शनिवार, 24 जून 2017

भ्रामरी प्राणायाम करने की विधि और फायदे


   भ्रामरी शब्द की उत्पत्ति ‘भ्रमर’ से हुई है जिसका अर्थ होता है एक गुनगुनाने वाली काली मधुमक्खी। इस प्राणायाम का अभ्यास करते समय साधक नासिका से एक गुनगुनाने वाली ध्वनि उत्पन्न करता है, यह ध्वनि काली मधुमक्खी की गूंज से मिलती-जुलती है, इसलिए इसका नाम भ्रामरी पड़ा है। योग की पुस्तक घेरंडसंहिता में भ्रामरी को दोनों हाथों से दोनों कानों को बंद कर श्वास लेने और रोकने के रूप में बताया गया है।
अर्धरात्रि गते योगी जन्तूनां शब्दवर्जिते।
कणौं पिघाय हस्ताभ्यां कुर्यात्पूरकुम्भकम्।। – घें. सं. 5/78
इस प्राणायाम के प्रतिदिन अभ्यास से साधक को दाहिने कान में विभिन्न प्रकार की ध्वनि सुनाई देती है, जैसे झींगुर की आवाज, बांसुरी, बिजली, ढोल, भौंरा, घड़ीघंट, तुरही इत्यादि और उसके बाद सबसे अंत में हृदय से उठती हुई अनहत की ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस ध्वनि के मिश्रण से एक आंतरिक प्रकाश पुंज उठता है। उस प्रकाश पुंज में मस्तिष्क विलुप्त हो जाता है और योग के उच्चतम शिखर को प्राप्त करता है जिसे परमपद कहा जाता है। ऋषि घेरांद के अनुसार भ्रामरी प्राणायाम दिन में तीन बार किया जाना चाहिए। (घेरंडसंहिता 5/77)
भ्रामरी प्राणायाम विधि-
    हठप्रदीपिका के अनुसार भ्रामरी में पुरक के दौरान भ्रंगनाद (नर मधुमक्खी की ध्वनि) और रेचक के दौरान भृंगीनाद (मादा मधुमक्खी की ध्वनि) उत्पन्न होती है जिसको हठ प्रदीपिका में निम्न तरह से बताया गया है।
वेगाद्घोषं पूरकं भृङ्गनादं भृङ्गीनादं रेचकं मंदमंदम्।
योगीन्द्राणामेवमभ्यासयोगाच्चित्ते जाताकाचिदानंदलीला।। – ह. प्र. 2/68
सबसे पहले आप पद्मासन या सिद्धासन या किसी भी आरामदायक अवस्था में बैठें।
आंखें बंद कर लें।
मुंह बंद रखें और गहरा श्वास लें।
श्वास छोड़ते समय मधुर गुनगुनाने वाली ध्वनि करें।
दोनों कानों को अंगूठों से बंद कर लें और मधुमक्खी के गुनगुनाने की ध्वनि के साथ श्वास छोड़े।
यह एक चक्र हुआ।
इस तरह से आप 10 से 15 बार करें। और फिर धीरे धीरे इसको 10 से 15 मिनट्स तक करते रहें।
भ्रामरी प्राणायाम विधि, लाभ और सावधानी
वैसे तो भ्रामरी प्राणायाम के बहुत सारे फायदे हैं। यहां पर इसके कुछ महत्वपूर्ण लाभ के बारे में बताया गया है।
मस्तिष्क को शांत: भ्रामरी प्राणायाम मस्तिष्क को प्रसन्न एवं शांत रखता है।
तनाव : 
यह तनाव एवं घबराहट से राहत दिलाता है।
क्रोध कम करने में : यह क्रोध को कम करने में अहम भूमिका निभाता है।
समाधि का अभ्यास: 
यह चेतना को अंदर तक ले जाता है और समाधि का अभ्यास देता है।
चिंता को दूर करने में: यह प्राणायाम चिंता को कम करने में बहुत अहम रोल निभाता है।
डिप्रेशन के लिए बेहद जरूरी:
 अगर आप डिप्रेशन से ग्रसित हैं तो इस प्राणायाम का अभ्यास जरूर करें। यह डिप्रेशन को कम करने में रामबाण का काम करता है।
वासना :
 वासना की मानसिक और भावनात्मक प्रभाव को कम करता है।
शांत करने में: 
चूंकि यह प्राणायाम आपके शरीर को शीतलता प्रदान करती है जिसके कारण यह आपको शांत करने में अहम् भूमिका निभाता है।
स्वास्थ्य के लिए: 
यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसका नियमित अभ्यास से आप बहुत सारे परेशानियों से बच सकते हैं।
 सावधानियां
कानों में संक्रमण के दौरान इसे नहीं करना चाहिए।
हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति को यह कुंभक के बिना करना चाहिए।

बुधवार, 21 जून 2017

आंखों की रोशनी बढ़ाने वाले योग आसन


  आंख हमारे शरीर का सबसे अधिक आकर्षण वाला हिस्सा ही नहीं, बल्कि सबसे उपयोगी अंग भी है। इसका सिर्फ खूबसूरत होना तबतक मायने नहीं रखता जबतक कि आपके आंखों की रोशनी भी सलामत न हो, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो या तो आपकी खूबसूरत आंखों को चश्मे के मोटे-मोटे फ्रेम की नज़र लग जाएगी या फिर लेंस लगाने के झंझटों में फंसे ही रहेंगे। वैसे तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ आंखों की समस्या से हमें जूझना ही पड़ता है, लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि आंखों के आसपास की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। यदि यह कसी रहे तो आपके आंखों की रोशनी को आपसे कोई दूर नहीं कर सकता। इसके लिए योग एकमात्र बेहतरीन उपाय है। इससे निकट दृष्टि और दूर दृष्टि दोनों की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। आइए, जानें कौन-कौन से योग और क्या उपाय हैं जो आपकी आंखों की रोशनी को लंबे समय तक आपके साथ तो रखेंगे ही, साथ ही यदि आप फिलहाल चश्मा इस्तेमाल कर रहे हैं तो उससे भी छुटकारा दिला सकते हैं।
   आँखों के जरिये ही हम सारे कामो को ठीक तरह से कर सकते है| इसलिए हमें इसका सही तरह से ख्याल रखना बेहद जरुरी है| दिन भर कंप्यूटर पर काम करना, ज्यादा देर टीवी देखना, या देर तक पढ़ाई करने के कारन हमारी आँखे सिर्फ थकती है नहीं, बल्कि स्ट्रेस का असर हमारी आँखों की रौशनी पर ही पड़ता है|
कई बार ऐसा होता है की पैसे कमाने की जरुरत के लिए देर रात तक जागना, या फिर घंटो काम करना हमारी मज़बूरी बन जाती है| ऐसे में हमारी आंखों के आसपास की माश्पेसिया अपने लचीलेपन को खो देती हैं और कठोर हो जाती हैं। नतीजनत् कम उम्र में ही दृष्टि दोष हो जाता है|
आपने हमेशा सुना होगा की योग से हमें कई स्वास्थ्य लाभ मिलते है| हम आपको बता दे की आँखों के लिए भी योग बेहद फायदेमंद है| आइये जानते है Yoga for Eyes in Hindi, किस तरह आँखों के लिए फायदेमंद है योग|
इन आसनो से बढ़ेगी आँखों की रौशनी
आँखों की रौशनी बढ़ाने के लिए योग एकमात्र बेहतरीन उपाय है। नियमित रूप से योगा करने पर आपके आँखों की रौशनी तो बढ़ेगी ही साथ ही निकट दृष्टि दोष और दूरदृष्टि दोष भी सही हो जाते हैं। जिससे आप लेंस लगाने या चश्मा लगाने के झंझटो से बच जायेंगे| और यदि आपको पहले से चश्मा लगा भी हुआ हो, तो वो भी उतर जायेगा|
चश्मा लगा है तो करे त्राटक आसन
अगर आपको काफी ज्यादा पावर के चश्मे लगे है और नंबर लगातार बढ़ता जा रहा है, तो त्राटक आसन करना आपके लिए फायदेमंद होगा| और यदि आपको चश्मा नहीं भी लगा हे तो त्राटक आसान करने के बाद आपको चश्मा लगाने की नौबत ही नहीं आएगी| इस आसन को अंधेरे में किया जाता है, इसलिए रात का समय बेहतर है| यदि आप इसे दिन में करते है तो कमरे को बंद कर अंधेरा कर लें। कमरे में एक मोमबत्ती जलाकर मोमबत्ती के सामने प्राणायाम की मुद्रा में बैठ जाएं। अब बिना पलकें झपकाए एकटक से मोमबत्ती को देखते रहें। इसके बाद आँखे बंद करके ओम का उच्चारण करें और फिर आंख खोल लें। इस प्रक्रिया को कम से कम 3 बार करें। आखिर में अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें और फिर उस गर्म हथेली से आंखों को स्पर्श करते हुए आंख खोलें।  ध्यान रखें कि आंख खोलने के दौरान आपकी नजर आपकी नाक पर ही होनी चाहिए।



शवासन से बढ़ाये आँखों की रौशनी

शवासन को करने के लिए सबसे पहले पीठ के बल लेट जाएं| आसान करते वक्त अपने मन को शांत स्तिथि में रखे| इसके पश्चात पैरों को ढीला छोडकर हाथों को शरीर से सटाकर कर बगल में रख लिजिए। आपका पूरा शरीर फर्श पर स्थिर होना चाहिए। इस आसन को नियमित रूप से करने से शरीर की थकान दूर होती है और आंखों को आराम मिलता है और आँखों की रोशनी भी बढती है।पकी नजर आपकी नाक पर ही होनी चाहिए। इस आसान को सप्ताह में कम से कम 3 बार जरूर करें|
अनुलोम विलोम भी फायदेमंद
अनुलोम विलोम प्राणायाम को करने के लिए पालकी मांढ़कर बैठ जाये| आपकी कमर और गर्दन दोनों सीधी होनी चाहिए| अब अपनी आंखें बंद कर लें। अब अपने सीधे हाथ को नासारन्ध्रों पर ले जाएं। अब अपनी बीच की अंगुलियों को सीधा रखते हुए अंगूठे से दाएं नासारन्ध्र(नाक के छिद्र) को बंद कर लें। और बाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे सांस को बाहर की ओर निकालें। सांस छोड़ने के बाद अब बाएं नासारन्ध्र से ही सांस भरना प्रारंभ करें। अधिक से अधिक सांस भरने के बाद बाएं नासारन्ध्र को अंगुलियों की मदद से बंद कर लें व अंगूठे को दाएं नासारन्ध्र से हटाकर दाईं नासिका से सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालें। इस प्रक्रिया 3 से 5 मिनट दोहराये| इस आसान को करने से मानसिक तनाव दूर होता है| आँखों की थकावट दूर होती है और रौशनी बढ़ती है|



सर्वांगासन से बढ़ाएँ नजर 
इस आसन में शरीर के सारे अंगों का व्यायाम एक साथ हो जाता है, इसलिए इसे सर्वांगासन का नाम दिया गया है।
कैसे करें:
सपाट जमीन पर पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को शरीर के साइड में रखें। दोनों पैरो को धीरे-धीरे ऊपर उठाइए। पूरा शरीर गर्दन से समकोण बनाते हुए सीधा लगाएं और ठोड़ी को सीने से लगाएं। इस पोजिशन में 10 बार गहरी सांस लें और फिर धीरे-धीरे पैर को नीचे करें।यह आपकी आंखों के आसपास की मांसपेशियों में रक्त संचार को बढ़ाता है, जिससे आंखों की रोशनी हमेशा अच्छी बनी रहती है।
अन्य तरीके इन्हे भी अपनाये
अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ें और फिर तेजी से आँखों पर रखें। कुछ क्षण बाद हाथों को हटा लें और फिर धीरे-धीरे आंखें खोलें। आँखों को अधिक स्ट्रेस से राहत पहुंचाने के लिए यह बेहतरीन Yoga Exercises for Eyes है।
अपने आँखों का फोकस बढाने के लिए सबसे पहले तो एक ऐसा टार्गेट चुनें जो आपकी नजर से सबसे दूर हो और उसे देखने की कोशिश करें। रोज पांच से दस मिनट तक यह एक्सरसाइज करें। इससे दूर की नजर मजबूत होती है|
पलक को झपकाकर आप आँखों पर देर तक रहने वाले तनाव को कम कर सकते है| इसके लिए तीन से चार सेकंड तक अपनी पलकों को लगातार झपकाएं और फिर आँखे तेजी से बंद कर लें। कुछ सेकंड बाद फिर आँखे खोलें। यह आँखों को आराम दिलाने का सबसे आसान तरीका है|




प्राणायाम : 
हममें से कई लोग ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर लगातार 10-12 घंटे काम करते हैं, जिससे उनकी आंखें धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ने लगती हैं। ध्यान रखें, आंखों को आराम देने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि आप रात में सोते हैं। क्या आप जानते हैं कि आंखों की रोशनी कमजोर हो तो यह आपकी याद्दाश्त को भी क्षीण कर सकती है? प्राणायाम आंखों की रोशनी को सही और आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी बनाए रखता है। <br>इसे करने के लिए आप सबसे पहले ध्यान की मुद्रा में बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रखें और पीठ सीधी रखें। अब आंखें बंद रखकर लंबी सांस लें और फिर छोड़ें। इस क्रिया को लगातार करें। ध्यान रखें कि जहां आप यह आसान कर रहे हों वहां उचित साफ-सफाई और वातावरण एकदम शांत हो।

सोमवार, 19 जून 2017

हरी मिर्च खाने के बेहतरीन फायदे

   

वैसे तो आमतौर पर इसका इस्तेमाल खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए ही किया जाता रहा है लेकिन हाल में हुए कई शोध इस बात का दावा करते हैं कि हरी मिर्च खाने से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.
   भोजन के साथ अगर साथ में हरी मिर्च ना रखी हो तो कहीं न कहीं कमी सी लगती है। भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर हरी मिर्च का प्रयोग भोजन में काफी किया जाता है। भारतीय हरी मिर्च में एक औषधी के समान है जिसमें शरीर के कई रोगों को खतम करने की ताकत है। हरी मिर्च में कई स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक गुण समाए होते हैं, इसलिये हमें इसे नियमित तौर पर अपने खाने में रखनी चाहिये।
    हरी मिर्च कई तरह के पोषक तत्वों जैसे- विटामिन ए, बी6, सी, आयरन, कॉपर, पोटेशियम, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है। यही नहीं इसमें बीटा कैरोटीन,क्रीप्टोक्सान्थिन, लुटेन -जॅक्सन्थि‍न आदि स्वास्थ्यवर्धक चीजें
हरी मिर्च के फायदे /
*रक्तचाप :-
रक्तचाप को नियंत्रित करने में हरी मिर्च काफी फयदेमंद होती है। मधुमेह होने की स्थिति में भी हरी मिर्च में रक्तचाप का स्तर नियंत्रित रखने के गुण होते हैं।
मौजूद हैं।



*.कैंसर से राहत दिलती है हरी मिर्च :-

हरी मिर्च में anti-oxidents होते है जो शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाते है और कैंसर से लड़ने में मदद करते है इस लिए हरी मिर्च का खाने के साथ सेवन करे |
*.स्किन के लिए मददगार है हरी मिर्च :-
हरी मिर्च मै बहत सारे विटामिन पाए जाते है जो स्किन के लिए फायदेमंद होते है अगर आप तीखा खाते है तो आपकी तवचा मै निखार आ जाता है लेकिन इतना तीखा भी नहीं खाना चहिये के आप को नुकसान हो |
*फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा कम करे :-
हरी मिर्च का सेवन करने से फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा काफी कम हो जाता है। इस बात का ध्यान धूम्रपान करने वालों को ज़्यादा रखना चाहिए क्योंकि वे रोज़ाना अपने फेफड़ों का थोड़ा सा हिस्सा हवा में उड़ा देते हैं |
*बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाव –
हरी मिर्च में एंटी बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जो कि संक्रमण को दूर रखते हैं। इसीलिए हरी मिर्च को खाने से आपको संक्रमण के कारण होने वाले त्वचा रोग परेशान नहीं करेंगे।
*आयरन बढाए –
महिलाओं में अक्‍सर आयरन की कमी हो जाती है लेकिन अगर आप हरी मिर्च खाने के साथ रोज खाएंगी तो आपकी यह कमी भी पूरी हो जाएगी।
*.मर्दों के लिए हरी मिर्च फायदेमंद:-



मर्दों को हरी मिर्च खानी चाहिए क्योंकि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर का ख़तरा रहता है। वैज्ञनिक शोधों ने यह साबित किया है कि हरी मिर्च खाने से प्रोस्टेट की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाती है।

*पाचन सुधरता है –
हरी मिर्च खाना जल्दी पचा देती है। साथ ही, शरीर के पाचन तंत्र में भी सुधार कर देती है। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। इसीलिए यह कब्ज दूर करती है।
*शुगर से आराम देती है हरी मिर्च :-
* हरी मिर्च ,पूछ समेत एक गलास पानी में रात को भिगो कर रखे और सुबहे ख़ाली पेट मिर्च को निकाल कर पानी पीये इस विधि का एक हफ्ते तक प्रयोग करे ऐसा करने से सुगर कन्ट्रोल में आ जाती है अगर फरक नहीं लगता तो 4 हप्ते तक इस पानी का सेवन करे |
*दमे के रोगी के लिए मददगार है हरी मिर्च :-
हरी ताजी मिर्च का एक चमच रस, शहद में मिलाकर ख़ाली पेट खाने से दमे के रोगी को राहत मिलेगी इस का प्रयोग दस दिनों तक करने से लाभ होगा 
*|विटामिन ए से भरपूर हरी मिर्च आंखों और त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद है.
*गर्मी के दिनों में यदि हम खाने के साथ हरी मिर्च खाए और फिर घर से बाहरजाए तो कभी भी लू नहीं लग सकती । खून में हेमोग्लोबिन की कमी होने पर रोजाना खाने के साथ हरी मिर्च खाए कुछ ही दिन में आराम मिल जायेगा।
*तीखा खाने से मूड बनता है बेहतर मिर्च खाने से दिमाग में एंडोर्फिन पैदा होता है जो कि आपका मूड हल्‍का बना कर आपको खुशी प्रदान करता है।

शुक्रवार, 16 जून 2017

आम के इतने सारे फायदे नहीं जानते होंगे आप!


आम के चमत्कारी फायदे 
आम के फल को शास्त्रों में अमृत फल माना गया है इसे दो प्रकार से बोया (उगाया) जाता है पहला गुठली बोकर उगाया जाता है जिसे बीजू या देशी आम कहते हैं। दूसरा आम का पेड़ जो कलम द्वारा उगाया जाता है। इसका पेड़ 30 से 120 फुट तक ऊंचा होता है।
इसके पत्ते 10 से 30 सेमी लम्बे तथा 2.5 से 7 सेमी चौडे़ होते हैं। आम के फूल देखने में छोटे-छोटे और हरे-पीले होते हैं। वसंत ऋतु में फूल (मौर) और ग्रीष्म ऋतु में फल उगते हैं। इस पेड़ के सभी भाग दवाइयों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
* संस्कृत : आम्र
* हिंदी : आम
*बंगला : आम
*कर्नाटकी : माविनेमार या मावपहेष्ण

*गुजराती : ऑंबो
* अरबी : अबज
* अग्रेंजी : मैंगों
* लैटिन : मैंगीफेरा इंडिका
* तैलगी : मामिडी चेट्ट या मवीं

*तमिल : मार्मर
* मलयालम : मावु
*. मराठी : ऑंबा
रंग : कच्चे आम का रंग हरा व पक्के आम का रंग पीला होता है।
स्वभाव : यह तर और गर्म प्रकृति का होता है।
स्वाद : आम खट्टे और मीठे व स्वादिष्ट होते हैं।
आम की किस्में :
लंगड़ा, फजली, चौसा, दशहरी, तोतापरी, गुलाब खास, पायरी, सफेदा, नीलम, हाफुस, अलकासो आदि। आम के पेड़ ज्यादातर गर्म देशों में होते हैं।
गुण :
ग्रन्थों के अनुसार आम का फल खट्टा, स्वादिष्ट, वात, पित्त को पैदा करने वाला होता है, किन्तु पका हुआ आम मीठा, धातु को बढ़ाने वाला (वीर्यवर्धक), शक्तिवर्धक, वातनाशक, ठंडा, दिल को ताकत देने वाला, पित्त को बढ़ाने वाला और त्वचा को सुन्दर बनाने वाला होता है।
यूनानियों के अनुसार कच्चे आम का स्वाद खट्टा, पित्तनाशक, भूख बढ़ाने वाला, पाचन शक्ति बढ़ाने वाला और कब्ज दूर करने वाला होता है।
वैज्ञानिकों द्वारा आम पर विश्लेषण करने पर यह पता चला है कि इसमें पानी की मा़त्रा 86 प्रतिशत, वसा 0.4 प्रतिशत, खनिज 0.4 प्रतिशत, प्रोटीन 0.6 प्रतिशत, कार्बोहाड्रेट 11.8 प्रतिशत, रेशा 1.1 प्रतिशत, ग्लूकोज आदि पाया जाता है।
दुष्प्रभाव :
अधिक मात्रा में कच्चे आम का सेवन करने पर वीर्य में पतलापन, मसूढ़ों में कष्ट, तेज बुखार, आँखों का रोग, गले में जलन, पेट में गैस और नाक से खून आना इत्यादि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। खाली पेट आम खाना शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। भूखे पेट आम नहीं खाना चाहिए। आम के अधिक सेवन से अपच की शिकायत होती है। रक्त विकार, कब्ज बनती है। अधिक अमचूर खाने से धातु दुर्बल होकर नपुसंकता आ जाती है।
विशेष :
आम के कच्चे फलों को अधिक खाने से मंदाग्नि, विषमज्वर (टायफाइड), रक्तविकार, कब्ज एवं नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं।
आम के खाने के बाद पाचन सम्बन्धी शिकायत होने पर, दो-तीन जामुन खा लें। जामुन में आम को पचाने की तीव्र शक्ति होती है। जामुन उपलब्ध न होने पर, चुटकी भर नमक और सौंठ पीसकर खा लें।
यकृत और जलोदर के रोगी को आम नहीं खाना चाहिए।
आम खाने के बाद, दूध, जामुन, कटहल की गुठली, सूक्ष्म मात्रा में सौंठ, नमक या सिकंज के बीज सेवन करना चाहिए।
आम के सेवन के बाद दूध पीना चाहिए तथा पानी नहीं पीना चाहिए।
विभिन्न रोगों में आम का उपयोग
1. कमजोरी :
दूध में आम का रस मिलाकर पीने से शरीर की कमजोरी दूर होती है और वीर्य बनता है।
अच्छे पके हुए मीठे देशी आमों का ताजा रस 250 से 350 मिलीलीटर तक, गाय का ताजा दूध 50 मिलीलीटर अदरक का रस 1 चम्मच तीनों को कांसे की थाली में अच्छी तरह फेट लें, लस्सी जैसा हो जाने पर धीरे-धीरे पी लें। 2-3 सप्ताह सेवन करने से मस्तिष्क की दुर्बलता, सिर पीड़ा, सिर का भारी होना, आंखों के आगे अंधेरा हो जाना आदि दूर होता है। यह गुर्दे के लिए भी लाभदायक है।
2. सूखी खांसी : 

पके आम को गर्म राख में भूनकर खाने से सूखी खांसी खत्म हो जाती है।
3. नींद न आना : 

दूध के साथ पका आम खाने से अच्छी नींद आती है।
4. भूख न लगना :

 आम के रस में सेंधानमक तथा चीनी मिलाकर पीने से भूख बढ़ती है।
5. खून की कमी :
एक गिलास दूध तथा एक कप आम के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर नियमित रूप से सुबह-शाम पीने से लाभ प्राप्त होगा।
300 मिलीलीटर आम का जूस प्रतिदिन पीने से खून की कमी दूर होती है।
6. दांत व मसूढ़े के लिए :
आम की गुठली की गिरी (गुठली के अंदर का बीज) पीसकर मंजन करने से दांत के रोग तथा मसूढ़ों के रोग दूर हो जाते हैं।
आम के फल की छाल व पत्तों को समभाग पीसकर मुंह में रखने से या कुल्ला करने से दांत व मसूढ़े मजबूत होते हैं।
7. मिट्टी खाने की आदत :
बच्चों को पानी के साथ आम की गुठली की गिरी का चूर्ण मिलाकर दिन में 2-3 बार पिलाने से ये आदत छूट जाती है और पेट के कीड़े भी मर जाते हैं।
बच्चे को मिट्टी खाने की आदत हो तो आम की गुठली का चूर्ण ताजे पानी से देना लाभदायक है। गुठली को सेंककर सुपारी की तरह खाने से भी मिट्टी खाने की आदत छूट जाती है।
8. नाक से खून आना :

 रोगी के नाक में आम की गुठली की गिरी का रस एक बूंद टपकाएं।
9. मकड़ी का जहर :
मकड़ी के जहर पर कच्चे आम के अमचूर को पानी में मिलाकर लगाने से जहर का असर दूर हो जाता है।
गुठली को पीसकर लगाने से अथवा अमचूर को पानी में पीसकर लगाने से छाले मिट जाते हैं।



10. रक्तस्राव : आम की गुठली की गिरी का एक चम्मच चूर्ण बवासीर तथा रक्तस्राव होने पर दिन में 3 बार प्रयोग करें।
11. आग से जलने पर :
आम के पत्तों को जलाकर इसकी राख को जले हुए अंग पर लगायें। इससे जला हुआ अंग ठीक हो जाता है।
गुठली की गिरी को थोड़े पानी के साथ पीसकर आग से जले हुए स्थान पर लगाने से तुरन्त शांति प्राप्त होती है।
12. धातु को पुष्ट करने के लिए : 

आम के बौर (आम के फूल) को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर 1-1 चम्मच दूध के साथ नियमित रूप से लें। इससे धातु की पुष्टि (गाढ़ा) होती है।
13. हाथ-पैरों की जलन :
हाथ-पैरों पर आम के फूल को रगड़ने पर लाभ पहुंचेगा।
आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
14. प्लीहा वृद्धि (तिल्ली के बढ़ने पर) :

 15 ग्राम शहद में लगभग 70 मिलीलीटर आम का रस रोजाना 3 हफ्ते तक पीने से तिल्ली की सूजन और घाव में लाभ मिलता है। इस दवा को सेवन करने वाले दिन में खटाई न खायें।
15. पाचन शक्ति (खाना पचाने की क्रिया) :
रेशेदार आम गुणकारी व कब्जनाशक होते हैं, आम खाने के बाद दूध पीने से आंतों को बल मिलता है। 70 मिलीलीटर मीठे आम का रस 2 ग्राम सौंठ मिलाकर प्रात: काल पीने से पाचनशक्ति बढ़ती है।
जिस आम में रेशे हो वह भारी होता है। रेशेदार आम अधिक सुपाच्य, गुणकारी और कब्ज को दूर करने वाला होता है। आम चूसने के बाद दूध पीने से आंतों को बल मिलता है। आम पेट साफ करता है। इसमें पोषक और रुचिकारक दोनों गुण होते हैं। यह यकृत की निर्बलता तथा रक्ताल्पता (खून की कमी) को ठीक करता है। 70 मिलीलीटर मीठे आम का रस, 2 ग्राम सोंठ में मिलाकर सुबह पीने से पाचन-शक्ति बढ़ती है।
16. मधुमेह (डायबिटीज) :
आम के कोमल पत्तों का छाया में सुखाया हुआ चूर्ण 25 ग्राम की मात्रा में सेवन करना मधुमेह में उपयोगी है।
जामुन व आम का रस एक समान मात्रा में मिलाकर नियमित रूप से पीने से मधुमेह ठीक हो जाता है।
छाया में सुखाए हुए आम के 1-1 ग्राम पत्तों को आधा किलो पानी में उबालें, चौथाई पानी शेष रहने पर छानकर सुबह-शाम पिलाने से कुछ ही दिनों में मधुमेह दूर हो जाता है
आम के पत्तों को छाया में सुखाकर कूट छान लें। इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम पानी से 20-25 दिन लगातार सेवन से मधुमेह रोग में लाभ होता है।
आम के 8-10 नये पत्तों को चबाकर खाने से मधुमेह पर नियंत्रण होता है।
17. सूखा रोग (रिकेटस): 

कच्चे आम के अमचूर को भिगोकर उसमें 2 चम्मच शहद मिला लें। इसे 1 चम्मच दिन में 2 बार लेने से सूखा रोग में आराम मिलता है।
18. लू लगने पर :
लू लगने पर केरी यानी कच्चे आम की छाछ पीने से लाभ होता है। जिस किसी को गर्मी या लू लग जाय, मुंह और जबान सूखने लगे, माथे, हाथ-पैर में पसीना छूटने लगे, दिल घबरा जाए और प्यास ही प्यास लगे तो ऐसी अवस्था में रोगी को केरी की छाछ निम्न विधि से बनाकर देना चाहिए। एक बड़ा-सा कच्चा आम उबालें या कोयलों की आग के नीचे दबा दें जब वह बैगन की तरह काला पड़ जाय तो उसे निकाल लें और ठंडे पानी में रखकर जले हुए छिलके उतार लें और इसे दही की तरह मथकर इसके गूदे में गुड़, जीरा, धनियां, नमक और कालीमिर्च डालकर इसे अच्छी तरह मथ लें और आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर दिन में 3 बार पीयें तो लू में लाभ होगा।
आम की कच्ची कैरी को गर्म राख में भूनकर, जल में उसके गूदे को मिलाकर थोड़ी-सी शक्कर डालकर पिलाने से लू का प्रकोप खत्म हो जाता है। लू लगने के कारण होने वाली जलन और बेचैनी से भी बचा जा सकता है।
कच्चे आम (कैरी) का शर्बत (पन्ना) बनाकर पीने से लू तथा बेचैनी में कमी आती है।
19. विषैले दन्त द्वारा काटे जाने पर :
पागल कुत्ते के, बंदर के, बिच्छू, मकड़ी का विष, ततैया के काटे जाने पर आम की गुठली पानी के साथ घिसकर लगाने से दर्द व घाव में आराम मिलता है।
अमचूर और लहसुन समान मात्रा में पीसकर बिच्छू दंश के स्थान पर लगाने से बिच्छू का जहर उतर जाता है।
20. गुर्दे की दुर्बलता : 

प्रतिदिन आम खाने से गुर्दे की दुर्बलता दूर हो जाती है।
21. अजीर्ण :
लगभग 10-15 ग्राम आम की चटनी को अजीर्ण रोग में रोगी को दिन में दो बार खाने को दें।
3-6 ग्राम आम की गुठली का चूर्ण अजीर्ण में दिन में 2 बार दें।
22. अर्श (खूनी बवासीर) :
आम की अन्त:छाल का रस दिन में 20-40 मिलीलीटर तक दो बार पिलायें। इससे बवासीर, रक्तप्रदर या खूनी दस्त के कारण होने वाले रक्तस्राव (खून का बहाव) में लाभ होता है।
15 से 30 मिलीलीटर आम के पत्तों का रस शहद के साथ दिन में 3 बार लें एवं ऊपर से दूध का सेवन करें।
आम की गुठली की गिरी का चूर्ण 1 से 2 ग्राम दिन में 2 बार सेवन करें।
23. तृष्णा (बार-बार प्यास लगना) :
लगभग 7 से 15 मिलीलीटर आम के ताजे पत्तों का रस या 15 से 30 मिलीलीटर सूखे पत्तों का काढ़ा चीनी के साथ दिन में 3 बार पीयें।
गुठली की गिरी के 50-60 मिलीलीटर काढ़े में 10 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से भयंकर प्यास शांत होती है।
24. शरीर में जलन:
भुने हुए या उबाले हुए कच्चे आम के गूदे का लेप बनाकर लेप करें।
आम के फल को पानी में उबालकर या भूनकर इसका लेप बना लें और शरीर पर लेप करें इससे जलन में ठंडक मिलती है।
25. बच्चों के दस्त :
7 से 30 ग्राम आम के बीज की मज्जा तथा बेल के कच्चे फलों की मज्जा का काढ़ा दिन में 3 बार प्रयोग करें।
आम के गुठली की गिरी भून लें। 1-2 ग्राम की मात्रा में चूर्ण कर 1 चम्मच शहद के साथ दिन में 2 बार चटावें। यदि रक्तातिसार (खूनी दस्त) हो तो आम की अन्तरछाल को दही में पीस कर पेट पर लेप करें।
26. यकृत-प्लीहा का बढ़ना : 

10 मिलीलीटर फलों का रस शहद के साथ दिन में 3 बार लेने से रोग ठीक होता है।
27. सुन्दर, सिल्की और लंबे बाल : 

आम की गुठलियों के तेल को लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं तथा काले बाल जल्दी सफेद नहीं होते हैं। इससे बाल झड़ना व रूसी में भी लाभ होता है।
28. स्वरभंग : 

आम के 50 ग्राम पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर चौथाई भाग शेष काढ़े में मधु मिलाकर धीरे-धीरे पीने से स्वरभंग में लाभ होता है।
29. खांसी और स्वरभंग : 

पके हुए बढ़िया आम को आग में भून लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चूसने से सूखी खांसी मिटती है।
30. लीवर की कमजोरी : 

लीवर की कमजोरी में (जब पतले दस्त आते हो, भूख न लगती हो) 6 ग्राम आम के छाया में सूखे पत्तों को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें। 125 मिलीलीटर पानी शेष रहने पर छानकर थोड़ा दूध मिलाकर सुबह पीने से लाभ होता है।
31. अतिसार :
आम की गुठली की गिरी को लगभग 6 ग्राम की मात्रा में 100 मिलीलीटर पानी में उबालें। इसके बाद इसमें लगभग 6 ग्राम गिरी और मिलाकर पीस लें। इसे दिन में 3 बार दही के साथ सेवन करें तथा खाने में चावल और दही लें।
गुठली की गिरी 10 ग्राम, बेलगिरी 10 ग्राम तथा मिश्री 10 ग्राम तीनों का चूर्णकर 3-6 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है। गुठली की गिरी व आम का गोंद समभाग लेकर 1 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से अतिसार मिटता है।
आम की गुठली की 10 से 20 ग्राम गिरी को कांजी के साथ पीसकर पेट पर गाढ़ा लेप करने से बहुत लाभ होता है।
आम के पेड़ की अन्तरछाल 40 ग्राम जौ कूटकर आधा किलो पानी में अष्टमांश काढ़ा सिद्ध करें। ठंडा होने पर इसमें थोड़ा शहद मिलाकर पिलाने से अतिसार (दस्त) विशेषकर आमातिसार में लाभ होता है।
आम की ताजी छाल को दही के पानी के साथ पीसकर पेट के आसपास लेप करने से लाभ होता है।
मिसरी, बेल की गिरी तथा आम की गुठली की गिरी एक समान मात्रा में पीसकर 1-1 चम्मच दिन में 3 बार ग्रहण करें।
15 से 30 मिलीलीटर आम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार दें।
5 ग्राम आम के तने की छाल या जड़ की छाल का चूर्ण शहद एवं बकरी के दूध के साथ दिन में तीन बार दें।
15 से 30 मिलीलीटर आम, जामुन एवं आंवलों के पत्तों से निकाला रस बकरी के दूध के साथ तीन बार दें।
32. गर्भिणी के आमातिसार : 

पुराने आम की गुठली की गिरी का चूर्ण 5-5 ग्राम को शहद या पानी के साथ भोजन के 2 घंटे पहले दिन में 3 बार सेवन कराने से लाभ होता है। भोजन में नमकीन चावल बिना घी डाले ले सकते हैं।



33. हैजा :
हैजे की शुरुआती अवस्था में 20 ग्राम आम के पत्तों को कुचलकर आधा किलो पानी में उबालें जब यह एक-चौथाई की मात्रा में शेष बचे तो इसे छानकर गर्म-गर्म पिलाने से लाभ होता है।
आम का शर्बत या आम का पना बार-बार पिलाना भी लाभकारी होता है।
250 ग्राम आम के पत्तों को कुचलकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर रोगी को थोड़ी-थोड़ी देर बाद, कई बार पिलाएं।
25 ग्राम आम के मुलायम पत्ते पीसकर एक गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक कि पानी आधा न हो जाये और छानकर गर्म-गर्म दिन में दो बार पिलाने से अथवा कच्चे आम 20 ग्राम कूट कर दही के साथ सेवन करने से हैजा खत्म हो जाता है।
34. बालों का झड़ना : 

नरम टहनी के पत्तों को पीसकर लगाने से बाल बड़े व काले होते हैं। पत्तों के साथ कच्चे आम के छिलकों को पीसकर तेल मिलाकर धूप में रख दें। इस तेल के लगाने से बालों का झड़ना रुक जाता है व बाल काले हो जाते हैं।
35. उल्टी-दस्त : 

आम के ताजे कोमल 10 पत्ते और 2-3 कालीमिर्च दोनों को पानी में पीसकर गोलियां बना लें। किसी भी दवा से बंद न होने वाले, उल्टी-दस्त इससे बंद हो जाते हैं।
36. संग्रहणी :
ताजे मीठे आमों के 50 मिलीलीटर ताजे रस में 20-25 ग्राम मीठा दही तथा 1 चम्मच शुंठी चूर्ण बुरककर दिन में 2-3 बार देने से कुछ ही दिन में पुरानी संग्रहणी (पेचिश) दूर होती है।
कच्चे आम की गुठली (जिसमें जाली न पड़ी हो) का चूर्ण 60 ग्राम, जीरा, कालीमिर्च व सोंठ का चूर्ण 20-20 ग्राम, आम के पेड़ के गोंद का चूर्ण 5 ग्राम तथा अफीम का चूर्ण एक ग्राम इनको खरलकर, वस्त्र में छानकर बोतल में डॉट बंद कर सुरक्षित करें। 3-6 ग्राम तक आवश्यकतानुसार दिन में 3-4 बार सेवन करने से संग्रहणी, आम अतिसार, रक्तस्राव (खून का बहना) आदि का नाश होता है।
37. भूख बढ़ना

आम के फूलों (बौर) का काढ़ा या चूर्ण सेवन करने से अथवा इनके चूर्ण में चौथाई भाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिसार, प्रमेह, भूख बढ़ाने में लाभदायक है।
38. प्रमेह (वीर्य विकार) : 

आम के फूलों के 10-20 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम खांड मिलाकर सेवन करने से प्रमेह में बहुत लाभ होता है।
39. स्त्री के प्रदर में : 

कलमी आम के फूलों को घी में भूनकर सेवन करने से प्रदर में बहुत लाभ होता है। इसकी मात्रा 1-4 ग्राम उपयुक्त होती है।
40. एड़ी का फटना : 

आम के ताजे कोमल पत्ते तोड़ने से एक प्रकार का द्रव पदार्थ निकलता है इस द्रव पदार्थ को एंड़ी के फटे हिस्से में भर देने से तुरन्त लाभ होता है।
41. आम की चाय : 

आम के 10 पत्ते, जो पेड़ पर ही पककर पीले रंग के हो गये हो, लेकर 1 लीटर पानी में 1-2 ग्राम इलायची डालकर उबालें, जब पानी आधा शेष रह जाये तो उतारकर शक्कर और दूध मिलाकर चाय की तरह पिया करें। यह चाय शरीर के समस्त अवयवों को शक्ति प्रदान करती है।
42. धातु को बढ़ाने वाला : 

आम के फूलों के चूर्ण (5-10 ग्राम) को दूध के साथ लेने से स्तम्भन और कामशक्ति की वृद्धि होती है।
43. भैंसों का चारा : 

आम की गुठली की गिरी का अनाज और चारे की जगह अच्छा प्रयोग हो सकता है। इसमें प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में पाये जाते हैं।
44. सूतिकृमि (पेट के कीड़े) : 

कच्चे आम की गुठली का चूर्ण 250 से 500 मिलीग्राम तक दही या पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से सूत जैसे कृमि नष्ट हो जाते हैं।
45. शक्तिवर्द्धक :
रोज सुबह मीठे आम चूसकर, ऊपर से सौंठ व छुहारे डालकर पकाये हुए दूध को पीने से पुरुषार्थ वृद्धि और शरीर पुष्ट होती है।
आम का रस 250 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से और इसके ऊपर से दूध पीने से शरीर में ताकत आती है।



46. दाद, खुजली, घाव आदि चर्म रोग में :

आम के कच्चे फलों को तोड़कर (जिनमें जाली न पड़ी हो), कुचलकर कपड़े में छानकर रस निकाल लें। रस का चौथाई भाग देशी शराब मिलाकर शीशी में भर कर रखें। 2 दिन बाद प्रयोग करें। इसके लगाने से पुरानी दाद, चम्बल आदि बीमारियां शीघ्र मिटती हैं। गहरे से गहरे नासूर भी इसे दिन में 2 बार लगाने से दूर होते हैं। इसे रूई की फुहेरी से लगाने से फूटी हुई कंठमाला, भगंदर, पुराने फोड़े आदि जड़ से दूर हो जाते हैं। इसे लगाने से बवासीर के मस्से भी सूख जाते हैं।
आम को तोड़ते समय, आमफल की पीठ में जो गोंदयुक्त रस (चोपी) निकलती है, उसे दाद पर खुजलाकर लगा देने से फौरन छाला पड़ जाता है और फूटकर पानी निकल जाता है। इसे 2-3 बार लगाने से रोग से छुटकारा मिल जाता है।
47. फोड़ों पर : 

आम के पेड़ का गोंद थोड़ा गर्म करके लगाने से फोड़ा पूरा पककर फूटकर बह जाता है और घाव आसानी से भर जाता है।
48. घमौरियां : 

गरमी के दिनों में शरीर पर पसीने के कारण छोटी-छोटी फुन्सियां हो जाती हैं, इन पर कच्चे आम को धीमी अग्नि में भूनकर, गूदे का लेप करने से लाभ होता है।
49. पेचिश :
दस्त में रक्त आने पर आम की गुठली पीसकर छाछ में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
आम के पत्तों को छाया में सुखाकर पीसकर कपड़े में छान लें। नित्य 3 बार आधा चम्मच की फंकी गर्म पानी से लें।
आम की गुठली को सेंककर नमक लगाकर प्रतिदिन खाने से दस्त होने पर पेट को ताकत मिलती है। 1-1 गुठली 3 बार नित्य खायें।
50. दांतों की मजबूती :

 आम के ताजे पत्ते खूब चबायें और थूकते जायें। थोड़े दिन के निरंतर प्रयोग से हिलते दांत मजबूत हो जायेंगे तथा मसूढ़ों से रक्त गिरना बंद हो जायेगा।
51. यक्ष्मा (टी.बी.) : 
एक कप आम के रस में 60 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम नित्य पीयें। नित्य 3 बार गाय का दूध पीयें। इस प्रकार 21 दिन करने से यक्ष्मा में लाभ होता है।
52. मस्तिष्क की कमजोरी : 

एक कप आम का रस, चौथाई कप दूध, एक चम्मच अदरक का रस, स्वाद के अनुसार चीनी सब मिलाकर एक बार नित्य पीयें। इससे मस्तिष्क की कमजोरी दूर होती है। मस्तिष्क की कमजोरी के कारण पुराना सिर दर्द, आंखों के आगे अंधेरा आना दूर होता है। शरीर स्वस्थ रहता है। यह रक्तशोधक भी है तथा यह हृदय, यकृत को भी शक्ति देता है।
53. शरीर में खून की कमी दूर करना : 

आम खाने से रक्त बहुत पैदा होता है। दुबले, पतले लोगों का वजन बढ़ता है। मूत्र खुलकर आता है। शरीर में स्फूर्ति आती है। आम का मुरब्बा भी ले सकते हैं।
54. सौंदर्यवर्धक : 

लगातार आम का सेवन करने से त्वचा का रंग साफ होता है तथा रूप में निखार आकर चेहरे की चमक बढ़ती है।
55. पायरिया : 

आम की गुठली की गिरी के महीन चूर्ण का मंजन करने से पायरिया एवं दांतों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
56. पथरी :
आम के मुलायम व ताजे पत्ते छाया में सुखाकर महीन पीस लें और इस चूर्ण को एक चम्मच प्रतिदिन सुबह बासी मुंह पानी के साथ लें। इसके परिणामस्वरूप पथरी पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है।
आम के पत्तों को सुखाकर महीन (बारीक) चूर्ण बनाकर रखें। प्रतिदिन सुबह-शाम 2 चम्मच चूर्ण पानी के साथ खायें। इसको खाने से कुछ दिनों में ही पथरी गलकर पेशाब के द्वारा निकल जाती है।
57. बिच्छू काटना : 

अमचूर और लहसुन समान मात्रा में पीसकर काटे स्थान पर लगाने से बिच्छू का जहर मिट जाता है।
58. अनिद्रा : 

सोते समय रात को आम खाएं व दूध पीयें। इस प्रयोग से नींद अच्छी आएगी।
59. जलोदर : 

आम खाने से जलोदर रोग में लाभ होता है। नित्य 2-3 आम खायें।
60. अंडकोष की सूजन :
आम के पेड़ की गांठ को गाय के दूध में पीसकर लेप करने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।
25 ग्राम की मात्रा में आम के कोमल पत्तों को पीसकर उसमें 10 ग्राम सेंधा नमक को मिलाकर हल्का-सा गर्म करके अंडकोष पर लेप करने से अंडकोष की सूजन मिट जाती है।



61. अंडकोष के एक सिरे का बढ़ना :
आम के पेड़ पर के बांझी (बान्दा) को गाय के मूत्र में पीसकर अंडकोष के बढ़े हिस्से पर लेप करने और सेंकने से लाभ होता है।
आम के पत्तों को नमक के साथ पीसकर लेप करें। इससे अंडकोष का बढ़ना, पानी भरना बंद हो जाता है।
62. श्वास या दमे का रोग :
आम की गुठली को फोड़कर उसकी गिरी निकाल लेते हैं। उसे सुखाकर पीस लेते हैं। इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा शहद के साथ चाटने से लाभ मिलता है।
आम की गुठली के चूर्ण को 2-3 ग्राम मात्रा में शहद के साथ चाटने से दमा, खांसी में लाभ मिलता है तथा पेचिश भी ठीक हो जाती है।
63. बाल बढ़ाने के लिए : 

10 ग्राम आम की गिरी को आंवले के रस में पीसकर बालों में लगाएं इससे बाल लम्बे और घने होते हैं।
64. बुखार होने पर : 

आम की चटनी बनाकर पीने से लू के कारण आने वाले बुखार में लाभ होता है।
65. रतौंधी :
अमोठ चूड़ा खाने से रतौंधी दूर होती है। आम का रस भी पीने से लाभ होता है।
रतौंधी रोग विटामिन `ए´ की कमी से होता है। आम में सभी फलों से ज्यादा विटामिन `ए´ होता है। इसलिए आम खाना रतौंधी रोग में लाभकारी है। चूसने वाला आम इस रोग में ज्यादा उपयोगी है।
66. अजंनहारी, गुहेरी

आम के पत्तों को डाली से तोड़ने पर जो रस निकलता है उस रस को गुहेरी पर लेप करने से गुहेरी जल्दी समाप्त हो जाती है।
67. मसूढ़ों के रोग :

 आम की गुठली की गिरी को बारीक पीसकर मंजन बना लें। इससे रोजाना मंजन करने से दांत व मसूढ़ों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
68. खांसी : 

आम की गुठली की गिरी को सुखाकर पीस लेते हैं इसमें से एक चम्मच चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से खांसी से छुटकारा मिल जाता है।
69. आमाशय (पेट) का जख्म : 

आम की भुनी हुई गुठली की गिरी का चूर्ण बनाकर खाने से आंतों की कमजोरी मिट जाती है।
70. गंजेपन का रोग :

 एक साल पुराने आम के आचार के तेल से रोजाना मालिश करने से गंजेपन का रोग कम हो जाता है।
71. गैस्ट्रिक अल्सर : 

पके मीठे और रस युक्त आम को छानकर सेवन करने से गैस्ट्रिक अल्सर में लाभ होता है।
72. कब्ज (गैस) होने पर :

 आम को खाने के बाद दूध पीने से शौच खुलकर आती है और पेट साफ होता है।
73. सिर की रूसी : 

आम की गुठली और हरड़ दोनों को बराबर मात्रा में लें और इसे दूध के साथ पीसकर सिर में लगायें। इससे रूसी मिट जाती है।
74. गर्भधारण : 

आम के पेड़ का बान्दा पानी के साथ बारीक पीसकर मासिक धर्म खत्म होने के 2 दिन बाद सुबह के समय गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सेवन करना चाहिए। इसके सेवन के बाद सेक्स करने से गर्भ ठहरता है।
75. दस्त होने पर :
आम और जामुन के पत्तों को पीस लें। इससे प्राप्त रस को 5-5 ग्राम की मात्रा में थोड़ा शहद मिलाकर एक दिन में 2 से 3 बार चाटें। इससे अतिसार यानी दस्त के साथ होने वाली उल्टी, बुखार (ज्वर) और प्यास आदि समाप्त हो जाती है।
आम की गुठली के चूर्ण को लगभग 15 ग्राम की मात्रा में ताजे दही के साथ खाने से लाभ मिलता है।
आम की गुठली की गिरी 25 ग्राम, जामुन की गुठली 25 ग्राम और भुनी हुई हरड़ को 25 ग्राम की मात्रा में पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इसी बने चूर्ण को पानी के साथ दिन में 2 से 3 बार पीने से लाभ होता है।
आम के फूल (बौर) को पीसकर उसमें 1 चम्मच दही को मिलाकर खाने से लाभ प्राप्त होता है।
आम की गुठली को पानी में अच्छी तरह घिसकर पीने और नाभि पर लगाने से लूज मोशम (अतिसार) में आराम मिलता है।
आम की गुठली, नमक, सोंठ, बेल की गिरी और हींग को पानी में घिसकर लगभग 2 ग्राम की मात्रा में 1 दिन में 2 से 3 बार पीने से आमातिसार और हल्के दस्तों में लाभ मिलता है।

वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय



रिसर्च में ये साबित हुआ है की वीर्य दो प्रकार का होता है एक तो गाढ़ा और सफ़ेद और दूसरा पतला पानी जैसा| रिसर्च में यह भी पाया गया है की ज्यादातर पुरुष अपने वीर्य को गाढ़ा करना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार गाढ़ा वीर्य मर्दाना ताकत और मर्दानगी का प्रतीक होता है| कुछ लोगों के अनुसार वीर्य का गाढ़ापन उनके पार्टनर को संतुष्ट करने के लिए जरुरी होता है| वहीँ कुछ पुरुष ऐसा भी सोचते हैं की पतला वीर्य होने पर उन्हें संतान प्राप्ति में दिक्कत होगी और गाढ़ा वीर्य उन्हें जल्दी संतान सुख प्रदान करेगा| इन्ही सब कारणों के कारण हर मर्द अपने वीर्य को गाढ़ा करना चाहता है|
वीर्य की 1 ml मात्रा में करीब 2 करोड़ शुक्राणु पाए जाते हैं| आप अपनी शुक्राणु की संख्या spermcheck kit के द्वारा घर में ही जांच सकते हैं| इस kit को आप ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं| जैसे की हमने ऊपर बताया की गाढ़ा वीर्य मर्दानगी का प्रतीक माना जाता है खास कर तब जब आप बच्चे के लिए प्लान कर रहे हों|
मोटापा, मानसिक तनाव, पोषण की कमी, tight अंडरवियर आदि कुछ कारन हैं जो की वीर्य के पतलेपन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं| आप अपने वीर्य में शुक्राणु की संख्या बढ़ा सकते हैं और उसे गाढ़ा भी कर सकते हैं| आपकी सहायता के लिए हमने वीर्य को गाढ़ा करने के टिप्स, उपाय और घरेलु नुस्खे इस लेख में बताये हैं जिन्हें अपनाकर आप वीर्य का गाढ़ापन और उसमें शुक्राणुओं की संख्या को जल्दी से बढ़ा सकते हैं|
एमिनो एसिड सप्लीमेंट के तौर पर या खाने के रूप में लें: एमिनो एसिड कुछ मात्रा में मांसों, फलों और सब्जियों में पाया जाता है। एमिनो एसिड वीर्य की मात्रा को बढ़ता है, और उसे गाढ़ा होने से भी बचाता है। एमिनो एसिड जो आपको खाने में सम्मिलित करना चाहिए।
एल- कार्निटीन (L-Carnitine) यह रेड मीट और दूध में पाया जाता है।
एल- आरगिनेइन (L-Arginine) यह ड्राईफ्रूट्स, तिल और अंडे में पाया जाता है।
एल- लीसीन- (L-Lysine) यह दूध और पनीर में पाया जाता है।
अपने आहार को बदलें: आपके खानपान में सुधार, अधिक और स्वस्थ वीर्य उत्पन्न करता है। इस प्रक्रिया को कम नहीं आंके।
प्रोसेस्ड फ़ूड का कम सेवन करें या फिर विल्कुल नहीं करें, और इसके बदले आहार जिसमें कम वसा और ज्यादा प्रोटीन हो उनका सेवन करें। ज्यादा सब्जी और अनाज खाएँ, संभव होने पर जैविक आहार (organic foods) खरीदें। बहुत ज्यादा पानी पीएँ। जो भी आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, वो वीर्य के लिए भी लाभदायक होता है।
अपना लाइफस्टाइल बदलो
ख़राब लाइफस्टाइल और नशा जैसे तंबाकू, धुम्रपान, शराब का सेवन ला प्रभाव निश्चित रूप से आपकी वीर्य की सेहत पर पड़ता है और वीर्य पानी जैसा पतला हो जाता है| इसलिए यह जरुरी हो जाता है की आप बुरी आदतों से दूर रहे और अच्छी लाइफस्टाइल आदतें जैसे अच्छा पोषण युक्त खान पान, नियमित exercise और अच्छी नींद लें| अच्छी आदतों से आपकी जनन क्षमता भी अच्छी होगी और वीर्य की सेहत में भी सुधार होगा|
ज्यादा सख्लन से बचें
जरुरत से ज्यादा हस्तमैथुन करना या फिर सामान्य से अधिक संभोग में रूचि लेने से अकसर वीर्य पतले हो जाता है| इसलिए जरुरी है की आप इस ज्यादा सख्लन होने से बचें और हो सके तो हफ्ते में एक या दो बार ही संभोग करें| यह सच है की सख्लन आपको मानसिक तनाव से मुक्त रखता है लेकिन वीर्य को गाढ़ा करने के लिए जरुरी है की आप अपने ऊपर थोडा सयम रखें|
supplements से लीजिये मदद
कुछ supplements जिनमें विटामिन E और जिंक पाया जाता है आपके वीर्य को गाढ़ा कर सकते हैं और आपकी मर्दानगी और यौनशक्ति को काफी बढ़ा सकते हैं| लेकिन यह जरुरी है की supplements का इस्तेमाल डॉक्टर की देख रेख में करें| आप अपने डॉक्टर को अपनी प्रॉब्लम बता कर उचित supplement ले सकते हैं| आप जरुरी विटामिन्स और minerals को कददू के बीज, अखरोट, बादाम आदि नियमित रूप से खा कर भी प्राप्त कर सकते हैं|
मिनरल जिंक (mineral zinc) का ज्यादा सेवन करें:
 इससे वीर्य की मात्रा, संख्या और टेस्टस्टेरन बढ़ती है। करीब 11 mg प्रति दिन लें, यह अखरोट, बीन्स, शुत्कि (oysters) या चिकन खाने से पूर्ति हो जाएगा।
अश्विनी मुद्रा का अभ्यास कीजिये
अश्विनी मुद्रा को इंग्लिश में kegel exercise के नाम से भी जाना जाता है| यह मर्दों के लिए काफी अच्छी मुद्रा मानी जाती है| यह लिंग की नसों में कमजोरी, शीघ्रपतन, वीर्य सम्बन्धी समस्याएँ और स्तम्भन दोष आदि को सही करने में काफी लाभप्रद मानी जाती है| इस exercise में आपको अपनी गुदा की muscles को अन्दर की और कुछ सेकंड्स खीच कर रखना होता है और फिर यह क्रिया एक बार में 10 बार करनी होती है|
*विटामिन C और एंटीअॅक्सीडेंट से भरपूर भोजन खाएँ: ये पोषक तत्व आपकी वीर्य से संबंधित बीमारी को कम करेगा और वीर्य के जीवनकाल को भी बढ़ाएगा। भोजनोपरान्त एक नारंगी खाएँ! एक 8 आउन्स (230 ml) ग्लास नारंगी के जूस में 124 ml विटामिन C होता है जो एक दिन के लिए काफी है।
*अपने आहार में फोलिक एसिड सप्लीमेंट लें: फोलिक एसिड (विटामिन B9) वीर्य की मात्रा बढ़ाने में मददगार साबित होता है। 400 ग्राम फोलिक एसिड हरी सब्जियां, फलियां, अनाज और नारंगी के रस में पाया जाता है।
जेहरीले वातावरण से करें बचाव
जेहरीले वातावरण और pollution का प्रभाव आपकी जनन क्षमता को कम करता है| यदि आप किसी high रिस्क इंडस्ट्री में काम करते हैं to दस्तानों और मुँह पर मास्क पहनकर अपने ऊपर होने वाले जेहरीले तत्वों के प्रभाव से बचाव करें| इसी प्रकार डिटर्जेंट और chemicals से काम करते समय अपने हाथों पर रबर के दस्ताने पहने|
विटामिन D और कैल्शियम के प्रतिदिन सेवन को बढ़ाएँ: 
आप दोनों को सप्लीमेंट के तौर पर भी ले सकते हैं या फिर कुछ समय धूप में व्यतीत करके विटामिन D की संश्लेषण कर सकते हैं। दही, स्लिम दूध, सैल्मन अधिक मात्रा में सेवन करके से आप कैल्शियम और विटामिन D की जरूरत को पूरा कर सकते हैं। अगर आप ज्यादा समय धूप में व्यतीत करते हैं तो अपने शरीर पर सनस्क्रीन लगाना नहीं भूलें ताकि सूर्य की हानिकारक किरणों से प्रभाव कम हो।
वीर्य को गाढ़ा करने वाली herbs यानि जड़ी बूटियाँ
हो सकता है जिन herbs के बारे में हम यहाँ बताने वाले हैं वो भारत में ना मिलती हों लेकिन इन्हें आप आसानी से ऑनलाइन आर्डर करके मंगवा सकते हैं| यहाँ कुछ ऐसी जड़ी बूटियाँ हम बताने जा रहे हैं जो की पुरुष की समस्त समस्याएं दूर कर सकती हैं और आपके वीर्य को गाढ़ा बना सकती हैं|
गोखरू
यह भारत में भी आसानी से मिल जाती है| इसमें पाए जाने वाले गुण आपके वीर्य को गाढ़ा करने में मदद करते हैं| इतना ही नहीं यह हर्ब वीर्य में शुक्राणु बढाती है, शुक्राणुओं की गतिशीलता बढाती है और शुक्राणु के जीवन को भी बढाती है| यह सभी बातें तब जरुरी होती हैं जब आपको संतान प्राप्ति में दिक्कत आ रही हो|
एलिसीन (Allicin) का सेवन करें: 
यह लहसुन में पाया जाता है, एलिसीन एक ओरगानोसल्फर यौगिक है जो वीर्य की मात्रा को यौन अंग में खून के संचार के अनुकूल बनाता है, जिससे स्वस्थ वीर्य की मात्रा बढती है। कुछ नए और दिलचस्प लहसुन युक्त खाना खाएँ या फिर लौंग और लहसुन की चाय बनाकर सुबह पी लें।
वीर्य को स्वस्थ बनाने वाले इन भोजनों का सेवन करें: अगर वीर्य को आँखों से चमकते हुए देखना चाहते हैं, तो अपने खानपान में इन चीजों का प्रयोग करें।
Goji berries (एंटीॅआक्सीडेंट)
जिनसेंग (Ginseng), अश्वगंधा
पम्पकिन सीड्स (omega-3 fatty acids)
अखरोट (omega-3 fatty acids)
एस्परगस (विटामिन C)
केला (विटामिन C)
ढीले कपडे पहनें: 
ऐसे कपडे पहने जिनसे आपके अंडकोश (testicles) पर दबाब न पड़े। गर्मी अंडकोश के लिए हानिकारक होती है, इसलिए ढीले वस्त्र जिसमें हवा का प्रवेश हो पहनें। अंडकोश का शरीर से बाहर होने का एकमात्र कारण यही है, ताकि उनमें ठंडक बनी रहे
अपने वज़न की जांच करें: 
ज्यादा या कम वजन हार्मोन प्रक्रिया के संचालन में प्रभाव डालता है। एस्ट्रोजन (estrogen) की ज्यादा मात्रा या टेस्टोश्टेरोन (testosterone) की कमी वीर्य की मात्रा में गलत प्रभाव डाल सकता है। जिम ज्वाइन करें, और खुद को प्रोत्साहित करने के लिए नए और दिलचस्प तरीके ढ़ूढें ताकि, अपने वज़न कम करने की लक्ष्य को आप पूरा कर पाएँ।
तनाव दूर करें: 
तनाव जानलेवा होता है। हालांकि, आप इसे कुछ समय के लिए संभाल लेंगे, मगर आपका वीर्य इतना मजबूत नहीं होता। तनाव वीर्य उत्पन्न करने वाले हार्मोन को कम कर देता है
गर्म टब से बाहर निकलें: 
यह सुखद तो होता है, लेकिन जब आप मनमोहक क्रिया में खोए होते हैं, आपके अंडकोश गर्मी से तप जाते हैं। टब में विश्राम को किसी और समय के लिए छोड़ दें।
साइकिल से उतर जाएं: 
साइकिल की सीटें वीर्य को कम करने के लिए प्रख्यात है, अगर कुछ पल के लिए आप सोचेंगे तो आपको महसूस होगा कि क्यों! दबाव, धक्का और उछाल- वीर्य को इनमें से कुछ भी पसंद नहीं है । जब ज्यादा वीर्य उत्पन्न करने की इच्छा हो तो कार या बस का प्रयोग करें।
वीर्य गाढ़ा करने का घरेलु नुस्खा.
वीर्य ही शारीर का सार है, एक योगी को सबसे ज्यादा दुःख अपने वीर्यपात होने पर ही होता है, मगर आज कल के युवा और आधुनिक डॉक्टर इसकी उतना नहीं आंकते, अत्यधिक मैथुन से या अश्लील सिनेमा और साहित्य से वीर्यपात कर चुके युवा जिनका वीर्य पानी कि भाँती हो चूका है, उनका जीवन नरक के समान है. वीर्य ही जीवन है, यही व्यक्ति कि आभा है, ये नहीं तो कुछ नहीं. वीर्य को गाढ़ा और शक्तिशाली करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का ये प्रयोग बहुत लाभदायक है. आइये जाने.
वीर्य गाढ़ा करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का प्रयोग.
    एक किलो सफ़ेद प्याज का रस निकाल कर रख लीजिये, अभी इसमें 100 ग्राम अजवायन को 12 घंटे तक सफेद प्याज के रस में भिगोकर रख लीजिये, रस इतना ही डाले के अजवायन इसको सोख ले, सुबह जब सारा रस अजवायन सोख ले तो इसको छाया में सुखा लें। सूखने के बाद उसे फिर से इसी प्रक्कर प्याज के रस में गीला करके सुखा लें। इस तरह से तीन बार करें। उसके बाद इसे कूटकर किसी बोतल में भरकर रख लें। आधा चम्मच इस चूर्ण को एक चम्मच पिसी हुई मिश्री के साथ मिलाकर खा जाएं। फिर ऊपर से हल्का गर्म दूध पी लें। करीब-करीब एक महीने तक इस मिश्रण का उपयोग करें। इस दौरान संभोग बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। यह सेक्स क्षमता को बढ़ाने वाला सबसे अच्छा उपाय है।
सफ़ेद मूसली पुरुष रोगों में रामबाण औषिधि. वियाग्रा और जिन्सेंग से कहीं बढ़कर है भारतीय सफ़ेद मूसली. आयुर्वेद में सदियों से ही इसका उपयोग कमजोरी से ग्रस्त रोगियों के लिए किया जाता रहा है. मुसली के पौधे की जड़ मूसल के समान होती और इसका रंग सफ़ेद होता है इसलिए इसे मुस्ली या मूसली कहा जाता है। वीर्य गाढ़ा करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन. वीर्य गाढ़ा करने का घरेलु नुस्खा. वीर्य ही शारीर का सार है, 
स्टेरॉयड (steroids) का सेवन समाप्त करें: 
यह भले ही आपकी मसल्स को बनाने में मददगार होंगे, लेकिन इससे आपके अंडकोश पर बुरा असर पड़ता है। वीर्य की मात्रा के अनुरूप ऐसा कौन चाहेगा? ऐनेबोलिक स्टेरइड (anabolic steroids) आपके समस्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

रविवार, 11 जून 2017

हिस्टीरिया के कारण, लक्षण और उपचार



हिस्टीरिया रोग जो है वो अमूमन अविवाहित लड़कियों और स्त्रियों को होता है और इसके होने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी है | हिस्टीरिया रोग होने पर रोगी को मिर्गी के समान दौरे पढ़ते है और यह काफी तकलीफदेह भी होता है | इसलिए इसके कारण और उपचार से जुडी जानकारी हम आपसे शेयर कर रहे है चलिए इस बारे में बात करते है |
आयुर्वेद में इसे ‘योषापस्मार’ के नाम से जाना जाता है। योषा शब्द स्त्रीवाचक है और अपस्मार मिर्गी का घोतक। यह रोग अविवाहित स्त्रियों को अधिक होता है। इस रोग में मिर्गी के समान दौरे पड़ते हैं।
हिस्टीरिया के कारण
हिस्टीरिया के प्रमुख कारणों में पर पुरुष से बलात्कार के कारण उत्पन्न खौफ, प्रेम में असफलता, काम वासना में अतृप्ति, प्रेमी से बिछुड़ना, शारीरिक मानसिक परिश्रम न कर आराम तलब जिंदगी गुजारना, अत्यंत भोग-विलास में जीवन व्यतीत करना, अश्लील साहित्य पढ़ना, उत्तेजक फिल्में देखना, श्वेत प्रदर से लंबे समय तक पीड़ित रहना, बांझपन, डिंबाशय व जरायु रोग, नाड़ियों की कमजोरी, आकस्मिक मानसिक आघात, मासिक धर्म का रुकना, कष्टपूर्ण मासिक धर्म, सास-बहू आदि परिवार के सदस्यों से तालमेल न बैठना, सामाजिक एवं पारिवारिक बंधनो में बांधना, चिंता, भय, शोक, मानसिक तनाव, अत्यधिक भावुक प्रकृति का होना, पति का वृद्ध, छोटा, बीमार होना या अन्य स्त्री से प्रेम का चक्कर, लम्बे समय तक पति से दूर रहना, संभोग करने का मौका न मिलना, जवानी बीत जाने पर भी विवाह न होना, असुरक्षा की भावना, बुद्धि की कमी, किसी गुप्त पाप को मन में दबाये रखना आदि होते हैं।
हिस्टीरिया के लक्षण
इस रोग के लक्षणों में रोगिणी को दौरा पड़ने से पूर्व आभास होने लगता है, लेकिन जब दौरा पड़ जाता है, तो उसे कुछ ज्ञान नहीं रहता। बेहोशी का दौरा 24 से 48 घंटों तक रह सकता है। मूर्च्छावस्था के दौरान ही झटके आते हैं, गले की मांसपेशियां जकड़ जाती हैं, मुट्ठी बंध जाती हैं, दांत भिंच जाते हैं, कंपकंपी होती है, श्वास लेने में तकलीफ होती है, सांस रूकती सी लगती है, पेट फूल जाता है, स्मृति का लोप हो जाता है, बहुत ज्यादा मात्रा में पेशाब होता है। इसके अलावा किसी किसी रोगी में हाथ-पैर पटकना, सांसे तेज चलना, ह्रदय की धड़कन अधिक बढ़ जाना, भयंकर सिर दर्द, बेचैनी, असंभव बातें बोलना, कभी रोना, कभी हंसना, कभी गाना, उलटी करना, आँखें नचाना, बाल और शरीर नोंचना आदि लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
हिस्टीरिया में क्या खाएं
हिस्टीरिया का इलाज और रोकथाम खान पान को संतुलित करने से भी संभव है और रोगी अपनी खानपान की आदतों में बदलाव कर इसे संयमित कर सकती है |गेहूं की रोटी, पुराना चावल, दलिया, मूंग की दाल, मसूर की दाल भोजन में खाएं।
फलों में पपीता, अंजीर, खीरा, संतरा, मौसमी, अनार, बेल के फल का सेवन करें।
आंवले का मुरब्बा सुबह-शाम के भोजन के साथ खाएं।
गाय का दूध ,नारियल का पानी और मठा और छाछ का उपयोग खाने के दौरान अधिक से अधिक करें |
दूध पीते समय उसमे जितना आपको अच्छा लगे उतनी मात्रा  मे शहद  मिलकर उसके साथ किशमिश का सेवन करें | यह काफी लाभप्रद है |

हिस्टीरिया में क्या न खाएं
भारी, गरिष्ठ, बासी, तामसी भोजन न खाएं।
ताली-भुनी, मिर्च-मसालेदार, चटपटी चीजें सेवन न करें।
चाय, कॉफी, शराब, तम्बाकू, गुटखे से परहेज करें।
गुड़, तेल, हरी-लाल मिर्च, खटाई, अचार न खाएं।
मांस, मछली, अंडा आदि से परहेज करें।
हिस्टीरिया रोग निवारण में सहायक उपाय
हिस्टीरिया में क्या करें
सुबह घूमने जाएँ। नियमित हलका-फुलका व्यायाम करें।
रोगिणी अविवाहित हो तो विवाह करवा दें।
पति-पत्नी में सुलह करवाएं।
रोगिणी को दौरा पड़ने पर बदन के कपड़े ढीले कर दें। हवादार, साफ जगह में बिस्तर पर लिटाएं और सिर के नीचे तकिया लगा दें।
बेहोशी रोगिणी के मुँह, आँखों पर ठंडे पानी के छीटें मारें।
मानसिक कारणों का मनोवैज्ञानिक से विश्लेषण कराकर उपचार कराएं।
एक मोहल्ले से दूसरे या एक शहर से दूसरे शहर में स्थान परिवर्तन कराएं।
रोगिणी से थोड़ा सख्त व्यवहार करें, लेकिन उसकी उपेछा न करें।
हिस्टीरिया में क्या न करें
कब्ज या गैस बनने की शिकायत न होने दें।
रोगिणी से अत्यधिक सहानुभूति न जतायें।
एकांत निवास में रोगिणी को अकेला न छोड़ें।
अश्लील साहित्य न पढ़ें और न ही ऐसी फ़िल्में देखें।
घूम्रपान की आदत न पालें।
होश में लाने के लिए नाक के नथुनों में प्याज या लहसुन का रस या अमृतधारा या कपूररस की कुछ बूंदें टपकाएं।
गर्भाशय संबंधी विकारों के कारण दौरे पड़ रहे हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से इलाज कराएं।
अधिक मानसिक या शारीरिक परिश्रम तथा चिंता, भय, शोक न करें।
मल-मूत्रादि के वेगों को न रोकें
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सोमवार, 5 जून 2017

जावित्री के गुण फायदे उपयोग





जावित्री
जावित्री के दो पहलु होते हैं - एक खाने योग्य होता है और दूसरा नहीं। यहाँ हम जावित्री के बारे में बात करने जा रहे हैं - भारतीय पाकशैली में सबसे स्वादिष्ट और महक वाला मसालों में यह एक है।
इसका अपना एक लंबा इतिहास है
पहले यह जाने कि जावित्री है क्या। जावित्री मोमी लाल और जालीदार वृद्धि वाला होता है जो जयफल के बीज को चारों तरफ से घेरकर रहता है। लेकिन जयफल है क्या? किसी और समय हम इसकी व्याख्या करेंगे। चलिए, आपको एक बात बताता हूं कि ए.डी. पहली शताब्दी को व्यंजन में जयफल के इस्तेमाल के इतिहास का पता चला है। 1843 में बनडा से बीज लाकर ग्रेनाडा में पेश किया गया और सेंट जॉन के क्षेत्र व्लेविडेरा एस्टेट में बीजारोपण किया गया। जयफल के पौधे ज़्यादातर उष्णकटिबंधीय देशों में पाए जाते है जहाँ की जलवायु और मिट्टी पौधे के वृद्धि के लिए उपयुक्त होती है।
गरम स्वाद गरम रंग



जयफल सूखने के साथ नारंगी रंग में बदल जाता है और उच्च क्वालिटी का मसाला अपने रंग को बनाए रखता है। कुछ प्रकार क्रीमी या भूरे रंग में बदल जाते हैं। पूरा सूखा जयफल को ब्लेड कहा जाता है। ब्लेड को पीस लेना ही अच्छा होता है। रसोइए अपने ज़रूरतानुसार इसको पीस लेते हैं। ब्लेड के रूप में संरक्षित करने से इसका स्वाद अच्छा रहता है। ठंडे और सूखे जगह पर इसको संरक्षित करना चाहिए, नमी के संपर्क में नहीं आना चाहिए।
पाक-शैली में इस्तेमाल
लगभग 55 डिग्री फैरनहाइट के तापमान में और आद्र गरम जलवायु में इस मसाले को उपजाया जाता है। आजकल यह मसाला भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, वेस्ट इंडीज़ और ब्राज़ील में उपजाया जाता है। वैसे तो जयफल और जावित्री महक, स्वाद, में लगभग समान है जबकि जावित्री ज़्यादा परिष्कृत होता है और मीठा और नमकीन दोनों व्यंजनों में इसका इस्तेमाल होता है। भारत में, यह मूल रूप से मुघलाई व्यंजनों में इस्तेमाल होता है जबकि इटली में पास्ता के फिलींग के रूप में इस्तेमाल होता है, अरबी मटन में इस्तेमाल करते हैं तो यूरोप में मीठा और नमकीन व्यंजनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
दूसरे वैशिष्ट्य
यह माना जाता है कि यह मसाला हजम करने में मदद करता है और मितली से राहत दिलाता है। सावधानी की बात, इसमें हालूसीनोजेन्स होता है और फैटली विषाक्त का खुराक बड़ी मात्रा में रहता है। थोड़े मात्रा में इस्तेमाल करने से यह सुरक्षित होता है।




जावित्री के असरदार नुस्खे और उपाय 
जावित्री:
*1 से 3 ग्राम जावित्री के चूर्ण को 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार लेने से वीर्य का जल्दी निकलने का रोग दूर हो जाता है।
*जावित्री, सफेद कनेर की छाल, समुद्रशोष, अफीम, खुरासानी अजवायन, जायफल, पीपल, मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर गुड़ के साथ 4-4 ग्राम की गोलियां बनाकर रख लें। इसमें से एक गोली रात को सोते समय खाने से संभोगशक्ति बढ़ जाती है।अकरकरा: अकरकरा, सोंठ, लौंग, केसर, पीपल, जायफल, *जावित्री, और सफेद चन्दन को 6-6 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक पीसकर उसमें 20 ग्राम अफीम मिला लें। फिर इसमें शहद मिलाकर उड़द के आकार की गोलियां बनाकर एक-एक गोली खा लें और ऊपर से दूध पी लें। इससे संभोग करने की कमजोरी दूर होती है।

*कष्ट को दूर करें (Trouble) – अगर किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट हो दुःख हो, तो वह हर प्रकार के कष्ट से निजात पाने के लिए इस उपाय को कर सकता हैं. इस उपाय को करने के लिए रोजाना गणेश जी की मूर्ति पर जावित्री चढाएं और रात को सोने से पहले जावित्री को खाकर सोयें.लगातार 21 दिनों तक इस उपाय को करने से आपके सभी संकट, कष्ट तथा दुःख दूर हो जायेंगे

शनिवार, 3 जून 2017

होम्योपैथिक औषधि कार्बो वेज – वानस्पतिक कोयला ( Carbo Veg ) के गुण लक्षण उपयोग


व्यापक-लक्षण 
पेट के ऊपरी भाग में वायु का प्रकोप – पुराना अजीर्ण रोग, खट्टी तथा खाली डकारें आना ठंडी हवा; पंखे की हवा
किसी कठिन रोग के पश्चात उपयोगी डकार आने से कमी
सिर्फ गर्म हालत से जुकाम; अथवा गर्म से एकदम ठंडक में आने से होने वाले रोग (जैसे, जुकाम, सिर-दर्द आदि) पांव ऊँचे कर के लेटना
हवा की लगातार इच्छा (न्यूमोनिया, दमा, हैजा आदि) लक्षणों में वृद्धि
जलन, ठंडक तथा पसीना-भीतर जलन बाहर ठंडक (जैसे, हैजा आदि में) गर्मी से रोगी को परेशानी
शरीर तथा मन की शिथिलता (रुधिर का रिसते रहना, विषैला फोड़ा, सड़ने वाला वैरीकोज़ वेन्ज, थकान आदि ) वृद्धावस्था की कमजोरी
यह मृत-संजीवनी दवा कही जाती है गरिष्ट भोजन से पेट में वायु का बढ़ जाना
*पेट के ऊपरी भाग में वायु का प्रकोप – 
कार्बो वेज औषधि वानस्पतिक कोयला है। हनीमैन का कथन है कि पहले कोयले को औषधि शक्तिहीन माना जाता था, परन्तु कुछ काल के बाद श्री लोविट्स को पता चला कि इसमें कुछ रासायनिक तत्त्व हैं जिनसे यह बदबू को समाप्त कर देता है। इसी गुण के आधार पर ऐलोपैथ इसे दुर्गन्धयुक्त फोड़ों पर महीन करके छिड़कने लगे, मुख की बदबू हटाने के लिये इसके मंजन की सिफारिश करने लगे और क्योंकि यह गैस को अपने में समा लेता है इसलिये पेट में वायु की शिकायत होने पर शुद्ध कोयला खाने को देने लगे। कोयला कितना भी खाया जाय वह नुकसान नहीं पहुँचाता है। परन्तु हनीमैन का कथन था कि स्थूल कोयले का यह असर चिर-स्थायी नहीं है। मुँह की बदबू यह हटायेगा परन्तु कुछ देर बाद बदबू आ जायेगी, फोड़े की बदबू में जब तक यह लगा रहेगा तभी तक हटेगी, पेट की गैस में भी यह इलाज नहीं है। हनीमैन का कथन है कि स्थूल कोयला वह काम नहीं कर सकता जो शक्तिकृत कोयला कर सकता है। कार्बो वेज पेट की गैस को भी रोकता है, विषैले, सड़ने वाले जख्म-गैंग्रीन-को भी ठीक करता है। पेट की वायु के शमन में होम्योपैथी में तीन औषधियां मुख्य हैं – वे हैं: कार्बो वेज, चायना तथा लाइको।
कार्बो वेज, चायना तथा लाइकोपोडियम की तुलना – 
डॉ० नैश का कथन है कि पेट में गैस की शिकायत में कार्बो वेज ऊपरी भाग पर, चायना संपूर्ण पेट में गैस भर जाने पर, और लाइको पेट के निचले भाग में गैस होने पर विशेष प्रभावशाली है।
*पुराना अजीर्ण रोग, खट्टी तथा खाली डकारें आना – 
पुराने अजीर्ण रोग में यह लाभकारी है। रोगी को खट्टी डकारें आती रहती हैं, पेट का ऊपर का हिस्सा फूला रहता है, हवा पसलियों के नीचे अटकती है, चुभन पैदा करती है, खट्टी के साथ खाली डकारें भी आती हैं। डकार आने के साथ बदबूदार हवा भी खारिज होती है। डकार तथा हवा के निकास से रोगी को चैन पड़ता है। पेट इस कदर फूल जाता है कि धोती या साड़ी ढीली करनी पड़ती है। कार्बो वेज में डकार से आराम मिलता है, परन्तु चायना और लाइको में डकार से आराम नहीं मिलता।
*किसी कठिन रोग के पश्चात उपयोगी – 
अगर कोई रोग किसी पुराने कठिन रोग के बाद से चला आता हो, तब कार्बो वेज को स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार किसी पुराने रोग के बाद किसी भी रोग के चले आने का अभिप्राय यह है कि जीवनी-शक्ति की कमजोरी दूर नहीं हुई, और यद्यपि पुराना रोग ठीक हो गया प्रतीत होता है, तो भी जीवनी शक्ति अभी अपने स्वस्थ रूप में नहीं आयी। उदाहरणार्थ, अगर कोई कहे कि जब से बचपन में कुकुर खांसी हुई तब से दमा चला आ रहा है, जब से सालों हुए शराब के दौर में भाग लिया तब से अजीर्ण रोग से पीड़ित हूँ, जब से सामर्थ्य से ज्यादा परिश्रम किया तब से तबीयत गिरी-गिरी रहती है, जब से चोट लगी तब से चोट तो ठीक हो गई किन्तु मौजूदा शिकायत की शुरूआत हो गई, ऐसी हालत में चिकित्सक को कार्बो वेज देने की सोचनी चाहिये। बहुत संभव है कि इस समय रोगी में जो लक्षण मौजूद हों वे कार्बो वेज में पाये जाते हों क्योंकि इस रोग का मुख्य कारण जीवनी-शक्ति का अस्वस्थ होना है, और इस शक्ति के कमजोर होने से ही रोग पीछा नहीं छोड़ता।
जब तक कार्बो वेज के रोगी का नाक बहता रहता है, तब तक उसे आराम रहता है, परन्तु यदि गर्मी से हो जाने वाले इस जुकाम में वह ठंड में चला जाय, तो जुकाम एकदम बंद हो जाता है और सिर-दर्द शुरू हो जाता है। बहते जुकाम में ठंड लग जाने से, नम हवा में या अन्य किसी प्रकार से जुकाम का स्राव रुक जाने से सिर के पीछे के भाग में दर्द, आँख के ऊपर दर्द, सारे सिर में दर्द, हथौड़ों के लगने के समान दर्द होने लगता है। पहले जो जुकाम गर्मी के कारण हुआ था उसमें कार्बो वेज उपयुक्त दवा थी, अब जुकाम को रुक जाने पर कार्बो वेज के अतिरिक्त कैलि बाईक्रोम, कैलि आयोडाइड, सीपिया के लक्षण हो सकते हैं।
*हवा की लगातार इच्छा (न्यूमोनिया, दमा, हैज़ा आदि) – 
कार्बो वेज गर्म-मिजाज़ की है, यद्यपि कार्बो एनीमैलिस ठंडे मिजाज़ की है। गर्म-मिजाज की होने के कारण रोगी को ठंडी और पंखे की हवा की जरूरत रहती है। कोई भी रोग क्यों न हो-बुखार, न्यूमोनिया, दमा, हैजा-अगर रोगी कहे-हवा करो, हवा करो-तो कार्बो वेज को नहीं भुलाया जा सकता। अगर रोगी कहे कि मुँह के सामने पंखे की हवा करो तो कार्बो वेज, और अगर कहे कि मुँह से दूर पंखे को रख कर हवा करो तो लैकेसिस औषधि है। कार्बो वेज में जीवनी-शक्ति अत्यन्त शिथिल हो जाती है इसलिये रोगी को हवा की बेहद इच्छा होती है। अगर न्यूमोनिया में रोगी इतना निर्बल हो जाय कि कफ जमा हो जाय, और ऐन्टिम टार्ट से भी कफ नहीं निकल रहा। उस हालत में अगर रोगी हवा के लिये भी बेताब हो, तो कार्बो वेज देने से लाभ होगा। दमे का रोगी सांस की कठिनाई से परेशान होता है। उसकी छाती में इतनी कमजोरी होती है कि वह महसूस करता है कि अगला सांस शायद ही ले सके। रोगी के हाथ-पैर ठंडे होते हैं, मृत्यु की छाया उसके चेहरे पर दीख रही होती है, छाती से सांय-सांय की आवाज आ रही होती हे, सीटी-सी बज रही होती है, रोगी हाथ पर मुंह रखे सांस लेने के लिये व्याकुल होता है और कम्बल में लिपटा खिड़की के सामने हवा के लिये बैठा होता है और पंखे की हवा में बैठा रहता है। ऐसे में कार्बो वेज दिया जाता है। न्यूमोनिया और दमे की तरह हैजे में भी कार्बो वेज के लक्षण आ जाते हैं जब रोगी हवा के लिये व्याकुल हो जाता है। हैजे में जब रोगी चरम अवस्था में पहुँच जाय, हाथ-पैरों में ऐंठन तक नहीं रहती, रोगी का शरीर बिल्कुल बर्फ के समान ठंडा पड़ गया हो, शरीर के ठंडा पसीना आने लगे, सांस ठंडी, शरीर के सब अंग ठंडे-यहां तक कि शरीर नीला पड़ने गले, रोगी मुर्दे की तरह पड़ जाय, तब भी ठंडी हवा से चैन मिले किन्तु कह कुछ भी न सके-ऐसी हालत में कार्बो वेज रोगी को मृत्यु के मुख से खींच ले आये तो कोई आश्चर्य नहीं।
*सिर्फ गर्म हालत से जुकाम; यह गर्म से एकदम ठंड में आने से होने वाले जुकाम, खांसी, सिर दर्द आदि – 
कार्बो वेज जुकाम-खांसी-सिरदर्द आदि के लिए मुख्य-औषधि है। रोगी जुकाम से पीड़ित रहा करता है। कार्बो वेज की जुकाम-खांसी-सिरदर्द कैसे शुरू होती है? – रोगी गर्म कमरे में गया है, यह सोच कर कि कुछ देर ही उसने गर्म कमरे में रहना है, वह कोट को डाले रहता है। शीघ्र ही उसे गर्मी महसूस होने लगती है, और फिर भी यह सोचकर कि अभी तो बाहर जा रहा हूँ-वह गर्म कोट को उतारता नहीं। इस प्रकार इस गर्मी का उस पर असर हो जाता है और वह छीकें मारने लगता है, जुकाम हो जाता है। नाक से पनीला पानी बहने लगता है और दिन-रात वह छींका करता है। यह तो हुआ गर्मी से जुकाम हो जाना। औषधियों का जुकाम शुरू होने का अपना-अपना ढंग है। कार्बो वेज का जुकाम नाक से शुरू होता है, फिर गले की तरफ जाता है, फिर श्वास-नलिका की तरफ जाता है और अन्त में छाती में पहुंचता है। फॉसफोरस की ठंड लगने से बीमारी पहले ही छाती में या श्वास-नलिका में अपना असर करती है।
*शरीर तथा मन की शिथिलता (रुधिर का रिसते रहना, विषैला फोड़ा, सड़ने वाला वैरीकोज़ वेन्ज, थकान आदि 
शिथिलता कार्बो वेज का चरित्रगत-लक्षण है। प्रत्येक लक्षण के आधार में शिथिलता, कमजोरी, असमर्थता बैठी होती है। इस शिथिलता का प्रभाव रुधिर पर जब पड़ता है तब हाथ-पैर फूले दिखाई देते हैं क्योंकि रुधिर की गति ही धीमी पड़ जाती है, रक्त-शिराएं उभर आती हैं, रक्त-संचार अपनी स्वाभाविक-गति से नहीं होता, वैरीकोज़ वेन्ज़ का रोग हो जाता है, रक्त का संचार सुचारु-रूप से चले इसके लिये टांगें ऊपर करके लेटना या सोना पड़ता है। रक्त-संचार की शिथिलता के कारण अंग सूकने लगते हैं, अंगों में सुन्नपन आने लगती है। अगर वह दायीं तरफ लेटता है तो दायां हाथ सुन्न हो जाता है, अगर बायीं तरफ लेटता है तो बायां हाथ सुन्न हो जाता है। रक्त-संचार इतना शिथिल हो जाता है कि अगर किसी अंग पर दबाव पड़े, तो उस जगह का रक्त-संचार रुक जाता है। रक्त-संचार की इस शिथिलता के कारण विषैले फोड़े, सड़ने वाले फोड़े, गैंग्रीन आदि हो जाते हैं जो रक्त के स्वास्थ्यकर संचार के अभाव के कारण ठीक होने में नहीं आते, जहां से रुधिर बहता है वह रक्त-संचार की शिथिलता के कारण रिसता ही रहता है।
रुधिर का नाक, जरायु, फेफड़े, मूत्राशय आदि से रिसते रहना – 
रुधिर का बहते रहना कार्बो वेज का एक लक्षण है। नाक से हफ्तों प्रतिदिन नकसीर बहा करती है। जहां शोथ हुई वहाँ से रुधिर रिसा करता है। जरायु से, फेफड़ों से, मूत्राशय से रुधिर चलता रहता है, रुधिर की कय भी होती है। यह रुधिर का प्रवाह वेगवान् प्रवाह नहीं होता जैसा एकोनाइट, बेलाडोना, इपिकाका, हैमेमेलिस या सिकेल में होता है। इन औषधियों में तो रुधिर वेग से बहता है, कार्बो वेज में वेग से बहने के स्थान में वह रिसता है, बारीक रक्त-वाहिनियों द्वारा धीमे-धीमे रिसा करता है। रोगिणी का ऋतु-स्राव के समय जो रुधिर चलना शुरू होता है वह रिसता रहता है और उसका ऋतु-काल लम्बा हो जाता है। एक ऋतु-काल से दूसरे ऋतु-काल तक रुधिर रिसता जाता है। बच्चा जनने के बाद रुधिर बन्द हो जाना चाहिये, परन्तु क्योंकि इस औषधि में रुधिर-वाहिनियां शिथिल पड़ जाती हैं, इसलिये रुधिर बन्द होने के स्थान में चलता रहता है, धीरे-धीरे रिसता रहता है। ऋतु-काल, प्रजनन आदि की इन शिकायतों को, तथा इन शिकायतों से उत्पन्न होनेवाली कमजोरी को कार्बो वेज दूर कर देता है। कभी-कभी जनने के बाद प्लेसेन्टा को बाहर धकेल देने की शक्ति नहीं होती। अगर इस हालत में रुधिर धीरे-धीरे रिस रहा हो, तो कार्बो वेज की कुछ मात्राएँ उसे बहार धकेल देंगी और चिकित्सक को शल्य-क्रिया करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
विषैला फोड़ा, सड़नेवाला ज़ख्म, गैंग्रीन – 
क्योंकि रक्त-वाहिनियां शिथिल पड़ जाती हैं इसलिये जब भी कभी कोई चोट लगती है, तब वह ठीक होने के स्थान में सड़ने लगती है। फोड़े ठीक नहीं होते, उनमें से हल्का-हल्का रुधिर रिसा करता है, वे विषैले हो जाते हैं, और जब फोड़े ठीक न होकर विषैला रूप धारण कर लेते हैं, तब गैंग्रीन बन जाती है। जब भी कोई रोग शिथिलता की अवस्था में आ जाता है, ठीक होने में नहीं आता, तब जीवनी शक्ति की सचेष्ट करने का काम कार्बो वेज करता है।
वेरीकोज़ वेन्ज – 
रुधिर की शिथिलता के कारण हदय की तरफ जाने वाला नीलिमायुक्त अशुद्ध-रक्त बहुत धीमी चाल से जाता है, इसलिये शिराओं में यह रक्त एकत्रित हो जाता है और शिराएँ फूल जाती हैं। इस रक्त के वेग को बढ़ाने के लिये रोगी को अपनी टांगें ऊपर करके लेटना या सोना पड़ता है। रक्त की इस शिथिलता को कार्बो वेज दूर कर देता है क्योंकि इसका काम रक्त-संचार की कमजोरी को दूर करना है।



शारीरिक तथा मानसिक थकान –
 शारीरिक-थकान तो इस औषधि का चरित्रगत-लक्षण है ही क्योंकि शिथिलता इसके हर रोग में पायी जाती है। शारीरिक-शिथिलता के समान रोगी मानसिक-स्तर पर भी शिथिल होता है। विचार में शिथिल, सुस्त, शारीरिक अथवा मानसिक कार्य के लिये अपने को तत्पर नहीं पाता।
*यह दवा मृत-संजीवनी कही जाती है – 
कार्बो वेज को होम्योपैथ मृत-संजीवनी कहते हैं। यह मुर्दों में जान फूक देती है। इसका यह मतलब नहीं कि मुर्दा इससे जी उठता है, इसका यही अभिप्राय है कि जब रोगी ठंडा पड़ जाता है, नब्ज़ भी कठिनाई से मिलती है, शरीर पर ठंडे पसीने आने लगते हैं, चेहरे पर मृत्यु खेलने लगती है, अगर रोगी बच सकता है तब इस औषधि से रोगी के प्राण लौट आते हैं। कार्बो वेज जैसी कमजोरी अन्य किसी औषधि में नहीं है, और इसलिये मरणासन्न-व्यक्ति की कमजोरी हालत में यह मृत-संजीवनी का काम करती है। उस समय 200 या उच्च-शक्ति की मात्रा देने से रोगी की जी उठने की आशा हो सकती है।
*जलन, ठंडक तथा पसीना-भीतर जलन बाहर ठंडा (जैसे, हैज़ा आदि में) – 
कार्बो वेज का विशेष-लक्षण यह है कि भीतर से रोगी गर्मी तथा जलन अनुभव करता है, परन्तु बाहर त्वचा पर वह शीत अनुभव करता है। कैम्फर में हमने देखा था कि भीतर-बाहर दोनों स्थानों से रोगी ठंडक अनुभव करता है परन्तु कपड़ा नहीं ओढ़ सका। जलन कार्बो वेज का व्यापक-लक्षण है – शिराओं (Veins) में जलन, बारीक-रक्त-वाहिनियों (Capillaries) में जलन, सिर में जलन, त्वचा में जलन, शोथ में जलन, सब जगह जलन क्योंकि कार्बो वेज लकड़ी का अंगारा ही तो है। परन्तु इस भीतरी जलन के साथ जीवनी-शक्ति की शिथिलता के कारण हाथ-पैर ठंडे, खुश्क या चिपचिपे, घुटने ठंडे, नाक ठंडी, कान ठंडे, जीभ ठंडी। क्योंकि शिथिलावस्था में हृदय का कार्य भी शिथिल पड़ जाता है इसलिये रक्त-संचार के शिथिल हो जाने से सारा शरीर ठंडा हो जाता है। यह शरीर की पतनावस्था है। इस समय भीतर से गर्मी अनुभव कर रहे, बाहर से ठंडे हो रहे शरीर को ठंडी हवा की जरूरत पड़ा करती है। इस प्रकार की अवस्था प्राय: हैजे आदि सांघातिक रोग में दीख पड़ती है जब यह औषधि लाभ करती है।
 अन्य-लक्षण
*ज्वर की शीतावस्था में प्यास, ऊष्णावस्था में प्यास का अभाव –
 यह एक विचित्रण-लक्षण है क्योंकि शीत में प्यास नहीं होनी चाहिये, गर्मी की हालत में प्यास होनी चाहिये। सर्दी में प्यास और गर्मी में प्यास का न होना किसी प्रकार समझ में नहीं आ सकता, परन्तु ऐसे विलक्षण-लक्षण कई औषधियों में दिखाई पड़ते है। जब ऐसा कोई विलक्षण लक्षण दीखे, तब वह चिकित्सा के लिये बहुत अधिक महत्व का होता है क्योंकि वह लक्षण रोग का न होकर रोगी का होता है, उसके समूचे अस्तित्व का होता है। होम्योपैथी का काम रोग का नहीं रोगी का इलाज करना है, रोगी ठीक हो गया तो रोग अपने-आप चला जाता है।
* तपेदिक की अन्तिम अवस्था – 
तपेदिक की अन्तिम अवस्था में जब रोगी सूक कर कांटा हो जाता है, खांसी से परेशान रहता है, रात को पसीने से तर हो जाता है, साधारण खाना खाने पर भी पतले दस्त आते हैं, तब इस औषधि से रोगी को कुछ बल मिलता है, और रोग आगे बढ़ने के स्थान में टिक जाता है।
*वृद्धावस्था की कमजोरी – 
युवकों को जब वृद्धावस्था की लक्षण सताने लगते हैं या वृद्ध व्यक्ति जब कमजोर होने लगते हैं, हाथ-पैर ठंडे रहते हैं, नसें फूलने लगती हैं, तब यह लाभप्रद है। रोगी वृद्ध हो या युवा, जब उसके चेहरे की चमक चली जाती है, जब वह काम करने की जगह लेटे रहना चाहता है, अकेला पड़े रहना पसन्द करता है, दिन के काम से इतना थक जाता है कि किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम उसे भारी लगता है, तब इस औषधि से लाभ होता है।
शक्ति तथा प्रकृति – यह गहरी तथा दीर्घकालिक प्रभाव करने वाली औषधि है।

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शुक्रवार, 2 जून 2017

होम्योपैथिक औषधि लाइकोपोडियम क्लैवेटम – LYCOPODIUM CLAVATUM के गुण लक्षण उपयोग


लक्षण 
मानसिक-लक्षण – अपनी योग्यता पर सन्देह, लोभ, कंजूस, लड़ाकूपन ( नक्स वोम से तुलना ) गर्म पेय, गर्म भोजन पसन्द करना
शाम के 4 से 8 तक रोग का बढ़ना हरकत से रोगी को आराम
दाहिनी तरफ का रोग, या रोग का दाहिने से बायें को जाना; या क्षीणता का ऊपर से नीचे को आना डकार आने से आराम
पेट में अफारा (कार्बो वेज-लाइको-चायना की तुलना) सिर खुला रखने से आराम
अर्जीण-रोग – बेहद भूखा किन्तु दो कौर के बाद उठ जाता है (अजीर्ण में लाइको तथा नक्स की तुलना) लक्षणों में वृद्धि
पेशाब में बालू की तरह का लाल चूरा – मूत्राशय की पथरी; सिर-दर्द, गठिया 4 से 8 शाम तक रोग-वृद्धि
नपुंसकता की औषधि दाहिनी ओर रोग होना
दाहिनी तरफ का हर्निया सर्दी से रोग बढ़ना क्योंकि औषधि शीत-प्रधान है
न्यूमोनिया के बाद से रोगी कभी अच्छा नहीं हुआ ठंडा खाने-पीने से रोग-वृद्धि
रोगी शीत-प्रधान होता है।
*मानसिक-लक्षण – 
अपनी योग्यता पर सन्देह, लोभ, कंजूस, लड़ाकूपन (नक्स से तुलना) – मानसिक-लक्षणों को लाइको और नक्स में इतनी समानता है कि चिकित्सक को यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि किस औषधि को दें। दोनों तीव्र-बुद्धि हैं, शरीर से कमजोर; शरीर के विकास और मानसिक-विकास में अन्तर पाया जाता है; शारीरिक-विकास पिछड़ा हुआ और मानसिक-विकास आगे बढ़ा हुआ। कमजोर पतले-दुबले व्यक्ति जो पहली नजर में देखने वाले पर कुछ प्रभाव नहीं छोड़ते, परन्तु कुछ देर तक उनसे बातचीत करने पर पता चलता है कि इस दुबले-पतले शरीर में किसी बुद्धिमान आत्मा का निवास है। बड़े नाजुक (Sensitive) होते हैं। जरा-सी बात पर पारा चढ़ जाता है। धैर्यहीन, असंतुष्ट, किसी पर विश्वास न करने वाले। यहां तक मानसिक-लक्षणों में दोनों में समानता है। परन्तु इनमें भेद भी हैं। नक्स का गुस्सा, उसकी चिड़चिड़ाहट तब जाहिर होती है जब कोई दूसरा उसके नजदीक झगड़ने जाय, लाइको तो खुद लोगों से झगड़ा मोल लिया करता है। लाइको का मरीज दूसरे पर हावी होना चाहता है, हर बात में नुक्स निकाला करता है, तेज मिजाज का होता है, कोई उसकी बात को काटे तो सह नहीं सकता। डॉ० एलन ने उसकी ऐसी व्यक्ति से तुलना की है जो डंडा लिये यह सोचा करता है कि किस पर वह प्रहार कर सकता है। इसके अतिरिक्त नक्स के रोग प्रात: काल बढ़ते हैं, लाइको के सायंकाल 4 बजे के बाद; नक्स भरपेट खाना खा लेता है, बाद को उसकी पेट की तकलीफ शुरू होती है. लाइको तो दो-चार कौर खाकर आगे खा ही नहीं सकता, दो-चार कौर के बाद ही पेट भारी लगने लगता है। लाइको लोभी, कंजूस, लालची, और लड़ाकू होता है।
अपने योग्यता पर संदेह – 
इसके रोगी में प्राय: देखा जाता है कि व्यक्ति को अपनी योग्यता में संदेह होता है। उदाहरणार्थ, वकील की जज के सामने अपने केस पेश करने में यह संदेह बना रहता है कि वह अपना केस सफलतापूर्वक रख सकेगा ‘या नहीं। नेता को जनता के समक्ष भाषण करने में यही सन्देह बना रहता है कि उसका भाषण सफल होगा या नहीं। यद्यपि ये दिन-प्रतिदिन केस लड़ते तथा भाषण करते हैं, तो भी इन्हें अपनी योग्यता पर सन्देह बना ही रहता है। जब ये भाषण करते हैं तब बड़ी सफलता से अपना कार्य निबाहते हैं, परन्तु शुरू-शुरू में यह डर सताता रहता है कि कहीं भाषण करते हुए अटक न जायें, अपनी युक्तियों को भूल न जायें। अपनी योग्यता में इस प्रकार सन्देह, अपनी कार्य-क्षमता में आत्म-विश्वास का अभाव साइलीशिया में भी पाया जाता है। इस प्रकार का आत्म-विश्वास का अभाव इन दो औषधियों में सबसे अधिक है। इस लक्षण को दूसरे शब्दों में ‘घटना होने से पहले चिन्ता’ (Anticipatory fear) कहा जा सकता है। यह लक्षण अर्जेन्ट नाइट्रिकम तथा जेलसीमियम में भी है।
एकान्त से डरना भी, और एकान्त चाहना भी – 
रोगी उन्हीं के पास रहना चाहता है जो सदा उसके साथ रहें, अपरिचितों से वह दूर रहना चाहता है। एक छोटे-से कमरे में एकान्त रहना वह पसन्द करता है, परन्तु यह भी चाहता है कि उसके पास एक दूसरा भी कमरा हो जिसमें कोई उसका जान-पहचान का व्यक्ति रहे। इस दृष्टि से लाइको एकान्त चाहता भी है, और एकान्त से डरता भी है।
झट रो देता है – 
जब कभी कोई मित्र मिलता है, तो उसकी आखों में आँसू आ जाते हैं। अगर कोई मित्र कुछ भेंट दे, तो धन्यवाद देने के साथ-साथ उसके आँसू टपक पड़ते हैं। वह इतना स्नायु-प्रधान होता है कि जरा-सी खुशी के मुकाम पर रो देता है, अत्यंत भावुक होता है।



अन्धकारमय पागलपन का दृष्टिकोण – 
उसके चित्त में अजीब तरह के बुरे-बुरे विचार आते रहते हैं। अगर जगत का नाश हो जाय, अगर घर के सब लोग मर जायें, अगर मकान को आग लग जाय, भविष्य के विषय में इस तरह के विचारों को सोचते-सोचते पागलपन आ जाता है।
अजीर्ण-रोग – 
बेहद भूखा परन्तु दो कौर खाने के बाद उठ जाता है (अजीर्ण में लाइको तथा नक्स की तुलना) – डॉ० चौधरी अपनी ‘मैटीरिया मैडिका’ में लिखते हैं: ‘मैं साहसपूर्वक कह सकता हूं कि अपचन या अजीर्ण रोग के 50 प्रतिशत रोगी लाइको से ठीक हो सकते हैं।’ हम पहले ही कह चुके हैं कि लाइको तथा नक्स एक दूसरे के अत्यन्त निकट है। अजीर्ण-रोग में भी दोनों औषधियों में भोजन के उपरान्त बेचैनी होने का लक्षण है, परन्तु लाइको में रोगी बेहद भूखा होता है किन्तु दो कौर खाने के बाद ही पेट की बेचैनी शुरू हो जाती है, पेट भरा-भरा लगता है। इस प्रकार का लक्षण कि रोगी भूखा तो बैठे किन्तु दो कौर खाने के बाद भूख न रहे, अन्य किसी औषधि में नहीं पाया जाता। नक्स का रोगी भर पेट खा लेता है, परन्तु उसकी बेचैनी तब शुरू होती है जब पाचन-क्रिया शुरू हो चुकी होती है, लाइको के रोगी की बेचैनी तो पाचन-क्रिया के शुरू होने के पहले ही शुरू हो जाती है।
पेशाब में बालू की तरह का लाल चूरा – 
मूत्राशय की पथरी, सिर दर्द, गठिया – 
पेशाब में बालू की तरह का लाल चूरा इस औषधि का बड़ा मुख्य लक्षण है। जिन रोगियों के पेशाब में इस प्रकार का लाल चूरा प्रचुर मात्रा में पाया जाय, उनके हर-किसी रोग में यह औषधि लाभकारी है। लाल चूरे का मतलब सिर्फ लाली नहीं, अपितु बालू की तरह के लाल ठोस कण हैं, जो पेशाब को किसी बर्तन में रख देने से नीचे बैठ जाते हैं। अगर शुरू-शुरू में लाइको से इसका इलाज न किया जाय, तो गुर्दे में पथरी पैदा हो जाती है, जो अत्यंत दर्द पैदा करती है। अगर यह दर्द गुर्दे के दाहिनी तरफ हो, तब तो लाइको निश्चित औषधि है। बायें गुर्दे के दर्द के लिये बर्बेरिस दवा है। सार्सापैरिला में पेशाब के नीचे सफेद-चूरा जमता है, लाल नहीं। बच्चों तथा बड़ों में भी पेशाब में लाइको का लाल चूरा पाया जाता है, इसके साथ कमर में दर्द होता है, और यह दर्द पेशाब करने से जाता रहता है। इन लक्षणों के होने पर लाइको की तरह और दूसरी कोई औषधि इतना लाभ नहीं करती और इन लक्षणों में लाइको पथरी को गलाकर निकाल देती है।
पेट में अफारा (कार्बो वेज, लाइको, चायना की तुलना) –
 पेट के अफारे या पेट में हवा बनने के संबंध में तीन औषधियां मुख्य हैं – कार्बोवेज, लाइको, चायना। यह गैस की औषधियों का ‘त्रिक’ है। कार्बोवेज में पेट के ऊपर के हिस्से में हवा भर जाती है, नाभि से उपर वाला भाग भरा रहता है, रोगी ऊपर से डकारा करता है। लाइको में पेट का निचला हिस्सा वायु से भरा रहता है, आतों में भोजन पड़ा-पड़ा सड़ा करता है, हर समय गुड़-गुड़ होती है, नीचे के पेट में हवा फिरती रहती है। लाइको का रोगी कहता है कि मैं जो कुछ खाता हूँ सब हवा बन जाता प्रतीत होता है। हवा की गुड़गुड़ाहट विशेष तौर पर बड़ीआंत के उस हिस्से में पायी जाती है जो तिल्ली की तरफ है, अर्थात् पेट के बायीं तरफ। हवा उठती तो दायीं से ही है, परन्तु निकल न सकने के कारण बायीं तरफ अटक जाती है। दायीं तरफ उठने के कारण बायीं तरफ होते हुए भी पेट में ऐसी गैस लाइको का ही लक्षण है। चायना की हवा सारे पेट में भरी रहती है, रोगी यह नहीं कहता कि हवा ऊपर है या नीचे, वह कहता है कि सारा पेट हवा से भरा पड़ा है।
*शाम को 4 से 8 तक रोग का बढ़ना – 
इसके रोग के बढ़ने का समय निश्चित है। इसकी शिकायतें शाम को 4 से 8 तक बढ़ा करती हैं। नये तथा पुराने रोगों में प्राय: उनके बढ़ने का यही समय होता है। रोगी कहता है कि बुखार 4 बजे आता है, 8 बजे तक रहकर हट जाता है। मलेरिया हो या कोई भी बुखार हो, अगर – उसका यह समय निश्चित है, तो इस औषधि से अवश्य लाभ होगा। मलेरिया, टाइफॉयड, गठिये का दर्द, वात-रोग के बुखार, न्यूमोनिया, दमा आदि कोई रोग भी क्यों न हो, अगर 4 बजे तबीयत गिर जाती है, 4 से 8 बजे रोग के बढ़ने का समय है, तो इस औषधि को भुलाया नहीं जा सकता। लाइको से अपचन के ऐसे अनेक रोगी ठीक हुए हैं जिनमें पेट में जलन 3 बजे दोपहर शुरू हुई और शाम 8 बजे पित्त की उल्टी के बाद जलन दूर हो गई।



*दाहिने तरफ का रोग, या रोग का दाहिने से बायें जाना; 
या क्षीणता का ऊपर से नीचे आना – कोई भी रोग जो शरीर के दाहिने हिस्से पर आक्रमण करे, या दाहिने पर आक्रमण करके बायीं तरफ जाय, तो इसकी तरफ ध्यान जाना चाहिये। टांसिल का शोथ जो पहले गले के दाहिने हिस्से पर आक्रमण करता है इसके द्वारा शुरू में ही संभल जाता है। लाइकोपोडियम, लैकेसिस, लैक कैनाइनम, फाइटोलैका में से लक्षणानुसार किसी भी औषधि से टांसिल को एकदम रोका जा सकता है। पेट, डिम्बकोश, जरायु – इनके दर्द में अगर पीड़ा दाहिने से शुरू होती हो, या दाहिने से शुरू होकर बायीं तरफ जाती हो, फुन्सियाँ दायीं तरफ से बायीं तरफ जायें, शियाटिका का दर्द दायीं तरफ से बायीं तरफ जाय, कोई भी शिकायत हो दायीं तरफ से शुरू होती, दायीं तरफ ही रह जाती, या दायीं से बायी तरफ बढ़ती है – उसमें इस औषधि का कार्य-क्षेत्र है।
क्षीणता का ऊपर से नीचे आना – 
अगर रोगी का नीचे का भाग सही सलामत हो, ऊपर का भाग क्षीण हो जाय, गर्दन से क्षीणता शुरू हो, या यह क्षीणता सिर से छाती की तरफ चले, तो यह इस औषधि का लक्षण है। नीचे से शुरू होकर दुबलापन ऊपर की तरफ बढ़े तो ऐब्रोटेनम दवा है।
पेशाब में लाल चूरा हो तो सिर-दर्द चला जाय –
 रोगी के सिर-दर्द का पेशाब के लाल चूरे के साथ विशेष संबंध पाया जाता है; जब तक पेशाब में लाल चूरा निकलता रहता है, तब तक रोगी सिर-दर्द से मुक्त रहता है, जब यह लाल चूरा निकलना बन्द हो जाता है तब सिर दर्द भी शुरू हो जाता है। यह लाल चूरा यूरिक ऐसिड होता है जो शरीर के भीतर होने से सिर दर्द का कारण बना रहता है।
पेशाब में लाल चूरा हो तो गठिया रोग चला जाय –
 जो लोग गठिये के शिकार होते हैं उनमें जब पेशाब में लाल चूरा आता रहता है, तब जैसे सिर दर्द नहीं रहता वैसे गठिये का दर्द भी नहीं रहता, जब लाल चूरा आना बन्द हो जाता है तब सिर-दर्द और गठिये का दर्द भी आ जाता है। पेशाब में लाल चूरे का सिर के दर्द और गठिये के दर्द – इन दोनों के साथ संबंध है। लाल चूरा होगा तो न सिर-दर्द होगा, न गठिये का दर्द होगा; लाल चूरा नहीं होगा तो या सिर-दर्द होगा या गठिये का दर्द होगा, या दोनों होंगे। इस लाल चूरे का यूरिया से संबंध है और इसलिये लाल चूरे के रूप में जब यूरिया निकलना बन्द हो जाता है तब यही यूरिया सिर-दर्द या गठिये का दर्द पैदा कर देता है।
खा लेने पर सिर-दर्द चला जाय – 
इस औषधि के रोगी का सिर-दर्द खाना खा लेने से घट जाता है। निश्चित समय पर भोजन न मिले तो सिर-दर्द शुरू हो जाता है। फॉसफोरस और सोरिनम में भी समय पर भोजन न खाने से सिर दर्द शुरू हो जाता है, परन्तु फॉसफोरस और सोरिनम में सिर-दर्द शुरू होने से पहले पेट में भूख की धबराहट पैदा होती है, जो भोजन करने पर भी नहीं जाती। कैक्टस में ठीक समय पर भोजन न करने से सिर-दर्द हो जाता है, और भोजन कर लेने के बाद और बढ़ जाता है।
जुकाम के पुराने मरीज को ठंड लगने से दोबारा जुकाम होने पर सिर दर्द – 
जो रोगी सदा जुकाम के शिकार रहते हैं, गाढ़ा, पीले रंग का स्राव सिनका करते हैं, अगर उन्हें ठंड लगकर नया जुकाम हो जाय, और गाढ़े की जगह पतला पानी आने लगे, तो उन्हें तब तक सिर-दर्द होता रहता है जब तक उनका जुकाम फिर गाढ़ा नहीं हो जाता है। उनके जुकाम के फिर से गाढ़ा हो जाने पर सिर-दर्द जाता रहता है। ऐसे रोगियों के सिर-दर्द में लाइकोपोडियम लाभ करता है।
नपुंसकता की औषधि –
 नपुंसकता दूर करने की मुख्य औषधियों में यह एक है। जो लोग बहुत थके-मांदे रहते हैं, जिनके शरीर में जीवनी-शक्ति की कमी है, जननांग कमजोर हैं, उन्हें फॉसफोरस की अपेक्षा लाइको की आवश्यकता होती है। जिन नवयुवकों ने दुराचरण, व्यभिचार, हस्त-मैथुन आदि दुष्कर्मों से अपने को क्षीण कर लिया है, जननेन्द्रिय में उत्तेजना नहीं होती, उनका यह परम मित्र है। डॉ० नैश लिखते हैं कि वृद्ध लोग जो दुबारा विवाह कर अपनी नव यौवना पत्नी को संतुष्ट नहीं कर सकते उनको इस औषधि की उच्च-शक्ति की एक मात्रा उनके कष्ट दूर कर देती है।
>दाहिनी तरफ का हर्निया –

 बायीं तरफ के हर्निया में नक्स वोमिका तथा दाहिनी तरफ के हार्निया में लाइको दिया जाता है।
न्यूमोनिया के बाद से रोगी कभी अच्छा नहीं हुआ – ब्रौंकाइटिस या न्यूमोनिया के बाद कई रोगी अपने को ठीक हुआ नहीं पाते। ब्रौंकाइटिस या न्यूमोनिया का ठीक-से इलाज न होने के कारण या अधूरा इलाज होने के कारण रोगी को क्षय हो जाता है। ऐसे रोगियों के लिये यह उत्कृष्ट दवा है। इसके अतिरिक्त न्यूमोनिया में इसका उपयोग किया जाता है।
रोगी शीत-प्रधान होता है – 
रोगी शीत-प्रधान होता है, उसमें जीवनी-शक्ति की कमी होती है, जीवन के लिये जिस गर्मी की जरूरत है वह उसमें नहीं होती। समूचा शरीर ठंड तथा ठंडी हवा को नहीं चाहता। रोगी गर्म खाना और गर्म पीना चाहता है। उसके दर्द गर्मी से शान्त होते हैं। इसमें एक अपवाद है। इसके सिर तथा मेरु-दंड के लक्षण गर्मी से बढ़ जाते हैं, बिस्तर की गर्मी को सिर के लक्षण में वह बर्दाश्त नहीं कर सकता। सिर-दर्द गर्मी से और हरकत से बढ़ जाता है। सूजन के स्थान, गले की शोथ, पेट का दर्द – ये सब गर्मी चाहते हैं, सिर्फ सिर के लक्षणों में रोगी को ठंड की जरूरत पड़ती है।



कब्ज में नक्स से तुलना – 
हम जान ही चुके हैं कि लाइको और नक्स बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। कब्ज में भी ये मिलते हैं। दोनों में कब्ज की जबर्दस्त शिकायत रहती है। लाइको का रोगी कई दिन तक पाखाना नहीं जाता यद्यपि मल-द्वार भारी और भरा रहता है। टट्टी की ख्वाहिश नहीं होती, मल-द्वार क्रियाहीन होता है। दोनों में बार-बार जाना और एक बार में पूरा मल न आना पाया जाता है, परन्तु नक्स में आँतों की मल को आगे धकेलने की शक्ति की कमी के कारण बार-बार जाना पड़ता है, लाइको में मल-द्वार के संकुचित होने या उसकी क्रियाशीलता के अभाव के कारण ऐसा होता है। देखना यह है कि क्या रोगी ऐसा अनुभव करता है कि मल-द्वार तो भरा पड़ा है परन्तु टट्टी नहीं उतरती? तब लाइको उपयोगी होगा
बच्चा दिनभर रोता रातभर सोता है – 
सका एक लक्षण यह है कि बच्चा दिनभर तो रोता रहता है, रातभर चैन से सोता है। जेलापा और सोरिनम में बच्चा दिनभर सोता और रातभर रोता है।
योनि की खुश्की – 
यह स्त्रियों की योनि की खुश्की को दूर करता है जिसके कारण संगम में कष्ट होता है। योनि में हवा निकलना इसका विचित्र-लक्षण है।
दुबली लड़कियां –
 जो लड़कियां 16-18 वर्ष की हो जाने पर भी नहीं बढ़ती, जिनकी छाती दबी रहती है, शरीर पुष्ट नहीं हो पाता वे इस औषधि से पुष्ट होने लगती है
खाँसी –
 हलक में पर लगने की-सी सरसराहट प्रतीत होती है। सूखी, खांसी आती है। गले में धुआँ-सा उठकर खांसी आती है।
पसीना न आना –
 अगर रोगी को पसीना न आता हो तो इस औषधि को ध्यान में रखना चाहिये।
सोते हुए बिस्तर में पेशाब कर देगा – जिन बच्चों को दिन को तो पेशाब ठीक आता है, परन्तु रात को पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है, बिस्तर में पेशाब कर देते हैं, उसके लिये लाइको उपयोगी है।
फ्लू के बाद –
 फ्लू के आक्रमण के बाद दिमागी काम करने वालों की दिमागी कमजोरी को लाइको दूर कर देता है और वे फिर से काम करने लगते हैं। स्नायु-प्रधान रोगियों को फ्लू के बाद दिमागी कमजोरी के लिये स्कुटेलेरिया लाभप्रद है। बहुत लम्बी बीमारी हो जाय तो चायना उपयुक्त है।
लाइकोपोडियम का सजीव तथा मूर्त-चित्रण – 
पतला-दुबला पीला चेहरा, पिचके हुए गाल, चेहरे पर जवानी में भी बुढ़ापा लिखा हुआ, अपनी उम्र से ज्यादा बूढ़ा; अगर बच्चा है तो बड़ा सिर और ठिगना, रुग्ण शरीर, ऊपर से नीचे की तरफ क्षीण होता हुआ; शरीर के क्षीण होते हुए भी बुद्धि में तेज; लड़ने पर आमादा; किसी की बात न सहने वाला, जरा-सी बात पर तिनक जाने वाला; बदहजमी का शिकार, मीठे का प्रेमी, गर्म भोजन और गर्म चाय का इच्छुक; पेट में अफारा; शाम को 4 से 8 बजे की शिकायतों को लेकर आने वाला – यह है सजीव मूर्त-चित्रण लाइकोपोडियम का।
शक्ति तथा प्रकृति – 30, 200 तथा ऊपर



मुख्य प्रयोग-
यह एक सोरा-विष-नाशक दवा है। इन्द्रियों की दुर्बलता,
पाचन-शक्ति का लोप हो जाना, ऋम्लविकार, गुर्दे के रोग, पीठ में दर्द,
गुर्दे में दर्द, कैन्सर, दुवलापन, रतौंधी, असमय बुढ़ापा आ जाना, यकृतरोग, जलोदर, रक्तसंचार में कमी, रात में अनेक वार मूत्र-त्याग को जाना, बिना प्यास के गला सूखना, गले की सूजन, मन्दाग्नि, नपुंसकता, लिंग में उत्तेजना का अभाव, मूत्रग्रन्थियों में वृद्धि, लिंग पर माँसार्बुद तथा शीघ्रपतन आदि लक्षणों में यह औषधि अत्यधिक उपयोगी रहती है । बच्चों व वृद्रों की व्याधि में यह विशेष रूप से उपयोगी है। श्लेष्माप्रधान धातु वाले रोगी जिनके यकृत में विकार है और मूत्र में लिथिक एसिड निकले, जीर्ण-शीर्ण किन्तु बुद्रिमान, दुवले बच्चे, जिनका सिर बड़ा व त्वचा सूखी-सी होती है, ऐसे रोगी जो रोगावस्था में बहुत ही चिड़चिड़े हो जायें व अपने को श्रेष्ठ समझते हों, मौत के स्वप्न देखें- उनको यह दवा अधिक लाभ करती है यह दवा शरीर के दाहिनी ओर के रोग या दाहिनी और से आक्रमण कर बाँयी ओर जाने वाले रोगों में विशेष हितकारी है। जैसे-हार्निया, यकृतरोग, श्वसनतंत्र की पीड़ा, जरायु सम्बन्धी व्याधि, मसाने के रोग आदि । किसी भी रोग के उपसर्ग सायं 4 से 8 बजे के मध्य वढ़ने पर यह दवा लाभ करेगी । निर्देशक लक्षणमन- धार्मिक बकवास में रुचि या उदास व चुप रहना, श्रम से जी चुराना, लिखने में भूल या गलती करना, भूत-प्रेत का काल्पनिक भय । पेट-भूख अच्छी लगने पर भी खाना देखते ही भूख समाप्त हो जाये। पेट गुम ही जाना, भारीपन, यकृत वाले स्थान पर धीमा-धीमा दर्द, पेट के बाँयी ओर हवा इकट्ठी होने से पेट गड़गड़ाना व मुँह में खट्टापन, कब्जियत रहने पर भी दस्त । एसिडिटी, खट्टी डकारें आना, मुँह में खट्टा पानी भर आना, पाकाशय-मुख पर आँतों के मिलन-केन्द्र में ट्यूमर होना जिससे खून की वमन ही । हृदय- भोजन के कुछ समयोपरान्त कलेजे की धड़कन बढ़ने, हृदय बढ़ने, नाड़ी की कमजोरी व अनियमित चाल में उपयोगी मूत्र-पेशाब रुक-रुक कर होना या होते-होते रुक जाना । पेशाब बहुत जोर से लगना किन्तु निकले नहीं, उसके लिए वहुत देर तक बैठना पड़े। मूत्रपथरी में दर्द जो दाहिनी ओर के मसाने से शुरू होकर मूत्रद्वार तक या और नीचे यहाँ तक कि पैर तक चला जाये ।
शोथ-यकृत-रोग से पीड़ित शोथ (ड्रॉप्सी) में यह औषधि फायदा करती सूजन में घाव होने पर ।
है- विशेष रूप से पैरों में सूजन व वर्द- हिलने-डुलने से कमर-दर्द बढ़े तो ब्रायोनिया दें और इससे लाभ न मिलने पर लाइको दें
सिर-पेट के किसी रोग के कारण सिर खल्वाट हो जाये, प्रसवोपरान्त केश झड़ना, कम आयु में बालों में सफेदी में लाभप्रद । । दाँत- दाँतों का बड़े मालूम पड़ना व पीलापन, मसूढ़े फूलना जिनमें दातुन आदि करने से रक्त निकले
लक्षणों में कमी- बिस्तर की गरमी से, कपड़ा उतारने से, जाड़े से, गर्म वस्तुओं के सेवन से, आधी रात के पश्चात्  लक्षणों में वृद्धि – शरीर के हिलाने-डुलाने से, शोरगुल व आवाज से, दाहिने अंग में, तीसरे पहर 4 से 8-9 बजे के मध्य । 
ज्ञातव्य – लाइकोपोडियम एक दीर्घ क्रिया करने वाली औषध है अत: इसकी एक-दो खुराक देकर कई दिनों तक फल की प्रतीक्षा करनी चाहिये।