शनिवार, 11 जून 2016

लकवा के अचूक उपचार Domestic treatment of paralysis

                                            


आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मतानुसार लकवा मस्तिष्क के रोग के कारण प्रकाश में आता है।इसमें अक्सर शरीर का दायां अथवा बायां हिस्सा प्रभावित होता है। मस्तिषक की नस में रक्त का थक्का जम जाता है या मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिनी से रक्तस्राव होने

लगता है। शरीर के किसी एक हिस्से का स्नायुमंडल अचानक काम करना बंद कर देता है याने उस भाग पर नियंत्रण नहीं रह जाता है।दिमाग में चक्कर आने और बेहोश होकर गिर पडने से अग क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

हाईब्लड प्रेशर भी लकवा का कारण हो सकता है। सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर २२० से ज्यादा होने पर लकवा की भूमिका तैयार हो सकती है।
पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अर्बुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।



लकवा के कारण-

लकवा हमेशा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र जिसमें मस्तिष्क एवं स्पाइरल कार्ड शामिल हैं में गड़बड़ी अथवा पेरिफेरल नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार है जिसके कारण होता है। निम्न कारण जो तंत्रिका की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं जिसके कारण पक्षाघात होता है।1: स्ट्रोक- स्ट्रोक लकवा का मुख्य कारण है। इसमें मस्तिष्क का निश्चित स्थान कार्य करना बंद कर देता है। जिससे शरीर को उचित संकेत भेज एवं प्राप्त नहीं कर पाते हैं। स्ट्रोक हाथ व पैर में लकवा की सम्भावना ज्यादा रहती है।
ट्यूमर: विभिन्न प्रकार के ट्यूमर मस्तिष्क अथवा स्पाइनल कार्ड में पाए जाते हैं वह वहां के रक्त प्रवाह को प्रभावित करके लकवा उत्पन्न करते हैं।
ट्रामा अथवा चोट: चोट के कारण अंदरूनी रक्त प्रवाह कारण मस्तिष्क एवं स्पाइनल कार्ड में रक्त प्रवाह कम हो जाता है जिससे लकवा हो सकता है।सिरेबरल पैल्सि : ये बच्चों में जन्म के समय होती हे जिसके कारण लकवा हो सकता है। इसके अतिरिक्त निम्न स्थितियां स्पाइनल कार्ड की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं।
1: स्लिप डिस्क

2: न्यूरोडिजनरेटिक डिस्क

3:स्पोन्डोलाइसिस

इसके अतिरिक्त लकवा के अन्य कारण भी हो सकते हैं।

लकवा के प्रकार -
लकवा प्रमुख रूप से इतने प्रकार का हो सकता है।
*लकवा जिस अंग को प्रभावित करता है उसके अनुसार उसका विभाजन किया जाता है।
*मोनोप्लेजिया: इसमें शरीर का एक हाथ या पैर प्रभावित होता है।
*डिप्लेजिया: जिनमें शरीर के दोनों हाथ या पैर प्रभावित होते हैं।
*पैराप्लेजिया: जिसमें शरीर के दोनों धड़ प्रभावित हो जाते हैं।
*हेमिप्लेजिया: इसमें एक तरफ के अंग प्रभावित होते हैं।
*क्वाड्रिप्लेजिया: इसमें धड़ और चारों हाथ पैर प्रभावित होते हैं।
*लकवा का आक्रमण होने पर रोगी को किसी अच्छे अस्पताल में सघन चिकित्सा कक्ष में रखना उचित रहता है।इधर उधर देवी-देवता के चक्कर में समय नष्ट करना उचित नहीं है। अगर आपकी आस्था है तो कोई बात नहीं पहिले बडे अस्पताल का ईलाज करवाएं बाद में आस्थानुसार देवी-देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त करलें।
*लकवा पडने के बाद अगर रोगी हृष्ट-पुष्ट है तो उसे ५ दिन का उपवास कराना चाहिये। कमजोर शरीर वाले के लिये ३ दिन के उपवास करना उत्तम है। उपवास की अवधि में रोगी को सिर्फ़ पानी में शहद मिलाकर देना चाहिये। एक गिलास जल में एक चम्मच शहद मिलाकर देना चाहिये। इस प्रक्रिया से रोगी के शरीर से विजातीय पदार्थों का निष्कासन होगा, और शरीर के अन्गों पर भोजन का भार नहीं पडने से नर्वस सिस्टम(नाडी मंडल) की ताकत पुन: लौटने में मदद मिलेगी।रोगी को सीलन रहित और तेज धूप रहित कमरे मे आरामदायक बिस्तर पर लिटाना चाहिये।
*उपवास के बाद रोगी को कबूतर का सूप देना चाहिये। कबूतर न मिले तो चिकन का सूप दे सकते हैं। शाकाहारी रोगी मूंग की दाल का पानी पियें। रोगी को कब्ज हो तो एनीमा दें।
*लहसुन की ३ कली पीसकर दो चम्मच शहद में मिलाकर रोगी को चटा दें।
*१० ग्राम सूखी अदरक और १० ग्राम बच पीसलें इसे ६० ग्राम शहद मिलावें। यह मिश्रण रोगी को ६ ग्राम रोज देते रहें।
*लकवा रोगी का ब्लड प्रेशर नियमित जांचते रहें। अगर रोगी के खून में कोलेस्ट्रोल का लेविल ज्यादा हो तो ईलाज करना वाहिये।रोगी तमाम नशीली चीजों से परहेज करे। भोजन में तेल,घी,मांस,मछली का उपयोग न करे।









    बरसात में निकलने वाला लाल रंग का कीडा वीरबहूटी लकवा रोग में बेहद फ़ायदेमंद है। बीरबहूटी एकत्र करलें। छाया में सूखा लें। सरसों के तेल पकावें।इस तेल से लकवा रोगी की मालिश करें। कुछ ही हफ़्तों में रोगी ठीक हो जायेगा। इस तेल को तैयार करने मे निरगुन्डी की जड भी कूटकर डाल दी जावे तो दवा और शक्तिशाली बनेगी।एक बीरबहूटी केले में मिलाकर रोजाना देने से भी लकवा में अत्यन्त लाभ होता है।
    सफ़ेद कनेर की जड की छाल और काला धतूरा के पत्ते बराबर वजन में लेकर सरसों के तेल में पकावें। यह तेल लकवाग्रस्त अंगों पर मालिश करें। अवश्य लाभ होगा।
    लहसुन की 4 कली दूध में उबालकर लकवा रोगी को नित्य देते रहें। इससे ब्लडप्रेशर ठीक रहेगा और खून में थक्का भी नहीं जमेगा।


    लकवा रोगी के परिजन का कर्तव्य है कि रोगी को सहारा देते हुए नियमित तौर पर चलने फ़िरने का व्यायाम कराते रहें। आधा-आधा घन्टे के लिये दिन में ३-४ बार रोगी को सहारा देकर चलाना चाहिये। थकावट ज्यादा मेहसूस होते ही विश्राम करने दें।

    आयुर्वेदिक मत से लकवे की चिकित्सा-
    अगर शरीर का कोई अंग या शरीर दायीं तरफ से लकवाग्रस्त है तो उसके लिए व्रहतवातचिंतामणि रस (वैदनाथ फार्मेसी) की ले ले। उसमे छोटी-छोटी गोली (बाजरे के दाने से थोड़ी सी बड़ी) मिलेंगी। उसमे से एक गोली सुबह ओर एक गोली साँय को शुद्ध शहद से लेवें।
    अगर कोई बायीं तरफ से लकवाग्रस्त है उसको वीर-योगेन्द्र रस (वैदनाथ फार्मेसी) की सुबह साँय एक एक गोली शहद के साथ लेनी है।
    गोली को शहद से कैसे ले? उसके लिए गोली को एक चम्मच मे रखकर दूसरे चम्मच से पीस ले, उसके बाद उसमे शहद मिलकर चाट लें। ये दवा निरंतर लेते रहना है, जब तक पीड़ित स्वस्थ न हो जाए।
    पीड़ित व्यक्ति को मिस्सी रोटी (चने का आटा) और शुद्ध घी (मक्खन नहीं) का प्रयोग प्रचुर मात्र मे करना है। शहद का प्रयोग भी ज्यादा से ज्यादा अच्छा रहेगा।
    लाल मिर्च, गुड़-शक्कर, कोई भी अचार, दही, छाछ, कोई भी सिरका, उड़द की दाल पूर्णतया वर्जित है। फल मे सिर्फ चीकू ओर पपीता ही लेना है, अन्य सभी फल वर्जित हैं।

    लकवा से होने वाली जटिलताए और होम्योपैथी-
    यदि लकवा लम्बे समय तक रहता है तो यह प्रभावित अंग को गम्भीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसके कारण शरीर मात्र अस्थि का ढांचा बन जाता है। रोगी को देखने, सुनने व बोलने में परेशानी होने लगती है।
    गम्भीर लकवाग्रस्त रोगी को चिकित्सालय में भर्ती कराना चाहिए। होम्योपैथी में लकवा का उपचार सम्भव है। होम्योपैथिक उपचार में रोगी के शारीरिक, मानसिक एवं अन्य लक्षणों को दृष्टिगत रखते हुए औषधि का चयन किया जाता है। कुछ दवाएं जो ज्यादा चलनमे है उनमें रस टॉस्क नाम की औषधि है जो शरीर के निचले हिस्से का लकवा इसके अतिरिक्त यदि लकवा गीला होने या नमी स्थानों में रहने से हो, यदि लकवा टाइफाइड के बुखार के बाद हो उसमें लाभकारी होती है। इसमें शरीर अंगों में जकडऩ में हो जाती तथा ये लकवा के पुराने मरीजों को बेहद लाभ पहुंचाता है। बच्चों में होने वाले लकवा में लाभकारी होता है।
    क्रास्टिकम नाम की यह होम्योपैथी दवा ठंड के कारण लकवा मारने या सर्दियों के मौसम में पैरालिसिस का अटैक पडऩे पर प्रभावी हो सकती है। इसके अलावा जीभ चेहरा या गले पर अचानक पडऩे वाले लकवा में भी कारगर साबित होता है।
    बेलाडोना नाम की औषधि से शरीर के सीधी तरफ का लकवा ठीक होता है। इस प्रकार के लकवा से प्रभावित व्यक्ति विक्षिप्त तक हो जाता है। इसमें इसी प्रकार नक्सवोमिका का प्रयोग तब लाभकारी होता है। शरीर का निचला हिस्सा लकवा से प्रभावित हो और उन अंगों हिलाने डुलाने में बहुत जोर लगाना पड़ता हो ऐसे लक्षणों में नक्सवोमिका रामबाण साबित हो सकती है।
    लकवा के उपचार में प्रयुक्त होने वाली अन्य औषधियों में कॉस्टिकम, जैलसिमियम, पल्म्बम,डल्कामारा, सल्फर, काकुलस, नैट्रमम्योर, कैलमिया, अर्जेटम, नाइट्रिकम, एकोमाइट, एल्युमिना आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा लकवाग्रस्त रोगी को ताजा खाना देना चाहिए। इसके अतिरिक्त चावल और गेहूं के साथ ही मौसमी फल भी फायदा करते हैं|
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