सोमवार, 22 अगस्त 2016

पिपली के गुण प्रयोग लाभ


पिप्पली या छोटी पीपल अनेक औषधीय गुणों से संपन्न होने के कारण आयुर्वेद की एक प्रमुख दवा है, आम जनमानस इसे गर्म मसाले की सामग्री के रूप में भी जानते हैं।
पिप्पली काली होती है तथा पंसारी के यहाँ आसानी से मिलती है। 

*पीपला पाइपर लोंगम का सूखा फल है जो एक चढने वाले गाँठदार तनाओं एवं चिरस्थाई काष्ठ-सदृश जडों से युक्त है। इसके पत्ते 5-9 से.मी. लंबे, 3-5 से.मी. चौडे, अण्डाकार, तल में विस्तृत वृत्ताकार पिण्डकवाले हैं। स्त्रीजातीय स्पाइक बेलनाकार, पुंजातीय स्पाइक बडे और पतले होते है। स्त्रीजातीय स्पाइक 1.3 - 2.5 से.मी. लंबे 4.5 मि.मी. व्यास के हैं। फल अण्डाभ, पीताभ नारंगी, छोटा, गुठलीदार फल एवं मांसल स्पाइक में डूबा हुआ होता है।
पिप्पली की कोमल तनों वाली लताऐं 1-2 मीटर तक जमीन पर फैलती है। इसके गहरे रंग के चिकने पत्ते 2-3 इंच लंबे एवं 1-3 इंच चौड़े, हृदय के आकार के होते हैं। इसके पुष्पदंड 1-3 इंच एवं फल 1 इंच से थोड़े कम या अधिक लंबे शहतूत के आकार के होते हैं। कच्चे फलों का रंग हल्का पीलापन लिए एवं पकने पर गहरा हरा रंग फिर काला हो जाता है। इसके फलों को ही छोटी पिप्पली या पीपल कहा जाता है।
वैदेही,कृषणा,मागधी,चपला आदि पवित्र नामों से अलंकृत,सुगन्धित पिप्पली भारतवर्ष के उष्ण प्रदेशों में उत्पन्न होती है | वैसे इसकी चार प्रजातियों- का वर्णन आता है परन्तु व्यवहार में छोटी और बड़ी दो प्रकार की पिप्पली ही आती है | बड़ी पिप्पली सिंगापुर से आयात की जाती है,परन्तु छोटी पिप्पली भारतवर्ष में प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती है |




*तीन पिप्पली पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से श्वास, खांसी के साथ ज्वर, मलेरिया ठीक होता है।
*फ्लू में दो पिप्पली या चौथाई चम्मच सौंठ दूध में उबाल कर पिलाएं।
*पिप्पली के १-२ ग्राम चूर्ण में सेंधानमक,हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांत पर लगाने से दांत का दर्द ठीक होता है ।
*पिप्पली मूल,काली मिर्च और सौंठ के समभाग चूर्ण को २ ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ चाटने से जुकाम में लाभ होता है।
* चार पिप्पली का चूर्ण आधा चम्मच शहद में डालकर नित्य चाटें, इससे मोटापा भी घटता है।
*पिप्पली वृक्ष के पत्ते दस्तों को बन्द करते हैं।इसके पत्ते चबाएं या पानी में उबालकर इसका उबला हुआ पानी पीयें।
*पिप्पली को पानी में पीसकर माथे पर लेप करने से सिर दर्द ठीक होता है।
*पिप्पली और वच चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर 3 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से दो बार दूध या गर्म पानी के साथ सेवन करने से आधासीसी का दर्द ठीक होता है |




पिप्पली या छोटी पीपल अनेक औषधीय गुणों से संपन्न होने के कारण आयुर्वेद की एक प्रमुख दवा है, आम जनमानस इसे गर्म मसाले की सामग्री के रूप में भी जानते हैं।
*इसका मसाले के रूप में और अचार एवं परिरक्षकों में भी प्रयोग होता है।
*इसके फल एवं जडें श्वसन-रोगों केलिए दवा के रूप में और पेशी दर्द और सूजन केलिए प्रति प्रकोपक एवं पीडाहारी के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इसके वातहर, हीमैटिनिक एवं कृमि रोधी गुण होते हैं।
* पिप्पली चूर्ण में शहद मिलाकर प्रातः सेवन करने से,कोलेस्टरोल की मात्रा नियमित होती है तथा हृदय रोगों में लाभ होता है |
वातजनित समस्‍यायें
5-6 पुरानी पिप्पली के पौधे की जड़ सुखाकर कुटकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की 1-3 ग्राम की मात्रा गर्म पानी या गर्म दूध के साथ पिला देने से शरीर के किसी भी भाग का दर्द 1-2 घंटे में दूर हो जाता है। वृद्धा अवस्था में शरीर के दर्दो में यह अधिक लाभदायक होता है।
*पिप्पली और छोटी हरड़ को बराबर-बररब- मिलाकर,पीसकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह- शाम गुनगुने पानी से सेवन करने पर पेट दर्द,मरोड़,व दुर्गन्धयुक्त अतिसार ठीक होता है |
* आधा चम्मच पिप्पली चूर्ण में बराबर मात्रा में भुना जीरा तथा थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर छाछ के साथ प्रातः खाली पेट सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है |
*पिप्पली के 1-2 ग्राम चूर्ण में सेंधानमक,हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांत पर लगाने से दांत का दर्द ठीक होता है |पिप्पली मे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के निष्चित गुण हैं जिनके कारण टी.बी. एवं अन्य संक्रामक रोगों की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक होता है। पिप्पली अनेक आयुर्वेदीय एंव आधुनिक दवाओं की कार्यक्षमता को बढ़ा देती
 है।



शनिवार, 16 जुलाई 2016

शिलाजीत के फायदे नुकसान Advantages and disadvantages of Shilajit


जीवन के उतार-चढ़ाव, व्यस्तता और जीवनशैली में आए बदलाव की वजह से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति ऐसा होगा जिसकी फैमिली लाइफ बहुत स्मूद चल रही हो। दिनभर ऑफिस का काम और फिर घर की जिम्मेदारियों का बोझ व्यक्ति को शारीरिक से ज्यादा मानसिक तौर पर थका देता है, जिसके चलते दांपत्य जीवन में व्यक्ति को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
अगर आप भी ऑफिस के काम और अन्य परेशानियों के चलते अपने पार्टनर के साथ टाइम स्पेंड नहीं कर पा रहे हैं, जिसकी वजह से आपका विवाहित जीवन बहुत टफ होता जा रहा है तो हम आपको एक ऐसी चमत्कारी दवा से परिचित करवाने जा रहे हैं जिसका सेवन चुटकियों में आपकी ये परेशानी हल कर सकता है|
भारत की भूमि पर विभिन्न प्रकार की उत्तम जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जिनमें से शिलाजीत भी एक है। आयुर्वेद में भी शिलाजीत की खूबियों का बखान करने के साथ उसके कई गुणों को प्रतिष्ठित भी किया गया है। आपको बता दें कि महर्षि चरक ने स्वयं यह कहा था कि पृथ्वी पर ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज शिलाजीत से ना किया जा सके।

आयुर्वेद के अनुसार शिलाजीत की उत्पत्ति शिला अर्थात पत्थर से हुई है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से पर्वत की चट्टानों के धातु अंश पिघलने से जो एक प्रकार का स्राव होता है, उसे शिलाजतु या शिलाजीत कहा गया है।
स्वाद में शिलाजीत काफी कड़वा, कसैला, उष्ण और वीर्य पोषण करने वाला होता है। देखने में यह तारकोल की तरह बेहद काला और गाढ़ा होता है जो सूखने के बाद एकदम चमकीला रूप ले लेता है।
मधुमेह, स्वप्नदोष, यौन दुर्बलता, शारीरिक दुर्बलता दूर करने के लिए शिलाजीत का प्रयोग उत्तम माना जा सकता है। इसके अलावा वृद्धावस्था में आने वाली शारीरिक कमियों और अन्य व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए शिलाजीत सहायक साबित होता है।
यौन शक्तिवर्द्धक (Shilajit for Sex Desire Stimulation)
शिलाजीत को इंडियन वियाग्रा कहा जाता है। शीघ्र स्खलन (Early Ejaculation) और ऑर्गेज्म (Orgasm) सुख से वंचित लोगों में यह कामोत्तेजना बढ़ाने का काम करता है।
सदियों से आयुर्वेद में शिलाजीत को यौन शक्ति वर्द्धक दवा के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह पुरुषों में वीर्य की संख्या बढ़ाता है और सेक्स हार्मोन को भी नियंत्रित करता है।
तनाव और मानसिक थकावट (Shilajit for Tension and Mental Tiredness)
शिलाजीत के सेवन से नर्वस सिस्टम सही से काम करता है। मानसिक थकावट, अवसाद, तनाव और चिंता से लड़ने के लिए शिलाजीत का सेवन करना चाहिए। इससे स्मरण शक्ति भी बढ़ती है, किसी भी काम करने में मन लगता है। दिमागी ताकत के लिए प्रतिदिन एक चम्मच मक्खन के साथ शिलाजीत का सेवन लाभदायक होता है ।
दिल के सेहत का भी रखता ख्याल (Shilajit for Heart Health)
शिलाजीत दिल के सेहत के लिए भी अच्छा है। दिल के साथ-साथ यह रक्त चाप को भी नियंत्रित करता है।
पाचनतंत्र के लिए (Shilajit for Digestive System)
शिलाजीत शरीर के पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है। इसके सेवन से अपच, गैस, कब्ज और पेट के दर्द जैसी बिमारियां खत्म होती हैं।



किडनी और अंत:स्राव ग्रंथि (Shilajit for Kidney and Endocrine Glands)
शिलाजीत के सेवन से किडनी, पैनक्रियाज और थायराइड ग्लैंड भी सही से काम करते हैं। यह ब्लड सर्कुलेशन के लिए भी अच्छा है।
डायबिटीज (Shilajit for Diabetes)
इसके सेवन से डायबिटीज भी कंट्रोल में रहता है। यह रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है और शरीर से हानिकारक टॉक्सिंस बाहर निकालने का काम करती है।
और भी हैं कई औषधीय लाभ (Shilajit for Common Health Problems)
*रोग प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत बनाता है
*सांस संबंधी बिमारियों में
*कफ को खत्म करने में
*गठिया और जोड़ों के दर्द में
*सूजन को कम करने में
*दिल को सेहतमंद बनाने में
*पेशाब और किडनी की बीमारी में
*एनिमिया के इलाज में
*अल्सर को कम करने में
*अल्जाइमर
*पीलिया

अगर आपको लगता है कि बीमारी के बाद ही आप शिलाजीत का प्रयोग कर सकते हैं तो आप गलत सोचते हैं। अगर कोई स्वस्थ मनुष्य शिलाजीत का सेवन करता है तो उसका शरीर हष्ट-पुष्ट बनता है और वह थकान या अन्य शारीरिक निर्बलता से दूर रहता है।
मानसिक तौर पर मजबूती प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन एक चम्मच मक्खन के साथ शिलाजीत का सेवन करना लाभ प्रदान करेगा। इससे आपको दिमागी थकावट से मुक्ति मिलेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिलाजीत के सेवन के लिए जो मात्रा निर्धारित होनी चाहिए वह दो से बारह रत्ती के बीच होनी चाहिए। इसके अलावा व्यक्ति की आयु और उसकी पाचन क्षमता को जानकर ही उसे शिलाजीत का सेवन करने दिया जाना चाहिए।
शिलाजीत का सेवन सूर्योदय से पहले किया जाए तो ही बेहतर है। दूध और शहद के साथ सुबह सूर्योदय से पहले शिलाजीत का सेवन करें और इसके 3-4 घंटे बाद ही कुछ खाएं।
वे लोग जिन्हें शीघ्र पतन की समस्या का सामना करना पड़ता है उनके लिए शिलाजीत एक वरदान साबित हो सकता है। बीस ग्राम शिलाजीत और बीस ग्राम बंग भस्म में दस ग्राम लौह भस्म और छः ग्राम अभ्रक भस्म घोटकर दो-दो रत्ती की गोलियां बना लें। सुबह के समय एक गोली को मिश्री मिले दूध के साथ लें, इससे आपको अप्रत्याशित लाभ मिलेगा।

शिलाजीत के सेवन के साथ-साथ कुछ बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक है। जिन लोगों के शरीर में पित्त का प्रकोप होता है उन्हें शिलाजीत के सेवन से बचना चाहिए। जब तक आप शिलाजीत का सेवन कर रहे हैं तब तक मिर्च-मसाले, खटाई, नॉन वेज और शराब आदि के सेवन से बचना चाहिए। शिलाजीत के सेवन के साथ-साथ कुछ बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक है। जिन लोगों के शरीर में पित्त का प्रकोप होता है उन्हें शिलाजीत के सेवन से बचना चाहिए। जब तक आप शिलाजीत का सेवन कर रहे हैं तब तक मिर्च-मसाले, खटाई, नॉन वेज और शराब आदि के सेवन से बचना चाहिए।

शिलाजीत से फायदे का विडियो- 

ग्रीन काफी के फायदे-नुकसान Advantages and disadvantages of green coffee



चाय से ज्यादा लोग कॉफी को प्राथमिकता देते है। कोई इसे सुबह पीना पसंद करता है तो कोई अपनी थकान मिटाने के लिए पीता है तो कोई इसे मीठा खाने के बाद पीना पसंद करते है। इस कॉफी को पीने के फायदे है लेकिन वो सीमित है। हाल ही में ग्रीन कॉफी के बारे में पता चला है ये वजन कम करने में काफी मदद करता है। इस कॉफी में ज्यादा कुछ खास फर्क नहीं है, बस इस कॉफी की बीन्स कच्चे रुप में होती है। आमतौर पर कॉफी बीन्स को निकाल कर भूना जाता है ताकि उनका स्वाद अच्छा हो और महक अच्छी हो जाए। कई शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि इस कॉफी की बीन्स का स्वास्थ से महत्वपूर्ण संबंध है।


समय-समय पर पेय पदार्थों के स्वरूप और उनके सेवन के तरीकों में बदलाव कर स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाने की कवायद दुनिया भर में होती रहती है। ग्रीन कॉफी ऐसा ही एक प्रयोग है। फिलहाल इसके लाभ और नुकसान को लेकर कई तरह के शोध किए जा रहे हैं।
हाल ही में आए शोधों के मुताबिक नई ग्रीन कॉफी ईजाद की गई है। इतना ही नहीं ग्रीन कॉफी को लेकर शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि सुबह-सुबह खाली पेट यानी नाश्ते से पहले ग्रीन कॉफी का नियमित रूप से सेवन किया जाए तो आप आसानी से अपना वजन कम कर सकते हैं।

* क्या है ग्रीन कॉफी?
ग्रीन टी के चलन के साथ ही ग्रीन कॉफी को लेकर भी बहुत चर्चाएं की जाने लगीं। यह असल में कच्चे, बिना सिके हुए कॉफी के बीज होते हैं। इन्हें इसी स्वरूप में पीसकर काम में लाया जाता है। चूंकि ये प्राकृतिक और कच्चे रूप में काम में लिए जाते हैं, इसलिए इसे ग्रीन कॉफी कहा जाता है।
* वजन घटाने का विकल्प
*छोटे स्तर पर हुए कुछ शोध यह साबित करते हैं कि ग्रीन कॉफी का सेवन करने वाले लोग, इसे न पीने वालों की तुलना में 7-8 किलो तक अधिक वजन घटा सकते हैं। साथ ही यह भी कहा जाता है कि यह शरीर में फैट के जमा होने की प्रक्रिया से भी बचाव कर सकता है। कुछ लोगों में इसके सेवन से उच्च रक्तचाप को कम करने में सहायता मिलने के भी प्रमाण मिले हैं।

*शोधों के मुताबिक, यदि आप अपने वजन से बहुत परेशान हैं लेकिन आप डायट चार्ट भी फॉलो नहीं करना चाहते तो आपको ग्रीन कॉफी का सेवन करना चाहिए।

*ग्रीन कॉफी का सबसे बड़ा फायदा है कि आप एक महीने में ही लगभग 2 किलोग्राम वजन आसानी से कम कर सकते हैं। इसके लिए आपको कोई अतिरिक्त मेहनत भी नहीं करनी होगी।
*शोधों के मुताबिक, जो लोग नियमित रूप से ग्रीन कॉफी का सेवन करते हैं, निश्चित रूप से उनका दो सप्ताह में लगभग डेढ़ किलोग्राम तक वजन कम हो सकता है लेकिन यदि एक महीने तक रोजाना ग्रीन कॉफी का सेवन किया जाएं तो आसानी से करीब 2 किलोग्राम वजन कम करने में आसानी होगी।

*शोधों में इस बात का भी खुलासा हुआ कि ग्रीन काफी कुछ ग्रीन टी के समान है। लेकिन ग्रीन कॉफी इसलिए भी अधिक फायदेमंद है क्योंकि ग्रीन कॉफी के कच्चे और बिना भुने स्वरूप में जो तत्व मौजूद होते हैं उनसे पाचन क्षमता ठीक रहती है और ठीक इसके विपरीत इन्हीं तत्वों से वजन नियंत्रण में भी मदद मिलती है।
*रिसर्च के दौरान यह भी बात सामने आई है कि यदि ग्रीन कॉफी के कच्चे और बिना भुने स्वरूप को भूना जाएगा तो इससे असरकारक तत्व नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि जो लोग सामान्य कॉफी पीने के शौकीन हैं उनका वजन कम नहीं होता क्योंकि इसे असरकारक तत्व भूनने के दौरान खत्म हो चुके होते हैं।


*दुनिया भर में कॉफी के इन बीजों का प्रयोग वजन घटाने के लिए विकल्प के तौर पर किया जा रहा है। लोग तेजी से इस ट्रैंड को अपना रहे हैं। असल में जानकारों का कहना है कि रोस्ट होने, यानी सिकने की प्रक्रिया में कॉफी के बीजों में मौजूद कुछ हेल्दी, प्राकृतिक रसायन नष्ट हो जाते हैं। पिछले कुछ समय में हुए कुछ शोध इस परिणाम को दर्शाने में सफल रहे हैं कि ग्रीन कॉफी का प्रयोग वजन घटाने में मदद कर सकता है।
ग्रीन काफी मे ओआरएसी ज्यादा मात्रा में होता है-
*ओआरएसी यानि ऑक्सीजन रेडिकल एबजॉरबेंस केपेसिटी ये एक तरीका होता है जिससे एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा की जांच की जाती है। जब ग्रीन कॉफी की बीन्स की जांच की गई तो पाया गया कि इसमें एंटीऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में है। हाल ही के अध्यन में पता चला है कि ये कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों को भी रोकने में कारगर है। दरअसल ये कैंसर के सेल को बनने से रोकती है।
*ऊर्जा बढ़ाती है- ये भी पाया गया कि ग्रीन कॉफी मेटाबॉलिजम रेट को बढ़ाती है जो कि आपकी दिनचर्या को पूरा करने में ऊर्जा देता है।
*वजन कम करता है- ये कॉफी वजन कम करने में भी मददगार है क्योंकि इसमें मेटाबॉलिजम रेट को बढ़ाने की क्षमता होती है। इसी के साथ पहले से मौजूदा फैट को भी कम करता है।





हो सकता है जोखिम भी
यूं सामान्य तौर पर किसी भी चीज का सेवन हद से ज्यादा करना तकलीफदेह हो सकता है। ग्रीन कॉफी के मामले में भी यह बात लागू होती है। इसके अलावा, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसके साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
*पेट की खराबी
* सिरदर्द
*एंग्जायटी आदि।
वहीं इसमें मौजूद कैफीन की मात्रा के कारण ग्रीन कॉफी का ज्यादा सेवन नुकसान पहुंचा सकता है। विशेषकर कुछ खास शारीरिक स्थितियों वाले लोगों के लिए, जिनमें शामिल हैं:
* ऑस्टियोपोरोसिस
* ब्लीडिंग डिसऑर्डर्स आदि से ग्रसित लोग।
* ग्लूकोमा
* डायबिटीज
* हाई ब्लड प्रेशर
* इरिटेबल बाउल सिंड्रोम
*ग्रीन कॉफी या इसके सप्लीमेंट्स का सेवन करने के लिए भी कुछ खास बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। अन्यथा इससे तकलीफ हो सकती है। इसलिए इसके सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है। डॉक्टर विशेष तौर पर बच्चों और गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसका सेवन न करने की सलाह देते हैं।
*इसके साथ ही कुछ विशेष औषधियों का सेवन करने वालों के लिए भी ग्रीन कॉफी के सेवन को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ग्रीन कॉफी में मौजूद कुछ तत्व इन औषध्ाियों के रसायनों के साथ मिलकर प्रतिक्रिया कर सकते हैं। ऐसी औषधियाँ हृदय रोगों के लिए, कमजोर हड्डियों के लिए, लंग डिसीज, मेनोपॉज, डिप्रेशन, स्कित्जोफ्रेनिया जैसी तकलीफों के लिए ली जाने वाली औषधियाँ शामिल हैं।
शोधों के मुताबिक, यदि आप अपने वजन से बहुत परेशान हैं लेकिन आप डायट चार्ट भी फॉलो नहीं करना चाहते तो आपको ग्रीन कॉफी का सेवन करना चाहिए।
*ग्रीन कॉफी का सबसे बड़ा फायदा है कि आप एक महीने में ही लगभग 2 किलोग्राम वजन आसानी से कम कर सकते हैं। इसके लिए आपको कोई अतिरिक्त मेहनत भी नहीं करनी होगी।
यदि आप नियमित रूप से ग्रीन कॉफी यानी हरी काफी  का सेवन करते हैं तो ग्रीन कॉफी में मौजूद क्लोरोजेनिक एसिड आपकी आहार नली में शुगर की मात्रा को कम कर देता है। इसके साथ ही ग्रीन कॉफी से आपके फैट के खत्म होने के प्रक्रिया एकदम तेज हो जाती है।



दिमाग को तेज करता है- इस ग्रीन कॉफी को पीने से आपका मूड तो अच्छा हो ही जाता है लेकिन ये आपके दिमाग को भी तेज करता है। ये आपके दिमाग की गतिविधियों, प्रतिक्रिया, याददाश्त, सतर्कता को तेज करता है।
एंटी एजिंग- आजकल ऐसा कौन है जो जवां दिखना नहीं चाहता है, हर कोई अपनी बढ़ती उम्र को रोकना चाहता है। ग्रीन कॉफी इस मामले में काफी मददगार है, जी हां ये उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देती है।
कैफीन की मात्रा कम होती है- जैसा की आपको हमने पहले बताया है कि इस कॉफी के बीन्स को भूना नहीं जाता है, इसका कच्चे रुप में ही सेवन किया जाता है। इसलिए इसमें सामान्य कॉफी की तुलना में कैफीन की मात्रा कम होती है। हालांकि कैफीन वजन कम करने में मदद करता है और आपके एकाग्रता में सुधार लाता है। लेकिन इसका ज्यादा सेवन करना आपके स्वास्थ के लिए हानिकारक हो सकता है।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

गेंग्रीन (गले -सडे घाव) के उपचार


कुछ चोट लग जाती है, और कुछ चोंटे बहुत गंभीर हो जाती है। जैसे कोई मधुमेह रोगी  है चोट लग गयी तो और उसके लिए कितना भी चेष्टा करे करे डॉक्टर हर बार उसको सफलता नही मिलता है। और अंत में वो चोट धीरे धीरे गैंग्रीन (अंग का सड़ जाना) में कन्वर्ट हो जाती है। और फिर काटना पड़ता है, उतने हिस्से को शारीर से निकालना पड़ता है। ऐसी परिस्तिथि में एक औषधि है जो गैंग्रीन को भी ठीक करती है और Osteomyelitis (अस्थिमज्जा का प्रदाह) को भी ठीक करती है।
गैंग्रीन माने अंग का सड़ जाना, जहाँ पे नए कोशिका विकसित नही होते। न तो मांस में और न ही हड्डी में और सब पुराने कोशिका मरते चले जाते हैं। इसीका एक छोटा भाई है Osteomyelitis इसमें भी कोशिका कभी पुनर्जीवित नही होते, जिस हिस्से में होता है उहाँ बहुत बड़ा घाव हो जाता है और वो ऐसा सड़ता है के डॉक्टर कहता है की इसको काट के ही निकलना है और कोई दूसरा उपाय नही है।। ऐसे परिस्तिथि में जहां शारीर का कोई अंग काटना पड़ जाता हो या पड़ने की संभावना हो, घाव बहुत हो गया हो उसके लिए आप एक औषधि अपने घर में तैयार कर सकते है।



औषधि है देशी गाय का मूत्र (सूती के आट परत कपड़ो में छान कर) , हल्दी और गेंदे का फुल। गेंदे के फुल की पिला या नारंगी पंखुरियाँ निकालना है, फिर उसमे हल्दी डालके गाय मूत्र डालके उसकी चटनी बनानी है। अब चोट कितना बड़ा है उसकी साइज़ के हिसाब से गेंदे के फुल की संख्या तै होगी, माने चोट छोटे एरिया में है तो एक फुल, बड़े है तो दो, तिन, चार अंदाज़े से लेना है। इसकी चटनी बनाके इस चटनी को लगाना है जहाँ पर भी बाहर से खुली हुई चोट है जिससे खून निकल चूका है और ठीक नही हो रहा हो । कितनी भी दवा खा रहे है पर ठीक नही हो रहा हो , ठीक न होने का एक कारण तो है  मधुमेह  दूसरा कोई जिनगत कारण भी हो सकते है। इसको दिन में कम से कम दो बार लगाना है जैसे सुबह लगाके उसके ऊपर रुई पट्टी बांध दीजिये ताकि उसका असर बॉडी पे रहे; और शाम को जब दुबारा लगायेंगे तो पहले वाला धोना पड़ेगा ,इसको गोमूत्र से ही धोना है डेटोल जैसो का प्रयोग मत करिए, गाय के मूत्र को डेटोल की तरह प्रयोग करे। धोने के बाद फिर से चटनी लगा दे। फिर अगले दिन सुबह कर दीजिये।
यह इतना प्रभावशाली है कि आप सोच नही सकते |देखेंगे तो चमत्कार जैसा लगेगा। इस औषधि को हमेशा ताजा बनाके लगाना है। किसीका भी जखम किसी भी औषधि से ठीक नही हो रहा है तो ये लगाइए। जो सोराइसिस गिला है जिसमे खून भी निकलता है, पस भी निकलता है उसको यह औषधि पूर्णरूप से ठीक कर देता है।  यह एक्सीडेंट के केसेस में खूब प्रोयोग होता है क्योंकि ये लगाते ही खून बंद  हो जाता है। ऑपरेशन का कोई भी घाव के लिए भी यह सबसे अच्छा औषधि है। गीला एक्जीमा में यह औषधि बहुत काम करता है, जले हुए जखम में भी काम करता है।


शनिवार, 2 जुलाई 2016

शराब पीने के दुष्प्रभाव The side effects of alcohol


शराब  की घूंट मुंह में जाते ही दिमाग और शरीर पर बेहद अलग असर होने लगता है. मुंह में जाते ही शराब  को कफ झिल्ली सोख लेती है. घूंट के साथ बाकी शराब सीधे छोटी आंत में जाती है. छोटी आंत भी इसे सोखती है, फिर यह रक्त संचार तंत्र के जरिए लीवर तक पहुंचती है.
कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान तो कभी आराम, पीने वाले शराब पीने का मौका खोज ही लेते हैं. पीते ही इंसान का मूड बदल सा जाता है, कुछ लोग ज्यादा बात करने लगते हैं. आखिर शराब हमारे शरीर के भीतर क्या करती है.
हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हेल्मुट जाइत्स के मुताबिक, "लीवर पहला मुख्य स्टेशन है. इसमें ऐसे एन्जाइम होते हैं जो अल्कोहल को तोड़ सकते हैं." यकृत यानी लीवर हमारे शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर करता है. अल्कोहल भी हानिकारक तत्वों में आता है. लेकिन यकृत में पहली बार पहुंचा अल्कोहल पूरी तरह टूटता नहीं है. कुछ अल्कोहल अन्य अंगों तक पहुंच ही जाता है.
जाइत्स कहते हैं, "यह पित्त, कफ और हड्डियां तक पहुंच जाता है, यहां पहुंचने वाला अल्कोहल कई बदलाव लाता है." अल्कोहल कई अंगों पर बुरा असर डाल सकता है या फिर 200 से ज्यादा बीमारियां पैदा कर सकता है.
सिर पर धावा
बहुत ज्यादा अल्कोहल मस्तिष्क पर असर डालता है. आस पास के माहौल को भांपने में शरीर गड़बड़ाने लगता है, फैसला करने की और एकाग्र होने की क्षमता कमजोर होने लगती है. शर्मीलापन कमजोर पड़ने लगता है और इंसान खुद को झंझट मुक्त सा समझने लगता है.
लेकिन ज्यादा मात्रा में शराब पीने से ये अनुभव बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं और इंसान बेसुध होने लगता है. उसमें निराशा का भाव और गुस्सा बढ़ने लगता है. और यहीं मुश्किल शुरू होती है. 2012 में दुनिया भर में शराब पीने के बाद हुई हिंसा या दुर्घटना में 33 लाख लोगों की मौत हुई, यानी हर 10 सेकेंड में एक मौत.
अल्कोहल को मस्तिष्क तक पहुंचने में छह मिनट लगते हैं. जाइत्स इस विज्ञान को समझाते हैं, "एथेनॉल अल्कोहल का बहुत ही छोटा अणु है. यह खून में घुल जाता है, पानी में घुल जाता है. इंसान के शरीर में 70 से 80 फीसदी पानी होता है. इसमें घुलकर अल्कोहल पूरे शरीर में फैल जाता है और मस्तिष्क तक पहुंच जाता है."
सिर में पहुंचने के बाद अल्कोहल दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटरों पर असर डालता है. इसकी वजह से तंत्रिका तंत्र का केंद्र प्रभावित होता है. अल्कोहल की वजह से न्यूरोट्रांसमीटर अजीब से संदेश भेजने लगते हैं और तंत्रिका तंत्र भ्रमित होने लगता है.
कभी कभी इसका असर बेहद घातक हो सकता है. कई सालों तक बहुत ज्यादा शराब पीने वाले इंसान के शरीर में जानलेवा परिस्थितियां बनने लगती हैं, "ऐसा होने पर विटामिन और जरूरी तत्वों की आपूर्ति गड़बड़ाने लगती है, इनका केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में अहम योगदान होता है." उदाहरण के लिए दिमाग को विटामिन बी1 की जरूरत होती है. लंबे समय तक बहुत ज्यादा शराब पीने से विटामिन बी1 नहीं मिलता और वेर्निके-कोर्साकॉफ सिंड्रोम पनपने लगता है, "दिमाग में अल्कोहल के असर से डिमेंशिया की बीमारी पैदा होने का खतरा बढ़ने लगता है."
दूसरे खतरे
मुंह और गले में अल्कोहल कफ झिल्ली को प्रभावित करता है, भोजन नलिका पर असर डालता है. लंबे वक्त तक ऐसा होता रहे तो शरीर हानिकारक तत्वों से खुद को नहीं बचा पाता है. इसके दूरगामी असर होते हैं. जाइत्स के मुताबिक पित्त संक्रमण का शिकार हो सकता है, "हम अक्सर भूल जाते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर और आंत के कैंसर के लिए अल्कोहल भी जिम्मेदार है." लीवर में अल्कोहल के पचते ही हानिकारक तत्व बनते हैं, जो लीवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं. जर्मनी में हर साल करीब 20 से 30 हजार लोग लीवर सिर्होसिस से मरते हैं.
जाइत्स चेतावनी देते हुए कहते हैं, "लीवर में अल्कोहल के पचते ही लोग सोचते हैं कि जहर खत्म हो गया लेकिन ये आनुवांशिक बीमारियां भी पैदा कर सकता है."
दुनिया भर में अल्कोहल
आयरलैंड और लक्जमबर्ग के लोग जर्मनों से भी ज्यादा अल्कोहल गटकते हैं. बेलारूस का नंबर तो पहला है, वहां साल भर में औसतन एक व्यक्ति 17.5 लीटर शुद्ध अल्कोहल पीता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शुद्ध अल्कोहल सेवन के मामले में पाकिस्तान, कुवैत, लीबिया और मॉरीतानिया सबसे नीचे हैं. वहां प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल सेवन दर 100 मिलीलीटर प्रति वर्ष है.
चीन, जापान और कोरिया के 40 फीसदी लोगों में एसेटअल्डिहाइट नाम का एन्जाइम नहीं पाया जाता. यह शरीर में अल्कोहल के असर को कम करने में मदद करता है. जाइत्स कहते हैं, "अल्कोहल एसेटअल्डिहाइट में बदलता है और एसेटअल्डिहाइट एसेटिक एसिड में. लेकिन अगर एसेटअल्डिहाइट एसेटिक एसिड में न बदले तो एसेटअल्डिहेड बनता है." आनुवांशिक कारणों के चलते कई एशियाई लोग अल्कोहल नहीं पचा पाते, उसके पीछे यही वजह है. अगर ऐसे लोग अल्कोहल पीते हैं तो उन्हें सिरदर्द, उल्टी और चक्कर जैसी शिकायतें होने लगती है. कइयों का चेहरा लाल हो जाता है.
जर्मनी में प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल सेवन दर करीब 12 लीटर सालाना है. 12 लीटर शुद्ध अल्कोहल का मतलब 500 बोतल बीयर प्रति व्यक्ति. यूनाइटेड किंगडम और स्लोवेनिया में प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल खपत 11.6 लीटर सालाना है.
भारत में यह आंकड़ा 8.7 लीटर सालाना है. लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत में पीने वाले बहुत ही ज्यादा पीते हैं. वो एक साल में 28.7 लीटर शुद्ध अल्कोहल गटक जाते हैं, यानी करीब एक हजार बोतल बीयर या करीबन 90-100 बोतल व्हिस्की या रम. इस लिहाज से देखा जाए तो भारतीय पियक्कड़ दुनिया में सबसे ज्यादा शुद्ध अल्कोहल गटकते हैं.
लेकिन अल्कोहल का दवा के रूप में भी सदियों से इस्तेमाल हो रहा है. जाइट्स के मुताबिक कभी कभार बहुत ही कम मात्रा में लिया जाने वाला अल्कोहल रक्त नलिकाओं को सख्त बनने से रोकता है. दवा की तरह लिया गया अल्कोहल हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा भी कम करता है. लेकिन मुश्किल यह है कि पीने वाले एक गिलास पर नहीं रुकते हैं और यहीं से अल्कोहल के दुष्चक्र की शुरुआत होती है.
शराब छुड़ाने का अचूक टोटका -----  विडियो लिंक 



बुधवार, 29 जून 2016

काँटा चुभने के उपचार


*शरीर के किसी हिस्से मे अगर काँटा चुभ जाए तो थोड़े से पानी में दो चुटकी ‎हींग डालकर घोल बना लें| घोल मैं रूई भिगोकर काँटे लगे स्थान पर आधा घंटा बाँध लें| एसा करने से काँटा स्वयं से निकल जाता है, और दर्द भी नहीं होता|
*कांटे वाली जगह को थोड़ा सा सुई से कुरेदकर उसमे आंकड़े (मदार)  का 3-4  बूंद  दूध भरकर पट्टी बांध दें  ,कांटा स्वयं  बाहर आ जाएगा|

*हाथ पैर में कांटा चुभ जाय, न निकलता हो तो मशक्कत ना करें थोड़े से गुड़ में अजवाइन मिलाकर बांधने से कांटा स्वयं निकल जायेगा।

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शनिवार, 25 जून 2016

आँखों की देखभाल और रोगों की चिकित्सा Home remedies of eye diseases



वैसे तो प्रकृति ने हमारी आंखों की रक्षा का प्रबंध बहुत ही अच्छे ढंग से कर रखा है। आंखों की बनावट इस प्रकार की है कि हडि्डयों से बने हुए कटोरे इनकी रक्षा करते हैं। आंखो के आगे जो दो पलकें होती हैं वे आंखों में धूल तथा मिट्टी तथा अन्य चीजों से रक्षा करती है। आंखो की अन्दरुनी बनावट भी इस प्रकार की है कि पूरी उम्र भर आंखे स्वस्थ रह सकती हैं। सिर्फ आंखों की अन्दरूनी रक्षा के लिए उचित आहार की जरुरत होती है जिसके फलस्वरूप आंखें स्वस्थ रह सकती हैं। सभी व्यक्तियों की आंखें विभिन्न प्रकार की होती हैं तथा उनके रंग भी अलग-अलग हो सकते हैं।
आंख के श्वेत भाग के रोग:- 
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंख में जो श्वेत (सफेद भाग) होता है उस भाग में लाली या बिन्दु जैसा कोई आकार बन जाता है।
दृष्टिदोष से सम्बन्धित रोग:- 
इस रोग से पीड़ित रोग को आंखो से कुछ भी नहीं दिखाई देता है।
आंखो के आगे अन्धेरा छा जाना:- इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंखो के आगे अन्धेरा छाने लगता है तथा उसे कुछ भी नहीं दिखाई देता है।
आंखो से धुंधला नजर आना:-
इस रोग के कारण रोगी को आंखो से धुंधला नजर आने लगता है।
गुहांजनी (बिलनी या अंजनिया):-
इस रोग के होने के कारण रोगी व्यक्ति की आंखो की पलकों पर फुन्सियां हो जाती हैं।
मोतियाबिन्द:-
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंखो के काले भाग में सफेदी सी छा जाती है जिसके कारण रोगी व्यक्ति को कम दिखाई पड़ने लगता है तथा उसकी आंखो का लेंस धीरे-धीरे धुंधला हो जाता है।
आंखो में खुजली होना:-
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंखो में खुजली होने लगती है जो किसी अन्य रोग के होने का लक्षण भी हो सकता है।
आंखो में रोहे, रतौंधी:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में दिखाई नहीं देता है।
आंखें पीली होना:- 
इस रोग के कारण रोगी की आंखो का सफेद भाग पीला हो जाता है। यह पीलिया रोग का लक्षण होता है।
बरौनियों का झड़ना:-
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंखो की पलकों के बाल झड़ने लगते हैं।
दूर दृष्टिदोष:–
इस रोग से पीड़ित रोगी को दूर की वस्तुएं ठीक से दिखाई नहीं देती हैं या दिखाई देती भी हैं तो धुंधली-धुंधली सी।
निकट दृष्टिदोष –
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को पास की वस्तुएं साफ-साफ दिखाई नहीं देती हैं।
अर्द्ध दृष्टिदोष (आंशिक दृष्टि):-
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को कोई भी वस्तु साफ-साफ दिखाई नहीं देती है।
वक्र दृष्टिदोष:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को कोई भी वस्तु टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देती है।
दिनौंधी:-
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को दिन के समय में दिखाई नहीं देता है।
द्वि- दृष्टिदोष या भेंगापन:-
इस रोग के काण रोगी व्यक्ति को हर वस्तु 2 दिखाई देती हैं
वर्ण दृष्टिदोष या कलर ब्लाइण्डनेस:-

इस रोग से पीड़ित रोगी को आंखो से देखने पर किसी भी रंग की वस्तु के रंग की पहचान नहीं हो पाती है।
धूम दृष्टिदोष:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को आंखो से देखने पर हर वस्तु धुंधली दिखाई देने लगती है।
कलान्तृष्टि:–
इस रोग से पीड़ित रोगी जब किसी भी वस्तु को ज्यादा देर तक देखता है तो उसकी आंखो में दर्द होने लगता है।
नजर कमजोर पड़ जाना:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को आंखो पर चश्मा लगवाने की जरूरत पड़ जाती है। इस रोग में बिना चश्मे के रोगी व्यक्ति को कुछ भी नहीं दिखाई देता है या दिखाई देता भी है तो बहुत कम।
क्रोनिक कंजक्टिवाइटिस:
इस रोग से पीड़ित रोगी की आंखो से पानी निकलने लगता है तथा उसकी अश्रु ग्रन्थियां सूज जाती हैं। रोगी व्यक्ति को नींद भी नहीं आती है।
धुंआ :
हमारे चारों ओर का वातावरण विषैले धुएं से भर चुका है जिसके कारण जब हमारी आंखें विषैली धुंए के संपर्क में आती है तो आंखो में विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
धूल :
वर्तमान समय में हमारे चारों ओर के वातावरण में धूल के कण विद्यमान हैं। धूल के कारण भी हमारी आंखो में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
रात को काफी देर में सोना :
रात को अधिक समय तक रोशनी में पढ़ना अथवा अधिक समय तक कार्य करना भी स्वास्थ्य की दृष्टि से आंखो के लिए हानिकारक होता है।
तेज धूप :
गर्मियों के मौसम में दोपहर के समय तेज धूप की किरणें हमारे आंखो की रोशनी के लिए हानिकारक होती है।
अधिक समय तक एक ही स्थान पर देखते रहना :
आंखो को लगातार एक ही जगह जमाकर रखने वाले कार्य जैसे कम्प्यूटर पर एकटक देखते रहना भी आंखो की रोशनी के लिए हानिकारक होता है। इसलिए आंखो को एक स्थान से हटाकर कुछ देर के लिए इधर-उधर भी देखना चाहिए।
आंखो के खराब होने के प्रमुख कारण:-
आंखो के रोग होने के विभिन्न कारण होते हैं जैसे- 

*अधिक गर्म खाद्य-पदार्थों का सेवन, नशीले पदार्थ, धूल के कण, अधिक सोचना, कम्यूटर या टी.बी. पर अधिक समय आंखे टिकाए रहना, अधिक समय तक सेक्स सम्बंधी बातों में लिप्त रहना, मधुमेह या मूत्र रोगों के कारण पुरानी कब्ज का होना, पूरी नींद न लेना तथा भोजन में पोषक तत्वों और विटामिन `ए´ की कमी होना आदि।
*आंखो की कुछ बीमारियां अनुवांशिक होती हैं।
*अधिक ठंड तथा गर्मी के कारण आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*उत्तेजक वस्तुओं के आंखो में प्रवेश करने के कारण भी आंखो के कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*शरीर में दूषित द्रव्य के जमा होने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*अधिक शराब पीने तथा विभिन्न प्रकार की दवाइयों के एलर्जियों के होने से व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है जिसके कारण उसकी आंखें में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*शरीर में विटामिन ए तथा कई प्रकार के लवणों आदि की कमी के कारण आंखो के रोग हो सकते हैं।
अधिक पढ़ने-लिखने का कार्य करने तथा कोई भी ऐसा कार्य जिसके करने से आंखो पर बहुत अधिक जोर पड़ता है, के कारण आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*अधिक टेलीविजन देखने तथा कम्प्यूटर पर कार्य करने के कारण भी आंखो में रोग हो सकते हैं।
*आंखो में धूल-मिट्टी तथा कीड़े-मकोड़े जाने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं।
रात के समय में अधिक देर तक जागने तथा कार्य करने और पूरी नींद न लेने के कारण आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*कम्प्यूटर पर लगातार काम करने से उसकी स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी आंखो में कई प्रकार के रोगों को जन्म दे सकती है क्योंकि उसकी रोशनी आंखो के लिए हानिकारक होती है।
*पढ़ते समय आंखो पर अधिक जोर देने से, अधिक चिंता करने से, अधिक सोच-विचार का कार्य करने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं।
*बस, चलती हुई रेलगाड़ी, टिमटिमाते हुए बल्ब देखने या कम प्रकाश में पढ़ने के कारण भी आंखो के रोग हो सकते हैं।
*अधिक क्रोध करने के कारण आंखो पर जोर पड़ता है जिसके कारण आंखो में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं।
अधिक दु:ख का भाव होने तथा रोने से आंखो से आंसू निकलते है जिसके कारण आंखो के रोग हो सकते हैं।
*सिर में किसी प्रकार से तेज चोट लगने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।

*जहर या अधिक उत्तेजक खाद्य पदार्थों का सेवन करने से भी आंखो के रोग हो सकते हैं।
सूर्य के प्रकाश को अधिक देर तक देखने के कारण भी आंखो के कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
वीर्य के वेग को बार-बार रोकने तथा सैक्स के प्रति कोई अनुचित कार्य करने जैसे हस्तमैथुन या गुदामैथुन करने के कारण भी आंखो के रोग हो सकते हैं।
अधिक संभोग करना तथा धातु रोग के कारण भी कई प्रकार के आंखो के रोग हो सकते हैं।
तेज बिजली की रोशनी में काम-काज करने के कारण भी आंखो के रोग हो सकते हैं।
दांतों से सम्बन्धित रोगों के होने के कारण भी आंखो में बहुत से रोग हो सकते हैं।
ठीक समय पर भोजन न करने, अनुचित ढंग से भोजन करने और जरूरत से अधिक भोजन करने के कारण भी आंखो से सम्बन्धित रोग हो सकते हैं।
मिट्टी के तेल वाली रोशनी में पढ़ने से, रास्ते में चलते-चलते पढ़ने से, दिन के समय में कृत्रिम रोशनी में कार्य करने तथा धूप में पढ़ने-लिखने का कार्य करने के कारण भी आंखो में रोग पैदा हो सकते हैं।
किसी भी न देखने योग्य या अनिच्छित वस्तु को देखने या किसी अंजान स्थान पर जाकर वहां की बहुत सी वस्तुओं को एक ही साथ देखने की कोशिश करने के कारण भी आंखो में रोग हो सकते हैं।

*चश्मे की आवश्यकता न होने पर भी अधिक समय तक चश्मा लगाए रखने के कारण भी आंखो के रोग हो सकते हैं।
*सोते समय अधिक सपनों को देखने के कारण भी आंखो में रोग हो सकते हैं।
*अपने सोने का स्थान खिड़की के ठीक सामने रखने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
सिलाई-कढ़ाई आदि का कार्य करते समय, सीने-पिरोने का काम करते समय, सुई की गति के साथ नजर को घुमाने के कारण भी आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
*डर-चिंता, क्रोध, मानसिक रोग, दोषयुक्त कल्पना करने, अशुद्ध विचार रखने के कारण भी आंखो के बहुत से रोग हो सकते हैं।
*जब मन तथा आंखें आराम करना चाहते हो उस समय आराम न करने के कारण आंखो में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।


*स्त्रियों में माहवारी से सम्बन्धित कोई रोग होने के कारण भी उसे आंखो के रोग हो सकते हैं।







आंखो का लकवा :
आंखों के लकवा रोग की प्राकृतिक चिकित्सा के लिए हरे रंग की कांच की बोतल में पानी को भरकर उसे सूर्य के प्रकाश में रखकर उसमें औषधीय गुण लाते हैं। इसके बाद इस जल से दिन में तीन-चार बार आंखों को धोना चाहिए तथा हरे रंग की बोतल में गाय के शुद्ध घी को भरकर सूर्य के प्रकाश में गर्म करके प्रतिदिन 3-4 बार आंखों में डालने से तथा आंखों का व्यायाम करने से आंखों का लकवा ठीक हो जाता है।
आंखो की पलकों के ऊपरी भाग के बालों का झड़ना :
आंखों की पलकों के ऊपरी भाग के बालों का झड़ने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए हरे रंग की कांच की बोतल में सूर्य किरणों द्वारा तैयार पानी को सुबह के समय खाली पेट प्यास के अनुसार पीना चाहिए। इसे लगभग 100 से 200 मिलीग्राम की मात्रा में पीना चाहिए। इसके लिए सूर्य के प्रकाश द्वारा तप्त (चार्ज) नीली कांच के बोतल में गाय के घी को आंखों के पलकों के ऊपर बालों पर लगाने से अथवा मालिश करने से पलकों के बालों का गिरना बंद हो जाता है। सूर्योदय के समय नीले रंग के सैलोफिन कागज की चार परत बनाकर लगभग 8 से 10 सेमी की दूरी पर रखकर 5-7 मिनट तक आंखों के ऊपर पलकों पर रोशनी देते हैं। ऐसा शाम के समय भी कर सकते हैं। सूर्य के अस्त होने के समय सूर्य की रोशनी अधिक गुणकारी होती है।
आंखो का सौंदर्य :
आंखो के सौंदर्य के लिए कांच के हरे रंग की बोतल में जल भरकर सूर्य की किरणों के प्रकाश द्वारा गर्म कर लेते हैं तथा आंखो को 3-4 बार धो लेते हैं। आंखो को धोने वाले यंत्र से आंखो को विभिन्न मुद्राओं में घुमाने से आंखें लचीली हो जाती हैं जिससे आंखो की चंचलता वापस लौट आती है। इसके बाद आंखो को कुछ देर तक खोलना, बंद करना, इधर-उधर घुमाना चाहिए। ऐसा करने से आंखो का व्यायाम हो जाता है।
आंखो पर अधिक जोर देने से उत्पन्न सिरदर्द :
आंखो से सम्बंधित कार्य करने से हुए सिरदर्द के इलाज के लिए कांच के हरे रंग की बोतल में जल भरकर सूर्य की किरणों के प्रकाश द्वारा गर्म कर लेते हैं तथा आंखो को 3-4 बार धो लेते हैं। इसके साथ ही सूर्य के प्रकाश द्वारा गर्म किये हुए गुलाब जल की 3-4 बूंदे दिन में 4-5 बार आंखो में डालने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है। सिरदर्द को दूर करने के लिए सूर्य के प्रकाश में गर्म किया हुआ नीली बोतल के नारियल के तेल से सिर तथा पैरों के तलवे, कनपटी और मस्तक पर मालिश की जाती है।
आंखो में कीचड़ आना :
जब आंखो में कीचड़ आने लगे तो कुछ समय के लिए पढ़ना-लिखना बंद कर देना चाहिए। इसके इलाज के लिए कांच के हरे रंग की बोतल में जल भरकर सूर्य की किरणों के प्रकाश द्वारा गर्म कर लेते हैं तथा आंखो को 3-4 बार धोते हैं। इसके साथ ही सूर्य के प्रकाश द्वारा गर्म किये हुए तैयार गुलाबजल की 3-4 बूंदें दिन में 4-5 बार आंखो में डालनी चाहिए। यह क्रिया लगभग एक सप्ताह तक करने से आंखो के सभी रोगों में लाभ मिलता है।
आंखो के नीचे की फुंसी का प्राकृतिक इलाज :
इसके इलाज के लिए हरे रंग की कांच की बोतल में जल भरकर सूर्य किरणों के प्रकाश द्वारा गर्म कर लेते हैं। इस पानी से आंखो को दिन में 3-4 बार धोना चाहिए तथा हरे रंग की कांच की बोतल में गाय का शुद्ध घी भरकर उसे सूर्य के प्रकाश द्वारा गर्म करके तैयार कर लेते हैं। इस घी को आंखो में डालने से और 3-4 दिनों तक आंखो की पलकों के नीचे रखने से आंखो की पलकों के नीचे की फुंसियां ठीक हो जाती हैं।
आंखो का धुंध तथा जाला :
सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के द्वारा तैयार किए शुद्ध गुलाबजल की तीन-चार बूंदें आंखोमें डालने से आंखो के धुंध तथा जाला जैसे रोगों में लाभ मिलता है। इसके अलावा हरे रंग की कांच की बोतल के पानी को सूर्य की किरणों के प्रकाश द्वारा गर्म करके इस पानी से नियमित रूप से आंखो को दिन में दो-तीन बार धोते हैं। इससे आंखो का धुंध और जाला समाप्त हो जाता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को अपनी आंखो को तेज रोशनी से बचाकर रखना बहुत ही आवश्यक होता है।
दूर–दृष्टिदोष :
दूर-दृष्टिदोष के रोग में रोगी दूर की वस्तुओं को आसानी से देख सकता है परन्तु पास की वस्तुओं को देखने में उसे कठिनाई का अनुभव होता है। रोगी को दूर-दृष्टिदोष का रोग काफी पुराने बुखार, फालिज, पुराना जुकाम तथा चश्मे का अधिक प्रयोग करने के कारण हो जाता है।
दूर-दृष्टिदोष से पीड़ित रोगी को संतुलित और स्वाभाविक भोजन ही सेवन करना चाहिए। उसे प्रतिदिन सुबह के समय गर्दन से सम्बंधित व्यायाम करने चाहिए तथा सूर्य के प्रकाश की किरणों द्वारा तप्त (चार्ज) हरे रंग की बोतल का जल की छींटे दिन में कई बार आंखो पर मारनी चाहिए। सुबह के समय सूर्य की किरणों को बंद आंखो पर डालने से अधिक लाभ होता है तथा शाम के समय नियमित रूप से लगभग 20-25 मिनट तक आंखो का व्यायाम करना चाहिए। इस रोग में आंखो का व्यायाम विशेष रूप से लाभकारी होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को आंखो के व्यायाम के बाद जितना हो सके आंखो के पास किताब को रखकर पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से आंखो पर जोर नहीं पड़ता है। पढ़ते समय बीच-बीच में पलकें गिराकर झपकनी चाहिए और आंखो को भी विश्राम देते रहना चाहिए। इस प्रकार कुछ दिनों तक करते रहने से आंखो पर लगा चश्मा भी हट जाता है।
आंखों का दर्द या आंख आना :
आंखो में दर्द होने पर या आंखे आने पर हमें 2-3 दिन कुछ भी नहीं खाना चाहिए। इससे आंखें स्वयं ही धीरे-धीरे करके ठीक हो जाती हैं। यदि ऐसा नहीं होता है तो पेट के विकारों को दूर करने के लिए कोई भी हल्का जुलाब लेना चाहिए। शरीर में दूषित स्टार्च विष एकत्रित होने से प्राय: कफ के कारण यह रोग होता है। इस रोग के लिए सबसे अच्छा इलाज उपवास करना होता है क्योंकि उपवास करने से शरीर की सफाई हो जाती है। विभिन्न प्रकार के एनिमा, उपवास तथा फलाहार, दूध, आहार की बजाय रसदार फलों से कुछ दिनों तक शरीर की आंतरिक सफाई करनी चाहिए।





आंखों में किसी भी प्रकार के रोग से पीड़ित रोगी को फलों में सेब, संतरे, बेर, चेरी, अनन्नास, पपीता, अंगूर आदि फलों का सेवन अधिक करना चाहिए। इन फलों में अधिक मात्रा में विटामिन `ए´, `सी´ तथा कैल्शियम होता है जो आंखों के लिए बहुत लाभदायक होता है।

  आँखों के उपचार ---विडियो लिंक

    आंखो के किसी भी प्रकार के रोग से पीड़ित रोगी को हरी सब्जियों में पत्तागोभी, पालक, मेथी तथा अन्य हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे शाक, मूली का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए। क्योंकि इनमें अधिक मात्रा में विटामिन `ए´ पाया जाता है और विटामिन `ए´ आंखों के लिए लाभदायक होता है।
आंखोआंखों के रोगों को दूर करने के लिए कंद मूल जैसे- आलू, गाजर, चुकंदर तथा प्याज का अधिक सेवन करना चाहिए। ये कंद मूल आंखों के लिए लाभदायक होते हैं।
अखरोट, खजूर, किशमिश तथा अंजीर का प्रतिदिन सेवन करने से आंखों के बहुत सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन बिना क्रीम का दूध तथा मक्खन खाने से आंखों में कई प्रकार के रोग नहीं होते हैं और यदि हैं भी तो वे जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
पके हुए भोजन में प्रतिदिन चपाती में घी लगाकर खाने से आंखों को बहुत लाभ मिलता है।आंखों को कई प्रकार के रोगों से बचाने के लिए व्यक्ति को डिब्बाबंद भोजन, केचप, जैम, ज्यादा गर्म भोजन, सूखे भोजन, तली हुई सब्जियां, आचार, ठंडे पेय पदार्थ, आइसक्रीम, केक, पेस्ट्री तथा घी और चीनी से बनी चीजें, मैदा तथा बेसन की मिठाइयों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।
रात को किसी मिट्टी या कांच के बर्तन में पानी भरकर एक चम्मच त्रिफला का चूर्ण भिगोने के लिए रख दें और सुबह के समय में इसे किसी चीज से छानकर पानी से बाहर निकाल लें। फिर इस पानी से आंखों को धोएं। इस प्रकार से यदि प्रतिदिन उपचार किया जाए तो आंखों के बहुत सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
आंखों के अनेकों रोगों को ठीक करने के लिए प्रतिदिन नेत्र स्नान करना चाहिए। नेत्र स्नान करने के लिए सबसे पहले एक चौड़े मुंह का बर्तन ले लीजिए तथा इसके बाद उसमें ठंडा पानी भर दीजिए। फिर इस पानी में अपने चेहरे को डुबाकर अपनी आंखों को पानी में दो से चार बार खोलिए और इसके बाद साफ कपड़े से चेहरे तथा आंखों को पोंछिए।
प्रतिदिन सुबह के समय घास पर पड़ी हुई ओस को पलकों पर तथा आंखों के अन्दर लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है तथा आंखों के अनेकों रोग ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन ठंडे पानी की धार सिर पर लेने से आंखो की रोशनी बढ़ने लगती है तथा आंखों के रोग भी ठीक हो जाते हैं।
सुबह के समय में उठते ही कुल्ला करके मुंह में ठंडा पानी भर लेना चाहिए तथा पानी को कम से कम एक मिनट तक मुंह के अन्दर रखना चाहिए। इसके साथ-साथ आंखों पर ठंडे पानी के छींटे मारते हुए धीरे-धीरे पलकों को मसलना चाहिए। फिर इसके बाद पानी को मुंह से बाहर उगल दें। इस क्रिया को दो से चार बार प्रतिदिन दोहराएं। इस प्रकार से प्रतिदिन करने से आंखों के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं तथा आंखों के देखने की शक्ति में वृद्धि होती है।

आंखों के रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी सो जाना चाहिए तथा गहरी नींद में सोना चाहिए। सोते समय आंखों को हथेलियों से ढक लें और किसी नीली वस्तु का ध्यान करते-करते सो जाएं। सुबह के समय में उठते ही 5 मिनट तक इसी प्रकार से दुबारा ध्यान करे और आंखों को खोलें। इस प्रकार की क्रिया करने से आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन शुद्ध सरसों के तेल से सिर पर मालिश करने तथा दो बूंद तेल कानों में डालने से आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है।
प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 20 मिनट तक उदरस्नान करने से भी आंखों की रोशनी बढ़ती है।
प्रतिदिन मेहनस्नान करने से आंखों के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
आंखों के बहुत सारे रोगों को ठीक करने के लिए प्रतिदिन आंखों और गर्दन के पीछे के भाग पर भीगी पट्टी का प्रयोग करने से आंखों में जलन, दर्द तथा लाली रोग ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन 5-6 पत्ती तुलसी, एक काली मिर्च तथा थोड़ी सी मिश्री को एक साथ चबाकर खाने से आंखों के रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन गाजर तथा चुकंदर का रस पीने से आंखों की रोशनी में वृद्धि होती है।
प्रतिदिन 5 भिगोए हुए बादाम चबा-चबाकर खाने से आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है।
प्रतिदिन एक आंवले का मुरब्बा खाएं क्योंकि आंवले में विटामिन `सी´ की मात्रा अधिक होती है जिसके फलस्वरूप आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं तथा आंखों की रोशनी में वृद्धि होती है।
प्रतिदिन सुबह तथा शाम को चीनी में सौंफ मिलाकर खाने से आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है।
हरे धनिये को धोकर फिर उसको पीसकर रस बना लें। इस रस को छानकर दो-दो बूंद आंखों में डालने से आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं तथा आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है।
कच्चे आलू को पीसकर सप्ताह में कम से कम दो बार आंखों के ऊपर 10 मिनट के लिए लगाने से आंखों की रोशनी तेज हो जाती है।
प्रतिदिन भोजन करने के बाद हाथों को धो लीजिए तथा इसके बाद अपनी गीली हथेलियों को आंखों पर रगड़ने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।
आंख आने में कपड़े की गीली पट्टी को 10 से 15 मिनट तक आंखों पर रखना चाहिए तथा कुछ समय के बाद इस पट्टी को बदलते रहना चाहिए। इसके साथ ही कम से कम तीन घण्टे के बाद आंखों की 20 मिनट तक गर्म पानी से भीगे कपड़े से सिंकाई करनी चाहिए। इसके फलस्वरूप आंखों का यह रोग ठीक हो जाता है।
आंख आने पर मांड के कारण पलकें आपस में चिपक जाती हैं। इस समय आंखों को खोलने में कभी भी जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। आंखों को खोलने के लिए आंखों पर पानी के छींटे मारने चाहिए तथा जब तक आंखों की पलकें न खुल जाएं तब तक आंखों पर पानी मारने चाहिए। इसके बाद नीले रंग का चश्मा आंखों पर लगाना चाहिए तथा नीली बोतल के सूर्यतप्त जल से सनी मिट्टी की पट्टी पेड़ू पर दिन में 2 बार लगानी चाहिए। ऐसा करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
आंखों के विभिन्न प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए साफ पिण्डोल मिट्टी की पट्टी का लेप बनाकर आंखों के आस-पास चारों तरफ लगाना चाहिए। यह पट्टी एक बार में कम से कम 15 मिनट तक लगानी चाहिए। इस क्रिया को दिन में कम से कम 2-3 बार दोहराएं। इसके फलस्वरूप रोगी व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है।
आंखों की अनेकों बीमारियों को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को दिन में उदरस्नान करना चाहिए तथा इसके बाद मेहनस्नान करना चाहिए। इसके बाद रीढ़ की ठंडी पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
आंखों के रोगों को ठीक करने के लिए उषापान करना चाहिए। उषपान केवल आंखों के रोगों को ही ठीक नहीं करता है बल्कि शरीर के और भी कई प्रकार के रोगों को भी ठीक करता है। उषापान करने के लिए रोगी व्यक्ति को रात के समय में तांबे के बर्तन में पानी को भरकर रखना चाहिए तथा सुबह के समय में उठते ही इस पानी को पीना चाहिए। इससे शरीर के अनेकों प्रकार के रोग तथा आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं तथा आंखों की रोशनी भी बढ़ती है। उषापान करने से मस्तिष्क का विकास होता है तथा पेट भी साफ हो जाता है।
आंखों तथा शरीर के विभिन्न प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए प्रतिदिन जलनेति क्रिया करनी चाहिए।
शुद्धकमल को जलाकर उसका काजल बनाकर प्रतिदिन रात को सोते समय आंखों में लगाने से आंखों की रोशनी तेज होती है तथा आंखों के विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
चांदनी रात में चन्द्रमा की तरफ कुछ समय के लिए प्रतिदिन देखने से आंखों की दृष्टि ठीक हो जाती है।
यदि किसी रोगी व्यक्ति की देखने की शक्ति कमजोर हो गई है तो उसे प्रतिदिन दिन में 2 बार कम से कम 6 मिनट तक आंखों को मूंदकर बैठना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है
आंखों के रोगों से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह के समय में उठकर अपनी आंखों को बंद करके सूर्य के सामने मुंह करके कम से कम दस मिनट तक बैठ जाना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
आंखों के रोग से पीड़ित रोगी को कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे आंखों से देखने के लिए जोर लगाना पड़े जैसे- अधिक छोटे अक्षर को पढ़ना, अधिक देर तक टी.वी. देखना आदि।
आंखो के रोग से पीड़ित रोगी को पानी पीकर सप्ताह में एक दिन उपवास रखना चाहिए। यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे दूर करने के लिए एनिमा क्रिया कीजिए। इससे रोगी व्यक्ति की आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं।
यदि आंखों के पास सूजन हो गई हो तो रोगी व्यक्ति को आंखों पर कुछ समय के लिए मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा भोजन में अधिक से अधिक हरी सब्जियों का उपयोग करना चाहिए क्योंकि हरी सब्जियों में विटामिन `ए´ अधिक मात्रा में पाया जाता है।
यदि आंखो की पलकें आपस में चिपक गई हैं तो आंखों को सावधानी पूर्वक धोना चाहिए और फिर गीले कपड़े से आंखो को पोंछकर पलकों को छुड़ाना चाहिए।
आंखोके रोग से पीड़ित रोगी को नींबू या नीम के पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए, क्योंकि एनिमा क्रिया से पेट साफ होकर कब्ज आदि की समस्या दूर हो जाती है। कब्ज के कारण भी आंखों में विभिन्न प्रकार के रोग हो जाते हैं जो कब्ज को दूर करने पर आसानी से ठीक हो जाते हैं।
आंखो में प्रतिदिन गुलाबजल डालने से आंखों के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
यदि आंखो में सूजन या लाली पड़ गई है तो सूर्य की किरणों के द्वारा तैयार हरी बोतल के पानी से आंखों को सुबह तथा शाम के समय धोना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
सुबह के समय में जल्दी उठना चाहिए तथा हरी घास पर नंगे पैर कुछ दूर तक चलना चाहिए। रोजाना ऐसा करने से आंखों की रोशनी तेज होती है।
आंखो में यदि किसी प्रकार का रोग हो जाता है तो सबसे पहले रोगी व्यक्ति को आंखो में रोग होने के कारणों को दूर करना चाहिए।
आंखोके रोग से पीड़ित रोगी को रोग की स्थिति के अनुसार एक से तीन दिनों तक फलों के रस (नारियल पानी, अनन्नास, संतरे, गाजर) का सेवन करके उपवास रखना चाहिए।
आंखो के रोग से पीड़ित रोगी को उत्तेजक खाद्य पदार्थों जैसे- चाय, कॉफी, चीनी, मिर्च-मसालों का उपयोग बंद कर देना चाहिए।
आंखो के रोग से पीड़ित रोगी को विटामिन `ए´, `बी´ तथा `सी´ युक्त पदार्थो का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए क्योंकि इन विटामिनों की कमी के कारण आंखों में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं।
आंखों को प्रतिदिन दो बार पानी से धोना चाहिए। आंखों को धोने के लिए सबसे पहले एक मोटा तौलिया लेना चाहिए। इसके बाद चेहरे को दो मिनट के लिए आंखें बंद करके रगड़ना चाहिए। फिर आंखों पर पानी मारकर आंखों को धोना चाहिए। इसके बाद साफ तौलिए से आंखों को पोंछना चाहिए। एक दिन में कम से कम 6 से 7 घण्टे की नींद लेनी चाहिए। इससे आंखों की देखने की शक्ति पर कम दबाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप आंखों में किसी प्रकार के रोग नहीं होते हैं और यदि आंखों में किसी प्रकार के रोग होते भी हैं तो वे ठीक हो जाते हैं।
आंखों के दृष्टिदोष को दूर करने के लिए रोगी व्यक्ति को कम से कम पांच बादाम रात को पानी में भिगोने के लिए रखने चाहिए। सुबह उठने के बाद बादामों को उसी पानी में पीसकर पेस्ट बना लें। फिर इस पेस्ट को खाना खाने के बाद अपनी आंखों पर कुछ समय के लिए लगाएं। इसके बाद आंखों को ठंडे पानी से धोएं और साफ तौलिए से पोंछे। इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को गाजर, नारियल, केले, तथा हरी सब्जियों का भोजन में
अधिक उपयोग करना चाहिए। कुछ महीनों तक ऐसा करने से आंखों में दृष्टिदोष से सम्बन्धित सभी रोग ठीक हो जाते हैं।

आंखों के व्यायाम
एक दिशा से दूसरी दिशा में जाने तथा झूलने वाले व्यायाम-
हाथ की तर्जनी उंगली से व्यायाम-
पैरों के तलुवों का व्यायाम-
सूर्यमुखी व्यायाम-
कुर्सी पर बैठकर सूर्यमुखी व्यायाम-
पलक मारने का व्यायाम-
दृष्टिपट पर चक्षु व्यायाम-
आंखो के अनेकों रोगों को ठीक करने कि लिए विभिन्न प्रकार के व्यायाम हैं जिन्हें प्रतिदिन सुबह तथा शाम करने से ये रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
ठंडे पानी में आंखो को खोलने का व्यायाम:-
पलक झपकाने का व्यायाम-
हथेली के द्वारा व्यायाम-
आंखो को घुमाने का व्यायाम-
कमजोर आंख तथा नजर के चश्मा छुड़ाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


सुबह के समय में प्रतिदिन हरे केले के पत्तों को अपनी आंखो के सामने रखकर कुछ मिनटों तक सूर्य के प्रकाश को देखने तथा इसके बाद पामिंग करने और फिर इसके बाद उदरस्नान या मेहनस्नान करने से आंखों पर से चश्मा हट सकता है तथा कई प्रकार के रोग जो आंखों से संबन्धित होते हैं, ठीक हो जाते हैं।
प्रतिदिन रात को सोते समय आंखो पर गीली मिट्टी की पट्टी लगाने तथा कमर पर कपड़े की गीली पट्टी करने और अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी लगाने से रोगी व्यक्ति की आंखो पर से चश्मा हट सकता है लेकिन इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन एनिमा क्रिया भी करनी चाहिए तथा सप्ताह में एक बार उपवास रखना चाहिए।
सुबह के समय में उठकर व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 12 मिनट से लेकर 30 मिनट तक सूर्य की ओर मुंह करके आंखों को बंद करके बैठना चाहिए। इस प्रकार बैठने से पहले रोगी को अपने सिर को ठंडे पानी से धोना चाहिए। इस क्रिया को करने के बाद आंखों पर ठंडे पानी के छींटे मारकर आंखों को धोना चाहिए। इसके बाद कम से कम पांच मिनट तक पामिंग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं तथा चश्मे का नम्बर कम होने लगता है।
सुबह के समय में मुंह धोने के बाद एक गिलास पानी में कागजी नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए। इसके बाद दोपहर के समय में भोजन करने तक और कुछ भी नहीं खाना चाहिए। दोपहर में चोकर युक्त आटे की रोटी खानी चाहिए। उबली हुई शाक-सब्जियां खानी चहिए। शाम के समय में फलों का रस पीना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से चश्मा हट सकता है तथा आंखों के कई प्रकार के रोग भी ठीक हो जाते हैं।

आँखों के घरेलू उपचार का विडियो -



नाक मे कीड़े पड़ने के उपचार Home remedies for vermes nasai




 
साफ सफाई का ध्यान नहीं रखने और अधिक गंदगी रहने की  वजह से  नाक मे घाव हो जाता है, उससे खून आने लगता है,  घाव ज्यादा पुराना हो ने पर उसमे कीड़े पैदा होने लगते हैं| 
  अब नाक के कीड़े के बारे मे कुछ उपचार  बता देता हूँ-
फिटकरी का प्रयोग-
1) एक चौथाई  ग्राम फिटकरी  करीब 100 मिली  पानी मे  मिलाकर रख लें | यह फिटकरी वाले पानी  की  3-4  बूंदे रोगी  के सिर  को पीछे  की तरफ  झुकाकर दोनों नथुनो मे  दिन मे 4 बार  टपकाएँ || इससे नाक के कीड़े मर जाते हैं| 
2)  पीसी हुई हींग को गरम पानी मे मिलाकर  नाक मे डालने से  नाक का  घाव ठीक होता है और कीड़े भी मर जाते हैं| 
3) नीम के पत्ते का काढ़ा बनाकर  नाक मे टपकाने से नाक के अंदर का घाव ठीक होता है  और नाक के कीड़े समाप्त होते हैं| 



4) लहसुन का रस निकालें| 3 भाग लहसुन का रस  4 भाग  पानी मे मिश्रित कर नथुनो मे टपकाएँ | कीड़े खत्म होंगे और नाक का घाव भी  ठीक हो जाएगा| 
5)  तारपीन का तेल लाएँ|  100 मिली पानी मे आधा चम्मच तारपीन का तेल मिलाकर इस पानी से नाक की धुलाई-सफाई  करें | इससे नाक के  कीड़े तिलमिलाकर  बाहर निकलेंगे  अब चिमटी से कीड़े पकड़कर बाहर निकालें| 

) बन तुलसी का रस  नथुनों मे डालने से  नाक के कीड़े मरते हैं | 

7)  खुरासानी अजवाईंन  के काढ़े से नाक के अन्दर की सफाई करना एक बढ़िया उपचार माना गया है| 
8) फरहद के पत्तों का रस नाक मे टपकाने से  नाक के तमाम कीड़े बाहर आ जाते हैं  और जख्म भी भर जाता है| 

रविवार, 19 जून 2016

कमर दर्द के सरल उपचार ; Simple home remedies for hip pain


                      












       
लगभग ८०% लोग अपने जीवन में कभी न कभी कमर दर्द से  परेशान होते हैं। कमर दर्द नया भी हो सकता है और पुराना रोग भी हो सकता है। नया रोग कमर की मांसपेशियों का  असंतुलित उपयोग करने  से उत्पन्न होता है। रोग पुराना होने पर वक्त बेवक्त कमर दर्द होता रहता है और उसके कारण का पता नहीं चलता है। यह  दर्द कभी-कभी इतना भयंकर होता है कि रोगी तडफ़ उठता है,बैठना-उठना  और यहां तक कि बिस्तर में करवट बदलना भी कठिन हो जाता है।सतही तौर पर देखने पर कमर में होने वाला दर्द भले ही एक सामान्य सी मेडिकल स्थिति लगता है, लेकिन इसे नज़रअंदाज करने से समस्या काफी बढ़ सकती है। 

   शरीर के अंगों  जैसे गुर्दे   में  इन्फ़ेक्शन,पोरुष ग्रंथि की व्याधि,स्त्रियों में पेडू के विकार ,मूत्राषय के रोग  और कब्ज  की वजह से कमर दर्द हो सकता है। गर्भवती स्त्रियों में कमर दर्द आम तौर पर पाया जाता है। गर्भ में बच्चे के बढने से भीतरी अंगों  पर दवाब बढने से कमर दर्द हो सकता है।

   कमर दर्द में लाभकारी घरेलू   उपचार  किसी भी आनुषंगिक दुष्प्रभाव से मुक्त हैं और असरदार भी है। देखते हैं कौन से हैं वे उपचार जो कमर दर्द  राहत पहुंचाते हैं--

   १) नीचे रखी कोई वस्तु उठाते वक्त पहिले अपने घुटने मोडें फ़िर उस वस्तु को उठाएं।

२) भोजन में पर्याप्त लहसुन का उपयोग करें। लहसुन कमर दर्द  का  अच्छा उपचार माना गया है।

३) गूगल कमर दर्द में अति उपयोगी घरेलू चिकित्सा  है। आधा चम्मच गूगल गरम पानी  के साथ सुबह-शाम सेवन करें।

४) चाय  बनाने में ५ कालीमिर्च के दाने,५ लौंग  पीसकर  और थौडा सा सूखे अदरक  का पावडर  डालें।  दिन मे दो बार पीते रहने से कमर दर्द में लाभ होता है।

५)  सख्त बिछोने पर सोयें। औंधे मुंह पेट के बल सोना हानिकारक है।




६)  २ ग्राम दालचीनी का पावडर एक चम्मच  शहद में मिलाकर दिन में दो बार लेते रहने से कमरदर्द में शांति मिलती है।

७) कमर दर्द पुराना हो तो शरीर को गर्म रखें और गरम वस्तुएं खाऎं।

८)  दर्द वाली जगह पर बर्फ़ का प्रयोग करना  हितकारी उपाय है। इससे भीतरी सूजन भी समाप्त होगी। कुछ रोज बर्फ़ का उपयोग करने के बाद गरम सिकाई प्रारंभ कर देने के अनुकूल परिणाम  आते हैं।

९)  भोजन मे टमाटर,गोभी,चुकंदर,खीरा ककडी,पालक,गाजर,फ़लों का प्रचुर उपयोग करें।

१०)  नमक मिलें गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। पेट के बल लेटकर दर्द के स्थान पर तौलिये द्वारा भाप लेने से कमर दर्द में राहत मिलती है।

११)रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन—चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियाँ काली न हो जायें) गर्म कर लें फिर ठंडा कर इसकी पीठ—कमर में मालिश करें।

१२)  कढ़ाई में दो—तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। थोड़े मोटे सूती कपड़े में यह गरम नमक डालकर पोटली बांध लें। कमर पर इसके द्वारा सेक करें।

१३) कमर और पीठ के दर्द के निवारण हेतु कुछ योगासनों का विशेष महत्व है। पाठकों की सुवधा के लिये उनका उल्लेख करता हूँ -




कटि चक्रासन :




पहली स्थिति 


जमीन पर लेट जाएं व घुटनों को मोड़ते हुए एड़ी को हिप्स से छू दें। हथेलियां सिर के नीचे रखें व कोहनियां जमीन से चिपकी हुई। सांस भरते हुए घुटनों को दाई ओर जमीन से छुएं व चेहरा बाई ओर खींचें, पर कोहनियां जमीन पर रहें। सांस छोड़ते हुए वापस आएं व बाई ओर दोहराएं।  


दूसरी स्थिति  

जमीन पर लेटी रहें। दाएं पैर के तलवे को बाई जंघा पर चिपका लें व बायां पैर सीधा रखें और दायां घुटना जमीन पर, हथेलियां सिर के नीचे। सांस भरते हुए मुड़ जाएं, पर दाई कोहनी जमीन से चिपकी रहे। जब तक संभव हो, रुकें व सांस छोड़ते हुए वापस दाएं घुटने को दाई ओर जमीन से छू दें। दस बार दोहराएं, फिर बाएं पैर से 10 बार दोहराएं।




सर्पासन 


पेट के बल लेट जाएं। पैरों को पीछे की ओर खींचें व एड़ी-पंजे मिलाए रखें। सांप की पूंछ की तरह। हथेलियों व कोहनियों को पसलियों के पास लाएं। ऐसे कि हथेलियां कंधों के नीचे आ जाएं और सिर जमीन को छुए। आंखें बंद रखें। चेहरा व सीना ऊंचा उठाएं, कमर के वजन पर सांप की तरह। इस स्थिति में जब तक हो सके, बनी रहें। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए जमीन पर वापस आ जाएं। विश्राम करें, हथेलियां सिर के नीचे टिका दें।
कमर दर्द  की एक्यू प्रेशर  चिकत्सा  का  विडियो देखें 


मंगलवार, 14 जून 2016

एसीडीटी (अम्लपित्त) के सरल उपचार Acidity home remedies






आहार नली के ऊपरी हिस्से में अत्यधिक अम्लीय द्रव संचरित होने से खट्टापन और जलन का अनुभव होना एसिडिटी कहलाता है। मुहं में भी जलन और अम्लीयता आ जाती है।
आमाषयिक रस में अधिक हायड्रोक्लोरिक एसिड होने से यह स्थिति निर्मित होती है। आमाषयिक व्रण इस रोग में सहायक की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
आमाषय सामान्यत: भोजन पचाने हेतु जठर रस का निर्माण करता है। लेकिन जब आमाषयिक ग्रंथि से अधिक मात्रा में जठर रस बनने लगता है तब हायडोक्लोरिक एसिड की अधिकता से एसिडिटी की समस्या पैदा हो जाती है। बदहजमी .सीने में जलन और आमाषय में छाले इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।


एसिडिटी निवारण के उपाय------विडियो लिंक 



*हर रोज़ हल्‍का गरम पानी पीना चाहिये।
*अपनी डाइट में केला, तरबूज और खीरा शामिल करें।
*रोजाना एक ग्‍लास दूध पीजिये।
*सोने से पहले ये नियम बना लीजिये कि भोजन दो-तीन घंटे पहले ही कर लें।
*एसिडिटी तब भी होती है जब आप भोजन के बीच में अधिक देर का गैप हो जाता है।
* इसलिये थोड़ी-थोड़ी देर पर कुछ ना कुछ खाते रहें।



*मसालेदार भोजन, चटनी, अचार और सिरका खाने से बचें।
*भोजन करने के बाद पानी में पुदीना उबालें और पिएं।
*गुड, नींबू, केला, बादाम और दही को खाने से भी एसिडिटी में राहत मिलती है।
*ज्‍यादा स्‍मोकिंग करना और ज्‍यादा शराब पीने से भी एसिडिटी हो जाती है।
*च्‍विंगम खाइये। इसको खाने से मुंह में थुक बनेगा जिससे खाना आसानी से पच जाएगा।
*नींबू, चीनी और पानी का घोल लंच करने से पहले पीजिये, इससे आपको परेशानी नहीं उठानी पडे़गी।
*सहजन, बीन्‍स, कद्दू, पत्‍ता गोभी, प्‍याज और गाजर जैसी सब्‍जियों को अपने आहार में शामिल करें।
*पाइनेपल के जूस का सेवन करें, यह एन्जाइम्स से भरा होता है। खाने के बाद अगर पेट अधिक
भरा व भारी महसूस हो रहा है, तो आधा गिलास ताजे पाइनेपल का जूस पीएं।
एसिडिटी के प्रमुख कारण निम्न हैं-
अधिक शराब का सेवन करना।
अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन-वस्तुएं उपयोग करना
मांसाहार.
कुछ अंग्रेजी दर्द निवारक गोलियां भी एसिडिटी रोग उत्पन्न करती हैं।
भोजन के बाद अम्लता के लक्षण बढ जाते हैं.
रात को लेटने पर भी एसिडिटी के लक्षण उग्र हो जाते हैं।
कुछ और अम्लता निवारक उपचार निम्न हैं-
** शाह जीरा अम्लता निवारक होता है। डेढ लिटर पानी में २ चम्मच शाह जीरा डालें । १०-१५ मिनिट उबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में दिन में ३ बार पीयें। एक हफ़्ते के प्रयोग से एसिडीटी नियंत्रित हो जाती है।
** भोजन पश्चात थोडे से गुड की डली मुहं में रखकर चूसें। हितकारी उपाय है।
**सुबह उठकर २-३ गिलास पानी पीयें। आप देखेंगे कि इस उपाय से अम्लता निवारण में बडी मदद मिलती है।
** तुलसी के दो चार पत्ते दिन में कई बार चबाकर खाने से अम्लता में लाभ होता है।



** एक गिलास जल में २ चम्मच सौंफ़ डालकर उबालें।रात भर रखे। सुबह छानकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पीयें। एसिडीटी नियंत्रण का उत्तम उपचार है।
आंवला एक ऐसा फ़ल जिससे शरीर के अनेकों रोग नष्ट होते हैं। एसिडीटी निवारण हेतु आंवला क उपयोग करना उत्तम फ़लदायी है।
**पुदिने का रस और पुदिने का तेल पेट की गेस और अम्लता निवारक कुदरती पदार्थ है। इसके केप्सूल भी मिलते हैं।
**फ़लों का उपयोग अम्लता निवारंण में महती गुणकारी है। खासकर केला,तरबूज,ककडी और पपीता बहुत फ़ायदेमंद हैं।
**५ ग्राम लौंग और ३ ग्राम ईलायची का पावडर बनालें। भोजन पश्चात चुटकी भर पावडर मुंह में रखकर चूसें। मुंह की बदबू दूर होगी और अम्लता में भी लाभ होगा।
** दूध और दूध से बने पदार्थ अम्लता नाशक माने गये है
**अचार,सिरका,तला हुआ भोजन,मिर्च-मसालेदार चीजों का परहेज करें। इनसे अम्लता बढती है। चाय,काफ़ी और अधिक बीडी,सिगरेट उपयोग करने से एसिडिटी की समस्या पैदा होती है। छोडने का प्रयास करें।
**एक गिलास पानी में एक नींबू निचोडें। भोजन के बीच-बीच में नींबू पानी पीते रहें। एसिडिटी का समाधान होगा।
**आधा गिलास मट्ठा( छाछ) में १५ मिलि हरा धनिये का रस मिलाकर पीने से बदहजमी ,अम्लता, सीने मे जलन का निवारन होता है

शनिवार, 11 जून 2016

लकवा के उपचार Domestic treatment of paralysis

                                            


आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मतानुसार लकवा मस्तिष्क के रोग के कारण प्रकाश में आता है।इसमें अक्सर शरीर का दायां अथवा बायां हिस्सा प्रभावित होता है। मस्तिषक की नस में रक्त का थक्का जम जाता है या मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिनी से रक्तस्राव होने

लगता है। शरीर के किसी एक हिस्से का स्नायुमंडल अचानक काम करना बंद कर देता है याने उस भाग पर नियंत्रण नहीं रह जाता है।दिमाग में चक्कर आने और बेहोश होकर गिर पडने से अग क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

हाईब्लड प्रेशर भी लकवा का कारण हो सकता है। सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर २२० से ज्यादा होने पर लकवा की भूमिका तैयार हो सकती है।
पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अर्बुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।



लकवा के कारण-

लकवा हमेशा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र जिसमें मस्तिष्क एवं स्पाइरल कार्ड शामिल हैं में गड़बड़ी अथवा पेरिफेरल नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार है जिसके कारण होता है। निम्न कारण जो तंत्रिका की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं जिसके कारण पक्षाघात होता है।1: स्ट्रोक- स्ट्रोक लकवा का मुख्य कारण है। इसमें मस्तिष्क का निश्चित स्थान कार्य करना बंद कर देता है। जिससे शरीर को उचित संकेत भेज एवं प्राप्त नहीं कर पाते हैं। स्ट्रोक हाथ व पैर में लकवा की सम्भावना ज्यादा रहती है।
ट्यूमर: विभिन्न प्रकार के ट्यूमर मस्तिष्क अथवा स्पाइनल कार्ड में पाए जाते हैं वह वहां के रक्त प्रवाह को प्रभावित करके लकवा उत्पन्न करते हैं।
ट्रामा अथवा चोट: चोट के कारण अंदरूनी रक्त प्रवाह कारण मस्तिष्क एवं स्पाइनल कार्ड में रक्त प्रवाह कम हो जाता है जिससे लकवा हो सकता है।सिरेबरल पैल्सि : ये बच्चों में जन्म के समय होती हे जिसके कारण लकवा हो सकता है। इसके अतिरिक्त निम्न स्थितियां स्पाइनल कार्ड की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं।
1: स्लिप डिस्क

2: न्यूरोडिजनरेटिक डिस्क

3:स्पोन्डोलाइसिस

इसके अतिरिक्त लकवा के अन्य कारण भी हो सकते हैं।

लकवा के प्रकार -
लकवा प्रमुख रूप से इतने प्रकार का हो सकता है।
*लकवा जिस अंग को प्रभावित करता है उसके अनुसार उसका विभाजन किया जाता है।
*मोनोप्लेजिया: इसमें शरीर का एक हाथ या पैर प्रभावित होता है।
*डिप्लेजिया: जिनमें शरीर के दोनों हाथ या पैर प्रभावित होते हैं।
*पैराप्लेजिया: जिसमें शरीर के दोनों धड़ प्रभावित हो जाते हैं।
*हेमिप्लेजिया: इसमें एक तरफ के अंग प्रभावित होते हैं।
*क्वाड्रिप्लेजिया: इसमें धड़ और चारों हाथ पैर प्रभावित होते हैं।
*लकवा का आक्रमण होने पर रोगी को किसी अच्छे अस्पताल में सघन चिकित्सा कक्ष में रखना उचित रहता है।इधर उधर देवी-देवता के चक्कर में समय नष्ट करना उचित नहीं है। अगर आपकी आस्था है तो कोई बात नहीं पहिले बडे अस्पताल का ईलाज करवाएं बाद में आस्थानुसार देवी-देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त करलें।
*लकवा पडने के बाद अगर रोगी हृष्ट-पुष्ट है तो उसे ५ दिन का उपवास कराना चाहिये। कमजोर शरीर वाले के लिये ३ दिन के उपवास करना उत्तम है। उपवास की अवधि में रोगी को सिर्फ़ पानी में शहद मिलाकर देना चाहिये। एक गिलास जल में एक चम्मच शहद मिलाकर देना चाहिये। इस प्रक्रिया से रोगी के शरीर से विजातीय पदार्थों का निष्कासन होगा, और शरीर के अन्गों पर भोजन का भार नहीं पडने से नर्वस सिस्टम(नाडी मंडल) की ताकत पुन: लौटने में मदद मिलेगी।रोगी को सीलन रहित और तेज धूप रहित कमरे मे आरामदायक बिस्तर पर लिटाना चाहिये।
*उपवास के बाद रोगी को कबूतर का सूप देना चाहिये। कबूतर न मिले तो चिकन का सूप दे सकते हैं। शाकाहारी रोगी मूंग की दाल का पानी पियें। रोगी को कब्ज हो तो एनीमा दें।

*लहसुन की ३ कली पीसकर दो चम्मच शहद में मिलाकर रोगी को चटा दें।

*१० ग्राम सूखी अदरक और १० ग्राम बच पीसलें इसे ६० ग्राम शहद मिलावें। यह मिश्रण रोगी को ६ ग्राम रोज देते रहें।
*लकवा रोगी का ब्लड प्रेशर नियमित जांचते रहें। अगर रोगी के खून में कोलेस्ट्रोल का लेविल ज्यादा हो तो ईलाज करना वाहिये।रोगी तमाम नशीली चीजों से परहेज करे। भोजन में तेल,घी,मांस,मछली का उपयोग न करे।









    बरसात में निकलने वाला लाल रंग का कीडा वीरबहूटी लकवा रोग में बेहद फ़ायदेमंद है। बीरबहूटी एकत्र करलें। छाया में सूखा लें। सरसों के तेल पकावें।इस तेल से लकवा रोगी की मालिश करें। कुछ ही हफ़्तों में रोगी ठीक हो जायेगा। इस तेल को तैयार करने मे निरगुन्डी की जड भी कूटकर डाल दी जावे तो दवा और शक्तिशाली बनेगी।एक बीरबहूटी केले में मिलाकर रोजाना देने से भी लकवा में अत्यन्त लाभ होता है।
    सफ़ेद कनेर की जड की छाल और काला धतूरा के पत्ते बराबर वजन में लेकर सरसों के तेल में पकावें। यह तेल लकवाग्रस्त अंगों पर मालिश करें। अवश्य लाभ होगा।
    लहसुन की 4 कली दूध में उबालकर लकवा रोगी को नित्य देते रहें। इससे ब्लडप्रेशर ठीक रहेगा और खून में थक्का भी नहीं जमेगा।


    लकवा रोगी के परिजन का कर्तव्य है कि रोगी को सहारा देते हुए नियमित तौर पर चलने फ़िरने का व्यायाम कराते रहें। आधा-आधा घन्टे के लिये दिन में ३-४ बार रोगी को सहारा देकर चलाना चाहिये। थकावट ज्यादा मेहसूस होते ही विश्राम करने दें।


    लकवा से होने वाली जटिलताए और होम्योपैथी-
    यदि लकवा लम्बे समय तक रहता है तो यह प्रभावित अंग को गम्भीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसके कारण शरीर मात्र अस्थि का ढांचा बन जाता है। रोगी को देखने, सुनने व बोलने में परेशानी होने लगती है।
    गम्भीर लकवाग्रस्त रोगी को चिकित्सालय में भर्ती कराना चाहिए। होम्योपैथी में लकवा का उपचार सम्भव है। होम्योपैथिक उपचार में रोगी के शारीरिक, मानसिक एवं अन्य लक्षणों को दृष्टिगत रखते हुए औषधि का चयन किया जाता है। कुछ दवाएं जो ज्यादा चलनमे है उनमें रस टॉस्क नाम की औषधि है जो शरीर के निचले हिस्से का लकवा इसके अतिरिक्त यदि लकवा गीला होने या नमी स्थानों में रहने से हो, यदि लकवा टाइफाइड के बुखार के बाद हो उसमें लाभकारी होती है। इसमें शरीर अंगों में जकडऩ में हो जाती तथा ये लकवा के पुराने मरीजों को बेहद लाभ पहुंचाता है। बच्चों में होने वाले लकवा में लाभकारी होता है।


    क्रास्टिकम नाम की यह होम्योपैथी दवा ठंड के कारण लकवा मारने या सर्दियों के मौसम में पैरालिसिस का अटैक पडऩे पर प्रभावी हो सकती है। इसके अलावा जीभ चेहरा या गले पर अचानक पडऩे वाले लकवा में भी कारगर साबित होता है।
    बेलाडोना नाम की औषधि से शरीर के सीधी तरफ का लकवा ठीक होता है। इस प्रकार के लकवा से प्रभावित व्यक्ति विक्षिप्त तक हो जाता है। इसमें इसी प्रकार नक्सवोमिका का प्रयोग तब लाभकारी होता है। शरीर का निचला हिस्सा लकवा से प्रभावित हो और उन अंगों हिलाने डुलाने में बहुत जोर लगाना पड़ता हो ऐसे लक्षणों में नक्सवोमिका रामबाण साबित हो सकती है।
    लकवा के उपचार में प्रयुक्त होने वाली अन्य औषधियों में कॉस्टिकम, जैलसिमियम, पल्म्बम,डल्कामारा, सल्फर, काकुलस, नैट्रमम्योर, कैलमिया, अर्जेटम, नाइट्रिकम, एकोमाइट, एल्युमिना आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा लकवाग्रस्त रोगी को ताजा खाना देना चाहिए। इसके अतिरिक्त चावल और गेहूं के साथ ही मौसमी फल भी फायदा करते हैं|

    लकवा के उपचार  का विडियो -