सोमवार, 24 जुलाई 2017

घबराहट दूर करने के प्राकृतिक उपाय/ Natural remedies to dispel nervousness


व्‍यस्‍त जीवनशैली और आगे बढ़ने की होड़ के कारण लोगों में एंग्जाइटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है, सही समय पर इसका इलाज न होने पर यह धीरे-धीरे फोबिया में बदल जाता है, इसलिए इससे बचने के लिए आपको कुछ सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्‍पों की जानकारी होनी चाहिए।
चिंता को हम पेनिक डिसऑर्डर के नाम से भी जानते हैं. व्यस्त जीवनशैली और आगे बढ़ने की होड़ के कारण लोगों में घबराहट की समस्या तेजी से बढ़ रही है, सही समय पर इसका इलाज न होने पर यह धीरे-धीरे फोबिया में बदल जाता है घबराहट और बेचैनी की समस्या आज एक आम समस्या हो गई है. यह एक ऐसा विकार अथवा परेशानी है जिसमें व्यक्ति को विशेष वस्तुओं, परिस्थितियों या क्रियाओं से डर लगने लगता है। अर्थात उनकी उपस्थिति में घबराहट होती है यह एक प्रकार की चिन्ता की बीमारी है।

घबराहट के लक्षण


दिल की धड़कन का बढ़ जाना- घबराहट या पेनिक डिसऑर्डर में सामान्यतः व्यक्ति की दिल की धड़कन बढ़ने लगती है व्यक्ति को बहुत घबराहट होने लगती है उसके हाथ पैरो में कम्पन होने लगती है.

एंग्जाइटी के लिए घरेलू उपचार

क्‍या आपका दिल छोटी-छोटी बातों में घबराने लगता है? अचानक से मन बेचैन हो उठता है और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं? उस वक्‍त समझ नहीं आता कि क्‍या करें? ऐसे में मन को शांति नहीं मिलती? यदि ऐसा है तो आप घबराहट यानी एंग्‍जाइटी डिसऑर्डर के शिकार हैं। यह एक प्रकार का मानसिक विकार है। मेडिकल भाषा में एंग्जाइटी डिस्‍ऑर्डर को स्नायुतंत्र पर अधिक दबाव पड़ना भी कहते हैं। इसके रोगियों की संख्‍या बढ़ रही है, समय पर इस समस्‍या का इलाज न होने पर यह धीरे-धीरे फोबिया में बदल जाता है। हालांकि घबराहट के दौरे को नियंत्रित करने के कई उपचार मौजूद हैं जैसे-दवाईयां, साइकोथैरेपी आदि। लेकिन दवाओं का सेवन आपके लिए एक नशे की लत की तरह हो सकता है। इसलिए आपको प्राकृतिक विकल्‍पों को चुनना चाहिए। आइए मन को शांत करने के ऐसे ही कुछ सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्‍पों के बारे में जानते हैं।




ग्रीन टी


ग्रीन टी व्‍यापक रूप से एंटीऑक्‍सीडेंट गुणों और स्‍वास्‍थ्‍य लाभों के कारण जानी जाती है। एल-थिएनाइन ग्रीन टी में एक एमिनो एसिड है। शोधों से पता चला है कि एल-थिएनाइन बढ़ी हृदय गति और रक्‍तचाप पर अंकुश लगाने में मदद करता है, और कुछ मानव अध्‍ययन के अनुसार, यह घबराहट को कम करने में भी आपकी मदद करता है। एक अध्‍ययन के अनुसार, 200 मिलीग्राम एल-थिएनाइन लेने से परीक्षण के दौरान चिंता की आंशका वाले विषय में छात्रों ने बहुत ही शांत और अधिक ध्‍यान केंद्रित कर परीक्षण दिया।

जिंको बिलोबा

इस जड़ी-बूटी का इस्‍तेमाल अक्‍सर स्‍मृति विकार औी ऐसी समस्‍याओं के लिए किया जाता है जो मस्तिष्‍क में रक्‍त के प्रवाह को कम कर देती है जैसे स्‍मृति हानि, एकाग्रता की कमी और मूड में गड़बड़ी। जिंको बिलोबा दुनिया में सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्रजातियों के पेड़ों में से एक है। यह जड़ी बूटी पूरी तरह से सुरक्षित है और सदियों से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। यह कम से कम 250 लाख साल पुरानी जड़ी-बूटी है।

ओमेगा-3 फैटी एसिड

ओमेगा-3 फैटी एसिड एंग्जाइटी के लक्षणों को कम करने और शरीर में तनाव केमिकल के स्‍तर जैसे एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल को कम कर मूड को अच्‍छा करने में मदद करता है। फैटी फिश जैसे ट्यूना और सालमन, अखरोट और अलसी के बीज ओमेगा-3 फैटी एसिड का बहुत अच्‍छा स्रोत है। एक इजरायली अध्‍ययन के दौरान जिन छात्रों को फिश ऑयल सप्‍लीमेंट दिये गये उनके खाने और सोने की आदतों, कोर्टिसोल का स्तर, और मानसिक स्‍तर के द्वारा मापने पर एंग्‍जाइटी कम देखने को मिली।

तनाव को कम करे –
घबराहट से बचने के लिए तनाव को कम करे क्योकि आप टेंशन में होंगे तो आपको निश्चित ही घबराहट होगी.

योग व सैर भी है फायदेमंद – 

सुबह की ताजी हवा में घूमने और योग करने से तनाव भी कम होगा और स्फूर्ति भी बढ़ेगी और इससे आपकी घबराहट भी कम होगी.

लैवेंडर

यह लोकप्रिय जड़ी-बूटी और आवश्‍यक तेल अपने शांत प्रभाव के कारण जानी जाती है। अध्‍ययन बताते हैं कि इसकी खुशबू हृदय गति और रक्‍तचाप को कम करने में मदद करती है और यह भावनात्‍मक एंटी-इंफ्लेमेंटरी के रूप में काम करता है। एक अध्‍ययन के अनुसार, यूनानी दंत रोगियों को तब कम घबराहट महसूस होती है जब उनका प्रतीक्षालय लैवेंडर के तेल के साथ सुगंधित किया जाता है। एक और जर्मन अध्‍ययन के अनुसार, विशेष रूप से तैयार लैवेंडर गोली सामान्यकृत चिंता विकार (जीएडी) से पीड़ि‍त लोगों में चिंता के लक्षणों को प्रभावी ढंग से कम करने में मदद करती है।

गहरी साँसे ले –

जब कभी भी आपको घबराहट होने लगे तो आप लम्बी और गहरी साँसे ले ये आपकी घबराहट को कम करने में आपकी मदद करेगी.

नींबू बाम

इस जड़ी बूटी का इस्‍तेमाल तनाव और चिंता को कम करने और अनिद्रा को दूर करने के लिए मध्य युग के किया जा रहा है। नींबू बाम से बनी चाय आराम तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करती है। नींबू बाम आपको चाय, कैप्‍सूल या अन्‍य शांत जड़ी बूटियों के साथ संयुक्‍त करके मिल सकती है।




ठंडा पानी पीये –


घबराहट को कम करने के लिए ठंडा पानी पीना बहुत ही अच्छा उपाय है ठंडा पानी आपके नर्वस सिस्टम को मैनेज करता है.


भीड़- भाड़ वाली जगह से भय –

जब किसी व्यक्ति को घबराहट की समस्या होती है तो अक्सर वह भीड़ भाड़ वाले स्थान पर जाने से बचता है भीड़ से उसे भय होने लगता है.

उपचार –

ऐसे रोगी को भीड़ वाले स्थानों पर जाने से बचना चाहिए क्योकि भीड़ देखकर ऐसे व्यक्ति को और अधिक घबराहट होने लगती है.

रविवार, 23 जुलाई 2017

चींटी भगाने के आसान घरेलू उपाय //Easy Ways to Avoid Ant



चींटी बहुत छोटी होती है लेकिन बहुत सारी एक साथ आकर परेशानी पैदा कर देती है। अक्सर मिठाई आदि मे चुपचाप घुसकर नुकसान कर देती है। हम खीजने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। रसोईघर में चींटी का हमला सामान्य सी बात है। शक्कर का डिब्बा चींटियों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान होता है। कई बार तो रोटी के कटोरदान में भी चीटियां घुस जाती है। यहां तक की नमकीन का आनंद उठाने भी आ जाती है।
लाल चींटी और काली चींटी ये दो प्रकार की चींटी ज्यादा दिखती है। लाल चींटी छोटी होती है लेकिन काटती जोर का है। इसके काटने पर तेज जलन होती है। काली चींटी सीधी सादी अपने काम से काम रखने वाली होती है। ये कम ही काटती है। चींटियाँ हमारे घर में खुद के लिए एक छोटा सा घर बना लेती है। अक्सर लाइन बना कर अपने घर से निकल कर खाने के सामान तक पहुंचती है। इनकी लाइन का पीछा करते हुए इनके घर तक पहुंचा जा सकता है। चींटियों का रास्ता बना कर किसी चीज तक पहुंचने का तरीका आश्चर्य में डाल देता है।
चींटी हमारे लिए अच्छा काम भी करती है। यह हमें कई प्रकार के कीड़े मकोड़े से बचाती है।
चींटियाँ मकड़ी , खटमल , पिस्सू , मक्खी , सिल्वर फिश , मोथ आदि कीड़े मकोड़े के लार्वा को खा जाती है। ये कीड़े मकोड़े चींटी से ज्यादा नुकसान देह होते है। चींटी  इनको घर मे फैलने से रोकती है। इस तरह हमारी मदद करती है।
चींटियाँ एक दूसरे को संकेत व संदेशों का आदान प्रदान करती है। ये काम चींटियों उनके सिर पर मौजूद एंटीना की मदद से करती है। इसके
अलावा फेरोमोन्स की मदद से चींटी रास्ता बनाती है और दूसरी चींटियों को रास्ता दिखती है। फेरोमोन्स एक प्रकार का केमिकल होता है जिसे कीट पतंगे व चीटियाँ उत्सर्जित करते है। इसके द्वारा वे उनकी प्रजाति को विशेष संदेश देने का काम करते है।
खाने पीने का सामान तलाश करने के लिए स्कॉउट चींटी घूमती रहती है। जब उसे कुछ मिलता है तो वह फेरोमोन्स से रास्ता बनाकर अपने साथियों को खाने तक पहुंचने का रास्ता दिखा देती है। दूसरी चींटियां भी उस रास्ते पर चलती हुई फेरोमोन्स से वो रास्ता मजबूत बनाती हुई चलती है। इस तरह से आसानी से दूर तक की मंजिल भी पा लेती है। जब खाना खत्म हो जाता है चींटी उस रास्ते पर चलना बंद कर देती है। इस रास्ते का फेरोमोन्स जल्द ही उड़ कर खत्म हो जाता है।



चींटी से बचने के उपाय

चींटियों से बचने का सबसे पहला उपाय उनके लिए खाने तक पहुंचने के रास्ते बंद करना है। यानी ऐसी चीजें जिनमे चींटी आ सकती है उन्हें एयर टाइट डिब्बे में रखना चाहिए। घर में साफ सफाई नियमित करनी चाहिए। विशेषकर रसोई में। मीठा थोड़ा भी इधर उधर गिरा हो तो तुरंत साफ कर देना चाहिए। वो सभी छोटी जगह जहां से चींटी का आवागमन सुलभ हो बंद कर देने चाहिए।
स्कॉउट चींटी घूमती हुई नजर आए तो सतर्क हो जाएँ। ये खाना ढूंढ़कर अपनी कॉलोनी को बताती है। अतः इससे पहले कि पूरा कुनबा दावत उड़ाने आ जाए चींटी को ललचाने वाला सामान बिखरा है तो साफ कर दें। ऐसे सामान को अच्छे से डिब्बों में एयर टाइट बंद करके रखें।
चींटीयों को दूर करने के उपाय इस प्रकार है :–
सिरका – Vinegar
सफेद सिरका और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर स्प्रे कर दें या इस पानी से उनके रास्ते पर पोंछा लगा दें।
इससे फेरोमोन्स साफ हो जाएँगे और चींटी रास्ता भटक जाएगी। खाने तक नहीं पहुंच पाएगी।
लाल चींटी ने बनाए छोटे से छेद में सिरके में थोड़ा बैकिंग सोडा मिलाकर डाल दें। ये काम कुछ दिन के बाद फिर कर दें। चीटियों से मुक्ति मिल जाएगी। 



नींबू – Lemon

नींबू की खुशबू जितनी हमे पसंद है उतनी ही चींटी को नापसंद है। नीबू के छिलके या नीबू के पत्ते जहां भी होंगे चींटियाँ वहाँ से चली जाएंगी।
हम इसका फायदा उठा सकते है। जहां चीटियाँ हों वहाँ नींबू के छिलके डाल दें या नींबू के पत्ते तोड़कर डाल दें। चीटियाँ वहाँ से भाग जाएगी।
संतरे के छिलके और खीरे के छिलके भी चींटी भगा देते है।
पिपरमिंट का तेल – Peppermint Oil
घर में पोंछा लगने के बाद यदि पिपरमिंट के तेल की कुछ बूंद फर्श पर डालकर कपड़े से फैला दें तो चींटी दूर ही रहेगी। पिपरमिंट की गंध
चींटी को दूर रखने का काम करेगी।
तेजपत्ता – Bay Leaves
तेज पत्ता स्वाद व सुगंध के लिए दाल के तड़के में तो काम लेते ही है। ये चींटी को दूर रखने में भी काम आ सकता है। चींटी आने वाली जगह
तेज पत्ता के कुछ टुकड़े डाल दें , चीटियाँ नहीं आएँगी। इसे किचन के ड्रॉअर या कैबिनट आदि में भी रख सकते है।
लौंग – Clove
लौंग के फायदे और उपयोग तो आप बहुत से जानते होंगे। इसका एक और फायदा ये भी है कि इसे चीटियाँ दूर रखने में काम ले सकते है।



शक्कर के डिब्बे में दो तीन लौंग डालकर रखें। चीटियाँ
शक्कर के डिब्बे तरफ देखेंगी भी नहीं।
कपूर – Camphor
कपूर पूजा में जलाने के लिए घर में पूजा वाले स्थान में रखते है। आपने देखा होगा पूजा वाली जगह चीटियां नहीं आती। इसका कारण कपूर होता है। कपूर की गंध चींटी को दूर रखती है। कपूर को जहाँ से चीटियाँ भगानी हो वहाँ रख देंगे तो चीटियां रवाना हो जाएंगी।
दालचीनी
एक और रसोई का मसाला चींटी को दूर रखने में काम आ सकता है वो है दालचीनी। दालचीनी का टुकड़ा जहाँ होगा वहाँ चीटियां नहीं आती।
जहां लगे Cheeti आ सकती है वहाँ दालचीनी का टुकड़ा रख दें। और असर देखें।
लहसुन
लहसुन के मामले में हमारी और चींटी की पसंद नापसंद मिलती है। हमारी तरह इसको भी लहसुन की गंध अच्छी नहीं लगती। चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर लहसुन घिसने से या लहसुन का पावडर बुरकने से इससे मुक्ति मिल सकती है।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

ज्यादा लंबे समय तक दिमाग स्वस्थ और तेज रखने के उपाय // Measures for keeping the mind healthy and fast for a long time



जीवनशैली में छोटे मोटे बदलाव लाकर आप अपने दिमाग को ज्यादा लंबे समय तक स्वस्थ और तेज रख सकते हैं. ये पांच बातें भूलने की बीमारी से बचाएंगी.धूम्रपान से दूरी, कसरत पर ध्यान, वजन कम रखना, शराब कम पीना और सेहतमंद खाने को प्राथमिकता देना पांच ऐसी बातें हैं जिनकी मदद से आप याददाश्त घटने और दिमाग के कमजोर होने के खतरे को एक तिहाई तक कम कर सकते हैं. ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च के मुताबिक वे पुरुष जो इन पांच बातों में से चार का भी ख्याल रखते हैं, उन्हें डिमेंशिया का 36 फीसदी कम खतरा होता है. 65 साल से ऊपर की उम्र वाले हर तीसरे व्यक्ति को डिमेंशिया की समस्या होती है.
इस रिसर्च को ब्रिटेन की एडिनबरा यूनिवर्सिटी के इयन डियरी की टीम ने अंजाम दिया. उनकी रिसर्च स्कॉटिश मेंटल सर्वे पर आधारित है. स्कॉटलैंड में जून 1947 में प्रत्येक 11 साल के बच्चे की ज्ञान संबंधी क्षमता को इसी टेस्ट के जरिए मापा गया था. उसके बाद से किसी भी देश में किसी एक उम्र के सभी बच्चों का इस तरह का टेस्ट नहीं किया गया है. स्कॉटिश टेस्ट के नतीजे वैज्ञानिकों के लिए बहुत काम के हैं. प्रोफेसर डियरी ने 1947 में टेस्ट से गुजरे करीब 70,000 बच्चों में से उन पर टेस्ट कर तुलनात्मक अध्ययन किया, जो जीवित हैं और अब बुजुर्ग हो चुके हैं. उन्होंने उनकी जीवनशैली, जेनेटिक्स और स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकरियां जुटाईं. उन्होंने जांचा कि इन बुजुर्गों की दिमागी क्षमता में 1947 के मुकाबले कितना अंतर आया है.
डियरी के काम में शारीरिक श्रम के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है. उनके मुताबिक याददाश्त को ज्यादा दिनों तक अच्छी हालत में रखने के लिए शारीरिक मेहनत का बहुत बड़ा योगदान होता है. ऐसे लोगों को बूढ़ा होने पर अल्जाइमर्स का खतरा भी कम रहता है.
इस रिसर्च को करवाने वाली संस्था एज यूके की कैरोलीन अब्राहम्स ने कहा, "आज जब हमारे पास डिमेंशिया से निपटने या उसे दूर भगाने के तरीके मौजूद नहीं हैं, हम छोटे मोटे तरीकों से इसके खतरे को कम जरूर कर सकते हैं." उनके मुताबिक याददाश्त को अच्छा रखने के लिए जो नुस्खे इस रिसर्च में बताए गए हैं वे पहले से ही हमारे शरीर के लिए अच्छे बताए जाते रहे हैं. यानि इन तरीकों को अपना लेना समझदारी ही होगी.

अचार खाने के फायदे और नुकसान //The advantages and disadvantages of eating pickle




  नींबू, गाजर, टमाटर, प्याज, लहसुन, आंवला, कटहल, आम, आंवला और न जाने क्या कुछ. बात अगर अचार की हो तो लिस्ट इतनी लंबी हो जाएगी कि पढ़ते-पढ़ते ही मुंह में पानी आ जाएगा. हालांकि अचार की ढ़ेरों क्वालिटी होने के बावजूद कुछ ही ऐसे अचार होते हैं जिन्हें प्रमुखता से खाया जाता है.
अचार कम ही मात्रा में सही पर हमारे खान-पान का महत्वपूर्ण का हिस्सा होते हैं. खट्टे, मीठे और तीखे स्वाद में उपलब्ध अचार भारतीय थाली के जायके को और अधिक बढ़ाने का काम करते हैं. कोई भी अचार मुख्य रूप से मसालों, सरसों के तेल, नमक और सिरके से ही तैयार होता है.
अचार का सेवन
सिर्फ भारत ही नहीं दुनियाभर में खाने के साथ अचार का सेवन किया जाता है। अगर भारत की बात की जाये तो यह खाने का अहम हिस्‍सा है। भारत में विभिन्‍न प्रकार के फलों और सब्जियों में तेल और मसाले मिलाकर अचार बनाया जाता है। चीन, जापान, कोरिया में सब्जियों के साथ अंडे में मसाले और सोया सॉस मिलाकर अचार बनाया जाता है। जबकि पश्चिमी देशों में सब्जियों और फलों को सिरके में डुबोकर अचार बनाया जाता है। यानी दुनियाभर में खाने के साथ इसका सेवन किया जाता है। फलों और सब्जियों के साथ मसाले और तेलयुक्‍त अचार के सेवन बहुत सारे स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक फायदे हैं, लेकिन इससे होने वाले नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
पाचन क्रिया सुधारे
अचार खाने से पाचन क्रिया दुरुस्‍त होती है। दरअसल पेट में अच्‍छे और बुरे दोनों तरह के कीटाणु होते हैं, जब आप किसी भी प्रकार की एंटीबॉयटिक दवा का सेवन करते हैं, तब अच्‍छे कीटाणु समाप्‍त हो जाते हैं। इससे पाचन क्रिया प्रभावित होती है और खाना आसानी से नहीं पचता है। जबकि अचार में नमक होता है जो प्रोबॉयोटिक्‍स के विकास में सहायक है। इससे पाचन क्रिया में सुधार होता है।
*गर्भावस्था के दौरान अचार खाने की क्रेविंग होती है. आम का अचार और नींबू का अचार खाने से सुबह के वक्त गर्भवती को होने वाली कमजोरी में राहत मिलती है.
लीवर को मजबूत बनाये
आंवला से बने अचार लीवर के लिए फायदेमंद हैं, आंवला में पाये जाने वाले गुणों के कारण लीवर मजबूत होता है। आंवला अल्‍सर जैसी बीमारी से बचाव करता है। साथ ही यह पाचन क्रिया को भी सुधारता है। इसलिए आंवला के अचार का सेवन करना फायदेमंद है।
*अगर आप वजन घटाने का हर तरीका आजमाते हैं तो एकबार ये तरीका भी आजमाकर देखिए. अचार खाने से वजन कम होता है. दरअसल, इसमें बहुत कम मात्रा में कैलोरी होती है. साथ ही इसमें मौजूद मसाले फैट को बहुत जल्दी टुकड़ों में बांट देते हैं
अधिक नमक होता है
अचार फायदे के साथ नुकसानदायक भी है। आचार में नमक की मात्रा काफी अधिक होती है। जिसके कारण यह स्‍वास्थ्‍य पर बुरा असर भी डालता है। बाजार में मिलने वाले आचार तो और अधिक नुकसानदेह हैं, क्‍योंकि उनमें सोडियम के साथ केमिकल भी होता है। इसमें पाया जाने वाला सोडियम बेंजोएट को ज्यादा खाने से कैंसर तक की समस्‍या हो सकती है।
दिमाग के लिए फायदेमंद
अचार पेट के साथ-साथ दिमाग के लिए भी फायदेमंद है। अचार में पाये जाने वाले प्रोबॉयोटिक्‍स बैक्‍टीरिया दिमाग के लिए भी फायदेमंद होते हैं। कुछ शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली और दिमाग के बीच में गहरा संबंध होता है, अगर पेट सही रहे तो दिमाग भी सही तरह से काम करता है।
अधिक तेल
अचार बनाते वक्‍त अधिक तेल और मसालों का प्रयोग किया जाता है। तेल के अधिक इस्‍तेमाल करने के कारण शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा बढ़ती है, इसके कारण वजन बढ़ने की समस्‍या हो सकती है। इसके कारण हृदय संबंधी बीमारियां भी हो सकती हैं।
मुक्‍त कणों से बचाये
अचार को बनाने के लिए फलों और सब्जियों का प्रयोग होता है, इसके लिए सब्जियों और फलों को बिना पकाये प्रयोग करते हैं। जिससे सब्जियों और फलों में मौजूद एंटी-ऑक्‍सीडेंट्स समाप्‍त नहीं होते हैं। यही एंटी-ऑक्‍सीडेंट अचार के जरिये शरीर में पहुंचते हैं और मुक्‍त कणों यानी फ्री रैडिकल्‍स से शरीर को बचाते हैं। जो विभिन्‍न प्रकार की बीमारियों का कारण बनता है।अचार में एंटी-ऑक्सीडेंट भरपूर होता है. जो शरीर को फ्री-रेडिकल्स से सुरक्षित रखने का काम करता है. ऐसे में अगर आप नियंत्रित मात्रा में इसका सेवन करते हैं तो ये काफी फायदेमंद है.
*कुछ शोधों की मानें तो मधुमेह में अचार खाना फायदेमंद होता है. सप्ताह में एकबार अचार खाना फायदेमंद रहेगा. मधुमेह के मरीजों को आंवले के अचार का सेवन करना चाहिए.
कैंसर का खतरा
अचार के अधिक सेवन कैंसर जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी भी हो सकती है। एक अध्ययन में यह सामने आया है कि जो लोग आचार का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उन्हें गैस्ट्रिक कैंसर की समस्‍या अधिक होती है। इसके अलावा इसके सेवन से गले में खराश और दर्द की भी शिकायत रहती है। यह ईसाफेगल कैंसर का भी कारण बन सकता है।
*बता दें कि आचार को रोजाना अपने भोजन में लेना किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। इस बात से हम इंकार नहीं कर रहे हैं कि आजार का हमारे भोजन में शामिल हो जाने से भोजन का स्वामद ही बदल जाता है। आचार कई तरह के बनते हैं जैसे- नींबू, आम, आंवला, गाजर आदि। भारत में खासकर आचार को बहुत महत्तव दिया जाता है, इसे आमतौर पर बहुत अधिक तेल, मसाले और नमक के साथ बनाया जाता है।
डायबिटीज का खतरा
बता दें कि आचार खासकर उन लोगों के बहुत बुरी चीज़ है जिन्हें डायबिटीज की शिकायत हो। बता दें कि आचार, संरक्षक के रूप में चीनी के साथ बनाया जाता है। इसलिए यह डायबिटीज से ग्रस्त लोगों के लिए किसी जहर से कम नहीं है। ऐसे रोगियों को चीनी वाले आचार के सेवन से बचना चाहिए।
ट्राइग्लिसराइड की समस्या
यूं तो आचार में मौजूद सभी प्रकार के संरक्षक के कारण स्वाटस्य् ा के लिए बुरा होता है। संरक्षक में आमतौर पर तेल की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। यही नहीं इसकी मौजूदगी से शरीर में ट्राइग्लिसराइड के स्तर में वृद्धि हो जाती है।
अल्सर की समस्या
यूं तो आचार में बहुत अधिक मसालों के कारण आंतों के अल्सर की समस्या होना बहुत कॉमन बात है। रोजाना आचार का सेवन करने वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, इसलिए जितना हो सके कम आचार खाना चाहिए, घर में बना आचार खाना चाहिए और आचार को बनाते समय उसमें बहुत ज्यादा मसाले मिलाने से बचना चाहिए।
शरीर में सूजन होना
जान लें कि आचार में संरक्षण के कारण, नमक की अधिक मात्रा का इस्तेमाल होता है, जिसमें सोडियम बहुत अधिक मात्रा में होता है। सोडियम के कारण शरीर पानी की बड़ी राशि को बनाए रखने के प्रतिक्रिया करता है जो शरीर के संतुलन के लिए आवश्यक होती है, जिससे शरीर में सूजन की समस्याी होती है।
पाचन समस्या में शिकायत
यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि बहुत अधिक मात्रा में आचार को खाने से, आचार का रस आपकी पाचन समस्याकओं का कारण बन सकती है। पेट की परेशानी, दर्द और पेट फूलना बहुत अधिक खाने से होने वाले दुष्प्राभाव हैं। यही नहीं, इससे डायरिया के कारण पाचन तंत्र की परत को प्रभावित करता है।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

सोरायसिस के कारण लक्षण और उपचार


   

   कई ऐसे त्वचा रोग हैं, जो लंबे समय तक रोगी को परेशान करते हैं. कई बार लंबे समय तक इलाज के बावजूद ये ठीक नहीं होते हैं. ऐसे में रोगी निराश भी हो जाते हैं. सोरायसिस एक ऐसा ही रोग है, जो आॅटो इम्यून डिसआॅर्डर है. अगर सही तरीके से धैर्य रख कर इलाज कराया जाये, तो इस रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है.|
    सोरायसिस क्रॉनिक यानी बार बार होनेवाला आॅटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के अनेक अंगो को प्रभावित करता है. यह मुख्य रूप से त्वचा पर दिखाई देता है, इसलिए इसे चर्म रोग ही समझा जाता है. यह किसी भी उम्र में हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में लगभग एक प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है पर अकसर 20-30 वर्ष की आयु में अधिक आरंभ होता है. 60 वर्ष की आयु के बाद इसके होने की आशंका अत्यंत कम होती है. 5-10 प्रतिशत रोगियों में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य को भी इस रोग से पीड़ित देखा गया है. आयुर्वेद में सोरायसिस को एक कुष्ठ, मंडल कुष्ठ या किटिभ कुष्ठ जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बोलचाल की भाषा में कुछ लोग इसे छाल रोग भी कहते हैं.

सोरायसिस के क्या हैं कारण
शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की गड़बड़ी को इसका कारण माना जाता है. आयुर्वेद में विरुद्ध आहार या असंतुलित खान-पान के कारण पित्त और कफ दोषों में होनेवाली विकृति को इसका कारण बताया गया है. त्वचा की सबसे बाहरी परत (एपिडर्मिस) की अरबों कोशिकाएं प्रतिदिन झड़ कर नयी कोशिकाएं बनती हैं और एक महीने में पूरी नयी त्वचा का निर्माण हो जाता है. सोरायसिस में कोशिकाओं का निर्माण असामान्य रूप से तेज हो जाता है और नयी कोशिकाएं एक माह की जगह चार-पांच दिनों में बन कर मोटी चमकीली परत के रूप में दिखाई पड़ती हैं और आसानी से झड़ने लगती है. चोट लगने, संक्रामक रोग के बाद या अन्य दवाओं के कुप्रभाव के कारण भी सोरायसिस की शुरुआत होती है.
सोरायसिस रोग के लक्षण
सोरायसिस कोहनी, घुटनों, खोपड़ी, पीठ, पेट, हाथ, पांव की त्वचा पर अधिक होता है. शुरुआत में त्वचा पर रूखापन आ जाता है, लालिमा लिये छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. ये दाने मिल कर छोटे या फिर काफी बड़े चकत्तों का रूप ले लेते है. चकत्तों की त्वचा मोटी हो जाती है.
हल्की या तेज खुजली होती है. खुजलाने से त्वचा से चमकीली पतली परत निकलती है. परत निकलने के बाद नीचे की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है और खून की छोटी बूंदे दिखाई पड़ सकती हैं. खोपड़ी की त्वचा प्रभावित होने पर यह कभी रूसी की तरह या अत्यधिक मोटी परत के रूप में दिखाई पड़ती है. नाखूनों के प्रभावित होने पर उनमें छोटे-छोटे गड्ढे हो सकते हैं. विकृत हो कर मोटे या टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं. नाखून पूरी तरह नष्ट भी हो सकते हैं.
लगभग 20% सोरायसिस के पुराने रोगियों के जोड़ों में दर्द और सूजन भी हो जाती है, जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है. अधिकांश रोगियों में रोग के लक्षण ठंड के समय में बढ़ जाते हैं. पर कुछ रोगियों को गरमी के महीने में अधिक परेशानी होती है. तनाव, शराब के सेवन या धूम्रपान से भी लक्षण बढ़ जाते हैं. अधिक प्रोटीन युक्त भोजन जैसे-मांस, सोयाबीन, दालों के सेवन से भी रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है. यह छूत की बीमारी नहीं है.
जिद्दी त्वचा रोग है सोरायसिस
सोरायसिस एक आॅटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है. यह रोग काफी जिद्दी है और लंबे समय तक परेशान करता है. अगर धैर्य रख कर इसका उपचार सही तरीके से कराया जाये, तो इससे छुटकारा मिल सकता है. आयुर्वेद से इसके ठीक होने की संभावना अधिक होती है.



सोरायसिस रोग के अनेक प्रकार

प्लाक सोरायसिस : लगभग 70-80 % रोगी प्लाक सोरायसिस से ही ग्रस्त होते हैं. इसमें कोहनियों, घुटनों, पीठ, कमर, पेट और खोपड़ी की त्वचा पर रक्तिम, छिलकेदार मोटे धब्बे या चकत्ते निकल आते हैं. इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है.
गट्टेट सोरायसिस : यह अकसर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर छोटे -छोटे लाल दानों के रूप में दिखाई पड़ता है. प्रभावित त्वचा प्लाक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है. अनेक रोगी स्वत: या इलाज से चार-छह हफ्तों में ठीक हो जाते हैं. पर कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में परिवर्तित हो सकते हैं
पामोप्लांटर सोरायसिस : यह मुख्य रूप से हथेलियों और तलवों को प्रभावित करता है.
पुस्चुलर सोरायसिस: इस प्रकार में अकसर हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लालिमा से घिरे दानों में मवाद हो जाता है.



एरिथ्रोडार्मिक सोरायसिस :
इस प्रकार के सोरायसिस में चेहरे समेत शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लालिमा लिये चकत्ते हो जाते हैं. शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है और समय पर उचित चिकित्सा नहीं होने पर रोगी के प्राण जा सकते हैं.
इन्वर्स सोरायसिस : इसमे स्तनों के नीचे, बगल, कांख या जांघों के उपरी हिस्से में लाल बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं.
एलोपैथ चिकित्सा 
साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं. 
पुवा (पीयूवीए) थेरेपी : अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता.
बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है.
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं. 
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही लेनी चाहिए. रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है. 



होमियोपैथी में उपचार

सोरायसिस इम्युनिटी में गड़बड़ी के कारण होता है, इसलिए इसका उपचार करने का सबसे अच्छा तरीका इम्युनिटी में सुधार करना ही है. अत: इम्युनिटी को सुधारने के लिए सोरिनम सीएम शक्ति की दवा चार बूंद महीने में एक बार लें.
काली आर्च : अगर त्वचा से रूसी निकले, नोचने पर और अधिक निकले, रोग जोड़ों पर अधिक हो, तो काली आर्च 200 शक्ति की दवा चार बूंद रोज सुबह में दें.
पामर या प्लांटर सोरायसिस : अगर सोरायसिस हथेली या तलवों तक ही सीमित हो, तो इसके लिए सबसे अच्छी दवा फॉस्फोरस है. इसकी 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
काली सल्फ : सोरायसिस सिर में भी होता है. सिर की त्वचा से सफेद रंग की रूसी निकले और गोल-गोल चकत्ते जैसे हों, तो काली सल्फ 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
रोग को ठीक होने में लंबा समय लग सकता है. अत: धैर्य रख कर उपचार कराना जरूरी है.
सोरायसिस की चिकित्सा
यह एक हठीला रोग है, जो अकसर पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. यदि एक बार हो गया, तो जीवन भर चल सकता है. अर्थात् रोग होता है, फिर ठीक भी होता है, लेकिन बाद में फिर हो जाता है. कुछ रोगियों में यह लगातार भी रह सकता है. हालांकि इसके कुछ रोगी अपने आप ठीक भी हो जाते हैं.
क्यों ठीक होते हैं अभी तक कारण अज्ञात है. कुछ नये रोगी धैर्य से खान-पान परहेज के साथ जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन और सावधानियों के साथ दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं अथवा रोग के लक्षणों से लंबी अवधि के लिए मुक्ति मिल जाती है. रोग के प्रारंभ में ही यदि आयुर्वेद विज्ञान से उपचार कराया जाता है, तो उपचार से रोग के ठीक होने की अधिक संभावना है. पुराने रोगियों को भी तुलनात्मक दृष्टि से कम खर्च में काफी राहत मिल जाती है. और रोगी बगैर परेशानी के सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है. एलोपैथ चिकित्सा प्रणाली में कुछ वर्षों पहले तक इसकी संतोषजनक चिकित्सा नहीं थी. विगत एक दशक में कई प्रभावकारी दवाएं विकसित हुई हैं, जिनके प्रयोग से लंबे समय तक रोग के लक्षणों से राहत मिल जाती है.



एलोपैथ चिकित्सा

साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं.
पुवा (पीयूवीए) थेरेपी : अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता.
बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है.
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं.
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी . रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है.

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

मलेरिया की जानकारी और विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों से इलाज



    Malaria एक तरह का बुखार है – जिसे ‘प्लाज्मोडियम संक्रमण (Plasmodium Infection)’ और दुर्वात भी कहते है,आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहते है । यह भी Dengue and Chikungunya की तरह संक्रमित मच्छरों के काटने से होने वाला बुखार है । लेकिन यह डेंगू और चिकनगुनिया के अपेक्षा कम प्रभावशाली होता है । लेकिन लोगो के उचित जानकारी के अभाव और लापरवाही के कारण यह जानलेवा भी साबित हो रहा है । विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के एक सर्वे के अनुसार विश्व भर में करीब 50 करोड़ लोग मलेरिया से प्रभवित होते है जिनमे से लगभग 27 लाख लोगो को अपने जान से हाथ धोना पड़ जाता है , जिनमें से आधे पाँच साल से कम के बच्चे होते हैं। , हालाँकि वास्तविक संख्या इससे भी कहीं अधिक हो सकती है । Malaria के प्रति सचेत रहने और आम लोगों में इसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए विश्व भर में प्रतिवर्ष ’25 अप्रैल’ को ‘विश्व मलेरिया दिवस’ मनाये जाता है
डॉक्टर की सलाह, समय पर रोकथाम और उचित देखरेख से, Malaria का इलाज पूर्णतयः सम्भव है. इसलिए किसी भी तरह के दहशत और अफवाहों में न आए और हमारे द्वारा सुझाए गए निर्देशो को पालन करे —
Malaria fever से बचने के तरीके
Malaria fever के लक्षण
Malaria fever से जुड़े परीक्षण
Malaria fever के घरेलू उपचार
Malaria fever की दवा
Malaria Fever एक विशेष प्रकार की 5 Plasmodium परजीवी / parasite के प्रजाति के कारण होता हैं।
Plasmodium Vivax
Plasmodium Falciparum
Plasmodium Malarie
Plasmodium Ovale
Plasmodium Knowlesi
भारत में ज्यादातर मलेरिया के संक्रमण Plasmodium Vivax और Plasmodium Falciparum के कारण ही होता हैं। इनमे से Plasmodium Falciparum ज्यादा खतरनाक होता है, यहाँ तक की इसमें रोगी की मृत्यु भी हो सकती है ।
जब किसी व्यक्ति को मलेरिया संक्रमित मच्छर कांटता हैं , तो उसमे मौजूद Plasmodim परजीवी अपना Sporozoite infection Blood में लार के रूप में छोड़कर व्यक्ति को infected कर देता हैं। शरीर में प्रवेश करने के आधे घंटे के अंदर यह परजीवी व्यक्ति के लिवर को संक्रमित कर देता हैं। लिवर के भीतर मलेरिया को फैलाने वाले छोटे जीव Merozoites बनने लगते हैं। यह Merozoites लिवर से रक्त में फैलकर लाल रक्त कोशिकाओ को प्रभावित कर तेज गति से बढ़ जाते हैं जिससे लाल रक्त कण टूटने लगते हैं और व्यक्ति को Malaria हो जाता हैं।
मलेरिया बुखार कैसे होता है 
मलेरिया परजीवी का संवाहक मुख्यत: संक्रमित मादा एनाफ़िलीज और मादा एनोलीज मच्‍छर होते है
मलेरिया बुखार का संक्रमण निम्नलिखित तरीको से होता है ___



1. सक्रमित मादा मच्‍छर से किसी भी स्‍वस्‍थ मनुष्‍य को :-

जब सक्रमित मादा एनोलीज और एनाफ़िलीज मच्‍छर किसी स्‍व‍स्‍थ्‍य व्‍यक्ति को काटता है तो वह अपने लार के साथ उस व्यक्ति के रक्‍त मे मलेरिया के जीवाणु को पहूंचा देता है।
2 . किसी मलेरिया रोगी से अन्‍य स्‍वस्‍थ व्‍यक्तियो को :-
जब कोई असंक्रमित मादा एनोलीज और एनाफ़िलीज मच्‍छर किसी मलेरिया संक्रमित व्यक्ति को काटता है तो, वह खून के साथ मलेरिया परजीवी को भी चूंस लेते हैं । 12-14 दिनो के बाद यह साधारण मच्छर संक्रमित होकर मलेरिया फेलाने मे सक्षम हो जाता है । इस तरह मलेरिया का संक्रमण मच्छरों से इंसानों में और इंसान से मच्छरों में होता हैं।
3. रक्त के आदान-प्रदान :-संक्रमित रक्त से Organ Transplant या Blood transplant के समय हो सकता है और मलेरिया से संक्रमित रक्त की सुई या इंजेक्शन के दोबारा उपयोग से भी सम्भवना होता हैं।
4 . मलेरिया संक्रमित गर्भिणी माता से शिशु को भी होने की सम्भवना हो सकती है ।
Malaria Sign and Symptoms in Hindi | मलेरिया बुखार के लक्षण
मलेरिया रोग के लक्षण साधरणतयः संक्रमित मच्‍छर के काटने के 10-12 दिनो के बाद रोगी में दिखना प्रारम्भ हो जाता हैं। जरुरी नहीं है की एक मलेरिया के रोगी में दिए गए सभी लक्षण नजर आए। मलेरिया के परजीवी की प्रजाति और मलेरिया के संक्रमण की तीव्रता के हिसाब से लक्षण में विषमताएं देखा जा सकते हैं। सामान्यत: मलेरिया बुखार के लक्षण कुछ ऐसे होते हैं —
* अचानक सर्दी लगना (कॅंपकॅंपी लगना ,ठण्ड लगने पर रजाई कम्‍बल ओढना)।
* फिर गर्मी लगकर तेज बुखार होना।
* पसीना आकर बुखार कम होना व कमजोर महसूस करना।
* तेज बुखार (104-105 F) जो की 2-7 दिन तक लगातार रहना
* साँस लेने में तकलीफ महसूस होना ।
* हाथ-पैर में ऐठन
*रोगी के सिर के अगले हिस्से , आंख के पिछले भाग में रहना , कमर, मांसपेशियों तथा जोड़ों में दर्द होना।
* मिचली nausea, उल्टी vomiting आना या महसूस होना



* शरीर पर लाल-गुलाबी चकत्ते red rashes होना

* आँखों लाल रहना ,आँखों में दर्द रहना
* हमेशा थका-थका और कमजोरी महसूश करना
* भूख न लगना, खाने की इच्छा में कमी, मुँह का स्वाद ख़राब होना, पेट ख़राब हो जाना
मलेरिया के स्टेज | Stages of Malaria
मलेरिया बुखार को तीन स्टेज में medical science में देखा जाता है:
कोल्ड स्टेज (Cold Stage): इस दौरान रोगी को तेज ठंड के साथ कपकपी होती है।
हॉट स्टेज (Hot Stage): इस दौरान रोगी को तेज बुखार, पसीने और उलटी आदि की शिकायत हो सकती है।
स्वेट स्टेज (Sweat Stage): बुखार के साथ-साथ मरीज को काफी पसीना आता है।
Malaria Checkup and Test in Hindi | मलेरिया बुखार से जुड़े जाँच
रक्त की माइक्रोस्कोप जांच (Peripheral Smear for Malarial Parasite) : इस जाँच में संक्रमित व्यक्ति का Blood slide पर लेकर Microscope से malaria virus के positive and negative होने का जाँच किया जाता है । अगर कोई व्यक्ति मलेरिया से संक्रमित हो तो उसका blood test result positive आता है । लेकिन कभी-कभी मलेरिया के परजीवी रक्त लेते समय रक्त में न रहकर लीवर में रहने के कारण मलेरिया होते हुए भी यह जांच Negative आ सकती हैं ।
कार्ड टेस्ट (Rapid Test) : इस जाँच के अन्तर्गत मलेरिया संक्रमित व्यक्ति के रक्त से serum अलग कर कार्ड पर डाला जाता हैं। अगर serum में Plasmodium परजीवी के antigen मौजूद रहते है तो यह सुनिशचित हो जाता है की आप मलेरिया से मलेरिया बुखार से संक्रमित हो ।
PCR Test : PCR का मतलब Polymerase Chain Reaction Test होता है ,इस जाँच से भी मलेरिया का संक्रमण है या नहीं यह सुनिश्चित किया जाता है ।
CBC Test : Complete Blood Count test में अगर Platelets अगर 1.5 लाख से कम रहता है और रोगी व्यक्ति में मलेरिया के लक्षण नजर दिखते है तो एहतियात के तौर पर मरीज को मलेरिया की दवा दिया जाता है ।
RREAD Test : Enhanced detection of enzyme activity in the rolling circle, डेनमार्क स्थित आरहस विश्वविद्यालय अनुसंधाकर्ताओं की ओर से विकसित यह प्रणाली प्लाजमोडियम पैरासाइट में टोपोआईसोमरेज नाम के एनजाइम की गतिविधियों को दर्ज करेगी । जिससे सिर्फ एक बूंद खून या लार के जरिए मलेरिया का पता लगाया जा सकेगा
मलेरिया से बचाव के तरीके 
चूँकि चिकनगुनिया बुखार, मच्छरों के काटने से होता है । सम्भवतः जितना हो सके मच्छरों से बचा जाए
* घर में सोते समय मच्छर दानी का प्रयोग करें ।
*घर में मच्छर भगाने वाले कॉयल , लिक्विड,इलेक्ट्रॉनिक बैट आदि का प्रयोग करें।
* घरो के अन्‍दर डी. डी .टी. जैसी कीटनाशकों का छिडकाव कराया जावे, जिससे मच्‍छरो का नष्‍ट किया जा सके।
* बाहर जाने से पहले मोस्कीटो रेप्लेंट क्रीम का प्रयोग करें ।
*आपके घर के आसपास जलजमाव वाली जगह के सफाई का खासा ख्याल रखे । जहां पानी एकत्रित होने से रोका नही जा सके वहां पानी पर मिटटी का तेल या जला हुआ तेल (मोबिल ऑयल ) छिडकें
* चूकि आमतौर पर यह मच्‍छर साफ पानी मे जल्‍दी पनपता है। इसलिए सप्‍ताह मे एक बार पानी से भरी टंकियो मटके, कूलर आदि खाली करके सुखा दे।
* टांके आदि पेयजल स्‍त्रोतो मे स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता से टेमोफोस नामक दवाई समय समय पर डलवाते रहे।
* घर के दरवाजे , खिड़कियों और रोशनदानों पर जालियां लगाकर रखे ।
* टायर, डब्बे ,कूलर, A/C, पशुओ के लिए रखे पानी, गमले में रुके पानी को बदलते रहे और 2-3 दिन में साफ़ करते रहे
* खाली बर्तनों को खुले में न रखे और उसे ढक कर रखे ।
*अगर आस-पास में किसी को यह संक्रमण है तो विशेष सावधानी बरते।
*अगर 2-3 दिन से अधिक समय तक बुखार हो तो तुरन्त चिकत्सक से मिले और रक्तजाच जरूर करा लें ।
उपरोक्त लक्षण दिखने पर चिकित्सक के पास जाकर मलेरिया बुखार के लक्षण का संदेह व्यक्त करे । डॉक्टर की सलाह, समय पर रोकथाम और उचित देखरेख से किसी भी अनहोनी से बचा जा सकता है
मलेरिया से बचने के प्राकृतिक एवं घरेलू तरीके
*पिसी हुई काली मिर्च और नमक को नींबू में लगाकर मलेरिया के रोगी को चूसने को दें। एैसा करने स बुखार की गर्मी उतर जाती है।
*सुबह-सुबह खाली पेट तुलसी के 4 से 5 पत्तों को अच्छि तरह से चबाकर खाएं । 10 ग्राम तुलसी के पत्तों और 7 काली मिर्चों को पानी में पीसकर सुबह और शाम पीने से मलेरिया बुखार ठीक होता है ।
*सौंठ और पिसा धनिया को चूर्ण बराबर मात्रा में पानी के साथ लेने से भी मलेरिया बुखार में आराम मिलता है ।
*10 ग्राम गरम पानी और उसमें 2 ग्राम हींग डालकर उसका लेप बनाएं। अब इस लेप को हाथ और पैरों के नाखूनों पर लगाएं। 4 दिनों तक एैसा करने से रोगी जल्दी ठीक हो जाता है।
*गिलोय के काढ़े या रस में शहद मिलाकर 40-80 मिलीलीटर की मात्रा में रोज सेवन करने से मलेरिया में लाभ होता है ! यह मेटाबॉलिक रेट बढ़ाने, इम्युनिटी और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने और बॉडी को इंफेक्शन से बचाने में मदद करती है।
*मलेरिया के बुखार होने पर प्याज का रस बेहद फायदेमंद होता है। 4 काली मिर्च का पाउडर, 4 मिली प्याज का रस मिलाकर दिन में 3 बारी पीएं।
*चिरायते का काढ़ा 1 कप दिन में 3 बार कुछ दिनों तक नियमित पीने से मलेरिया रोग के सारे कष्टों में शीघ्र आराम मिलता है।
*लहसुन की 4 कलियों को छीलकर घी में मिला लें और इसका सेवन करें। एैसा करने से मलेरिया की ठंड उतर जाती है।
*मलेरिया बुखार के लिए गिलोय, पपीता पत्ते, एलोवेरा/मुसब्बर वेरा का रस और बकरी का दूध देना लाभप्रद होता है।
*प्याज के रस में एक चुटकी कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीते रहने से भी मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।

*हरड़ का चूर्ण (10 ग्राम) को 100 मिलीलीटर पानी में पकाकर काढ़ा बना ले। यह काढ़ा दिन में 3 बार पीने से मलेरिया रोग में फायदा होता है।
फलों का रस, दूधश् दही, लाइट जल्दी पचने वाली चीजें सेवन करें । विटामिन-सी युक्त, आयरन, इलेक्टक्रेलाइट, ओआररस लेते रहें जो कि शरीर को बुखार से थ्रोमबोसाटोपनिया होने से बचाने में सहायक है।
*ढाक : ढाक के बीजों की गिरी (10 ग्राम) और करंजवा के बीजों के गिरी (10 ग्राम) को पानी में घिसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर सुखा लें। बुखार आने के 4 घण्टे पहले यह 1 गोली पानी के साथ लेने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
| मलेरिया का होमियोपैथिक इलाज
मलेरिया के होमियोपैथिक दवाओ में निम्नलिखित दवाएं शामिल है —
#Cinchona.[Cinch]
#Arsenicum.[Ars]
#Nux vomica. [Nux-v]
#Natrum muriaticum. [Nat-m]
#Eupatorium perfoliatum. [Eup-per]
#Ipecac. [Ip]
#Chininum sulphuricum. [Chin-s]
#Gelsemium. [Gels]

  मलेरिया की आयुर्वेदिक दवा
*सप्त पर्ण घन सत्व से बनी सप्त पर्ण बटी



*महा सुदरशन चूर्ण के घन्सत्व से बनी गोलॊ का उपयोग दिन में चार बार करें

*विषमज्वरातंक लौह, आनंद भैरव रस, आरोग्यवर्धनी वटी, अपमंगल रस, चंद्रप्रभा गोल्डन। इन पांचों गोलियों को सुबह-शाम खाने के बाद खाएं।
*परवल, कुटकी, पाठा, नागरमोथा, गिलोय, लाल चंदन, सौंठ, तुलसी, मुलैठी व पीपल आदि का चूर्ण या पाउडर बनाकर सुबह और शाम 3 ग्राम की मात्रा में पानी से लेना रोगी के लिए लाभदायक होता है।
*नीम या सप्तपर्ण पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर भी पीया जा सकता है। इसके लिए 10 ग्राम छाल को आधा गिलास पानी में 1/4 होने तक उबालें और छानकर गुनगुना पिएं।
*आयुष-चौंसठ : आयुष-चौंसठ दवा विशेषकर मलेरिया के उपचार के लिए प्रयोग में ली जाती है। यह कैप्सूल के रूप में होती है जिसे मरीज को इलाज और बचाव दोनों के लिए देते हैं।
 मलेरिया की आधुनिक औषधि
मलेरिया के दवाओ में निम्नलिखित दवाएं शामिल है —
Chloroquine
Mefloquine
Mepacrine
Proguanil
Artemether
Artesunate
Bulaquine

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

वर्षा ऋतु मे मे खान पान आहार विहार की सावधानियाँ




   ग्रीष्मकाल के समाप्ति के बाद तपती हुई धरती पर जब बारीश की रिम-झिम बौछारे गिरती है तो वह समस्त सजीव को तरो तजा तो करती है पर साथ ही कई बीमारीयो को आमंत्रण भी देती है। हर किसी को इस सुहाने मौसम का पूरा लुफ्त उठाने की इच्छा होती है पर साथ ही इस मौसम मे लोग अक्सर जल्दी बीमार हो जाते है।
बारिश के मौसम में मलेरिया,डेंगू ,सर्दी-खांसी,जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड,त्वचा रोग,पीलिया इत्यादी अनेक रोग फैलते है। जिस तरह हम बारिश से बचने के लिए छाते के इस्तेमाल करते है ठीक उसी तरह बरसात के मौसम मे फैलनेवाली इन बीमारियों से बचने के लिए हमें कुछ एहतियात रूपी छाते का इस्तेमाल करना चाहिए।
वर्षा ऋतु में नीचे दिए हुए जरुरी एहतियात बरते !
* हमेशा ताजे और स्वच्छ सब्जी / फल का सेवन करे।
• ध्यान रहे की खाने से पहले फल / सब्जी को अच्छे से स्वच्छ पानी से धो कर साफ कर ले,खास कर हरी पत्तेदार सब्जी।




डायबिटीज के मरीजो को विशेष रूप से अपने पैरो को ज्यादा ख्याल रखना चाहिये।पैर गीले होने पर तुरंत उन्हे साफ कर देना चाहिये।

* बुजर्गो की देखभाल
• बदलते मौसम मे बुजर्गो के बिमार होने कि संभावना ज्यादा होती है। इसलिये जरुरी है कि उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाए।
• बासी भोजन,पहले से कटे हुए फल तथा दुषित भोजन का सेवन न करे ।
• हमेशा ताजा गरम खाना खाए।
* बाहर का खाना मना है।
• बाहर का सड़क के किनारे मिलनेवाला या होटल का खाना खाने से पूरी तरह बचना चाहिए। .
• बाहर का खाना खाने से जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड इत्यादी गंभीर रोग हो सकते है।
• सड़क के किनारे बेचे जानेवाले चायनिझ फ़ूड,भेल,पानी पूरी यह फ़ूड पॉईजनिंग होने के प्रमुख कारण है।
*भरपूर स्वच्छ पानी का सेवन करे।
• वर्षा ऋतु में हवा में अधिक नमी होने के कारण शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती है और साथ ही पसीना भी ज्यादा आता है,ऐसे में जरुरी है की शरीर में पर्याप्त पानी का प्रमाण रखने के लिए भरपूर पानी का सेवन करे।
• हमेशा उबाल कर ठंडा किया हुआ या फ़िल्टर किये हुए स्वच्छ पानी का सेवन करे।कम से कम १५ मिनट तक पानी अवश्य उबाले।
• ठंडा पेय पीने की बजाय तुलसी,इलायची की चाय या थोडा गरम पानी पीना ज्यादा फायादेमंद है।
*बारिश से बचाव
• इस मौसम में सब्जी / फल जल्दी ख़राब हो जाते है इसलिए हमेशा ताजा फल या सब्जी का प्रयोग करे।
• इन दिनों में हमारी पाचन शक्ति सबसे कम होती है।इसलिए जरुरी है अधिक तला,भुना खाना न खाया जाए बल्की ऐसा भोजन खाया खाए जो आसानी से पच जाए।जब भूख लगे तब ही और जीतनी भूख हो उतना ही आराम से पचने लायक खाना लेना चाहिए।
• ज्यादा ठंडा,खट्टा न खाए।ज्यादा नमक वाली चीजे जैसे चिप्स,कुरकुरे,चटनी,पापड कम खाए क्योंकी इस मौसम मे शरीर मे water retention कि संभावना ज्यादा होती है।
हर किसी को बारिश में भीगना पसंद है पर बारिश में ज्यादा देर तक भीगने से सर्दी-खांसी और बुखार हो सकता है।
• बारिश में भीगने पर ज्यादा देर तक बालो को गीला न रखे।
• अगर आप को अस्थमा है या फिर आपको जल्दी सर्दी-जुखाम-खांसी हो जाती है तो बारिश में न भीगे।
• बारिश से बचने के लिये छाता/रेनकोट का इस्तेमाल करना चाहिये।
• कपडे/जूते /चप्पल गीले हो जाने पर तुरंत बदल दे।ज्यादा समय तक गीले कपडे पहनने से फंगल ईत्यादी त्वचा रोग हो सकते है।



बुजर्ग बारीश मे ज्यादा बाहर न निकले।गरम चाय,कोफी या सूप पिए।

• ज्यादा कच्चे फल या सलाद न खाए।
• खाने मे हल्दी ,ईलायची,सौन्फ,दालचीनी का इस्तेमाल करे।इनसे रोगप्रतिकार शक्ती बढती है।
बारिश के मौसम में कैसे रखें अपनी सेहत का ख़याल
इस बार वर्षा ऋतु का आगमन समय से पहले हो गया है। ग्रीष्मकाल के समाप्ति के बाद तपती हुई धरती पर जब बारीश की रिम-झिम बौछारे गिरती है तो वह समस्त सजीव को तरो तजा तो करती है पर साथ ही कई बीमारीयो को आमंत्रण भी देती है। हर किसी को इस सुहाने मौसम का पूरा लुफ्त उठाने की इच्छा होती है पर साथ ही इस मौसम मे लोग अक्सर जल्दी बीमार हो जाते है।
बारिश के मौसम में मलेरिया,डेंगू ,सर्दी-खांसी,जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड,त्वचा रोग,पीलिया इत्यादी अनेक रोग फैलते है। जिस तरह हम बारिश से बचने के लिए छाते के इस्तेमाल करते है ठीक उसी तरह बरसात के मौसम मे फैलनेवाली इन बीमारियों से बचने के लिए हमें कुछ एहतियात रूपी छाते का इस्तेमाल करना चाहिए।
वर्षा ऋतु में नीचे दिए हुए जरुरी एहतियात बरते !
*हमेशा ताजे और स्वच्छ सब्जी / फल का सेवन करे।
• ध्यान रहे की खाने से पहले फल / सब्जी को अच्छे से स्वच्छ पानी से धो कर साफ कर ले,खास कर हरी पत्तेदार सब्जी।
• बासी भोजन,पहले से कटे हुए फल तथा दुषित भोजन का सेवन न करे ।
• हमेशा ताजा गरम खाना खाए।
• इस मौसम में सब्जी / फल जल्दी ख़राब हो जाते है इसलिए हमेशा ताजा फल या सब्जी का प्रयोग करे।
• इन दिनों में हमारी पाचन शक्ति सबसे कम होती है।इसलिए जरुरी है अधिक तला,भुना खाना न खाया जाए बल्की ऐसा भोजन खाया खाए जो आसानी से पच जाए।जब भूख लगे तब ही और जीतनी भूख हो उतना ही आराम से पचने लायक खाना लेना चाहिए।
• ज्यादा ठंडा,खट्टा न खाए।ज्यादा नमक वाली चीजे जैसे चिप्स,कुरकुरे,चटनी,पापड कम खाए क्योंकी इस मौसम मे शरीर मे water retention कि संभावना ज्यादा होती है।
*


बाहर का खाना मना है।

• बाहर का सड़क के किनारे मिलनेवाला या होटल का खाना खाने से पूरी तरह बचना चाहिए। .
• बाहर का खाना खाने से जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड इत्यादी गंभीर रोग हो सकते है।
• सड़क के किनारे बेचे जानेवाले चायनिझ फ़ूड,भेल,पानी पूरी यह फ़ूड पॉईजनिंग होने के प्रमुख कारण है।
* भरपूर स्वच्छ पानी का सेवन करे।
• वर्षा ऋतु में हवा में अधिक नमी होने के कारण शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती है और साथ ही पसीना भी ज्यादा आता है,ऐसे में जरुरी है की शरीर में पर्याप्त पानी का प्रमाण रखने के लिए भरपूर पानी का सेवन करे।
• हमेशा उबाल कर ठंडा किया हुआ या फ़िल्टर किये हुए स्वच्छ पानी का सेवन करे।कम से कम १५ मिनट तक पानी अवश्य उबाले।
• ठंडा पेय पीने की बजाय तुलसी,इलायची की चाय या थोडा गरम पानी पीना ज्यादा फायादेमंद है।

रविवार, 9 जुलाई 2017

नीम के पत्ते खाने के फायदे // Benefits of eating neem leaves





   नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि इसको भारत में ‘गांव का दवाखाना’ कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’
   नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि इसको भारत में ‘गांव का दवाखाना’ कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’
   


नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटिज, बैक्टिरिया और वायरस से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लड़ने का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है।

   नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है।
नीम के बारे में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों में इसके फल, बीज, तेल, पत्तों, जड़ और छिलके में बीमारियों से लड़ने के कई फायदेमंद गुण बताए गए हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की भारतीय प्रणाली ‘आयुर्वेद’ के आधार-स्तंभ माने जाने वाले दो प्राचीन ग्रंथों ‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ में इसके लाभकारी गुणों की चर्चा की गई है। इस पेड़ का हर भाग इतना लाभकारी है कि संस्कृत में इसको एक यथायोग्य नाम दिया गया है – “सर्व-रोग-निवारिणी” यानी ‘सभी बीमारियों की दवा।’ लाख दुखों की एक दवा!
विषमज्वर : 
नीम की पत्ती की सींकें 21 और काली मिर्च 21 नग लेकर उन्हें 6 तोला पानी में पीस-छानकर कुछ गर्म करके पिलाने से दो-तीन दिनों में विषमज्वर उतर जाता है।



दाह : 
ज्वर में दाह हो तो नीम के पत्ते पीसकर शहद मिला पानी में घोलकर पिलायें। इससे ज्वरदाह कम हो जाता और वमन भी रुक जाता है।
* मसूरिका : 
नीम के मुलायम पत्ते और काली मिर्च सम परिमाण में पीसकर चने के बराबर गोली बना लें। चेचक के दिनों में प्रात: 1 गोली पानी के साथ लेने पर चेचक नहीं निकलती। बराबर दो सप्ताह के सेवन से फोड़ा-फुन्सी भी नहीं निकलते।
* कामला : 
नीम की छाल के रस में शहद मिलाकर सुबह सेवन करने से कामला में आराम होता है।
वातरक्त : नीम-पत्र और पटोल-पत्र का क्वाथ शहद मिलाकर पीने से वातरक्त (गाउट) में आराम होता हैं।
*कृमिरोग :
 नीम-पत्र का रस मधु के साथ पीने से उदरस्थ कृमियों का नाश होता है।
8. शीतपित्त : नीम-पत्र को घी में भूनकर आँवला मिलाकर खाने से शीतपित्त, फोड़े, घाव, अम्लपित और रक्तविकार में निश्चित लाभ होता है।
*


शोधन :

 जब फोड़ा पक जाय तथा मुँह छोटा हो, तब नीम के पत्तों को पीसकर पुल्टिस बाँधने से शोधन हो जाता है।
*बाल-ज्वर : 
नीम के सूखे पत्रों के साथ घी मिलाकर धूप देने से बच्चों का ज्वर छूट जाता है।
कुष्ठ : नीम के पत्र पीसकर जल के साथ लगातार ६ मास लेने से सब प्रकार के कुष्ठ दूर हो जाते हैं। इसके साथ घी का सेवन अवश्य करें।
*योनि-पिच्छलता : 
गाढ़े स्राव से योनि गीली रहती हो तो नीम के पत्ते उबालकर उस पानी से धोयें (डूसिंग करें)। फिर नीम-छाल को आग पर जलाकर उसका धुआँ दें। इससे योनि की पिच्छलता दूर होकर बदबू मिटती और वह कड़ी हो जाती है।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

एक्‍जिमा (खाज)के घरेलू आयुर्वेदिक उपाय उपचार





     एक्जिम एक प्रकार का चर्म रोग है। त्वचा के उत्तेजक, दीर्घकालीन विकार को एक्जिमा के नाम से जाना जाता है। इस रोग में त्वचा शुष्क हो जाती है और बार-बार खुजली करने का मन करता है क्योंकि त्वचा की ऊपरी सतह पर नमी की कमी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप त्वचा को कोई सुरक्षा नहीं रहती, और जीवाणुओं और कोशाणुओं के लिए हमला करने और त्वचा के भीतर घुसने के लिए आसान हो जाता है। एक्जिमा के गंभीर मामलों में त्वचा के ग्रसित जगहों से में पस और रक्त का स्राव भी होने लगता है। यह रोग डर्माटाईटिस के नाम से भी जाना जाता है।
    मुख्य रूप से यह रोग खून की खराबी के कारण होता है और चिकित्सा न कराने पर तेजी से शरीर में फैलता है। एक्जिमा का रोग अपने रोगियों को उम्र और लिंग के आधार पर नहीं चुनता। एक्जिमा के रोग से ग्रस्त रोगी अन्य विकारों के भी शिकार होते हैं। यह किसी भी उम्र के पुरुष या महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। लेकिन कुछ आयुर्वेदिक उपचारों को अपनाकर इस समस्‍या के लक्षणों को कम किया जा सकता है।
खदिरारिष्ट
२० मिलीलीटर खदिरारिष्ट को २० मिलीलीटर पानी में मिलाकर खाना खाने के बाद दिन में दो बार लेने से फायदा होता है।
गुदुच्याड़ी तेल
एक औषधियुक्त तेल जिसे ग्रसित जगह पर लगाने से लाभ मिलता है।
पञ्चनिम्बडी चूर्ण
खाना खाने के बाद आधे से एक चमच पानी के साथ लेने से भी लाभ होता है।





नीम 
नीम रक्त विकारों में बहुत ही लाभकारी है | पाव भर सरसों के तेल में नीम की 50 ग्राम के लगभग कोंपलें पकाएं | कोंपले काली होते ही तेल नीचे उतार लें | छानकर बोतल में रखें और दिन में थोड़ा-थोड़ा एग्जिमा प्रभावित स्थान पर लगाएं | नीम की कोंपलों का रस 10 ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करते रहने से भी एक्जीमा ठीक हो जाता है |
आटे का लेप :
गेहूं के आटे का लेप करने से शरीर के सारे चर्म रोग दूर हो जाते हैं और खुजली में आराम मिलता है।
*तुलसी के पत्तों का रस पीने और लगाते रहने से लाभ होता है |
शुद्ध गुग्गूल-
आयुर्वेद की बहुत ही प्रचलित जड़ी बूटी, गुग्गूल में शुद्धि और तरोताजा करने के लिए अत्यधिक ओजस्वी शक्तियों का समावेश होता है।

एलोविरा 
एलोविरा के पौधे की पत्‍ती को काट लें और उसमें से निकलने वाले जेल को खुजली वाली जगह पर लगा लें। दिन में कम से कम चार से पांच बार ऐसा करने पर आपको आराम मिलेगा। साथ ही ठीक होने तक लगाने पर बाद में कभी खुजली नहीं होगी।
नींबू :
नींबू हर घर में आराम से मिल जाता है। इसलिए बॉडी में जहां पर भी खुजली हो रही हो उस जगह पर नींबू और गरी का तेल मिलाकर लगा लें। लगाने के तुरंत बाद खुजलाएं नहीं। थोड़ी देर में आराम मिल जाएगा।



छाछ -

. छाछ में एक साफ कपड़े का टुकड़ा भिगोकर त्वचा पर जलन, खुजली और बेचैनी वाले स्थान पर रखें | जितनी अधिक देर रख सकें, रखें | फिर उस स्थान को भली प्रकार साफ कर दें |

*खुबानी के पत्तों के रस का दाद-खाज पर प्रयोग करना भी लाभदायक है |
खीरे का रस:
खीरे को बारीक स्‍लाइस में काटकर दो घंटे के लिए रख दें। पूरा रस निकल जाने के बाद उसे छान लें और खुजली वाली जगह पर लगा लें। जरूर आराम होगा।
चन्दन
एक चम्मच कपूर के साथ एक चम्मच चन्दन की लई मिलाकर एक्जिमा से ग्रसित जगह पर लगाने से भी बहुत फायदा होता है।
नीम
नीम के कोमल पत्तों का रस निकालकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिला लें। इसे प्रतिदिन सुबह पीने से खून की खराबी दूर होकर एक्जिमा ठीक होने लगता है।

*चने के आटे में पानी मिलाकर पेस्ट सा बनाकर त्वचा के विकारग्रस्त स्थान पर लगाने से लाभ होता है | चने के आटे का उबटनके रूप में प्रयोग से मेकअप से होने वाला एक्जीमा भी ठीक हो जाता है |
*शुद्ध हल्दी भी एक्जिमा की चिकित्सा में लाभ  करती है। इसे एक्जिमा के चकतों पर लगाया जा सकता है और दूध में मिलाकर भी पीया जा सकता है।
हरड़-
4 हरड़ को गौमूत्र में पीसकर लेप बना लें। यह लेप प्रतिदिन दो से तीन बार एक्जिमा पर लगाने से लाभ होता है।




आहार और खान पान
दही और अचार जैसे खट्टी चीज़ों का सेवन बिलकुल ना करें।
करेले और नीम के फूलों का सेवन भी लाभकारी होता है।
क्या करें क्या ना करें
डिटरजेंट (कपडे धोने का पाउडर) को बिलकुल भी ना छुएं, पर अगर मजबूरी से छूना भी पड़े तो सूती दस्तानों का प्रयोग करें।
एक्जिमा से ग्रसित जगह पर तंग कपडे ना पहनें।
सिंथेटिक कपड़ों का भी बिलकुल प्रयोग ना करे, क्योंकि इससे पसीने के निष्काशन में कठिनाई होती है।
तरबूज जैसे फलों का नियमित रूप से सेवन करें।
गाजर और पालक के रस का मिश्रण पीने से भी एक्जिमा के ठीक होने में लाभ मिलता है।
पानी का भरपूर मात्रा में सेवन करें और चाहें तो संतरे का रस भी पी सकते हैं।
अध्ययनों से पता चला है कि टमाटर का रस भी एक्जिमा को चंद दिनों में ठीक करने में सहायक सिद्ध होता है।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

गोमूत्र के फायदे //Benefits of Cow Urine






गोमुत्र अर्क :-

गौ कई प्रकार की होती है जेसे जर्शी, दोगली, देशी | इनमें से देशी गौ का मूत्र बहुत काम आता है | हिन्दू धर्म में गौ को माता मानते है और उसकी पूजा भी करते है | इसलिए देशी गौ को गौ माता के नाम से भी जाना जाता है | भाइयो हमारे बुजुर्ग कहते है की गौ माता के मूत्र में गंगा और गोबर में लक्ष्मी का वास होता है तभी मूत्र को घर में छिड़का और गोबर से चोका लगाया जाता है |
आयुर्वेद में गौ मूत्र के बहुत प्रयोग हैं |गौमूत्र का रासायनिक विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया, कि इसमें 24 ऐसे तत्व हैं जो शरीर के विभिन्न रोगों को ठीक करने की क्षमता रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गौमूत्र का नियमित सेवन करने से कई बीमारियों को खत्म किया जा सकता है। जो लोग नियमित रूप से थोड़े से गौमूत्र का भी सेवन करते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली कई बीमारियां दूर ही रहती हैं। शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है। इसके कुछ गुण इस प्रकार गए हैं|
गौ मूत्र का सेवन कैसे करें :-
स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र को रोजाना दो तोला सात पट कपड़े में छानकर उसमें से आधा कफ गौ मूत्र सुबह-सुबह खाली पेट पियें | ध्यान रहे की गौ देशी होनी चाहिए और वो प्रेगनेंट नहीं होनी चाहिए | अगर आप गौ अर्क का सेवन करना चाहते हैं तो आधे कफ पानी में 1 या 2 चम्मच गौ अर्क डाल दें और उसे पी लें | आप इसका सेवन सुबह-साम खाली पेट कर सकते हैं |
कृषि में गोमूत्र का प्रयोग :-
वर्तमान मानव जीवन कृषि में रासायनिक खादों के प्रयोग से होने वाले दुष्परिणामों को झेल रहा है। रासायनिक खादों से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फैल रही हैं। ऐसे में गोमूत्र एवं अन्य अपशिष्ट वैकल्पिक खाद और कीटनाशक के रूप में सामने आ रहे हैं।
याद रहे जो भी उपचार आपको नीचे गौ मूत्र से बताये गयें है | इसमें आपको देशी गौ माता का मूत्र ही लेना है और गौ प्रेग्नेनेट नहीं होने चाहिए | या आप उसकी बछिया का ले सकते है | और फिर आपको ये गौ मूत्र किसी सूती कपडे में से 7-8 बार छानना है | तभी इसका प्रयोग करना है |
गौ मुत्र के फायदे :



कान के सभी रोगों के लिए : 

जिन व्यक्तियों के कान में प्रॉब्लम है जेसे कान में दर्द रहना, कम सुनायी देना मवाद निकलना इत्यादि | जिनको भी ये सभी तकलीफें है वो लोग देशी गौ माता का मूत्र कान में एक – दो बूंद अवस्य डाले कम से कम 5-6 दिन तक | और आधा गौ मूत्र कफ पियें बहुत जल्द ही ठीक हो जाएगा | याद रहे की गौ मूत्र तजा ही पियें | अगर बहुत पुराना है तो तो उसमें थोडा सा पानी मिलाकर पी सकते है |
आँख के सभी रोगों के लिए :
 जिन व्यक्तियों की आँख में प्रॉब्लम है जेसे , आँख में से पानी आना, आँखों का लाल रहना, रेटिना का रोग, आँखों में खुजली चलना, इत्यादि इन सबकी सबसे बेस्ट एक ही दवा है वो है गौ मूत्र करना क्या है देशी गौ माता का मूत्र लेना और उसे आँख में एक एक टपका डाल लेना | इससे आँखों के सभी रोग सही हो जाते है 100%
अस्थमा रोग के लिए : 
जिन भी लोगो को अस्थमा की बीमारी है वो लोग रोज सुबह-सुबह गौ मूत्र का सेवन करें | कम से कम १५ दिन तक इसका सेवन करें अस्थमा की बीमारी जद से खत्म हो जाएगी |
घाव में फायदेमंद :
 जिन लोगो के सरीर पर चोट लगने से उनके सरीर पर घाव बन जाते है | तो उसकी सबसे अच्छी दवा है गौ मूत्र | याद रहे की मूत्र देशी गौ माता का ही होना चाहिए | करना क्या की आपको गेंदे के एक फूल की चटनी बनानी है फिर उसमें थोडा सा गौ मूत्र मिलाना है | फिर ये एक लेप के रूप में आ जाएगा | फिर आपको ये लगाना है जहा पर घाव है | घाव बहुत जल्द ही ठीक हो जाएगा |
चर्म रोग के लिए :- चर्म रोग में गौ मूत्र और पीसे हुए जीरे के लेप से लाभ मिलता है। खाज, खुजली में गौ मूत्र उपयोगी है।
मोटापा घटाने के लिए :–
 गौमूत्र मोटापा कम करने में भी सहायक है। एक ग्लास ताजे पानी में चार बूंद गौ मूत्र के साथ दो चम्मच शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिलाकर नियमित पीने से लाभ मिलता है।
पेट की बिमारियों के लिए :-
 पेट की बीमारियों के लिए गौमूत्र रामवाण की तरह काम करता है, इसे चिकित्सीय सलाह के अनुसार नियमित पीने से यकृत यानि लिवर के बढ़ने की स्थिति में लाभ मिलता है। यह लिवर को सही कर खून को साफ करता है और रोग से लड़ने की क्षमता विकसित करता है।



छालों के लिए :
- जिन व्यक्तियों के मुह में छालें है वो लोग गौ मूत्र से कुल्ला करें सुबह-सुबह दिन दिन में ही सही हो जाएँगे |
केंसर के लिए :- 
आजकल केंसर की बीमारी बहुत चल रही है केंसर की सबसे अच्छी दवा है गौ मूत्र जिन को भी केंसर है रोज सुबह-सुबह गौ मूत्र पियें | गारंटी के साथ ठीक हो जाएगी |
यकृत रोग में फायदेमंद :- 
जब यकृत का रोग बढ़ जाता है तो व्यक्ति उदर जैसी बिमारियों का शिकार हो जाते हैं | अगर आपको यकृत से सम्बंधित कोई भी परेशानी है तो आप थोड़े से पुननर्वा के काढ़े में थोडा-सा गौ मूत्र मिला लें और इसका सेवन करें | ऐसा करने से बहुत जल्दी लाभ मिलता है |



कुछ आवश्यक जानकारी :-

1. जिस घर में नियमित रूप से गौमूत्र का छिड़काव होता है, वहां बहुत सारे वास्तु दोषों का समाधान एक साथ हो जाता हैं।

2. देसी गाय के गोबर-मूत्र-मिश्रण से ‘`प्रोपिलीन ऑक्साइड” उत्पन्न होती है, जो बारिस लाने में सहायक होती है| इसी के मिश्रण से ‘इथिलीन ऑक्साइड‘ गैस निकलती है जो ऑपरेशन थियटर में काम आता है |
3. गौमूत्र का सेवन छानकर किया जाना चाहिए। यह वैसा रसायन है, जो वृद्धावस्था को रोकता है और शरीर को स्वस्थ्यकर बनाए रखता है।
4. गाय के मूत्र में आयुर्वेद का खजाना है! इसके अन्दर ‘कार्बोलिक एसिड‘ होता है जो कीटाणु नासक है, यह किटाणु जनित रोगों का भी नाश करता है। गौमूत्र चाहे जितने दिनों तक रखे, ख़राब नहीं होता है।
5. गौमूत्र को मेध्या और हृदया कहा गया है। इस तरह से यह दिमाग और हृदय को शक्ति प्रदान करता है। यह मानसिक कारणों से होने वाले आघात से हृदय की रक्षा करता है और इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों से बचाता है।
ध्यान देने योग्य बातें :-
1. गोमूत्र को हमेशा निश्चित तापमान पर रखें|
2. गोमूत्र की मात्रा ऋतु पर निर्भर करती है। चूँकि इसकी प्रकृति कुछ गर्म होती है इसीलिए गर्मियों में इसकी मात्रा कम लेनी चाहिए।
3. 8 वर्ष से कम बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को गौमूत्र अर्क वैद्य की सलाह के अनुसार ही दें।
4. मिट्टी, कांच या स्टील के बर्तन में ही गौमूत्र रखें।



गैस के लिए :-
 गैस की शिकायत में प्रातःकाल आधे कप पानी में गौ मूत्र के साथ नमक और नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए।
किडनी की बिमारियों में फायदेमंद :
 जिनकी किडनी ख़राब है वो व्यक्ति कभी भी खड़ा होकर पानी नहीं पियें | और एसा भोजन न करें जिसमें हिप्रोटिन, चिकनाई युक्त वाला भोजन न करें | और सुबह देशी गौ माता का मूत्र ले सुबह खाली पेट आधा कफ | एसा करने से किडनी सही हो जाएगी |

खांसी में फायदेमंद : जिनको भी खांसी की समस्या है वो लोग रोज सुबह- सुबह आधा कफ गौ माता का मूत्र पियें | चाहे खांसी कितनी भी खतरनाक हो सभी खांसी की समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा |

रविवार, 2 जुलाई 2017

10 आदतें जो आपको हमेशा खुश रखेंगी


   खुशी शायद सबसे बड़ा खजाना है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में जीने के लिए है।आप एक अरबपति या फिर एक बहुत साधारण इंसान है, दिन के अंत में यह खुशी ही है जो आपके अपने जीवन में पवित्रता लाता है।इस दुनिया में कुछ भी नहीं है, अगर आप खुश नहीं है। पैसो से भी आप खुशी नहीं खरीद सकते है। ऐसा कुछ है कि आप अपने काम और जीवन में कुछ अच्छा करके अपने जीवन काल में प्राप्त करने की आवश्यकता रखते है। यहाँ इस लेख में सबसे आसान तकनीक के द्वारा आपको खुश रहने तरकीब के बारे मैं चर्चा कर रहे हैं इन पर एक नजर अवश्य डाले।
जल्दी उठना एक बहुत अच्छी आदत है। यह एकदम सही समय है जब आपके मन और आत्मा किसी भी तरह के नकारात्मक विचारों से रहित रहता है।जल्दी जागने से आप तरो ताजा महसूस करते है। हर सुबह को देखो एक ताज़े अवसर के रूप में जो जीवन मैं आपको मिला है। अपनी पूरी कोशिश अपने सपनों को प्राप्त करने के लिए लगा दो। कल के दिन को भूल कर आप एक नयी सुबह और नए दिन की शुरूआत करे।




संतुलन बनाए अपने काम और जीवन में

बहुत ज्यादा कुछ भी अस्वस्थ है यह काम के पहलू में भी सच है। खुद को काम के बोझ में इतना साथ मत फंसा दीजिये कि आप अपने अस्तित्व को ही भूल जाय। यह आपके लिए महत्वपूर्ण है कि आप आपने काम के साथ अपने परिवार के लिए भी वक़्त निकाल सके और अगर जरूरत हो तो अपने लिए भी कुछ खली समय निकल पाए। यह आपको अपने काम में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए फायदेमंद साबित होगा । किसी भी अवकाश के बिना काम मैं निरंतर लगे रहने से उस काम मैं मजा नहीं रहता और आप दक्षता भी खो देते है।
नय दोस्त बनाओ (Make Friends)
मित्र बनाने से आप अपनी भावनाओं और खुशी को साझा कर सकेंगे। किसी दोस्त के साथ बातें करने से आपको अच्छा फील होगा और इससे नए दोस्त भी बनेंगे। आप सोशल मीडिया का उपयोग करके पुराने मित्रों और जिनसे संपर्कों को खो दिया है उनका पता लगा सकते हो। यह आपको वापस ख़ुशी दिला देगा और पुराणी यादें आपकी उदासीनता को खत्म कर देंगी।
रोज़ व्यायाम करो-
दैनिक व्यायाम करने से निस्संदेह आप चुस्त और तंदुरुस्त रहेंगे। निस्संदेह दैनिक व्यायाम आपकी नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, और चिंताओं को दूर करने मैं मदद करेंगी।ध्यान और योग एक खुश जीवन की गुणवत्ता और जीने का एक तरीका सुनिश्चित कर देगी ।
अपने अतीत पर सिमटना बंद करें-
हर व्यक्ति के जीवन में कुछ बुरा घटित होता है। आपके जीवन मैं केवल लाल गुलाब ही नहीं होंगे आपको काँटों का सामना भी करना ही होगा। बुरी पुरानी यादें केवल आपको दुःख ही देंगी इसलिए उनको जितना जल्दी हो सके भूल जाना चाहिए, उसी मैं बेहतरी है। आपको अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भागना है उनका सामना करना है। आपको आपने वर्तमान मैं जीना है और वही काम करे जिससे आप प्यार करते हैं।
बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करनी है
बड़ी उम्मीदें जीवन में दुख सिर्फ दुख लाती है अगर आप फैल हो जाते है जिसका आपने सपना देखा था और उसका आप कुछ कर भी नहीं पा रहे है तो उसका स्वागत और इज़त करें जो आपके पास है
नई चीज़ें सीखें
अगर आप बोरियत महसूस कर रहे है जिसके साथ आप काम कर रहे हैं, तो नई चीजें सीखना शुरू करें जिसको करने से आपको आनंद प्राप्त है । यह अपने प्ले स्टेशन में एक नया खेल खेलने या सीखने के जैसा हो सकता है। या यहां तक कि ड्राइव करना या तैरना या जो कुछ भी जिसमे आप ख़ुशी महसूस करते हो। यह आपको बोरियत से छुटकारा दिला देगा और कुछ समय के लिए आपको परेशानी से राहत मिल जाएगी। यह आपको अपनी एकाग्रता, नई बातें सिखने और कौशल दिखाने के लिए दृढ़ता के साथ सुधार में मदद करता है।



अहंकार को छोड़ दो
अहंकार आपके मैं जीवन दुख ही दुख भर देगा। आप अपने करीबी दोस्तों और प्रियजनों को खो देंगे सब खत्म हो जाएगा। अहंकार को दूर करे और खुशी से जीवन जीना शुरू करें। अगर आप अपने अहंकार को चलता कर सकते हैं, तो आप अपने जीवन में नई चीजें हैं प्राप्त कर सकते है जैसे आपके प्रियजन जो आप से नाराज थे वो सब आपका स्वागत करेंगे।
शिकायत करना छोड़ दो
अन्य कारक जो आपको दुखी करते है उन्हें छोड़ दो। जो चीजें आपके जीवन की जरूरत नहीं है उनके बारे में शिकायत करना बंद करो, दूसरों से अपनी तुलना मत करो। हर कोई अपने समस्याओं के साथ काम कर रहा है,और कोई भी मन की पूर्ण शांति में नहीं है। हर इंसान की लाइफ में कुछ न कुछ है कि उनके जीवन में हर किसी को परेशान कर रहा है। खुश रहो और जो कुछ भी जीवन ने दिया है उससे संतुष्ट रहो। कुछ लोगों के पास खाने के लिए भोजन भी नहीं है और फिर भी वे अपने तरीके से खुश हैं।
दूसरों को माफ करना सीखो-यह कुछ ऐसा है जिसमे वास्तव में बहुत कुछ किया जा सकता है। लेकिन किसी के खिलाफ शिकायत करना जो आप के लिए खराब रहा है केवल शत्रुता में वृद्धि ही करता है। हालांकि क्षमाशील होना आप के प्रति उनके बुरे व्यवहार को माफ नहीं कर सकता, लेकिन यह आपको मुश्किल भावनाओं से मुक्त करता है।यह नकारात्मक भावनाओं और आक्रोश को कम करता है उस व्यक्ति के प्रति जो वास्तव में आप के लिए अच्छा है। गुस्से और असंतोष आपके शरीर में नकारात्मक कण पैदा करते है जो कि आपके स्वस्थ और फिट रहने के लिए हानिकारक हैं।



ईमानदार रहो ईमानदारी दिखाओ -

खुद के और दूसरों के प्रति ईमानदार होने के नाते आप अपने मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते है। दूसरों से झूठ बोलना आप अपने इरादों को हासिल लेंगे, लेकिन साथ ही अपने आत्मसम्मान को खो देंगे और सबकुछ धूल मैं मिल जाएगा। पकड़े जाने के डर से आपके तनाव में वृद्धि होगी ओर रिश्तों में कड़वाहट पैदा होगी।
सारांश -
ये कुछ पहलु जिनके इस्तेमाल से हम अपनी ख़ुशी वापस ला सकते है और खुश और संतुष्ट रहने के लिए सभी को अपने जीवन मैं पहलु को उतारना चाहिए। इस दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है, जब तक आप अपने आप को खुश करने की कोशिश न करे आप खुश नहीं रह सकते। जिस तरह से आप खुशी जीवन जीने के लिए चयन में निहित है।जो छोटी झोपड़ियों में रहते हैं खुश हैं, लेकिन ऐसे भी कुछ लोग हैं जो अरबपतियों होने के बावजूद भी खुश नहीं हैं।