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10.4.11

दन्तशूल(toothache) के घरेलू उपचार

   दांत,मसूढों और जबडों में होने वाली पीडा को दंतशूल  से परिभाषित किया जाता है। हममें से कई लोगों को ऐसी पीडा अकस्मात हो जाया करती है। दांत में कभी सामान्य तो कभी असहनीय दर्द उठता है। रोगी को चेन नहीं पडता। मसूडों में सूजन आ जाती है। दांतों में सूक्छम जीवाणुओं का संक्रमण हो जाने से स्थिति और बिगड जाती है। मसूढों में घाव बन जाते हैं जो अत्यंत कष्टदायी होते हैं।दांत में सडने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है और उनमें केविटी बनने लगती है।जब सडन की वजह से दांत की नाडियां प्रभावित हो जाती हैं तो पीडा अत्यधिक बढ जाती है।
   प्राकृतिक उपचार दंत पीडा में लाभकारी होते हैं। सदियों से हमारे बडे-बूढे दांत के दर्द में घरेलू पदार्थों का उपयोग करते आये हैं।  यहां हम ऐसे ही प्राकृतिक उपचारों की चर्चा कर रहे हैं।

१) बाय बिडंग १० ग्राम,सफ़ेद फ़िटकरी १० ग्राम लेकर तीन लिटर जल में उबालकर जब मिश्रण एक लिटर रह जाए तो आंच से उतारकर ठंडा करके एक बोत्तल में भर लें। दवा तैयार है। इस क्वाथ से सुबह -शाम कुल्ले करते रहने से दांत की पीडा दूर होती है और दांत भी मजबूत बनते हैं।

२) लहसुन में जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। लहसुन की एक कली थोडे से सैंधा नमक के साथ पीसें फ़िर इसे दुखने वाले दांत पर रख कर दबाएं। तत्काल लाभ होता है। प्रतिदिन एक लहसुन कली चबाकर खाने से दांत की तकलीफ़ से छुटकारा मिलता है।

३) हींग दंतशूल में गुणकारी है। दांत की गुहा(केविटी) में थोडी सी हींग भरदें। कष्ट में राहत मिलेगी।

४)  तंबाखू और नमक महीन पीसलें। इस टूथ पावडर से रोज दंतमंजन करने से दंतशूल से मुक्ति मिल जाती है।

५) बर्फ़ के प्रयोग से कई लोगों को दांत के दर्द में फ़ायदा होता है। बर्फ़ का टुकडा दुखने वाले दांत के ऊपर या पास में रखें। बर्फ़ उस जगह को सुन्न करके लाभ पहुंचाता है।

६) कुछ रोगी गरम सेक से लाभान्वित होते हैं। गरम पानी की ्थैली से सेक करना प्रयोजनीय है।

७)  प्याज कीटाणुनाशक है। प्याज को कूटकर लुग्दी दांत पर रखना हितकर उपचार है। एक छोटा प्याज नित्य भली प्रकार चबाकर खाने की सलाह दी जाती है। इससे दांत में निवास करने वाले जीवाणु नष्ट होंगे।

८) लौंग के तैल का फ़ाया दांत की केविटी में रखने से तुरंत फ़ायदा होगा। दांत के दर्द के रोगी को दिन में ३-४ बार एक लौंग मुंह में रखकर चूसने की सलाह दी जाती है।

९) नमक मिले गरम पानी के कुल्ले करने से दंतशूल नियंत्रित होता है। करीब ३०० मिलि पानी मे एक बडा चम्मच नमक डालकर तैयार करें।दिन में तीन बार कुल्ले करना उचित है।

१०) पुदिने की सूखी पत्तियां  पीडा वाले दांत के चारों ओर  रखें। १०-१५ मिनिट की अवधि तक रखें। ऐसा दिन में १० बार करने से लाभ मिलेगा।

११) दो ग्राम हींग नींबू के रस में पीसकर पेस्ट जैसा बनाले। इस पेस्ट  से दंत  मंजन करते रहने से दंतशूल का निवारण होता है।

१२। मेरा अनुभव है कि विटामिन सी ५०० एम.जी. दिन में दो बार और केल्सियम ५००एम.जी दिन में एक बार लेते रहने से दांत के कई रोग नियंत्रित होंगे और दांत भी मजबूत बनेंगे।

१३)  मुख्य बात ये है कि  सुबह-शाम दांतों की स्वच्छता करते रहें। दांतों के बीच की ्जगह में अन्न कण फ़ंसे रह जाते हैं और उनमें जीवाणु पैदा होकर दंत विकार उत्पन्न करते हैं।

१४) शकर का उपयोग हानिकारक है। इससे दांतो में जीवाणु पैदा होते हैं। मीठी वसुएं हानिकारक हैं। लेकिन कडवे,ख्ट्टे,कसेले स्वाद के पदार्थ दांतों के लिये हितकर होते है। नींबू,आंवला,टमाटर ,नारंगी का नियमित उपयोग  लाभकारी है। इन फ़लों मे जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। मसूढों से अत्यधिक मात्रा में खून जाता हो तो नींबू का ताजा रस पीना  लाभकारी है।

१५) हरी सब्जियां,रसदार फ़ल भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।

१६)  दांतों की  केविटी में दंत चिकित्सक केमिकल मसाला भरकर इलाज करते हैं। सभी प्रकार के जतन करने पर भी दांत की पीडा शांत न हो तो दांत उखडवाना ही आखिरी उपाय है।

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26.1.11

मूत्राषय प्रदाह(cystitis)का कुदरती घरेलू पदार्थों से उपचार.

मूत्राषय में रोग-जीवाणुओं का संक्रमण होने से मूत्राषय प्रदाह रोग उत्पन्न होता है। निम्न मूत्र पथ के अन्य अंगों किडनी, यूरेटर और प्रोस्टेट ग्रंथि और योनि में भी संक्रमण का असर देखने में आता है। इस रोग  के कई कष्टदायी लक्छण होते हैं जैसे-तीव्र गंध वाला पेशाब होना,पेशाब का रंग बदल जाना, मूत्र त्यागने में जलन और दर्द  अनुभव होना, कमजोरी मेहसूस होना,पेट में पीडा और शरीर में बुखार की हरारत रहना। हर समय मूत्र त्यागने की ईच्छा बनी रहती है। मूत्र पथ में जलन  बनी रहती है। मूत्राषय में सूजन आ जाती है।
     यह रोग पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में ज्यादा देखने में आता है। इसका कारण यह है कि स्त्रियों की पेशाब नली (दो इंच) के बजाय पुरुषों की मूत्र नलिका ७ इंच लंबाई  की होती है। छोटी नलिका से होकर संक्रमण सरलता से मूत्राषय को आक्रांत कर लेता है। गर्भवती स्त्रियां और सेक्स-सक्रिय औरतों में मूत्राषय प्रदाह रोग अधिक पाया जाता है। रितु निवृत्त महिलाओं में भी यह रोग अधिक होता है।
     इस रोग में मूत्र खुलकर नहीं होता है और जलन की वजह से रोगी पूरा पेशाब नहीं कर पाता है और मूत्राषय में पेशाब बाकी रह जाता है। इस शेष रहे मूत्र में जीवाणुओं का संचार होकर रोगी की स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है।
    आधुनिक चिकित्सक एन्टीबायोटिक दवाओं से इस रोग को काबू में करते हैं लेकिन कुदरती और घरेलू पदार्थॊं  के उपचार भी इस रोग में फ़लदायी होते है।

१)  खीरा ककडी का रस इस रोग में अति लाभदायक है। २०० मिलि ककडी के रस में एक बडा चम्मच नींबू का रस  और एक चम्मच शहद मिलाकर हर तीन घंटे के फ़ासले से पीते रहें।

२) पानी और अन्य तरल पदार्थ प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें। प्रत्येक १० -१५ मिनिट के अंतर पर एक गिलास पानी या फ़लों का रस पीयें। सिस्टाइटिज नियंत्रण का यह रामबाण उपचार है।

३)  मूली के पत्तों का रस लाभदायक है। १०० मिलि रस दिन में ३ बार प्रयोग करें।

४)  नींबू का रस इस रोग में उपयोगी है। वैसे तो नींबू स्वाद में खट्टा होता है लेकिन गुण क्छारीय हैं। नींबू का रस मूत्राषय में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होता है। मूत्र में रक्त आने की स्थिति में भी लाभ होता है।

५)  पालक रस १२५ मिलि में नारियल का पानी मिलाकर पीयें। तुरंत फ़ायदा होगा। पेशाब में जलन मिटेगी।

६)  पानी में मीठा सोडा यानी सोडा बाईकार्ब मिलाकर पीने से तुरंत लाभ प्रतीत होता है लेकिन इससे रोग नष्ट नहीं होता। लगातार लेने से स्थिति ज्यादा बिगड सकती है।

७) गरम पानी से स्नान करना चाहिये। पेट और नीचे के हिस्से में गरम पानी की बोतल से सेक करना चाहिये। गरम पानी के टब में बैठना लाभदायक है।

८)  मूत्राषय प्रदाह रोग की शुरुआत में तमाम गाढे भोजन बंद कर देना चाहिये।दो दिवस का  उपवास करें। उपवास के दौरान पर्याप्त मात्रा में तरल,पानी,दूध लेते रहें।

९)  विटामिन सी (एस्कार्बिक एसिड) ५०० एम जी दिन में ३ बार लेते रहें। मूत्राषय प्रदाह निवारण में उपयोगी है।

१०) ताजा भिंडी लें। बारीक काटॆं। दो गुने जल में उबालें। छानकर यह काढा दिन में दो बार पीने से मूत्राषय प्रदाह की वजह से होने वाले पेट दर्द में राहत मिल जाती है।

११)  आधा गिलास मट्ठा में आधा गिलास जौ का मांड मिलाएं इसमें नींबू का रस ५ मिलि मिलाएं और पी जाएं। इससे मूत्र-पथ के रोग नष्ट होते है।

१२) आधा गिलास  गाजर का रस में इतना ही पानी मिलाकर पीने से मूत्र की जलन दूर होती है। दिन में दो बार प्रयोग कर सकते हैं।









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22.1.11

अम्लता(एसीडीटी) का करें कुदरती और घरेलू पदार्थों से ईलाज.

acidity(अम्लता) क्या है?
आहार नली के ऊपरी हिस्से में अत्यधिक अम्लीय द्रव संचरित  होने से खट्टापन और जलन का अनुभव होना एसिडिटी कहलाता है। मुहं में भी जलन और अम्लीयता आ जाती है। आमाषयिक रस में अधिक हायड्रोक्लोरिक एसिड होने से यह स्थिति निर्मित होती है। आमाषयिक व्रण इस रोग में सहायक की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
   आमाषय सामान्यत: भोजन पचाने हेतु जठर रस का निर्माण करता है। लेकिन जब आमाषयिक ग्रंथि से अधिक मात्रा में जठर रस बनने लगता है तब हायडोक्लोरिक एसिड की अधिकता से एसिडिटी की समस्या पैदा हो जाती है। बदहजमी .सीने में जलन और आमाषय में छाले इस रोग के प्रमुख लक्छण हैं।
  एसिडिटी के प्रमुख कारण निम्न हैं-

अधिक शराब का सेवन करना।
अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन-वस्तुएं उपयोग करना
मांसाहार.
कुछ अंग्रेजी दर्द निवारक गोलियां भी एसिडिटी रोग उत्पन्न करती हैं।
भोजन के बाद अम्लता के लक्छण बढ जाते हैं.
रात को लेटने पर भी एसिडिटी के लक्छण उग्र हो जाते हैं।

  घरेलू पदार्थों से एसिडिटी का ईलाज निरापद और हितकारी होता है।

१) शाह जीरा  अम्लता निवारक होता है। डेढ लिटर पानी में २ चम्मच शाह जीरा डालें । १०-१५ मिनिट उबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में  दिन में ३ बार पीयें। एक हफ़्ते के प्रयोग से एसिडीटी नियंत्रित हो जाती है।

२) भोजन पश्चात थोडे से गुड की डली मुहं में रखकर चूसें। हितकारी उपाय है।

३) सुबह उठकर  २-३ गिलास पानी पीयें। आप देखेंगे कि इस उपाय से अम्लता निवारण में बडी मदद मिलती है।

४) तुलसी के दो चार पत्ते दिन में कई बार चबाकर खाने से अम्लता में लाभ होता है।

५)  एक गिलास जल में २ चम्मच सौंफ़ डालकर उबालें।रात भर रखे। सुबह छानकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पीयें। एसिडीटी नियंत्रण का उत्तम उपचार है।





७) आंवला एक ऐसा फ़ल जिससे शरीर के अनेकों रोग नष्ट होते हैं। एसिडीटी निवारण हेतु आंवला क उपयोग करना उत्त्रम फ़लदायी है।





८)  पुदिने का रस और पुदिने का तेल पेट की गेस और अम्लता निवारक कुदरती पदार्थ है। इसके केप्सूल भी मिलते हैं।

९)  फ़लों का उपयोग अम्लता निवारंण में महती गुणकारी है। खासकर केला,तरबूज,ककडी और पपीता बहुत फ़ायदेमंद हैं।

१०)  ५ ग्राम लौंग और ३ ग्राम ईलायची का पावडर बनालें। भोजन पश्चात चुटकी भर पावडर मुंह में रखकर चूसें। मुंह की बदबू दूर होगी और अम्लता में भी लाभ होगा।

११) दूध और दूध से बने पदार्थ अम्लता नाशक माने गये हैं।

१२) अचार,सिरका,तला हुआ भोजन,मिर्च-मसालेदार चीजों का परहेज करें। इनसे अम्लता बढती है। चाय,काफ़ी और अधिक बीडी,सिगरेट उपयोग करने से एसिडिटी की समस्या पैदा होती है। छोडने का प्रयास करें।

१३) एक गिलास पानी में एक नींबू निचोडें। भोजन के बीच-बीच में नींबू पानी पीते रहें। एसिडिटी का समाधान होगा।






१४)  आधा गिलास मट्ठा( छाछ) में १५ मिलि हरा धनिये का रस मिलाकर  पीने से बदहजमी ,अम्लता, सीने मे जलन का निवारन होता है।

१५) सुबह-शाम २-३ किलोमिटर घूमने से तन्दुरस्ती ठीक रहती है और इससे अम्लता की समस्या से निपटने में भी मदद मिलती है।



4.12.10

अस्थि-भंगुरता: कुदरती पदार्थों से चिकित्सा.

       ५० वर्ष की आयु के बाद शरीर की अस्थियां कमजोर होने लगती हैं,इसे अस्थि भंगुरता,अस्थि मृदुता या अस्थि क्छरण कहते हैं। हड्डिया  पतली और खोखली होने लगती हैं और इतनी कमजोर व भंगुर हो जाती है कि झुककर किसी वस्तु को उठाने या साधारण भार पडने अथवा मामूली सी चोंट लगने पर भी  अस्थि-भंग(बोन फ़्रेक्चर)हो जाता है। केल्सियम,फ़ास्फ़ोरस व अन्य  तत्व की कमी हो जाने से  अस्थि मृदुता रोग होता है। इन तत्वों की कमी से अस्थि-घनत्व( बोन डेन्सिटी)का स्तर गिर जाता है। यह रोग पुरुषों की बजाय महिलाओं में ज्यादा होता है। कुल्हे की हड्डी, कलाई की हड्डी और रीढ की हड्डी के  फ़्रेक्चर  की घटनाएं  ज्यादा होती हैं।
  अस्थि भंगुरता के लिये निम्न कारण जिम्मेदार माने जाते हैं---
१) अधिक आयु होना
२) शरीर का वजन कम होना
३) कतिपय अंग्रेजी दवाएं अस्थि भंगुरता जनक होती हैं
४) महिलाओं में रितु निवृत्ति होने पर एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर गिरने लगता है। एस्ट्रोजन हार्मोन हड्डियों की मजबूती के लिये अति आवश्यक  हार्मोन होता है।
५) थायराईड हारमोन
६)  कोर्टिकोस्टराईड दवाएं लंबे समय तक उपयोग करना।
७)भोजन में केल्सियम तत्व-अल्पता
८)  तम्बाखू,और शराब का अधिक सेवन करना
९)  केमोथिरेपी
  अस्थि भंगुरता का इलाज कुदरती पदार्थों से करना आसान ,कम खर्चीला और साईड इफ़ेक्ट रहित होने से प्रयोजनीय है ---

१)  मांस खाना छोड दें। मांस में ज्यादा प्रोटीन होता है और यह प्रोटीन शरीर के केल्सियम को मूत्र के जरिये बाहर निकालता है। केल्शियम अल्पता से अस्थि-भंगुरता होती है। मांस की बजाय हरी पत्तेदार सब्जियों का प्रचुरता से उपयोग करें।

२)  प्रतिदिन १००० एम.जी.केल्सियम और ५०० एम.जी. मेग्नेशियम उपयोग करें। यह  ओस्टियो पोरोसिस( अस्थि मृदुता) का उम्दा इलाज है।खोखली और कमजोर अस्थि-रोगी को यह उपचार अति उपादेय है।
३)  एक चम्मच शहद नियमित तौर पर लेते रहें। यह आपको अस्थि भंगुरता  से बचाने का बेहद उपयोगी नुस्खा है।

४)  वसा रहित पावडर का दूध केल्सियम की आपूर्ति के लिये श्रेष्ठ है। इससे हड्डिया ताकतवर बनती हैं। गाय या बकरी का दूध भी लाभकारी है।

५)  विटामिन "डी " अस्थि मृदुता में परम उपकारी माना गया है।  विटामिन डी की प्राप्ति सुबह के समय धूपमें बैठने से हो सकती है। विटामिन ’डी" शरीर में केल्सियम  संश्लेशित करने में सहायक होता है।शरीर का २५ प्रतिशत भाग खुला रखकर २० मिनिट धूपमें बैठने की आदत डालें।

६)   अधिक दूध वाली चाय पीना हितकर है। दिन में एक बार पीयें।

७) सोयाबीन के उत्पाद अस्थि मृदुता निवारण में महत्वपूर्ण हैं। इससे औरतों में एस्ट्रोजिन हार्मोन का संतुलन बना रहता है। एस्ट्रोजिन हार्मोन की कमी  महिलाओं में अस्थि मृदुता पैदा करती है।

८)  केफ़िन तत्व की अधिकता वाले पदार्थ के उपयोग में सावधानी बरतें।  चाय और काफ़ी में अधिक केफ़िन तत्व होता है। दिन में बस एक या दो बार चाय या काफ़ी ले सकते हैं।

९) बादाम अस्थि मृदुता निवारण में उपयोगी है। ११ बादाम रात को पानी में गलादें। छिलके उतारकर गाय के २५० मिलि दूध  के साथ मिक्सर या ब्लेन्डर में चलावें।  नियमित उपयोग से हड्डियों को भरपूर केल्शियम मिलेगा और अस्थि भंगुरता का निवारण करने में मदद मिलेगी।

१०) बन्द गोभी में बोरोन तत्व पाया जाता है। हड्डियों की मजबूती में इसका अहम योगदान होता है। इससे खून में एस्ट्रोजीन का स्तर बढता है जो महिलाओं मे अस्थियों की मजबूती बढाता है। पत्ता गोभी की सलाद और सब्जी प्रचुरता से इस्तेमाल करें।

११)  नये अनुसंधान में जानकारी मिली  है कि मेंगनीज तत्व अस्थि मृदुता में अति उपयोगी है। यह तत्व साबुत गेहूं,पालक,अनानास,और सूखे मेवों में पाया जाता है। इन्हें भोजन में शामिल करें।

१२)  विटामिन  "के" रोजाना ५० मायक्रोग्राम  की मात्रा में लेना  हितकर है। यह अस्थि भंगुरता में लाभकारी है।

१३)  सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हड्डियों की मजबूती के लिये नियमित व्यायाम करें और स्वयं को  घर के कामों में लगाये रखें।

१४)  भोजन में नमक की मात्रा कम कर दें।  भोजन में नमक ज्यादा होने से सोडियम अधिक मात्रा मे उत्सर्जित होगा  और इसके साथ ही केल्शियम भी बाहर निकलेगा।

१५)  २० ग्राम तिल थोडे से गुड के साथ मिक्सर में चलाकर तिलकुट्टा बनालें। रोजाना सुबह उपयोग करने से अस्थि मृदुता निवारण में मदद मिलती है।





१६) टमाटर का जूस आधा लिटर प्रतिदिन पीने से दो तीन माह में हड्डियां बलवान बनती  है और अस्थि भंगुरता में आशातीत लाभ होता है।





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3.12.10

पेट दर्द (एबडोमिनल कोलिक) निवारक घरेलू इलाज।

      पेट में पीडा abdominal colic होने की व्याधि वक्छ(छाती) से तलपेट के मध्य के क्छेत्र में  किसी भी जगह मेहसूस हो सकती है।यह पीडा कुछ समय के लिये मामूली किस्म की अथवा लम्बे समय तक होने वाली गंभीर प्रकार की  हो सकती है।  पेट दर्द होने के कई कारण हो सकते हैं।पेट में स्थित  लिवर,गाल ब्लाडर ,आमाषय,पेनक्रियास(अग्नाषय)और आतों  में विकार आ जाने से पेट दर्द पैदा होता है।  एक या अधिक अंग प्रभावित होते हैं।

   पेट दर्द के  मुख्य कारण कब्ज का होना,  अपच, ज्यादा गैस बनना, आमाषय और आंतों में व्रण बन जाना, आंत्र पुच्छ प्रदाह होना, गाल ब्लाडर अथवा किडनी में पथरी निर्माण होना ,विषाक्त भोजन सेवन करना आदि हैं।
     पेट दर्द  निवारण के लिये निम्न उपचार लाभदायक सिद्ध होते हैं-

१)  पेट दर्द मे हींग का प्रयोग लाभकारी है। २ ग्राम हींग थोडे पानी के साथ पीसकर पेस्ट बनाएं। नाभी पर और आस पास यह पेस्ट लगावें । लेटे रहें।  इससे पेट की गैस निष्काषित होकर दर्द में राहत मिल जाती है।

२)  अजवाईन तवे पर सेक लें । काला नमक के साथ पीसकर पावडर बनाएं। २-३ ग्राम गरम पानी के साथ दिन में ३ बार लेने से पेट का दर्द दूर होता है।

३)  जीरा तवे पर सेकें। २-३ ग्राम की मात्रा गरम पानी के साथ ३ बार लें। इसे चबाकर खाने से भी लाभ होता है।


४)  पुदिने और नींबू का रस प्रत्येक एक चम्मच लें।  अब इसमें आधा चम्मच अदरक का रस और थोडा सा काला नमक मिलाकर उपयोग करें। यह एक खुराक है। दिन में ३ बार इस्तेमाल करें।

५)  सूखा अदरक मुहं मे चूसने से पेट दर्द में राहत मिलती है।

६)  कुछ पेट दर्द के रोगी बिना दूध की चाय पीने से पेट दर्द में आराम मेहसूस करते हैं।

७)  अदरक का रस नाभी स्थल पर लगाने और हल्की  मालिश करने  से उपकार होता है।

८) अगर पेट दर्द एसिडीटी (अम्लता) से हो रहा हो तो पानी में थोडा सा मीठा सोडा डालकर पीने से फ़ायदा होता है।

९)   पेट दर्द निवारक  चूर्ण बनाएं। भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, सौंठ( सूखी अदरक) लहसून, धनिया,हींग सूखी पुदीना पत्ती , सबकी बराबर मात्रा लेकर महीन चूर्ण बनावें। थोडा सा काला नमक भी मिश्रित करें।  भोजन पश्चात एक चम्मच की मात्रा मामूली गरम जल से लें। पेट दर्द में आशातीत लाभकारी है।

१०)  हरा धनिया का रस एक चम्मच शुद्ध घी  मे मिलाकर लेने से पेट की व्याधि दूर होती है।







१०)  अदरक का रस और अरंडी का तेल प्रत्येक एक चम्मच  मिलाकर दिन में ३ बार लेने से पेट दर्द  दूर  होता है।

११)  अदरक का रस एक चम्मच,नींबू का रस २ चम्मच में थोडी सी शकर मिलाकर प्रयोग करें । पेट दर्द में उपकार होता है। दिन में २-३ बार ले सकते हैं।








१२)  अनार पेट दर्द मे फ़ायदे मंद है।  अनार के बीज निकालें । थोडी मात्रा में नमक और काली मिर्च का पावडर बुरकें। दिन में दो बार लेते रहें।









१३)  मैथी के बीज पानी में गलाएं। पीसकर पेस्ट बनाएं। यह पेस्ट २०० ग्राम दही में मिलाकर दिन में दो बार लेने से पेट के विकार नष्ट होते हैं।

१४)  इसबगोल के बीज दूध में ४ घंटे गलाएं। रात को सोते वक्त लेते रहने से पेट में मरोड का दर्द और पेचिश ठीक होती है।

१५)  सौंफ़ में पेट का दर्द दूर करने के गुण है। १५ ग्राम सौंफ़  रात भर एक गिलास पानी में गलाएं। छानकर सुबह खाली पेट पीयें।। बहुत गुणकारी उपचार है।








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27.11.10

किडनी अकर्मण्यता (kidney failure) :रक्त में क्रिएटनीन का स्तर बढना: उपचार कैसे करें?

       हमारे गुर्दे रक्त में उपस्थित  अपशिष्ट पदार्थों और जल  को फ़िल्टर कर मूत्र के रूप में बाहर निकालने की क्रिया संपन्न करते हैं। हमारी मांसपेशियों में उपस्थित क्रिएटिन फ़ास्फ़ेटस  के विखंडन से उर्जा उत्पन होती है और इसी प्रक्रिया में अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटनीन बनता है । स्वस्थ गुर्दे अधिकांश क्रिएटनीन को फ़िल्टर कर मूत्र में निष्कासित करते रहते हैं। अगर खून में क्रिएटनीन का स्तर १.५ से ज्यादा हो जाता है तो समझा जाता है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये खून में क्रिएटनीन की मात्रा का परीक्छण करना जरूरी होता है। अब मैं कुछ ऐसे उपाय बताना चाहूंगा जिनको व्यवहार में लाकर रोगी अपने खून मे क्रिटनीन की मात्रा घटा सकते हैं। ये ऊपाय गुर्दे का कार्य-भार कम करते हैं जिससे खून में उपस्थित क्रिएटनीन का लेविल कम होने में मदद मिलती है।  क्रिएटनीनीन कम करने वाले भोजन में प्रोटीन, फ़ास्फ़ोरस,पोटेशियम,नमक की मात्रा बिल्कुल कम होने पर ध्यान दिया जाता है। जिन भोजन पदार्थों में इन तत्वों की अधिकता हो उनका परहेज करना आवश्यक है।

   जब उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ उपयोग नहीं किये जाएंगे तो मांसपेशियों में कम क्रिएटीन मौजूद रहेगा अत: क्रिएटनीन भी कम बनेगा। किडनी को भी अपशिष्ट पदार्थ  को फ़िल्टर करने में कम ताकत लगानी पडेगी जिससे किडनी की तंदुरस्ती में इजाफ़ा होगा। याद रखने योग्य है कि क्रिएटिन के टूटने से ही क्रिएटनीन बनता है।

       एक और जहां उच्च क्रिएटनीन लेविल गुर्दे की गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है वही शरीर में जल की कमी से समस्या और गंभीर हो जाती है। जल की कमी से रक्तगत क्रिएटनीन में वृद्धि होती है। अत: महिलाओं को २४ घंटे में २.५ लिटर तथा पुरुषों को ३.५ लिटर पानी पीने की सलाह दी जाती है। चाय ,काफ़ी में केफ़ीन तत्व ज्यादा होता है जो गुर्दे के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।अत: इनका सर्वथा परित्याग आवश्यक है।

         मूत्र प्रणाली  में कोई संक्रामक रोग हो जाने से भी रक्तगत क्रिएटनीन बढ सकता है। अत: इस विषय में सावधानीपूर्वक इलाज करवाना चाहिये। उच्च रक्त चाप से गुर्दे को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं को नुकसान होता है। इससे भी रक्त गत क्रिएटनीन बढ जाता है। अत: ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के उपाय करना जरूरी है।मेरा ब्लड प्रेशर संबंधी लेख ध्यान से पढें। नमक ३ ग्राम से ज्यादा हानिकारक है।

    नियमित २० मिनिट व्यायाम करने और ३ किलोमिटर घूमने से खून में क्रिएटनीन की मात्रा काबू  करने  में मदद मिलती है।व्यायाम और घूमने के मामले में बिल्कुल  आलस्य न करें ।

   मधुमेह रोग धीरे -धीरे गुर्दे को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिये यह रोग भी रक्तगत क्रिएटनीन को बढाने में अपनी भूमिका निर्वाह करता है। खून में शर्करा संतुलित बनाये रखने के उपाय आवश्यक हैं। डायबीटीज पर मेरा लेख पढें और तदनुसार  उपाय करें।

       प्रोटीन हमारे शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों के निर्माण में उपयोग होता है। इससे रोगों के विरुद्ध लडने में भी मदद मिलती है। जब प्रोटीन शारीरिक क्रियाओं के लिये टूटता है तो इससे यूरिया अपशिष्ट पदार्थ बनता है। अकर्मण्य अथवा  क्छतिग्रस्त किडनी इस यूरिया को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती है। खून में यूरिया का स्तर बढने पर क्रिएटनीन भी बढेगा । मांस में और अंडों में किडनी के लिये सबसे ज्यादा हानिकारक प्रोटीन पाया जाता है।अत: किडनी रोगी को ये भोजन पदार्थ नहीं लेना चाहिये। प्रोटीन की पूर्ति थोडी मात्रा में दालो के माध्यम से कर सकते हैं।

   किडनी के सुचारु कार्य नहीं करने से खून में पोटेशियम का लेविल बहुत ज्यादा बढ जाता है। पोटेशियम की अधिकता से अचानक हार्ट अटेक होने की सम्भावना बढ जाती है। अगर लेबोरेटरी जांच में रक्त में पोटेशियम बढा हुआ पाया जाए तो कम पोटेशियम वाला खाना लेना चाहिये। खीरा ककडी,गाजर,सेव,अंगूर और चावल कम पोटेशियम वाले भोजन  पदार्थ हैं । केला,संतरा,आलू का उपयोग वर्जित है।इनमे अधिक पोटेशियम पाया जाता है।लेकिन अगर पोतेशियम वांछित स्तर का हो तो इन फ़लों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

   किडनी अकर्मण्यता एक मुश्किल से काबू में आने वाला रोग है। आधुनिक चिकित्सक उपयुक्त एन्टिबायोटिक्स का प्रयोग कर बढे हुए सिरम क्रिएटनीन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। योग्य और अनुभवी चिकित्सक के मार्गदर्शन में मेरे बताये उपायों पर पूरी सावधानी के साथ  अमल करने से क्रिएटनीन लेविल में वांछित सुधार होगा और किडनी फ़ैलियर  की स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।

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18.11.10

मोटापा, पेट (तोंद) की चर्बी निवारण के कुदरती पदार्थों के उपचार

मोटापा के कारण--



१) शरीर की आवश्यक्ता से ज्याद केलोरी वाला भोजन खाना।



२) मेटाबोलिस्म(चयापचय)की दर कम होना।



३)थायराईड अथवा  पीयूष ग्रंथि( पिचुट्री) के विकार।



४) अधिक समय बैठक का जीवन।



५) हार्मोन का असंतुलन होना।



शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करने के कुदरती उपचार-



१)  चर्बी घटाने के लिये व्यायाम बेहद आवश्यक उपाय है।एरोबिक कसरतें लाभप्रद होती हैं। आलसी जीवन शैली से मोटापा बढता है। अत: सक्रियता बहुत जरूरी है।



२) शहद मोटापा निवारण के लिये अति महत्वपूर्ण पदार्थ है। एक चम्मच शहद आधा चम्मच नींबू का रस गरम जल में मिलाकर लेते रहने से शरीर की अतिरिक्त चर्बी नष्ट होती है। यह दिन में ३ बार लेना कर्तव्य है।



३)  पत्ता गोभी(बंद गोभी) में चर्बी घटाने के गुण होते हैं। इससे शरीर का मेटाबोलिस्म ताकतवर बनता है। फ़लत: ज्यादा केलोरी का दहन होता है।  इस प्रक्रिया में चर्बी समाप्त होकर मोटापा निवारण में मदद मिलती है।



४)  पुदीना में मोटापा विरोधी तत्व पाये जाते हैं। पुदीना रस एक चम्मच २ चम्मच शहद में मिलाकर लेते रहने से  उपकार होता है।



५)  सुबह उठते ही २५० ग्राम टमाटर का रस २-३ महीने तक पीने से  शरीर की वसा  में कमी होती है।



६) गाजर का रस मोटापा कम करने में उपयोगी है। करीब ३०० ग्राम गाजर का रस दिन में किसी भी समय लेवें।



७) एक अध्ययन का निष्कर्ष आया है कि वाटर थिरेपी मोटापा की समस्या हल करने में कारगर सिद्ध हुई है। सुबह उठने के बाद प्रत्येक घंटे के फ़ासले पर २ गिलास पानी पीते रहें। इस प्रकार दिन भर में कम से कम २० गिलास पानी पीयें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे और चयापचय प्रक्रिया(मेटाबोलिस्म) तेज होकर ज्यादा केलोरी का दहन होगा ,और शरीर की चर्बी कम होगी। अगर २  गिलास के बजाये ३ गिलास पानी प्रति घंटे पीयें तो और भी तेजी से मोटापा निवारण होगा।



८)  कम केलोरी वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग करें। जहां तक आप कम केलोरी वाले भोजन की आदत नहीं डालेंगे ,मोटापा निवारण दुष्कर कार्य रहेगा। अब मैं ऐसे भोजन पदार्थ निर्देशित करता हूं जिनमें नगण्य केलोरी होती है। अपने भोजन में ये पदार्थ ज्यादा शामिल करें--



नींबू

जामफ़ल (अमरुद)

अंगूर

सेवफ़ल

खरबूजा

जामुन

पपीता

आम

संतरा

पाइनेपल

टमाटर

तरबूज

बैर

स्ट्राबेरी

सब्जीयां जिनमें नहीं के बराबर केलोरी होती है--

पत्ता गोभी

फ़ूल गोभी

ब्रोकोली

प्याज

मूली

पालक

शलजम

सौंफ़

लहसुन

९)  कम नमक,कम शकर उपयोग करें।



१०) अधिक वसा युक्त भोजन पदार्थ से परहेज करें।  तली गली चीजें इस्तेमाल करने से चर्बी बढती है। वनस्पति घी हानिकारक है।



११) सूखे मेवे (बादम,खारक,पिस्ता) ,अलसी के बीज,ओलिव आईल में उच्चकोटि की वसा होती है। इनका संतुलित उपयोग उपकारी है।



१२)  शराब और दूध निर्मित पदार्थ का उपयोग वर्जित है।



१३)  अदरक चाकू से बरीक काट लें ,एक नींबू की चीरें काटकर  दोनो पानी में ऊबालें। सुहाता गरम पीयें। बढिया उपाय है।



१४)  रोज  पोन किलो फ़ल और सब्जी का उपयोग करें।



१५)  ज्यादा कर्बोहायड्रेट वाली वस्तुओं का परहेज करें।शकर,आलू,और चावल में अधिक कार्बोहाईड्रेट होता है। ये चर्बी बढाते हैं। सावधानी बरतें।



१६)  केवल गेहूं के आटे की रोटी की बजाय गेहूं सोयाबीन,चने के मिश्रित आटे की रोटी ज्यादा फ़यदेमंद है।



१७)  शरीर के वजने को नियंत्रित करने में योगासन का विशेष महत्व है। कपालभाति,भस्त्रिका का  नियमित अभ्यास करें।।



१८) सुबह आधा घंटे तेज चाल से घूमने जाएं।  वजन घटाने का सर्वोत्तम तरीका है।



१९) भोजन मे ज्यादा रेशे वाले पदार्थ शामिल करें। हरी सब्जियों ,फ़लों  में अधिक रेशा होता है। फ़लों को छिलके सहित खाएं। आलू का छिलका न निकालें। छिलके में कई  पोषक तत्व होते हैं।

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13.11.10

कान दर्द,कान पकना: कुदरती पदार्थों से सरल उपचार

कर्ण शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। इसकी रचना जटिल  और अत्यंत नाजुक  है। कान दर्द (earache) का मुख्य कारण युस्टेशियन नली में अवरोध  पैदा होना   है। यह नली गले  से शुरु होकर  मध्यकर्ण को मिलाती है। यह नली निम्न कारणों से अवरुद्ध हो सकती है--

१)  सर्दी लग जाना।

२) लगातार तेज और कर्कश ध्वनि

३) कान में चोंट लगना

४) कान में कीडा घुस जाना या संक्रमण होना।

५) कान में अधिक मैल(वाक्स) जमा होना।

६) नहाते समय कान में पानी प्रविष्ठ होना।

   बडों के बनिस्बत छोटे बच्चों को कान दर्द अक्सर हो जाता है। बच्चों मे प्रतिरक्छा तंत्र अविकसित रहता है और युस्टेशियन नली भी छोटी होती है अत:  इसके आसानी से जाम होने के ज्यादा अवसर होते हैं।  रात के वक्त कान दर्द अक्सर बढ जाया करता है। कान में किसी प्रकार का संक्रमण होने से पहिले तो कान की पीडा होती है और इलाज नहीं करने पर कान में पीप पडने का रोग हो जाता है।

     कान दर्द निवारक कुदरती पदार्थों के उपचार नीचे लिखे जाते हैं-

१)  दर्द वाले कान में हायड्रोजन पेराक्साइड की कुछ बूंदे  डालें। इससे कान में जमा मैल( वाक्स) नरम होकर बहार निकल जाता है।  अगर कान में कोइ संक्रमण होगा तो भी यह उपचार उपकारी रहेगा। हायड्रोजन में उपस्थित आक्सीजन जीवाणुनाशक होती है।

२)  लहसुन संस्कारित तेल कान पीडा में हितकर है। १० मिलि तिल के तेल में ३ लहसुन की कली पीसकर डालें और इसे  किसी बर्तन में गरम करें। छानकर शीशी में भरलें। इसकी  ४-५ बूंदें रुग्ण कान में टपकादें। रोगी १० मिनिट तक लेटा रहे। फ़िर इसी प्रकार दूसरे कान में भी दवा डालें। कान दर्द में लाभ प्रद नुस्खा है।

३)  जेतुन का तेल मामूली गरम करके कान में डालने से दर्द में राहत होती है।

४)  मुलहठी कान दर्द में उपयोगी है। इसे घी में भूनें । बारीक पीसकर पेस्ट बनाएं। इसे कान के बाह्य भाग में लगाएं। कुछ ही मिनिट में दर्द समाप्त होगा।

५)  बच्चों के कान में पीप होने पर स्वस्थ स्त्री  के दूध की कुछ बूंदें कान में टपकादें। स्त्री के दूध में प्रतिरक्छा तंत्र को मजबूत करने के गुण विध्यमान होते हैं। उपकारी उपचार है।

६)  कान में पीप होने पर प्याज का रस लाभप्रद उपाय है। प्याज का रस गरम करके कान में २-४ बूंदे डालें। दिन में ३ बार करें। आशातीत लाभकारी उपचार है।

७) अजवाईन का तेल  और तिल का तेल १:३ में मिक्स करें। इसे मामूली गरम करके कान में २-४ बूंदे टपकादें। कान दर्द में उपयोगी है।

८) पांच ग्राम मैथी के बीज एक बडा चम्मच तिल के तेल में गरम करें। छानकर  शीशी में भर लें। २ बूंद दवा और २ बूद दूध कान में टपकादें। कान पीप का उम्दा इलाज माना गया है।

९)  तुलसी की कुछ पत्तिया और लहसुन की एक कली पीसकर पेस्ट बनालें। इसे गरम करें। कान में इस मिश्रण का रस २-३ बूंद टपकाएं। कान में डालते समय रस सुहाता गरम होना चाहिये। कान दर्द का तत्काल लाभप्रद उपचार है।

१०)  कान दर्द और पीप में पेशाब की उपयोगिता सिद्ध हुई है। ताजा पेशाब ड्रापर में भरकर कान में डालें,उपकार होगा।

११)  मूली कान दर्द में हितकारी है। एक मूली के बारीक टुकडे करलें । सरसों के तेल में पकावें। छानकर शीशी में भर लें ।कान दर्द में इसकी २-४ बूंदे टपकाने से आराम मिल जाता है।

१२) गरम पानी में सूती कपडा भिगोकर निचोडकर ३-४ तहें बनाकर कान पर सेक के लिये रखें।  कान दर्द परम उपकारी उपाय है।

१३)  सरसों का तेल गरम करें । सुहाता गरम तेल की २-४ बूंदे कान में टपकाने से कान दर्द में तुरंत लाभ होता है।

१४)  सोते वक्त सिर के नीचे बडा तकिया रखें। इससे युस्टेशियन नली में जमा श्लेष्मा नीचे खिसकेगी और नली साफ़ होगी। मुंह में कोई चीज चबाते रहने से भी नली का अवरोध हटाने में मदद मिलती है।

१५)   केले की पेड की हरी छाल निकालें। इसे गरम करें  सोते वक्त इसकी ३-४ बूंदें कान में डालें । कान दर्द  की उम्दा दवा है।

7.11.10

निद्राल्पता (इन्सोम्निआ) की कुदरती पदार्थों से चिकित्सा

        नींद की कमी होना या निद्राहीनता की स्थिति को आधुनिक चिकित्सा में  इन्सोम्निआ अथवा स्लीप डिसओर्डर कहते हैं। शरीर की क्रियाओं के संतुलित संचालन हेतु नींद की महता निर्विवाद मानी गई है। नींद से तनाव और चिंताओं का शमन होता है। वयस्क व्यक्ति के लिये ७ से ९ घंटे की नींद जरुरी है। हर इन्सान को जीवन में कभी न कभी निद्राहीनता की तकलीफ़ से रुबरू होना पडता है। निद्राहीनता से मस्तिष्क को वांछित आराम नहीं मिल पाता है जिससे दैनिक गतिविधियों में बाधा पडती है। आधुनिक चिकित्सा में निद्राल्पता की चिकित्सा के लिये कई दवाएं मौजूद हैं लेकिन इन दवाओं के शरीर पर अवांछित प्रभाव भी देखने में आ रहे हैं। अत: निद्राल्पता का कुदरती एवं घरेलू पदार्थों से इलाज  करना  उचित है।

1)  पोस्तदाना (पोपी सीड्स) सुबह पानी में गला दें शाम को थोडा सा पानी डालकर मिक्सर में चलाकर करीब ४० मिलि दूध बनालें। इसमें उचित  मात्रा में शकर मिलाकर रात को सोते वक्त पियें। निद्राहीनता का बेहद कारगर  उपचार है।

२)  रात को सोते वक्त एक गिलास गाय का मामूली गरम मीठा दूध पीना हितकर है।

३)  घी और मक्खन  का उपयोग निद्राहीनता में लाभकारी हैं।

४)  जायफ़ल ३-४ नग पीसकर पावडर बनालें।  सोने से पहिले पानी के साथ लें॥गुणकारी उपचार है।

५)  नियमित समय पर सोना और नियमित समय पर उठने का नियम बनाकर उस पर सख्ती से अमल करे। ९ बजे रात को सोना और सुबह ५ बजे उठना श्रेष्ठ नियम है।

६)  रात को टीवी देखने से परहेज करें।

७)  केला,दही, हरी सब्जियां नींद की कमी में उपकारी है।

८)  दिन के समय ज्यादा नींद लेने से रात की नींद में व्यवधान पडता है। अत: दिन में लंबी नींद वर्जित है।

९)  केफ़िन तत्व की प्रधानता वाली वस्तुओं का सेवन बिल्कुल कम कर दें । चाय और काफ़ी में केफ़िन तत्व ज्यादा होता है। अत: इनका उपयोग बिल्कुल कम से कम करें।

१०)  शराब पीने और धूम्रपान करने से शरीर के तरल पदार्थों पर विपरीत असर होता है जिससे ऊनींदापन और निद्राहीनता पैदा होती है।  अत: इनका त्याग आवश्यक है।

११)  बाबा रामदेव के बताये अनुलोम-विलोम एवं कपाल भार्ती प्राणायाम से नींद की समस्या काफ़ी हद तक समाधान हो जाती है।

१२) नींद की समस्या ग्रामीण लोगों की तुलना में शहरी लोगों में ज्यादा दिखाई देती है। शरीर श्रम  नहीं करने वालों को पर्याप्त नींद नहीं आती है। व्यवसाय संबंधी चिंता और घरेलू क्लेश से भी निद्राहीनता पैदा होती है।

१३)  नियमित रूप से व्यायाम करना और सुबह के वक्त ३-४ किलोमिटर घूमना  अत्यंत उपादेय है।

१४)  गरम पानी में तोलिया भिगोकर,निचोडकर  उसे रीढ की हड्डी पर रखें। गरम जल में दोनों पैरों को १५ मिनिट तक डुबाकर रखें। सोने से पहिले ये उपाय करने से अच्छी नींद आती है।

१५)  दो संतरे के रस में २० ग्राम शहद और ५० मिलि पानी मिलाकर  रात को सोते वक्त पीने से अनिद्रा का निवारण होता है।

१६)  अधिक उम्र के लोगों को बनिस्बत कम अवधि की नींद आती है। यह कोई रोग नहीं है।

1.10.10

पेचिश( डिसेन्ट्री) का होम रेमेडीज,घरेलू पदार्थों से करें ईलाज।

पेचिश रोग की जानकारी:
पेचिश बडी आंत का रोग है। इस रोग में  बार-बार लेकिन थोडी मत्रा में मल होता है।  बडी आंत में सूजन और घाव हो जाते हैं।दस्त होते समय पेट में मरोड के साथ कष्ट होता है। दस्त पतला मद्धम रंग का होता है।दस्त में आंव और रक्त भी मिले हुए हो सकते हैं। रोग की बढी हुई स्थिति में रोगी को ज्वर भी आता है और शरीर में पानी की कमी(डिहाईड्रेशन) हो जाती है।
    चूंकि इस रोग में शरीर में पानी की कमी हो जाने से अन्य कई व्याधियां पैदा हो सकती हैं ,अत: सबसे ज्यादा महत्व की बात यह है कि रोगी पर्याप्त जल पीता रहे। यह संक्रामक रोग है और परिवार के अन्य लोगों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। बीमारी ज्यादा लंबी चलती रहने पर(क्रोनिक डिसेन्टरी) शरीर का सामान्य स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित होता है । कभी कब्ज हो जाती है तो कभी पतले दस्त होने लगते हैं। दस्त में सडांध और दुर्गध होती है। ज्वर १०४ से १०५ फ़ारेनहीट तक पहुंच सकता है।
    इस रोग का  निम्न वर्णित घरेलू पदार्थों  की होम रेमेडीज से निरापद ,सफ़ल उपचार किया जा सकता है-

१)   दो चम्मच धनिया पीसकर एक कप पानी में ऊबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में पीयें ऐसा दिन में तीन बार करना चाहिये। कुछ ही दिनो में पेचिश ठीक होगी।

२)   अनार के सूखे छिलके दूध में ऊबालें। जब तीसरा भाग रह जाए तो उतारलें। यह नुस्खा दिन में तीन बार प्रयोग करने से पेचिश से छुटकारा मिलता है।

३)  हरा धनिया और शकर धीरे-धीरे चबाकर खाएं। पेचिश में फ़ायदा होता है।

४)  खट्टी छाछ में बिल्व फ़ल(बिल्ले) का गूदा मसलकर अच्छी तरह मिला दें। यह मिश्रण कुछ दिनों तक प्रयोग करने से पुरानी पेचिश में भी लाभ होते देखने में आया है।

५)  अदरक का रस १० ग्राम , गरम पानी में मिलाएं। इसमें एक चम्मच अरंडी का तेल मिलाकर पी जाएं। कुछ रोज में पेचिश ठीक होगी।

६)  कम दवाब पर एनिमा दिन में २-३ बार लेना लाभकारी है। इससे बडी आंत के विषैले पदार्थ  का निष्कासन होता है।

७)  तेज मसालेदार भोजन पदार्थ बिल्कुल न लें।

८)  पेट पर गरम पानी की थेली रखने से पेचश रोग में लाभ होता है।

९)  तरल भोजन लेना उपकारी है। कठोर भोजन पदार्थ शने-शने प्रारंभ करना चाहिये।

१०)  मूंग की दाल और चावल की बनी खिचडी परम उपकारी भोजन है। इसे दही के साथ खाने से पेचिश  शीघ्र नियंत्रित होती है।

११)  एक चम्मच मैथी के बीजों का पावडर एक कटोरी दही में मिलाकर सेवन करें। दिन में तीन बार कुछ दिन लेने से पेचिश का निवारण होता है।

१२)  कच्चे बिल्व फ़ल का गूदा निकालें इसमें गुड या शहद मिलाकर सेवन करने से कुछ ही दिनों में पेचिश रोग दूर होता है।

१३)  ३-४  निंबू का रस एक गिलास पानी में ऊबालें । इसे खाली पेट पीना चाहिये। पेचिश का सफ़ल उपचार है।

१४)  २५० ग्राम सौंफ़ के दो भाग करें। एक भाग सौंफ़ को तवे पर भून लें। दोनों भाग आपस में मिला दें। २५० ग्राम शकर को मिक्सर में पावडर बनालें। सौंफ़ और शकर पावडर मिलाकर शीशी में भर लें । यह मिश्रण २ चम्मच दिन में ३-४ बार लेने से पेचिश में उपकार होता है।
१५)  इसबगोल की भूसी २ चम्मच  एक गिलास दही में मिलाएं। इसमे भूना हुआ जीरा  मिलाकर सेवन करना पेचिश रोग में अत्यंत हितकर सिद्ध होता है।
१६)  दो भाग हरड और एक भाग लींडी पीपल लेकर मिलाकर पावडर बनालें। २-३ ग्राम पावडर भोजन उपरांत पानी के साथ लें। पेचिश की बढिया दवा है।
१७)  दो केले १५० ग्राम दही में मिलाकर दिन में दो बार कुछ रोज लेने से पेचिश रोग नष्ट हो जाता है।
१८)  अनार का रस अमीबिक डिसेन्ट्री याने आंव वाली पेचिश में फ़ायदेमंद माना गया है।
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15.9.10

मलेरिया नाशक होम रेमेडीज. how to cure maleria with natural and home remedies?

मलेरिया ज्वर की जानकारी--
मलेरिया ज्वर संसार का सर्वाधिक व्यापक रोग है। हजारो लाखों लोग हर वर्ष इस रोग की चपेट में आ जाते हैं। आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहा जाता है।मलेरिया मुख्यत:तीन प्रकार के परजीवी जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है-
(१) वाईवेक्स
(२) फ़ेल्सीपेरम
(३) मेलेरी
  जब मादा एनोफ़ीलीज मच्छर किसी मलेरिया रोग ग्रस्त  व्यक्ति को काटता है ,तो रोगी व्यक्ति के शरीर से मलेरिया संक्रमित खून खींच लेता है। इस खून में मलेरिया के  जीवाणु होते हैं।फ़िर जब यही मच्छर स्वस्थ्य व्यक्ति को काटता है तो मलेरिया के जीवाणु उसके शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। मच्छर के काटने के प्राय:१० दिवस पश्चात मलेरिया ज्वर का आक्रमण हो जाता है।
    नये मलेरिया बुखार के दौरान  तेज सिर दर्द,जोर की ठंड के साथ  कंप कंपी होना,मांसपेशियों मे भयंकर पीडा होना और बेहद कमजोरी  के लक्छण प्रकट होते हैं बाद में ज्वर उतरते समय पसीना होता है। ज्वर के दौरे में तापमान १०४ डीग्री से भी ज्यादा हो सकता है। जी घबराना और पित्त की कडवी  उल्टी होना भी मलेरिया का प्रमुख लक्छण है।मलेरिया सामान्यत: तीन प्रकार का होता है-
प्रतिदिन निश्चित समय पर चढने वाला ज्वर।
एक दिन छोडकर आने वाला ज्वर। इसे एकांतरा भी कहते हैं।
दो दिन विराम देकर आने वाला मलेरिया ज्वर।
    जहां तक ईलाज का प्रश्न है माडर्न चिकित्सा में कुनेन से बनी दवाएं धडल्ले से व्यवहार में लाई जा रही हैं।लेकिन मलेरिया के जीवाणु अब इन दवाओं के प्रति सहनशीलता प्रकट करने लगे हैं।
       होम रेमेडीज से मलेरिया की चिकित्सा निरापद याने हानि रहित होती है। मलेरिया नाशक नुस्खे निम्न प्रकार हैं--
(१) तीन ग्राम चूना लें।इसे ६० मिलि पानी में घोलें। एक नींबू इसमें निचोडें।  मलेरिया ज्वर की संभावना होने पर यह मिश्रण पीयें। यह नुस्खा प्रतिदिन लेना उत्तम है।
(२)  चिरायता मलेरिया ज्वर की प्रसिद्ध औषधि मानी गई है। इसके उपयोग से रोगी का तापमन नीचे आ जाता है। एक पाव गरम पानी में १५ ग्राम चिरायता मिलाएं,कुछ लौंग और दालचिनी भी मिला दें। २० मिलि मात्रा में दिन में ३ बार देने से मलेरिया ज्वर में उपकार होता है।
(३)  गरम पानी में नींबू का रस मिलाकर पीने से ज्वर की तीव्रता घट जाती है।
(४)  थोडी सी फ़िटकरी तवे पर भूनकर चूर्ण बनालें।  आधा चम्मच पावडर बुखार आने के ३ घंटे पहिले पानी से पीयें। बाद में हर दूसरे घंटे पर यह दवा लेते रहने से ज्वर नष्ट हो जाता है।
(५)  जब बुखार न हो ,१० ग्राम तुलसे के पत्तों के रस में आधा चम्मच काली मिर्च का पावडर मिलाकर चाट लें। बहुत फ़ायदेमंद उपाय है। 
६) एक गिलास पानी लें। इसमें एक चम्मच दालचिनी,एक चम्मच शहद और  आधा चम्मच काली मिर्च का पावडर मिलाकर आंच पर ऊबालें। ठंडा होने पर पीयें। आशातीत लाभकारी नुस्खा है।
(७)  धतूरा की नई कोंपल २ नग लेकर गुड के साथ अच्छी तरह मिश्रित करलें। फ़िर इसकी गोली बनालें। ऐसी गोली दिन में २ बार लेने से मलेरिया  का निवारण हो जाता है।
(८)  मलेरिया ज्वर की अवधि में अन्न का भोजन न लें। सेवफ़ल और पानी लेते रहें। ज्वर से शीघ्र मुक्ति मिलेगी।
(९) एक गिलास पानी में १० ग्राम अदरक  और १० ग्राम मुनक्का डालकर खूब ऊबालें कि आधा रह जाय। ठंडा होने दें । यह काढा पीने से ज्वर नियंत्रण में आ जाता है।
(१०) तेज ज्वर की हालत में ललाट पर ठंडे पानी की पट्टी रखने से तापमान नीचे आ जाता है। ठंडे पानी में गिला किया टावेल  सारे शरीर पर लपेटने से भी तुरंत लाभ मिलता है।