौजूद लैक्सेटिव और ड्यूरेटिक गुण मेटाबॉलिज्म तेज करने में मदद करते है| मेटाबॉलिज्म तेज होने पर शरीर में कैलोरी लॉस होने लगता है, नतीजनत् वजन नियंत्रित रहता है| वजन को कम करने के लिए आर्युवेद में भी गुलाब का इस्तेमाल किया जाता है| अगर आप भी अपने बढ़ते वजन से परेशान है तो गुलाब की कुछ पत्तियाँ(करीब 2०) को एक ग्लास पानी में डालकर उबालें। उबालने से पहले इन्हे साफ़ करना ना भूले|
आपको पानी को तब तक उबालना है जब तक पानी का रंग गहरा गुलाबी न लगने लगे। फिर इसमें एक चुटकी इलायची पाउडर और एक चम्मच शहद मिलाएं। अब इस मिश्रण को छन्नी से छानकर दिन में दो बार लें। इसके सेवन से आपका वजन भी कम होता है और तनाव भी दूर होने में मदद मिलती है|
*


गुलाब से बने गुलकंद में विटामिन बी, सी और ई भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। भोजन करने के बाद गुलकंद के सेवन से पाचन से जुड़ी समस्याएं दूर हो जाती है|

गुलाब की पत्तियों को पीसकर होंठो पर लगाने से फटे होंठो की समस्या से निजाद मिलती है| इसे होंठो में लगाना थोड़ा मुस्किल होता है, तो आप थोड़ा ग्लिसरीन मिला सकते है|
*यदि किसी को गर्मी के कारण सिरदर्द हो रहा हो तो, गुलाब को पीस कर लेप बनाकर सिर पर लगाने से सिर दर्द थोड़ी देर में गायब हो जाता है।
रोज सुबह चेहरा धोने के बाद गुलाब जल में नीबू की कुछ बूंदें मिला कर हल्के हाथों से चेहरे पर लगाकर धोने से त्वचा का कालापन दूर होता है|
*डीहाइड्रेशन से बचाये-
गुलाब की पत्तियों से आप गुलकंद बना सकते है| गुलकंद का सेवन आपको डीहाइड्रेशन से बचाता है| इससे शरीर को ठंडक मिलती है जिससे आप तरोताजा महसूस करते है| यदि आप काम के बाद बहुत थका महसूस करते है तो गुलकंद जरूर खाए, ये आपके शरीर को स्फूर्ति देगा| इससे थकान और शरीर का दर्द दोनों दूर होता है|रतौंधी नामक आँखों के रोग के रोग और गर्मी के कारण आँखों में होने वाली जलन को दूर करने के लिए गुलाब जल का इस्तेमाल एक बहुत अच्छी दवा है|
*यदि किसी को चेचक हो गया हो तो गुलाब की पंखुडियां को सूखाकर चूर्ण बना लें, फिर इस इस चूर्ण को चेचक के रोगी के बिस्तर पर डाले| इससे पीड़ित को ठंडक और आराम मिलता है।
*नियमित तौर पर सुबह-शाम एक चम्मच गुलकंद खाने से मसूढ़ों में दर्द या खून आने की समस्या से निजाद मिलती है| यहाँ तक की मासिक धर्म के दौरान भी गुलकंद खाने से पेट दर्द में आराम मिलता है।
*गुलकंद एक आयुर्वेदिक टॉनिक है। गुलाब के फूल की भीनी-भीनी खुशबू और पंखुड़ियों के औषधीय गुण से भरपूर गुलकंद को नियमित खाने पर पित्त के दोष दूर होते हैं तथा इससे कफ में भी राहत मिलती है। गर्मियों के मौसम में गुलकंद कई तरह के फायदे पहुंचाता है। हाजमा दुरुस्त रखता है और आलस्य दूर करता है। गुलकंद शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है और कब्ज को भी दूर करता है। सुबह-शाम एक-एक चम्मच गुलकंद खाने पर मसूढ़ों में सूजन या खून आने की समस्या दूर हो जाती है। पीरियड के दौरान गुलकंद खाने से पेट दर्द में आराम मिलता है। मुंह का अल्सर दूर करने के लिए भी गुलकंद खाना फायदेमंद होता है।
*गुलकंद इस तरह बनाएं: ताजे गुलाब की पंखुड़ियों को अच्छी तरह से धोकर पानी निथार लें। जितनी मात्र में पंखुड़ियां हैं, उतनी मात्र में मिश्री या मोटी चीनी लें। अच्छी तरह मिला कर एक शीशे के जार में रखें। दस दिन तक लगातार धूप दिखाएं। गुलकंद तैयार है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये



गुलाब में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाये जाते है| इसलिए इसकें सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है| सुबह सुबह यदि खाली पेट ताजे गुलाब की २-३ कच्ची पंखुड़ियां खा ली जाएं, तो दिन भर के लिए ताजगी मिलती है। दरहसल गुलाब एक बेहद अच्छा ब्लड प्यूरिफायर है। पेट दर्द और यूरीन से जुड़ी दिक्कतों में भी गुलाब की पत्तियों का पानी लाभप्रद साबित होता है।

त्वचा के लिए फायदेमंद
सिर्फ गुलाब ही नहीं,गुलाब जल के फायदे  भी बहुत है| यदि आप अपने चेहरे पर मुहांसो से परेशान है तो त्वचा पर चन्दन या फिर मुल्तानी मिटटी में गुलाब जल मिलाकर लगाये| सूखने तक रखे फिर धो ले| कुछ दिन तक नियमित इस प्रयोग को करने से त्वचा के मुँहासे और उससे होने वाले दाग दोनों खत्म हो जाते है|
*अगर आपकी त्वचा शुष्क है, तो गर्मियों में अपनी त्वचा पर चंदन पाउडर में गुलाब जल मिला कर लगाएं। त्वचा मुलायम होगी और पिंपल्स से भी निजात मिलेगी। रोज सुबह चेहरा धोने के बाद एक चम्मच गुलाब जल में नीबू की कुछ बूंदें मिला कर हल्के हाथों से लगा कर धोएं। इससे त्वचा का कालापन कम हो जाएगा। मुहांसों के पुराने दागों पर नियमित गुलाब जल में शहद मिला कर लगाएं। दाग दूर हो जाएंगे।
*अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्रोंकाइटिस, डायरिया, कफ, फीवर, हाजमे की गड़बड़ी में गुलाब का सेवन बेहद उपयोगी होता है।
*गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल चाय बनाने में भी होता है। इससे शरीर में जमा अतिरिक्त टॉक्सिन निकल जाता है। पंखुड़ियों को उबाल कर इसका पानी ठंडा कर पीने पर तनाव से राहत मिलती है और मांसपेशियों की अकड़न दूर होती है।
*पेट दर्द, यूरीन से जुड़ी दिक्कतों में भी गुलाब की पंखुड़ियों का पानी कारगर साबित होता है।
*अर्जुन की छाल और देसी गुलाब मिलाकर पानी में उबाल लें। यह काढ़ा पीने से दिल से जुड़ी बीमारियां खत्म होती हैं। दिल की धड़कन बढ़ रही हो तो सूखी पंखुड़ियां उबालकर पिएं।
दिल का रखे ख़याल
आप शायद नहीं जाते होंगे लेकिन गुलाब का फूल आपके दिल के लिए भी फायदेमंद है| अर्जुन की छाल और देसी गुलाब मिलाकर पानी में उबाल कर काढ़े जैसा बना ले| इस काढ़े को चाय की तरह पिने से दिल से जुड़ी बीमारियां दूर रहती है। यदि किसी की दिल की धड़कन बढ़ रही हो तो वो सूखी पंखुड़ियों को उबालकर पी ले।
*नींद न आती हो या तनाव रहता हो तो सिर के पास गुलाब रखकर सोएं, अनिद्रा की समस्या दूर हो जाएगी।
* गुलाब के फूल की पंखुड़ियां खाने से मसूढ़े और दांत मजबूत होते हैं। मुंह की बदबू दूर होती है और पायरिया रोग से भी निजात मिल जाती है।
*गुलाब के फूल में विटामिन ए, बी 3, सी, डी और ई से भरपूर होता हैं । इसमें उच्‍च मात्रा में विटामिन सी होने के कारण डायरिया के इलाज के लिए इसका प्रयोग किया जाता हैं। गुलाब के फल में फ्लवोनोइड्स, बायोफ्लवोनोइड्स, सिट्रिक एसिड, फ्रुक्टोज, मैलिक एसिड, टैनिन और जिंक भी होता हैं।



*गुलाब जल में बालों की देखभाल के प्रभावी गुण होते हैं। इसे बालों में लगाने से बालों की जड़ों में ब्लड के सर्कुलेशन में सुधार होता हैं। जिससे बालों के विकास में मदद मिलती हैं। इसके अलावा यह बालों को मजबूत और लचीला बनाने के लिए एक कंडीशनर का भी काम करता हैं ।

*त्वचा के लिए गुलाब जल बहुत लाभदायक होता हैं । गुलाब जल के प्रयोग का सबसे बड़ा फायदा यह हैं कि गुलाब जल एक प्राकृतिक एस्ट्रिंजेंट होने से यह एक सर्वश्रेष्‍ठ टोनर भी हैं । रोज रात को सोने से पहले इसे लगाने से त्वचा टाइट होती हैं, यह त्वचा के पीएच संतुलन को बनाएं रखता हैं और मुंहासों को दूर करने में भी मदद करता हैं ।
*गुलाब का शर्बत मस्तिष्क को बल व शीतलता प्रदान करता है।
दाह, मुखपाक, मुखशोथ होने पर गुलकंद लाभकारी होता है। – नेत्र विकारों में गुलाबजल का प्रयोग किया जाता है।
*गुलाब गर्मी के मौसम में होने वाली बेचैनी ,घबराहट जैसी समस्याओं के लिए भी बहुत अच्छा होता हैं। इसे रोज़ाना सुबह खाने से राहत मिलती हैं ।
*आंखों में होने वाली समस्याओं के लिए भी गुलाब बहुत फ़ायदा देता हैं । आंखों में गर्मी के कारण जलन हो या धूल मिट्टी जाने से आंखों में तकलीफ हो रही हो तो गुलाब जल से आंखों को धोने से आराम मिलता हैं ।
*गुलाब का तेल बुखार को आने से भी रोकता हैं। गुलाब में मौजूद एंटी इंफ्मेंटेरी तत्‍व सूक्ष्म जीवाणु संक्रमण के कारण सूजन, रसायन, अपच और निर्जलीकरण को कम करने में मदद करता हैं।
*गुलाब जल का प्रयोग एक हर्बल चाय के रूप में भी किया जा सकता हैं। यह पेट के रोगों और मूत्राशय में होने वाले संक्रमण को दूर करने के काम आती हैं । और साथ ही गर्मी के दिनों में गुलाब को पीस कर उसका लेप बना कर माथे पर लगाने से सिर दर्द भी ठीक हो जाता हैं ।
*गुलाब के तेल में मौजूद एंटीसेप्टिक गुण घावों को जल्दी भरने में मदद करते हैं । घाव पर गुलाब का तेल लगाने से संक्रमण भी नहीं फैलता हैं ।
*अगर आपकी त्वचा शुष्क है, तो गर्मियों में अपनी त्वचा पर चंदन पाउडर में गुलाब जल मिला कर लगाएं। त्वचा मुलायम होगी और कील मुहांसों से भी राहत मिलेगी।



रोज सुबह चेहरा धोने के बाद एक चम्मच गुलाब जल में नीबू की कुछ बूंदें मिला कर हल्के हाथों से लगा कर धोएं। इससे त्वचा का कालापन कम हो जाएगा। मुहांसों के पुराने दागों पर नियमित गुलाब जल में शहद मिला कर लगाएं। दाग दूर हो जाएंगे।
इसके अंदर ऐसे तत्व पाए जाते हैं जिसकी वजह से आपके चेहरे के बंद पोर्स साफ हो जाएगें। इन पोर्स में तेल और गंदगी छुपी रहती है जिसकी वजह से चेहरे पर कील और मुंहासे हो जाते हैं। गुलाब जल लगाने से चेहरा की त्वचा स्वस्थ और चमकदार बन जाती है।
*यदि आप कहीं तेज़ धूप में जा रहे हों तो त्वचा पर गुलाब जल छिडकने से धूप का असर नहीं पड़ता। गुलाब जल एक कीटाणुनाशक भी है। जिसके प्रयोग से छोटे छोटे कीटाणुओं का नाश हो जाता है। इसको लगाने से धूप की वजह से होने वाले नुक्‍सानों से बचा जा सकता है।
*गुलाब जल एक प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन है जिसको लगातार लगाने से कई तरह की त्‍वचा संबधी समस्‍याएं खतम हो जाती हैं। सन बर्न या फिर त्‍वचा को साफ करना हो, गुलाब जल काफी फायदेमंद होता है।
*पुरूष इसे आफ्टर शेव के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।
गुलाब जल अरोमा थैरेपी का ही एक हिस्‍सा है। अगर गुलाब जल का प्रयोग किया जाए तो काफी सकारात्‍मक प्रभाव मिलते हैं। तनाव कम होना, अच्‍छी नींद आना, तरो-ताज़ा महसूस करना और सौंदर्य निखरना यह सब गुलाब जल के लगातार उपयोग से ही होता है।
*गुलाब जल एक सर्वश्रेष्‍ठ टोनर भी है। यह एक प्राकृतिक अस्ट्रिन्जन्ट होता है इसलिए यह टोनर के रुप में प्रयोग किया जाता है। रोज़ रात को इसे अपने चेहरे पर लगाएं और देखे की आपकी त्‍वचा कुछ ही दिनों में टाइट हो जाएगी और झुर्रियां चली जाएगीं।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

गुलर( Ficus Racemosa)के गुण, फायदे और उपयोग Guler (Ficus Racemosa) properties, benefits and use

     

      गूलर का पेड़ भारत में हर जगह पाया जाता ही। यह एक हमेशा हरा रहने वाला पेड़ है। इसे उदंबर, गूलर, गूलार उमरडो, क्लस्टर फिग आदि नामों से जाना जाता है। इसका लैटिन नाम फाईकस ग्लोमेरेटा कहा जाता है।
   गूलर का पेड़ बड़ा होता है तथा यह उत्तम भूमि में उगता है। इसका तना मोटा होता है। गूलर के पत्ते छोटे कोमल से होते हैं। इसका फूल गुप्त होता है। इसमें छोटे-छोटे फल होते हैं जो कच्चे होने पर हरे और पकने पर लाल हो जाते हैं। फल स्वाद में मधुर होते हैं। फलों के अन्दर कीट होते है जिनके पंख होते हैं। इसलिए इसे जन्तुफल भी कहा जाता है। इसकी छाल भूरी सी होती है। यह फाईकस जाति का पेड़ है और इसके पत्ते तोड़ने पर लेटेक्स या दूध निकलता है।
गूलर के फल खाने योग्य होते है परन्तु उनमें कीढे होते हैं इसलिए इसको अच्छे से साफ़ करके ही प्रयोग किया जाना चहिये।
    आयुर्वेदिक चिकित्सों के अनुसार गूलर का कच्चा फल कसैला एवं दाहनाशक है। पका हुआ गूलर रूचिकारक, मीठा, शीतल, पित्तशामक, तृषाशामक, श्रमहर, कब्ज मिटाने वाला तथा पौष्टिक है। इसकी जड़ में रक्तस्राव रोकने तथा जलन शांत करने का गुण है। गूलर के कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है तथा पके फल खाए जाते है। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर या अन्य प्रकार से उपयोग किया जाता है।

* मुंह के छाले हों तो गूलर के पत्तों या ‪छाल‬ का काढ़ा मुंह में भरकर कुछ देर रखना चाहिए। इससे फायदा होता है। इससे दांत हिलने तथा मसूढ़ों से खून आने जैसी व्याधियों का निदान भी हो जाता है। यह क्रिया लगभग दो सप्ताह तक प्रतिदिन नियमित रूप से करें।
* आग से या अन्य किसी प्रकार से जल जाने पर प्रभावित स्थान पर गूलर की छाल को लेप करने से जलन शांत हो जाती है। इससे खून का बहना भी बंद हो जाता है। पके हुए गूलर के शरबत में शक्कर, खांड या शहद मिलाकर सेवन करने से गर्मियों में पैदा होने वाली जलन तथा तृषा शांत होती है।
* नेत्र विकारों जैसे आंखें लाल होना, आंखों में पानी आना, जलन होना आदि के उपचार में भी गूलर उपयोगी है। इसके लिए गूलर के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे साफ और महीन कपड़े से छान लें। ठंडा होने पर इसकी दो−दो बूंद दिन में तीन बार आंखों में डालें। इससे नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।
* नकसीर फूटती हो तो ताजा एवं पके हुए गूलर के लगभग 25 मिली लीटर रस में गुड़ या शहद मिलाकर सेवन करने या नकसीर फूटना बंद हो जाती है
गूलर की छाल ग्राही है, रक्तस्राव को बंद करती है। साथ ही यह मधुमेह में भी लाभप्रद है। गूलर के कोमल−ताजा पत्तों का रस शहद में मिलाकर पीने से भी मधुमेह में राहत मिलती है। इससे पेशाब में शर्करा की मात्रा भी कम हो जाती है।
* गूलर के तने को दूध बवासीर एवं दस्तों के लिए श्रेष्ठ दवा है। ‪खूनी‬ बवासीर के रोगी को गूलर के ताजा पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इसके नियमित सेवन से त्वचा का रंग भी निखरने लगता है।
* हाथ−पैरों की त्वचा फटने या ‪बिवाई‬ फटने पर गूलर के तने के दूध का लेप करने से आराम मिलता है, पीड़ा से छुटकारा मिलता है।
* गूलर से स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी दूर होती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है।

* विभिन्न योनि विकारों में भी गूलर काफी फायदेमंद होता है। योनि विकारों में योनि प्रक्षालन के लिए गूलर की छाल के काढ़े का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।
* गूलर के नियमित सेवन से शरीर में पित्त एवं कफ का संतुलन बना रहता है। इसलिए पित्त एवं कफ विकार नहीं होते। साथ ही इससे उदरस्थ अग्नि एवं दाह भी शांत होते हैं। पित्त रोगों में इसके पत्तों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन भी फायदेमंद होता है।
गूलर के तने का दूध बवासीर एवं दस्तों के लिए श्रेष्ठ दवा है। खूनी बवासीर के रोगी को गूलर के ताजा पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इसके नियमित सेवन से त्वचा का रंग भी निखरने लगता है। हाथ-पैरों की त्वचा फटने या बिवाई फटने पर गूलर के तने के दूध का लेप करने से आराम मिलता है, पीड़ा से छुटकारा मिलता है।
गूलर से स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी दूर होती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है।
* स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है। विभिन्न योनि विकारों में भी गूलर काफी फायदेमंद होता है। योनि विकारों में योनि प्रक्षालन के लिए गूलर की छाल के काढ़े का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता हैआग से या अन्य किसी प्रकार से जल जाने पर प्रभावित स्थान पर गूलर की छाल को लेप करने से जलन शांत हो जाती है। इससे खून का बहना भी बंद हो जाता है। पके हुए गूलर के शरबत में शक्कर, खांड या शहद मिलाकर सेवन करने से गर्मियों में पैदा होने वाली जलन तथा तृषा शांत होती है। नेत्र विकारों जैसे आंखें लाल होना, आंखों में पानी आना, जलन होना आदि के उपचार में भी गूलर उपयोगी है।
*धातुदुर्बलता के लिए 1 बताशे में 10 बूंद गूलर का दूध डालकर सुबह-शाम सेवन करने और 1 चम्मच की मात्रा में गूलर के फलों का चूर्ण रात में सोने से पहले लेने से धातु दुर्बलता दूर हो जाती है। इस प्रकार से इसका उपयोग करने से शीघ्रपतन रोग भी ठीक हो जाता है।

*बाजीकारक (काम उत्तेजना) के लिए 4 से 6 ग्राम गूलर के फल का चूर्ण और बिदारी कन्द का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्री और घी मिले हुए दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पौरुष शक्ति की वृद्धि होती है व बाजीकरण की शक्ति बढ़ जाती है। यदि इस चूर्ण का उपयोग इस प्रकार से स्त्रियां करें तो उनके सारे रोग ठीक हो जाएंगे।
*मर्दाना शक्तिवर्द्धक के लिए 1 छुहारे की गुठली निकालकर उसमें गूलर के दूध की 25 बूंद भरकर सुबह रोजाना खाये इससे वीर्य में शुक्राणु बढ़ते हैं तथा संतानोत्पत्ति में शुक्राणुओं की कमी का दोष भी दूर हो जाता है।
पका हुआ गूलर सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में इसी के बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी बोतल में भर कर रख दें। इस चूर्ण में से 2 चम्मच की मात्रा गर्म दूध के साथ सेवन करने से मर्दाना शक्ति बढ़ जाती है। 2-2 घंटे के अन्तराल पर गूलर का दूध या गूलर का यह चूर्ण सेवन करने से दम्पत्ति वैवाहिक सुख को भोगते हुए स्वस्थ संतान को जन्म देते हैं।
*प्रदर के लिए गूलर के फूलों के चूर्ण को छानकर उसमें शहद एव मिश्री मिलाकर गोली बना लें। रोजाना 1 गोली का सेवन करने से 7 दिन में प्रदर रोग से छुटकार मिल जाता है।



20 ग्राम गूलर की ताजी छाल को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें जब यह 50 मिलीलीटर की मात्रा में बच जाए तो इसमें 25 ग्राम मिश्री और 2 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें इससे रक्तप्रदर रोग में लाभ मिलता है।

*महिलाओ के श्वेत प्रदर के लिए 1 किलो कच्चे गूलर लेकर इसके 3 भाग कर लें। इसमें से कच्चे गूलर 1 भाग उबाल लें और इनकों पीसकर 1 चम्मच सरसों के तेल में फ्राई कर लें तथा इसकी रोटी बना लें। रात को सोते समय रोटी को नाभि के ऊपर रखकर कपड़ा बांध लें। इस प्रकार शेष 2 भागों से इसी प्रकार की क्रिया 2 दिनों तक करें इससे श्वेत प्रदर रोग की अवस्था में आराम मिलता है।
*फोड़ा फुन्सी – 


फोड़ा फुन्सी होने पर हमें फोड़े फुंसियों पर गूलर का दूध लगाना चाहिए
सूखा रोग –

 आयुर्वेदानुसार गूलर का दूध मां के या गाय, बकरी या भैंस के दूध के साथ मिलाकर पीने से हमारा शरीर सूखे रोग से मुक्त रहता है
खुनी बवासीर – 
(1) इस दशा में हमें कच्चे गूलर की सब्जी खानी चाहिए.
(2) गूलर के सूखे फलों को पीसकर, छानकर उसमें चीनी मिलाकर प्रतिदिन खाने से हम खुनी बवासीर रोग से मुक्त हो जाते हैं.
(3) खुनी बवासीर में हमें 10 बूँद गूलर का दूध 1 चम्मच पानी में मिलाकर पीना चाहिए.
मंदाग्नि – 
मंदाग्नि रोग होने पर गूलर के ताजे पत्तों को पीसकर, गोली बनाकर छाया में सुखाकर छाछ के साथ खाना खाने के समय लिया जाता है.
मधुमेह –
 इसके फल को पीसकर पानी के साथ पीने से हम मधुमेह रोग से मुक्त हो जाते हैं.
नासूर – 
इसमें पके हुए गूलर के फलों को, गूलर के छाल के रस में घोंटकर, धुप में सुखाकर, इसकी गोली बनाकर दिन में 4 बार 2 - 2 गोली शहद में मिलाकर चाटना चाहिए, फिर बकरी का दूध पीना चाहिए.
निमोनिया –
 निमोनिया होने पर गूलर के दूध को पानी में मिलाकर काढ़ा बनाकर पिलाया जाता है.
मोच या हड्डी टूटना – 
मोच आने पर या हड्डी टूटने पर गूलर की छाल, गेहूं भीगाकर, पीसकर देशी घी में मिलाकर थोडा गर्म करके लेप लगाया जाता है इससे लगभग 1 सप्ताह में टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है.
नकसीर –
 इसमें गूलर के फलों को सुखाकर उसे पीसकर, छानकर, चीनी मिलाकर रोज पीने से नकसीर का रोग ख़त्म हो जाता है.
दन्त रोग – 
दंत रोग में हमें गूलर के 2 – 3 फल पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर इसके काढ़े से कुल्ला करना चाहिए इससे हमारे दांत व मसूढ़े स्वस्थ तथा मजबूत रहते है
पित्त ज्वर –
 पित्त ज्वर होने पर हमें गूलर के जड़ की छाल के हिम को चीनी में मिलाकर पीना चाहिए.
पित्त विकार – 
पित्त विकार होने पर गूलर के पत्तों को पीसकर, शहद के साथ चाटा जाता है.

शनिवार, 28 जनवरी 2017

सेमल के आयुर्वेदिक और औषधीय गुणHerbal and medicinal properties of Semal


     सेमल की रूई रेशम सी मुलायम और चमकीली होती है और गद्दों तथा तकियों में भरने के काम में आती है, क्योंकि यह काती नहीं जा सकती । । आयुर्वेद में सेमल बहुत उपकारी ओषधि मानी गई है । यह मधुर, कसैला, शीतल, हलका, स्निग्ध, पिच्छिल तथा शुक्र और कफ को बढ़ानेवाला कहा गया है । सेमल की छाल कसैली और कफनाशक; फूल शीतल, कड़वा, भारी, कसैला, वातकारक, मलरोधक, रूखा तथा कफ, पित्त और रक्तविकार को शांत करनेवाला कहा गया है । फल के गुण फूल ही के समान हैं ।
Semal के नए पौधे की जड़ को सेमल का मूसला कहते हैं, जो बहुत पुष्टिकारक, कामोद्दीपक और नपुंसकता को दूर करनेवाला माना जाता है । Semal का गोंद मोचरस कहलाता है । यह अतिसार को दूर करनेवाला और बलकारक कहा गया है । इसके बीज स्निग्धताकारक और मदकारी होते है; और काँटों में फोड़े, फुंसी, घाव, छीप आदि दूर करने का गुण होता है ।

सेमल का विभिन्न रोगों में उपयोग
Semal वृक्ष के फल, फूल, पत्तियाँ और छाल आदि का विभिन्न प्रकार के रोगों का निदान करने में प्रयोग किया जाता है। जैसे-



स्तन में शिथिलता :-
 स्तन में शिथिलता हो तो इसके काँटो पर बनने वाली गांठों को घिसकर लगायें 10-15 दिन में ही स्तन की शिथिलता ख़तम हो जायेगीढूध बढाने में सहायक :- अगर माताओं को दूध कम आता हो तो इसकी जड़ की छाल का पावडर लें .
ताकत के लिए :- 
अगर शरीर में कमजोरी है तो इसके डोडों का पावडर एक-एक चम्मच घी के साथ सवेरे शाम लें और साथ में दूध पीयेंखांसी में लाभदायक :- अगर खांसी हो तो सेमल की जड़ का पावडर काली मिर्च और सौंठ बराबर मात्रा में मिलाकर लें .
आँखों के निचे काले घेरों के लिए :-
सेमल के तने पर नुकीले कांटे होते हैं, इन काँटों को इकठ्ठा करके इन्हें कुचल कर इसका चूर्ण तैयार किया जाये और करीब आधा चम्मच चूर्ण को 5 मिलीलीटर मतलब लगभग एक चम्मच दूध में मिला लिया जाये और इस मिश्रण को आँखों के नीचे काले धब्बों वाले स्थान पर लगाये और करीब आधे घंटे तक लगा रहने दें और बाद में इसे साफ़ पानी से धो लें. सुबह और रात में इस नुस्खे को एक महीने तक लगातार दोहराएँ तो काफी लाभ मिलेगा
प्रदर रोग – 
सेमल के फूलों की सब्जी देशी घी में भूनकर सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
गिल्टी या ट्यूमर –
 सेमल के पत्तों को पीसकर लगाने या बाँधने से गाँठों की सूजन कम हो जाती है।
रक्तप्रदर –




 इस वृक्ष की गोंद एक से तीन ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
लकड़ी का उपयोग :- 
इसकी लकड़ी पानी में खूब ठहरती है और नाव बनाने के काम में आती है
फोड़े फुंसी होने पर :-
 चेहरे पर फोड़े फुंसी हों तो इसकी छाल या काँटों को घिसकर लगा लो
आंव (colitis) :-
 इसके फूल के डोडों की सब्जी खाने से आंव (colitis) की बीमारी ठीक होती है
प्रदर रोग – 
सेमल के फलों को घी और सेंधा नमक के साथ साग के रूप में बनाकर खाने से स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
जख्म – 




इस वृक्ष की छाल को पीस कर लेप करने से जख्म जल्दी भर जाता है।
रक्तपित्त –
 सेमल के एक से दो ग्राम फूलों का चूर्ण शहद के साथ दिन में दो बार रोगी को देने से रक्तपित्त का रोग ठीक हो जाता है।
आग से जलने पर –
 इस वृक्ष की रूई को जला कर उसकी राख को शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से आराम मिलता है।
नपुंसकता –
 दस ग्राम सेमल के फल का चूर्ण, दस ग्राम चीनी और 100 मिलीलीटर पानी के साथ घोट कर सुबह-शाम लेने से बाजीकरण होता है और नपुंसकता भी दूर हो जाती है।
पेचिश – 
यदि पेचिश आदि की शिकायत हो तो सेमल के फूल का ऊपरी बक्कल रात में पानी में भिगों दें। सुबह उस पानी में मिश्री मिलाकर पीने से पेचिश का रोग दूर हो जाता है।
*अतिसार - 
सेमल वृक्ष के पत्तों के डंठल का ठंडा काढ़ा दिन में तीन बार 50 से 100 मिलीलीटर की मात्रा में रोगी को देने से अतिसार (दस्त) बंद हो जाते हैं।


बुधवार, 25 जनवरी 2017

80 रोगों की एक दवा :वायविडंग 80 diseases Medication: Wayvidng

   

 चाहे आप विश्वास न करें  लेकिन सिर्फ एक दवा का प्रयोग करके आप 80 प्रकार के वात रोगों से बच सकते हैं। जी हां, इस दवा का सेवन करने से आप कठिन से कठिन बीमारियों से पूरी तरह से निजात पा सकते हैं। अगर आपको भी होते हैं वात रोग, तो पहले जानिए इस चमत्कारिक दवा और इसकी प्रयोग विधि के बारे में…
विधिः
    200 ग्राम लहसुन छीलकर पीस लें। अब लगभग 4 लीटर दूध में लहसुन व 50 ग्राम गाय का घी मिलाकर गाढ़ा होने तक उबालें। फिर इसमें 400 ग्राम मिश्री, 400 ग्राम गाय का घी तथा सोंठ, काली मिर्च, पीपर, दालचीनी, इलायची,तमालपात्र, नागकेशर, पीपरामूल, वायविडंग, अजवायन, लौंग, च्यवक, चित्रक, हल्दी, दारूहल्दी, पुष्करमूल, रास्ना, देवदार, पुनर्नवा, गोखरू, अश्वगंधा, शतावरी, विधारा, नीम, सोआ व कौंचा के बीज का चूर्ण प्रत्येक 3-3 ग्राम मिलाकर धीमी आंच पर हिलाते रहें। जब मिश्रण घी छोड़ने लगे लगे और गाढ़ा मावा बन जाए, तब ठंडा करके इसे कांच की बरनी में भरकर रखें।



प्रयोग :

    प्रतिदिन इस दवा को 10 से 20 ग्राम की मात्रा में, सुबह गाय के दूध के साथ लें (पाचनशक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।)परंतु ध्यान रखें, इसका सेवन कर रहे हैं तो भोजन में मूली, अधिक तेल व घी तथा खट्टे पदार्थों का सेवन न करें और स्नान व पीने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।
इस दवा के प्रयोग से -
   पक्षाघात (लकवा), अर्दित (मुंह का लकवा), दर्द, गर्दन व कमर का दर्द,अस्थिच्युत (डिसलोकेशन), अस्थिभग्न (फ्रेक्चर) एवं अन्य अस्थिरोग, गृध्रसी (सायटिका), जोड़ों का दर्द, स्पांडिलोसिस आदि तथा दमा, पुरानी खांसी,हाथ पैरों में सुन्नता अथवा जकड़न, कंपन्न आदि ,khanseeके साथ 80 वात रोगों में लाभ होता है और शारीरिक विकास होता है।
दवा के प्रयोग से पूर्व किसी उत्तम वैघ की सलाह अवश्य लें।

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

विभिन्न ज्वरों की होम्योपैथिक औषधियाँ various homeopathic medicines for Fevers


बुखार को मुख्य तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है – 

(1) साधारण बुखार (Simple fever) जो सर्दी लग जाने से, धूप में घमूने से, पानी में भींग जाने से, ज्यादा खा लेने से, कब्ज से, अधिक परिश्रम करने से, या भय आदि से हो जाता है।

(2) सविराम-ज्वर – जो छूट कर फिर आ जाता है।

(3) अविराम ज्वर – जो टाइफाइड की तरह चढ़ता-ढलता रहता है, बिल्कुल नहीं उतरता। अन्य भी अनेक प्रकार के ज्वर हैं, परन्तु हम यहां इन मुख्य-ज्वरों की ही चर्चा करेंगे।साधारण बुखार (Simple fever)



इपिकाक – अगर किसी अन्य औषधि के स्पष्ट लक्षण न हों, तो वे बुखार इपिकाक 30 की प्रति तीन घंटे में एक मात्रा देते रहे |अनियमित-ज्वर’ में इससे इलाज प्रारंभ करना चाहिये।
फेरम फॉस – विशेष-लक्षण न मिलें तो बायोकैमिक 6x देने से लाभ होता है।
रस टॉक्स – पानी में भीग जाने से बुखार हो, तो रस टॉक्स अथवा डलकेमारा लाभ करते हैं। डॉ० डनहम कहते हैं कि जिस बुखार में जाड़ा लगने के कई घंटे पहले कष्ट देने वाली सूखी खांसी उठे, जब तक जाड़ा चढ़े तब तक बनी रहे, उसमें रस टॉक्स से बहुत लाभ होता है।
कैम्फर – सर्दी की पहली अवस्था में जब ऐसा प्रतीत हो कि सर्दी लग गई है, बुखार या जुकाम होगा, नाक से पानी बहने लगे, थोड़ी-सी हरारत हो। पानी में 1 बून्द डाल दो-तीन बार लें।
ऐन्टिम क्रूड या पल्स – ज्यादा या भारी पदार्थ खा लेने पर इन से लाभ होता है। पल्स में प्यास नहीं होती।
नक्स-वोमिका – अगर कब्ज के कारण बुखार हो, तो नक्स से लाभ होता है। रोगी शीत-प्रधान होता है, परन्तु शीत और ताप एक-दूसरे के बाद आते-जाते रहते हैं। 

चायना की तरह बुखार का अगला आक्रमण पहले आक्रमण से 3-3 घंटे पहले होता है।एकोनाइट –

सर्दी से शरीर का ताप बढ़े, खुश्क गर्मी के साथ प्यास हो, और अगर हरारत कैम्फर से दूर न हो। भय से बुखार हो जाने पर यह सर्व श्रेष्ठ है। सर्दी से बुखार के अतिरिक्त जुकाम खांसी भी हो जाती है।
बेलाडोना –

 सर्दी लगने से एकाएक तेज बुखार हो जाना, आंखे लाल, जोर का सिर-दर्द, शरीर में बेहद जलन, बुखार के साथ प्यास न होना।



ग्लोनॉयन –

 गर्मी या लू लगने से बुखार हो जाना, भयंकर सिर-दर्द होना।

सविराम-ज्वर मलेरिया आदि
सविराम-ज्वर में शीत, ताप, पसीना, प्यास, समय-इन पांच बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। चिनिनम, सल्फ, चायना, आर्स, इपिकाक, सीड्रन, नक्स – ये छ: नये मलेरिया में, और नैट्रम म्यूर, कार्बो वेज, सल्फर – ये तीन पुराने मलेरिया में श्रेष्ठ औषधियां हैं।

चायना – इसमें भी जाड़ा, ताप, पसीना तीनों अवस्थाएं स्पष्ट होती हैं। जाड़ा चढ़ने से पहले प्यास, जाड़ा और ताप चढ़ जाने पर प्यास का न रहना, पसीने की हालत में तेज प्यास; कमजोर बना देने वाला पसीना। चायना का बुखार रात को नहीं आता। बुखार का अगला आक्रमण नक्स की तरह पहले आक्रमण से 2-3 घंटे पहले आता है। सातवें, चौदहवें दिन बुखार आ सकता है।
चिनिनम सल्फ 1x या 3x – यह कुनीन का ही नाम है। हनीमैन ने सिनकोना की छाल के क्वाथ से अपने ऊपर ‘परीक्षा-सिद्धि (Proving) की थी। उनके स्वस्थ शरीर पर इसके सेवन से मलेरिया के से लक्षण प्रकट हो गये थे इसी से होम्योपैथी का आविष्कार हुआ। क्योंकि स्वस्थ-शरीर पर कुनीन से मलेरिया के से लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, इसीलिये कुनीन मलेरिया-ज्वर को दूर करती है। इस दृष्टि से ऐलोपैथी में मलेरिया के लिये कुनीन का प्रयोग होम्योपैथिक-प्रयोग ही समझना चाहिये। होम्योपैथी में भी मलेरिया के लिये यही मुख्य औषधि है।नैट्रम म्यूर 200 शक्ति – 10-11 बजे बुखार आये; होठों पर पानी के छाले पड़े। यह पुराने मलेरिया-ज्वर की प्रसिद्ध दवा है। 4 से 8 बजे बुखार बढ़े तो लाइको उत्तम है। ज्यादा कुनीन से बुखार दबा देने पर उसके मूल-नाश न होने पर नैट्रम म्यूर लाभप्रद है।
कार्बो वेज – यह भी पुराने मलेरिया को दूर करता है। शीतावस्था में रोगी का शरीर बर्फ जैसा ठंडा हो जाता है।
सल्फर – 
अन्य किसी दवा से लाभ न हो, तो यह नये तथा पुराने मलेरिया में लाभ करता है।
नक्स वोमिका –
 जाड़ा, ताप पसीना – इन तीनों अवस्थाओं में रोगी कपड़ा ओढ़े पड़ा रहता है। शरीर का कोई सा भी हिस्सा उधाड़ने से सर्दी से कांप उठता है। कपड़ा ओढ़े रखना भी नहीं चाहता परन्तु ओढ़े बगैर रहा भी नहीं जाता। शरीर आग की तरह जल रहा होता है परन्तु वह कपड़ा हटा नहीं सकता, हटाते ही ठिठुरन होने लगती है।




आर्सेनिक – 
जाड़ा या ऊष्णावस्था पूरी तरह से विकसित न होना; या कोई एक अवस्था का ज्यादा होना; या किसी एक अवस्था की कमी होना; पसीना बिल्कुल न होना; शीतावस्था में प्यास न होना, तापावस्था में थोड़ा-थोड़ा, घूट-घूंट पीना, पसीने की अवस्था में अत्यंत प्यास; रात के 12 बजे बुखार का बढ़ जाना – ये इसके ज्वर के मुख्य लक्षण है।
इपिकाक – बुखार के जब विशेष-लक्षण प्रकट न हों, तब इसे देना चाहिये। जर्मनी के प्रसिद्ध डाक्टर जहार मलेरिया-ज्वर में सबसे पहले इसी को दिया करते थे। जाड़ा लगने से पहले या जाड़े और ताप की अवस्था में मिचली इसका मुख्य-लक्षण है।
सीड्रन – अगर घड़ी की सूई के अनुसार ठीक समय पर बुखार चढ़े।
अविराम-ज्वर टाइफॉयड आदि
ब्रायोनिया –
 जब टाइफॉयड में कब्ज प्रधान हो, तेज प्यास हो, रोगी पानी बहुत पीता हो, चुपचाप पड़े रहना चाहता हो, तब यह उपयोगी है।
पाइरोजेन –
 टाइफ़ॉयड में क्लोरोमाइसिटिन से भी लाभ न होन पर इससे लाभ होता है।
बैप्टीशिया –
 किसी-किसी का मत है कि रोग के प्रारंभ से अन्त तक इसका निम्न-शक्ति में प्रयोग करने से रोगी ठीक हो जाता है, किसी दूसरी दवा की जरूरत नहीं पड़ती।
रस टॉक्स –
 अगर टाइफॉयड का प्रारंभ पहले दस्तों से हुआ हो, रोगी बेचैन हो, इधर-उधर करवटें बदलने से उसे चैन पड़ता हो, तब यह लाभप्रद है।
टाइफ़ॉयडीनम 200 –
 रोग के प्रारंभ होने का सन्देह होते ही इसकी 200 शक्ति की एक-दो मात्रा देने से अन्त तक रोग नहीं बिगड़ने पाता।
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