शनिवार, 27 मई 2017

होम्योपैथिक औषधि फास्फोरस के लक्षण उपयोग



Phosphorus Homeopathic Medicine 
लक्षण तथा मुख्य-रोग लक्षणों में कमी
स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) खाने से रोगी को आराम
जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना (शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम) नींद से रोगी को आराम
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना मालिश से रोगी की आराम
सहज-स्राव (Bleeding remedy) नमकीन और घी के पदार्थ पसन्द करना
सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना लक्षणों में वृद्धि
रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना ठंडी हवा से रोग-वृद्धि
कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा, और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना वायु-मंडल में एकदम परिवर्तन से रोग-वृद्धि-
गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना मानसिक श्रम से रोग-वृद्धि
न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता बाईं करवट लेटने से वृद्धि-
* स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) – स्नायु-संस्थान पर प्रभाव करने वाली फास्फोरस के बराबर दूसरी कोई औषधि नहीं है। स्नायु-संस्थान का केन्द्र मस्तिष्क तथा मेरु-दंड (Spinal cord) है। इन पर जब रोग आक्रमण करता है तब यकायक लक्षण प्रकट होते हैं। रोगी एकदम नि:सत्व, पक्षाघात हो जाता है, बेहोशी आ जाती है, एकदम पसीना आने लगता है। ये सब मस्तिष्क अथवा स्नायु-संस्थान पर रोग के आक्रमण के लक्षण हैं, और इन लक्षणों के होने पर फास्फोरस का ध्यान में रखना उचित है।
* जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना -
शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम–
 इस प्रकार मस्तिष्क तथा मेरु-दण्ड पर रोग का आक्रमण तब होता है जब जीवनी-शक्ति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच जाती है। निम्नतम स्तर पर पहुंचने के अनेक कारण हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, दु:ख, शोक, चिंता, दिन-रात मानसिक कार्य में लगे रहने से उसमें अति कर देना या व्यभिचार आदि कुकर्मों में जीवनी-शक्ति का ह्रास कर देना आदि ऐसे कारण हैं जिनसे जीवनी-शक्ति निम्नतम-स्तर में पहुंच जाती है और यकायक शक्तिहीनता, कंपन, अंगों का सुन्न पड़ जाना, एकदम पसीना आना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। फास्फोरस का इस अवस्था पर विशेष स्वास्थ्यप्रद प्रभाव है। इससे स्नायुओं का पोषण होने लगता है, उनका क्षीण होना रुक जाता है। इसलिये इसे ‘स्नायु की औषधि’ (Nerve remedy) कहा जाता है। जीवनी-शक्ति के निम्न-स्तर पर होने की दशा में कोई छोटा-सा भी कारण शारीरिक तथा मानसिक क्षीणता को उत्पन्न कर सकता है और जरा-सी ही मानसिक-आघात से मनुष्य ढह सकता है।
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना – 



जीवनी-शक्ति को निम्नतम-स्तर पर पहुंचने का प्रथम-प्रकाश शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में जलन के रूप में प्रकट होता है। यह जलन विशेष तौर पर त्वचा में होती है। रोगी खासकर प्रात: काल इस जलन से बेचैन रहता है, घबराया रहता है, चिंताकुल रहता है, टिक कर बैठ नहीं सकता, लगातार हरकत करता रहता है, कभी यहाँ बैठता है, कभी वहां, न कहीं चैन से खड़ा रह सकता है, न कहीं चैन से बैठ सकता है, कहीं टिक नहीं सकता। जिंकम में भी न टिकने का लक्षण है, परन्तु न टिक सकने की बेचैनी उसके पैरों तक सीमित रहती है, वह पैर हिलाता रहता है, परन्तु फास्फोरस तो समस्त शरीर से बेचैन रहता है, बेचैनी सिर्फ पैरों में ही सीमित नहीं रहती।

फास्फोरस की जलन विशेष तौर पर रीढ़ की हड्डी में पायी जाती है। रीढ़ की हड्डी के भिन्न-भिन्न स्थानों में रोगी को जलन अनुभव होती है, खास करके दोनों फलकों के बीच के स्थान पर। लाइको में भी फलकों के बीच के स्थान पर जलन पायी जाती है। लाइको में कन्धों के बीच में जलन ऐसी अनुभव होती है जैसे राई का प्लास्तर लगा हो। रीढ़ की हड्डी के अलावा पीठ में भी जलन नीचे से ऊपर को जाती है। इस प्रकार की जलन इसमें अन्य किसी औषधि की अपेक्षा अधिक है। मेरु-दंड (Spinal cord) के रोगों में फास्फोरस का अन्य औषधियों की अपेक्षा प्रमुख स्थान है।
जलन में फास्फोरस की सल्फर तथा आर्सेनिक से तुलना- 
जलन में मुख्य तौर पर तीन औषधियों की तरफ ध्यान दिया जाता है। वे है – सल्फर, आर्सेनिक तथा फास्फोरस। जलन के पुराने रोगों में सल्फर और नवीन रोगों में आर्सेनिक उपयोगी है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि आर्सेनिक जलन के पुराने रोगों में लाभ नहीं करता। अगर घाव बहुत पुराना हो जाय सड़ने लगे, जलन करता हो, तो पुराना होने पर भी उसमें आर्सेनिक लाभ करेगा। फास्फोरस की जलन इतनी ही तीव्र होती है जैसी सल्फर या आर्सेनिक की, परन्तु भेद यह है कि आर्सेनिक की जलन में सेंक से रोगी को आराम पहुंचता है, जो बात सल्फर और फास्फोरस में नहीं है। फास्फोरस की जलन सिर्फ स्नायविक हो सकती है। जहां कहीं भी तीव्र जलन का लक्षण हो, वहां फास्फोरस को प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिये। सिकेल कौर में भी जलन है, परन्तु उसकी जलन आर्सेनिक से उल्टी होती है। आर्सेनिक तो गर्मी पसन्द करता है, परन्तु सिकेल गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़ा तक अपने पर नहीं रख सकता। सल्फर की जलन प्राय: पाँव के तलुवों में अनुभव होती है, बिस्तर में जाते ही रोगी के पांव के तलुवे जलने लगते हैं, वह बिस्तर में पांव रखने के लिये ठंडी जगह ढूंढा करता है या बिस्तर से पांव बाहर निकाल लेता है, फास्फोरस की जलन विशेष तौर से हथेलियों में होती है। जैसे सल्फर का रोगी पांवों को नहीं ढक सकता, वैसे फास्फोरस का रोगी हाथों को नहीं ढक सकता। जलन हाथों से शुरू होकर शरीर के अन्य स्थानों पर, चेहरे तक भी फैल जाती है।
*सहज-स्राव (Bleeding remedy) – 
इस औषधि के रोगी को रक्त-स्राव झट से होने लगता है। जरा-सी चोट से खून निकलने लगता है, जमता नहीं। किसी-किसी रोगी के लिये रक्त-स्राव की यह प्रकृति अत्यन्त खतरनाक होती है। उसका रक्त बहता ही जाता है, इसी से उसकी मृत्यु तक हो सकती है। फास्फोरस प्रकृति की स्त्री को रक्त-स्राव तो होना ही चाहिये, अगर माहवारी का रक्त-स्राव नहीं होता, तो किसी और जगह से खून बह निकलेगा। नाक से, फेफड़ों से, किसी भी स्थान से रक्त बह-निकलना चाहिये अगर वहां से न निकलेगा, तो दूसरी जगह से निकलेगा।



*कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा- 
और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना – कब्ज में मल खुश्क, लम्बा, कुत्ते के मल-जैसा, चिमड़ा और बहुत कांखने से निकलता है। अगर रोगी को दस्त आये तो ऐसे लगता है मानो पानी का नलका धड़ाके से खुल गया और नल के पानी की तरह बहने लगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो मल अपने-आप गुदा-प्रदेश से रिसा करता है। हनीमैन ने लिखा है कि यह औषधि उन रोगियों को बहुत लाभ पहुंचाती है, जो पतली टट्टी या अतिसार (दस्तों) के पुराने मरीज होते हैं।
* गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना –
 गर्म कमरे में ठंडी हवा में जाने से खांसी उठने लगे तो फास्फोरस, और ठंडक से गर्म कमरे में जाने से खांसी आये तो ब्रायोनिया औषधि है। गला पक जाता है, दुखने लगता है, बोला नहीं जाता। गायकों तथा व्याख्याताओं के गला बैठ जाने और दुखने में फास्फोरस लाभप्रद है। डॉ० फ़ैरिंगटन लिखते हैं कि जब खाँसी में गले की बहुत गहराई से जोर लगाकर कफ उठाना पड़े, तब फास्फोरस से लाभ होता है।
*न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – 
न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता – हम लाइकोपोडियम के प्रकरण में लिख आये हैं कि न्यूमोनिया में तीन अवस्थाएं होती हैं – पहली अवस्था ‘शोथावस्था’ (Congestive stage) की होती है जिसमें फेफड़े में शोथ हो जाती है; दूसरी अवस्था ‘स्थूलावस्था’ (Hepatization) की है जिसमें फेफड़ा कफ से भर जाता और कड़ा पड़ जाता है; तीसरी अवस्था ‘विपाकावस्था’ (Stage of Resolution) की है जिसमें अगर कफ घुल गया तो रोगी अच्छा हो जाता है, न घुला तो कफ न निकल सकने के कारण मर जाता है। तीसरी अवस्था में रोगी सांस के लिये छटपटाता है और उसके नथुने पंखे की तरह सांस लेने के लिये चलते हैं। इस अवस्था में लाइको चमत्कारी लाभ करता है।
* सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना – 
रोगी अनुभव करता है कि उसकी सम्पूर्ण पाक-स्थली खाली हो गई है, उसमें कुछ नही रहा। रोगी बिना खाये नहीं रह सकता, रात को भी उठकर खाता है। भूख को क्षण भर के लिये भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। अभी खाया है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख को अनुभव करता है। खाने से उसका कष्ट मिलता है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख का अनुभव होता है। इस प्रकार भूख का अनुभव होना आयोडाइन, चेलिडोनियम, पेट्रोलियम तथा ऐनाकार्डियम में पाया जाता है। परन्तु भूख अनुभव होने के अतिरिक्त रोगी को पेट का खाली-खाली होने का अनुभव होना भी फास्फोरस का लक्षण है। पेट के खाली-खाली होने का लक्षण इग्नेशिया, कैलि कार्ब, सीपिया तथा स्टैनम में भी पाया जाता है, परन्तु फास्फोरस में पेट का खालीपन ऊपर-नीचे सारे पेट में होता है, पेट में ही नहीं, संपूर्ण ‘पाक-स्थली’ में पाया जाता है। इग्नेशिया में पेट के खालीपन के साथ रोगिणी गहरी सांस छोड़ती है; कैलि कार्ब में पेट अन्दर घसता-सा महसूस होता है, खाने से भी यह नहीं मिटती; सीपिया में पेट की शून्यता ‘मानो पेट में कुछ भी नहीं’ खाने से कम हो जाती है; स्टैनम में पेट के खालीपन के साथ छाती की कमजोरी पायी जाती है। पेट के खाली-खाली होने का अनुभव फास्फोरस में सबसे ज्यादा पाया जाता है।



*रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना – 
रोगी स्वभाव से शीत-प्रधान होता है, ठंड से उसके रोग बढ़ जाते हैं, गर्मी पसन्द करता है, यह उसका ‘व्यापक-लक्षण’ है। परन्तु कभी-कभी ‘व्यापक-लक्षण’ तथा ‘अंग विशेष के लक्षण’ में विरोध भी होता है। फास्फोरस का रोगी अपने ‘व्यापक-लक्षण’ में तो शीत-प्रधान है, परन्तु पेट तथा सिर के रोगों में उसे ठंडक पसन्द होती है। वह आइसक्रीम खाना पसन्द करता है, बर्फ का पानी पीना चाहता है, परन्तु पेट में ठंडे पानी पीने के साथ इसका लक्षण यह है कि पेट में जब वह पानी गर्म हो जाता है, तब उल्टी हो जाती है। अगर रोगी शीत-प्रधान हो, परन्तु ठंडा पानी पीये और ठंडा पानी पीने के बाद जब वह पेट में गर्म हो जाय तब उल्टी हो जाय, तो फास्फोरस से अवश्य लाभ होगा। पेट के दर्द में अगर ठंडी चीजें खाने से आराम हो, गर्म खाने से तकलीफ बढ़े, तो पेट में कैंसर होने की संभावना होती है। ऐसे लक्षण में फास्फोरस लाभ करता है।
फास्फोरस औषधि के अन्य लक्षण
*रोगी नंगा हो जाता है – कभी-कभी रोगी प्रेमावेश में आकर अपने को नंगा कर लेता है। निर्लज्ज होकर अपने अंगों का प्रदर्शन करता है। हायोसाइमस में भी यह लक्षण है।



*पुराने जुकाम में खून आना –
 रोगी का जुकाम पुराना हो जाता है। उसके रुमाल में जुकाम का खून लग रहता है तब फास्फोरस 200 की एक मात्रा से लाभ होगा।
*नींद देर में और टूट-टूट कर आती है – 
रोगी को नींद देर में, और टूट-टूट कर आती है। प्रेम के स्वप्न आते है।
*पपोटे सूजना – ऊपर के पपोटों के सूजने में कैलि कार्ब, नीचे के पपोटों के सूजने में एपिस तथा आंखों के ऊपर-नीचे और चेहरे के सूजन में फास्फोरस उपयोगी है।
*नींद के बाद आराम – थोड़ी भी नींद के बाद रोगी को आराम मिलता है। लैकेसिस में नींद के बाद रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।
* वृद्ध-पुरुषों के चक्कर – 
मस्तिष्क के रोग में चक्कर आने तथा वृद्ध-पुरुषों के अनेक प्रकार के चक्करों में यह महौषधि है। दूसरी कोई औषधि चक्कर के इतने लक्षणों पर नहीं घटती
*फास्फोरस का सजीव मूर्त-चित्रण – 
स्नायु-प्रधान, तपेदिक के रोगी जैसा, लम्बा, पतला, चिपटी छाती, जन्म से कमजोर, हड्डियां ऐसी जैसे जल्दी बढ़ गयी हों, जरा-से शारीरिक या मानकिस श्रम से पस्त हो जाने वाला। किसी बात में मन नहीं लगता। चाहता है कि कोई शरीर को दबाता रहे, मालिश कर दे। रक्तहीन लड़के या लड़कियां। सर्दी बर्दाश्त नहीं होती। नमकीन चीजें पसन्द होती हैं। ऐसा है मूर्त-रूप फास्फोरस का।
*शक्ति तथा प्रकृति – फास्फोरस 6, फास्फोरस 30, फास्फोरस 200 (औषधि ‘सर्द’-प्रकृति के लिये है|
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