18/1/18

मानसिक रोगों के लक्षण और चिकित्सा //Signs of Mental Illness and treatment



    आधुनिक दवाएं किस तरह से मानसिक रोगों का उपचार करती हैं इस बारे में लोगों में बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है। और इस बारे में भी कि मानसिक रोगों में दी जाने वाली दवाएं कितनी असरकारी हैं। ज़्यादातर लोग मानते हैं कि इस क्षेत्र में डॉक्टर कुछ नहीं कर सकते और मानसिक बीमारियों के लिए वे केवल ओझाओं साधुओं आदि पर ही विश्वास करते हैं।
    ज़्यादातर लोगों को मानसिक रोगों के इलाज के लिए बिजली के झटकों और बंद करके रखे जाने के बारे में ही पता है। इस भाग में मानसिक रोगों के उपचार के बारे में बताया जा रहा है। निरोगण के मुख्य अवयव हैं दवाएं, बातचीत, आपातकालीन स्थिति में बिजली के झटके देना, अस्पताल में रखना और पुनर्वास। हर मामले में इनमें से सब की ज़रूरत नहीं होती। साधारण बीमारी दवाइयों और सुझावों से ही ठीक हो सकती है। गंभीर बीमारियॉं जैसे विखन्डित मनस्कता तक भी केवल दवाओं से दूर हो जाती हैं।
     अस्पताल में रखे जाने और बिजली के झटकों की ज़रूरत कभी कभी ही होती है। विखन्डित मनस्कता और उन्माद अवसादी विक्षिप्ति में लंबे समय तक मानसिक रोगों के इलाज की ज़रूरत होती है।इन बीमारियों में हालांकि पूरी तरह से ठीक होना मुश्किल है परन्तु इलाज से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है। मानसिक रोगों में इलाज लगातार चलने की ज़रूरत होती है।
     

इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण गलत तरीके का खान-पान है। शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाने के कारण मस्तिष्क के स्नायु में विकृति उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण मस्तिष्क के स्नायु अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और मानसिक रोग हो जाता है।
• शरीर के खून में अधिक अम्लता हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता हैं क्योंकि अम्लता के कारण मस्तिष्क (नाड़ियों में सूजन) में सूजन आ जाती है जिसके कारण मस्तिष्क शरीर के किसी भाग पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और उसे मानसिक रोग हो जाता है।
• अधिक चिंता, सोच-विचार करने, मानसिक कारण, गृह कलेश, लड़ाई-झगड़े तथा तनाव के कारण भी मस्तिष्क की नाड़ियों में रोग उत्पन्न हो जाता है और व्यक्ति को पागलपन का रोग हो जाता है।
• अधिक मेहनत का कार्य करने, आराम न करने, थकावट, नींद पूरी न लेने, जननेन्द्रियों की थकावट, अनुचित ढ़ग से यौनक्रिया करना, आंखों पर अधिक जोर देना, शल्यक्रिया के द्वारा शरीर के किसी अंग को निकाल देने के कारण भी मानसिक रोग हो सकता है।
• यह रोग पेट में अधिक कब्ज बनने के कारण भी हो सकता है क्योंकि कब्ज के कारण आंतों में मल सड़ने लगता है जिसके कारण दिमाग में गर्मी चढ़ जाती है और मानसिक रोग हो जाता है।
होम्योपैथी-
     होम्योपैथी मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए काफी उपयोगी होती है। इसलिए आपको जहॉं भी ज़रूरी हो होम्योपैथी का इस्तेमाल करना चाहिए। मानसिक रोगों के लिए होम्योपैथिक दवाओं के बारे ध्यान से पढें।
इन्हें शायद सहायता की ज़रूरत है



जिन लोगों को मनोचिकित्सा की ज़रूरत होती है, उनकी सूची नीचे दी गई है।

जो कि बेसिरपैर की बातें करता हो और अजीबोगरीब और असामान्य व्यवहार करता हो।
जो बहुत चुप हो गया हो और औरों से मिलना जुलना और बात करना छोड़ दे।
अगर कोई ऐसी बातें सुनने या ऐसी चीज़ें देखने का दावा करे जो औरों को न सुनाई / दिखाई दे रही हों।
अगर कोई बहुत ही शक्की हो और वह हमेशा यह शिकायत करता रहे कि दूसरे लोग उसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं।
     अगर कोई ज़रूरत से ज़्यादा खुश रहने लगे, हमेशा चुटकुले सुनाता रहे या कहे कि वह बहुत अमीर है या औरों से बहुत बेहतर है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं हो।
अगर कोई बहुत दु:खी रहने लगे और बिना मतलब रोता रहे।
अगर कोई आत्महत्या की बातें करता रहे या उसने आत्महत्या की कोशिश की हो।
अगर कोई कहे कि उसमें भगवान या कोई आत्मा समा गई है। या अगर कोई कहता रहे कि उसके ऊपर जादू टोना किया जा रहा है या कोई बुरी छाया है।
अगर किसी को दौरे पड़ते हों और उसे बेहोशी आ जाती हो और वो बेहोशी में गिर जाता हो।
अगर कोई बहुत ही निष्क्रिय रहता हो, बचपन से ही धीमा हो और अपनी उम्र के हिसाब से विकसित न हुआ हो।
उचित मानसिक स्वास्थ्य-
अभी तक हमने मानसिक रोगों और समस्याओं के बारे में बात की है। परन्तु उचित मानसिक स्वास्थ्य भी कोई चीज़ है और हम सबको अपना मानसिक स्वास्थ्य वैसा बनाना चाहिए। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य ठीक रख पाने में दूसरों की मदद करनी चाहिए।
 यह ज़्यादातर लोगों के लिए बचपन से ही शुरू हो जाता है, परन्तु कभी भी बहुत देर नहीं हुई होती।
रोज़ कसरत करना, सैर करना और खेलना अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
टीम वाले खेल सबसे ज़्यादा अच्छे होते हैं क्योंकि इनसे दिमाग में गलत विचार नहीं आते।
योगा से मदद मिलती है। और योगा ज़रूर करना चाहिए 
सार्थक काम करने और काम में संतुष्टी होने से भी मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
हमें अपने बारे में ध्यान से सोच कर अपनी स्वाभाव को समझना चाहिए और अपनी गलतियों को सुधारना चाहिए। किताबों और दोस्तों से सबसे ज़्यादा मदद मिलती है।
धर्म – 
सहानुभूति, वैराग्य, आदर और अच्छा इन्सान बनने के धर्म के बुनियादी सिद्धांत से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। इससे जीवन के दु:खों और मुश्किलों से निपटने में मदद मिलती है। परन्तु उन लोगों से सावधान रहें जो कि धर्म के नाम पर लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश करते हैं।
नाच गाने, होली, डांडिया आदि जैसी सामाजिक घटनाएं लोगों के दिमाग से गलत विचार निकलाने में मदद करती हैं। जब भी ऐसे मौके आएं तो लोगों के साथ मिलने जुलने की कोशिश करें।
देसी घरेलु उपचार व आयुर्वेदिक नुस्खे-
• अखरोट की बनावट मानव-मस्तिष्क से होती है । अतः प्रातःकाल एक अखरोट व मिश्री दूध में मिलाकर ‘ ॐ ऐं नमः’ या ‘ ॐ श्री सरस्वत्ये नमः ‘ जपते हुए पीने से मानसिक रोगों में लाभ होता है व यादशक्ति पुष्ट होती है ।
• मालकाँगनी का 2-2 बूँद तेल एक बताशे में डालकर सुबह-शाम खाने से मस्तिष्क के एवं मानसिक रोगों में लाभ होता है।
• स्वस्थ अवस्था में भी तुलसी के आठ-दस पत्ते, एक काली मिर्च तथा गुलाब की कुछ पंखुड़ियों को बारीक पीसकर पानी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह पीने से मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है। इसमें एक से तीन बादाम मिलाकर ठंडाई की तरह बना सकते हैं। इसके लिए पहले रात को बादाम भिगोकर सुबह छिलका उतारकर पीस लें। यह ठंडाई दिमाग को तरावट व स्फूर्ति प्रदान करती है।
• रोज सुबह आँवले का मुरब्बा खाने से भी स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। अथवा च्यवनप्राश खाने से इसके साथ कई अन्य लाभ भी होते हैं।
• गर्म दूध में एक से तीन पिसी हुई बादाम की गिरी और दो तीन केसर के रेशे डालकर पीने से मानसिक रोगों में लाभ होता है साथ ही स्मरणशक्ति तीव्र होती है।
• सिर पर देसी गाय के घी की मालिश करने से भी मानसिक रोगों में लाभ होता है।
• मूलबन्ध, उड्डीयान बंध, जालंधर बंध (कंठकूप पर दबाव डालकर ठोडी को छाती की तरफ करके बैठना) से भी बुद्धि विकसित होती है, मन स्थिर होता है।




किडनी विकृति के कारण और उपचार //kidney failure and ayurvedic treatment


    गुर्दे शरीर को स्वच्छ रखते हैं। रक्त में से मूत्र बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य गुर्दे करते हैं। शरीर में रक्त में उपस्थित विजातीय व अनावश्यक कचरे को मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से बाहर निकालने का कार्य गुर्दों का ही है।
गुर्दा वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवशात् यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है। 
     अपने शरीर में गुर्दे   होशियार  टेक्नीशियन की भाँति कार्य करते हैं। गुर्दा शरीर का अनिवार्य एवं क्रियाशील भाग है, जो अपने तन एवं मन के स्वास्थ्य पर नियंत्रण रखता है। उसके बिगड़ने का असर रक्त, हृदय, त्वचा एवं यकृत पर पड़ता है। वह रक्त में स्थित शर्करा (Sugar), रक्तकण एवं उपयोगी आहार-द्रव्यों को छोड़कर केवल अनावश्यक पानी एवं द्रव्यों को मूत्र के रूप में बाहर फेंकता है। यदि रक्त में शर्करा का प्रमाण बढ़ गया हो तो गुर्दा मात्र बढ़ी हुई शर्करा के तत्त्व को छानकर मूत्र में भेज देता है।
     गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है।
आयुर्वेद के निष्णात वैद्य कहते हैं कि गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज में हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है।
    इन अंग्रेजी दवाओं के जहरीले असर  के कारण ही गुर्दे एवं मूत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी किसी आधुनिक दवा के अल्पकालीन सेवन की विनाशकारी प्रतिक्रिया (Reaction) के रूप में भी किडनी फेल्युअर (Kidney Failure) जैसे गम्भीर रोग होते हुए दिखाई देते हैं। अतः मरीजों को हमारी सलाह है कि उनकी किसी भी बीमारी में, जहाँ तक हो सके, वे निर्दोष वनस्पतियों से निर्मित एवं विपरीत तथा परवर्ती असर (Side Effect and After Effect) से रहित आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन का ही आग्रह रखें। एलोपैथी के डॉक्टर स्वयं भी अपने अथवा अपने सम्बन्धियों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक दवाओं का ही आग्रह रखते हैं।
    आधुनिक विज्ञान कहता है कि गुर्दे अस्थि मज्जा  बनाने का कार्य भी करते हैं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आज रक्त कैंसर की व्यापकता का कारण भी आधुनिक दवाओं का विपरीत एवं परवर्ती प्रभाव ही हैं।
किडनी विकृति के कारणः 
    आधुनिक समय में मटर, सेम आदि द्विदलो जैसे प्रोटीनयुक्त आहार का अधिक सेवन, मैदा, शक्कर एवं बेकरी की चीजों का अधिक प्रयोग चाय कॉफी जैसे उत्तेजक पेय, शराब एवं ठंडे पेय, जहरीली आधुनिक दवाइयाँ जैसे – ब्रुफेन, मेगाडाल, आइबुजेसीक, वोवीरॉन जैसी एनालजेसिक दवाएँ, एन्टीबायोटिक्स, सल्फा ड्रग्स, एस्प्रीन, फेनासेटीन, केफीन, ए.पी.सी., एनासीन आदि का ज्यादा उपयोग, अशुद्ध आहार अथवा मादक पदार्थों का ज्यादा सेवन, सूजाक (गोनोरिया), उपदंश (सिफलिस) जैसे लैंगिक रोग, त्वचा की अस्वच्छता या उसके रोग, जीवनशक्ति एवं रोगप्रतिकारक शक्ति का अभाव, आँतों में संचित मल, शारीरिक परिश्रम को अभाव, अत्यधिक शारीरिक या मानसिक श्रम, अशुद्ध दवा एवं अयोग्य जीवन, उच्च रक्तचाप तथा हृदयरोगों में लम्बे समय तक किया जाने वाला दवाओँ का सेवन, आयुर्वेदिक परंतु अशुद्ध पारे से बनी दवाओं का सेवन, आधुनिक मूत्रल (Diuretic) औषधियों का सेवन, तम्बाकू या ड्रग्स के सेवन की आदत, दही, तिल, नया गुड़, मिठाई, वनस्पति घी, श्रीखंड, मांसाहार, फ्रूट जूस, इमली, टोमेटो केचअप, अचार, केरी, खटाई आदि सब गुर्दा-विकृति के कारण है।


सामान्य लक्षणः

गुर्दे खराब होने पर निम्नांकित लक्षण दिखाई देते हैं-
आधुनिक विज्ञान के अनुसारः 
   आँख के नीचे की पलकें फूली हुई, पानी से भरी एवं भारी दिखती हैं। जीवन में चेतनता, स्फूर्ति तथा उत्साह कम हो जाता है। सुबह बिस्तर से उठते वक्त स्फूर्ति के बदले आलस्य एवं बेचैनी रहती है। थोड़े श्रम से ही थकान लगने लगती है। श्वास लेने में कभी-कभी तकलीफ होने लगती है। कमजोरी महसूस होती है। भूख कम होती जाती है। सिर दुखने लगता है अथवा चक्कर आने लगते हैं। कइयों का वजन घट जाता है। कइयों को पैरों अथवा शरीर के दूसरे भागों पर सूजन आ जाती है, कभी जलोदर हो जाता है तो कभी उलटी-उबकाई जैसा लगता है। रक्तचाप उच्च हो जाता है। पेशाब में एल्ब्यमिन पाया जाता है।
आयुर्वेद के अनुसारः

    सामान्य रूप से शरीर के किसी अंग में अचानक सूजन होना, सर्वांग वेदना, बुखार, सिरदर्द, वमन, रक्ताल्पता, पाण्डुता, मंदाग्नि, पसीने का अभाव, त्वचा का रूखापन, नाड़ी का तीव्र गति से चलना, रक्त का उच्च दबाव, पेट में किडनी के स्थान का दबाने पर पीड़ा होना, प्रायः बूँद-बूँद करके अल्प मात्रा में जलन व पीड़ा के साथ गर्म पेशाब आना, हाथ पैर ठंडे रहना, अनिद्रा, यकृत-प्लीहा के दर्द, कर्णनाद, आँखों में विकृति आना, कभी मूर्च्छा और कभी उलटी होना, अम्लपित्त, ध्वजभंग (नपुंसकता), सिर तथा गर्दन में पीड़ा, भूख नष्ट होना, खूब प्यास लगना, कब्जियत होना – जैसे लक्षण होते हैं। ये सभी लक्षण सभी मरीजों में विद्यमान हों यह जरूरी नहीं।
गुर्दा रोग से होने वाले अन्य उपद्रवः 

      गुर्दे की विकृति का दर्द ज्यादा समय तक रहे तो उसके कारण मरीज को श्वास (दमा), हृदयकंप, न्यूमोनिया, प्लुरसी, जलोदर, खाँसी, हृदयरोग, यकृत एवं प्लीहा के रोग, मूर्च्छा एवं अंत में मृत्यु तक हो सकती है। ऐसे मरीजों में ये उपद्रव विशेषकर रात्रि के समय बढ़ जाते हैं।
आज की एलोपैथी में गुर्दो रोग का सरल व सुलभ उपचार उपलब्ध नहीं है, जबकि आयुर्वेद के पास इसका  प्रभावी सरल व सुलभ इलाज है।
आहारः 
     प्रारंभ में रोगी को 3-4 दिन का उपवास करायें अथवा मूँग या जौ के पानी पर रखकर लघु आहार करायें। आहार में नमक बिल्कुल न दें या कम दें। नींबू के शर्बत में शहद या ग्लूकोज डालकर 15 दिन तक दिया जा सकता है। चावल की पतली घेंस या राब दी जा सकती है। लौकी का जूस आधा गिलास देना शुरू करे। फिर जैसे-जैसे यूरिया की मात्रा क्रमशः घटती जाय वैसे-वैसे, रोटी, सब्जी, दलिया आदि दिया जा सकता है। मरीज को मूँग का पानी, सहजने का सूप, धमासा या गोक्षुर का पानी चाहे जितना दे सकते हैं। किंतु जब फेफड़ों में पानी का संचय होने लगे तो उसे ज्यादा पानी न दें, पानी की मात्रा घटा दें।
विहारः 
    गुर्दे के मरीज को आराम जरूर करायें। सूजन ज्यादा हो अथवा यूरेमिया या मूत्रविष के लक्षण दिखें तो मरीज को पूर्ण शय्या आराम  करायें। मरीज को थोड़े गरम एवं सूखे वातावरण में रखें। हो सके तो पंखे की हवा न खिलायें। तीव्र दर्द में गरम कपड़े पहनायें। गर्म पानी से ही स्नान करायें। थोड़ा गुनगुना पानी पिलायें।
औषध-उपचारः 
     गुर्दे के रोगी के लिए कफ एवं वायु का नाश करने वाली चिकित्सा लाभप्रद है। जैसे कि स्वेदन, वाष्पस्नान , गर्म पानी से कटिस्नान |
     रोगी को आधुनिक तीव्र मूत्रल औषधि न दें क्योंकि लम्बे समय के बाद उससे गुर्दे खराब होते हैं। उसकी अपेक्षा यदि पेशाब में शक्कर हो या पेशाब कम होता हो तो नींबू का रस, सोडा बायकार्ब, श्वेत पर्पटी, चन्द्रप्रभा, शिलाजीत आदि निर्दोष औषधियों या उपयोग करना चाहिए। गंभीर स्थिति में रक्त मोक्षण (शिरा मोक्षण) खूब लाभदायी है किंतु यह चिकित्सा मरीज को अस्पताल में रखकर ही दी जानी चाहिए।
    सरलता से सर्वत्र उपलब्ध पुनर्नवा नामक वनस्पति का रस, काली मिर्च अथवा त्रिकटु चूर्ण डालकर पीना चाहिए। कुलथी का काढ़ा या सूप पियें। रोज 100 से 200 ग्राम की मात्रा में गोमूत्र पियें। पुनर्नवादि मंडूर, दशमूल, क्वाथ, पुनर्नवारिष्ट, दशमूलारिष्ट, गोक्षुरादि क्वाथ, गोक्षुरादि गूगल, जीवित प्रदावटी आदि का उपयोग दोषों एवं मरीज की स्थिति को देखकर बनना चाहिए।
रोज 1-2 गिलास जितना लौहचुंबकीय जल (Magnetic Water) पीने से भी गुर्दे के रोग में लाभ होता है।


विशिष्ट परामर्श-




किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -







इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl








जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 






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13/1/18

अर्निका(होम्योपैथिक) दवा के उपयोग और फायदे



    आपने कभी न कभी Arnica के बारे में सुना हे होगा जो की एक Homeopathic medicine है, आइये जानते है इसके uses, health benefits और उपयोग से जुडी जानकारी के बारे में | भारत में लोग अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कई प्रकार के साधनों का इस्तेमाल करते है | कुछ लोग स्वस्थ शरीर के लिए पौष्टिक आहार का सेवन करते है तो कुछ लोग दवा का सेवन करते है | दवा में भी कुछ लोग Allopathy और कुछ लोग Homeopathic दवा का इस्तेमाल करते है | Allopathy दवा मानव शरीर में जल्द effect करता है पर side effect भी करता है वही homeopathic शरीर पर थोडा लेट असर करता है परन्तु इस दवा के सेवन से किसी भी प्रकार का side effect नहीं होता है |
    मनुष्यों के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली homeopathic दवाओ में Arnica दवा का इस्तेमाल सबसे अधिक किया जाता है | Arnica एक प्रकार का दर्दनाशक दवा है जिसका इस्तेमाल मुख्यतौर पर शरीर में हो रहे है किसी प्रकार के दर्द का निवारण के लिए किया जाता है | दरअसल Arnica मानव शरीर में anti-biotic के रूप में कार्य करता है यह शरीर में होने वाले सूजन, दर्द को ख़त्म करता है |



अर्निका दवा के उपयोग और फायदे

Homeopathic दवा Arnica का इस्तेमाल दर्द, सुजन के साथ साथ और भी कई समस्याओ में किया जाता है | आइए जानते है इस दवा का इस्तेमाल किन किन समस्यो के समाधान के लिए किया जाता है |

दर्द –
 अगर आपके शरीर में किसी भी प्रकार का दर्द है तो आप इस दवा का इस्तेमाल कर के दर्द से आराम पा सकते है |
Stiffness – 
कई बार ऐसा होता है की हाथ के कोहनी और घुटने की त्वचा कठोर हो जाती है, इस समस्या का समाधान के लिए आप Arnica का इस्तेमाल रोजाना करे इससे त्वचा की कठोरता ख़त्म हो जाती है और त्वचा मुलायम और कोमल दिखने लगती है |
सूजन – 
अगर आपके दांतों में दर्द और मसुडो में सूजन है तो आप Arnica 30C का सेवन करे इससे आपके दांत का दर्द और मसुडो का सूजन कम हो जायेगा |


चोट – 

बच्चे अपने बचपन में कई सारी बदमासिया किया करते है | कभी कभी तो बच्चो को खेल के दौरान चोट लग जाती है जिससे प्रभावित हिस्सा नीला पड़ जाता है | प्रभावित हिस्सों में इस दवा का सेवन करने से नीला दाग ख़त्म हो जाता है |
Diabetes – 
अगर आप diabetes के मरीज है और बीमारी के कारण आपके आँखे प्रभावित हो रही है तो इस दवा का सेवन कर सकते है |
मांसपेशियों में दर्द –
 कभी कभी ऐसा होता है की किसी कारण हमारी मांसपेशीया प्रभावित हो जाती है और दर्द होता है तो इस स्थिति में आप इस दवा का सेवन कर सकते है |
Pain after Surgery – 
ताजा खोज से यह पता चला है की अगर आपके शरीर में किसी प्रकार की surgery हुई है और surgery के बाद दर्द हो रहा हो तो आप arnica 30C liquid या दाने को अपने जीभ के नीचे रखे | इस दवा को हरेक 2 घंटे के अंतराल पर 6 dose ले, ऐसा करने से दर्द से आराम मिलता है |
Stroke – 
अगर आपको stroke आते है तो आप arnica 30C के दाने को अपने जीभ के नीचे हरेक 2 घंटे के अंतराल पर 6 dose ले इससे आपको आराम मिलेगा |



23/12/17

शाबर मंत्रों द्वारा कठिन रोगों का निवारण // Troubleshoot the Tough Diseases by Shabar Mantras




शाबर मंत्र दुर्बलता का इलाज :-


तू है वीर बड़ा हनुमान |
लाल लंगोटी मुख में पान |
ऐर भगावै |
बैर भगावै |
अमुक में शक्ति जगावै |
रहे इसकी काया दुर्बल |
तो माता अंजनी की आन |
दुहाई गौरा पार्वती की |
दुहाई राम की |
दुहाई सीता की |
ले इसके पिण्ड की खबर |
ना रहे इसमें कोई कसर |


यदि कोई अकारण ही दुर्बल होता जा रहा हो और कारण समझ में नहीं आये तो इस मंत्र का 7 बार जाप करते हुए प्रत्येक मंत्र के बाद रोगी पर फूँक लगाए और यही रोगी स्वयं करता है तो रोगी खुद को फूक लगाए इसके साथ ही रोगी को हनुमान जी के मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा से उनके चरणों का सिन्दूर लाकर तिलक भी करें | रोगी किसी भी रोग से पीड़ित हो उसे स्वास्थ्य लाभ अवश्य मिलेगा ||
शाबर मंत्र, मासिक पीड़ा का निवारण :


ॐ नमो आदेश मनसा माता का |
बड़ी – बड़ी अदरख |
पतली पतली रेश |
बड़े विष के जल फाँसी दे |
शेष गुरु का वचन न जाये खाली |
पिया पंच मुंड के बाम पद ठेली |
विषहरी राई की दुहाई |

थोड़ी सी अदरख लेकर इस मंत्र से सात बार फूंककर मासिक धर्म में होने वाली पीड़ाओं से ग्रसित स्त्री को खिलाने से मासिक पीड़ा शांत हो जाती है ||

शाबर मंत्र, नाभि का उखड़ना : 
ॐ नमो नाड़ी नाड़ी |
 नौ से नाड़ी |
 बहत्तर कोठा | 
चलै अगाड़ी | 
डिगै न कोठा |
 चले नाड़ी रक्षा करे
यती हनुमन्त कि आन | 
शब्द साँचा | 
पिंड काँचा | 
फुरे मंत्र ईश्वरोवाचा |

आप एक पीला बाँस ले ले जिसमे 9 गाँठें हो | अब रोगी को जमीन पर लिटा दे और उसकी नाभि के ऊपर यह बाँस खड़ा करके इस मंत्र का जाप करते हुए बाँस के छेद में जोर – जोर से फूंक मरते रहे इस प्रकार करने से उखड़ी हुई नाभि तुरंत ठीक हो जाती है ||


शाबर मंत्र, रोग(रोग समझ न आने पर
) निवारण :-

ॐ नमो आदेश गुरु का |
काली कमली वाला श्याम |
उसको कहते है घनश्याम |
रोग नाशे |
शोक नाशे |
नहीं तो कृष्ण की आन |
राधा मीरा मनावे |
अमुक का रोग जावे |

जब यह समझ में नहीं आये की वास्तव में रोगी किस रोग से पीड़ित है तो इस मंत्र का जाप करते हुए रोगी को झाड़ा दे | रोगी को अवश्य लाभ मिलेगा ||
शाबर मंत्र, बवासीर का निवारण :

ॐ काका कता क्रोरी कर्ता |
ॐ करता से होय |
यरसना दश हूंस प्रकटे |
खूनी बादी बवासीर न होय |
मंत्र जान के न बताये |
द्वादश ब्रह्म हत्या का पाप होय |
लाख जप करे तो उसके वंश में न होय |
शब्द साँचा |
पिण्ड काँचा |
हनुमान का मंत्र साँचा |
फुरो मंत्र ईश्वरोवाचा


रात को पानी एक बर्तन में रख दे, सुबह होने पर उस पानी को ऊपर दिए मंत्र से 21 बार अभिमंत्रित करके गुदा प्रक्षालन करें | ऐसा करने से बवासीर कैसी भी हो शीघ्र ही ठीक हो जाती है ||
शाबर मंत्र, अनियमित मासिक-धर्म :
ॐ नमो आदेश श्री रामचंद्र सिंह गुरु का |
तोडूं गाँठ ओंगा ठाली |
तोड़ दूँ लाय |
तोड़ दूँ सरित |
परित देकर पाय |
यह देख हनुमन्त दौड़कर आये |
अमुक की देह शांति पाय |
रोग कूँ वीर भगाये |
रोग न नसै तो नरसिंह की दुहाई |
फुरे हुकुम खुदाई |



शाबर मंत्र, कमर दर्द निवारण :
चलता जाये |
उछलता जाये |
भस्म करन्ता |
डह डह जाये |
सिद्ध गुरु की आन |
महादेव की शान |
शब्द साँचा |
पिंड काँचा |
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा |

इस मंत्र से रोगी को झाड़ा दे | इसके बाद एक कला धागा लेकर रोगी के सर से पाँव तक नापकर अलग कर ले और इस मंत्र को 21 बार पढ़े और हर मंत्र के साथ जहां मंत्र में फुरो शब्द आता है वहां दागे पर फूंक लगते जाये | इसके बाद इस दागे को रोगी को धारण करवा दे | ऐसा करने से रोगी को दर्द से शीघ्र मुक्ति मिल जाएगी ||
शाबर मंत्र, दांत-दाढ़ के दर्द का उपाय :-

ॐ नमो आदेश गुरु का |
बन में ब्याई अञ्जनी |
जिन जाया हनुमंत |
कीड़ा मकुड़ा माकड़ा |
ये तीनों भस्मन्त |
गुरु की शक्ति |
मेरी भक्ति |
फुरे मंत्र ईश्वरो वाचा |

मंत्र प्रयोग विधि: – एक नीम की टहनी लेकर दर्द के स्थान पर छुआते हुए इस मंत्र को सात बार जपें | इस प्रकार करने से रोगी का दांत या दाढ़ का दर्द समाप्त हो जायेगा और पीड़ित व्यक्ति अपने दर्द में आराम की अनुभूति करेगा |

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शाबर मंत्र, आँख के दर्द का निवारण :-


ॐ नमो आदेश गुरु का |
समुद्र |
समुद्र में खाई |
इस (मरद) की आँख आई |
पाकै, फूटे न पीड़ा करे |
गुरु गोरख की आज्ञा करें |
मेरी भक्ति |
गुरु की शक्ति |
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा
मंत्र प्रयोग विधि :-
नमक की सात डली लेकर इस मंत्र का उच्चारण करते हुए सात बार झाड़ा करें तो नेत्रों (आँख) की पीड़ा दूर हो जाती है ( मंत्र में “मरद” की जगह आप रोगी भी कह सकते है या आप रोगी का नाम भी ले सकते है ||
शाबर मंत्र, समस्त रोग निवारण :-

वन में बैठी वानरी |
अंजनी जायो हनुमन्त |
बाल डमरू ब्याही बिलाई |
आँख कि पीड़ा |
मस्तक कि पीड़ा |
चौरासी बाई |
बलि बलि भस्म हो जाय |
पके न फूटे |
पीड़ा करें तो गोरखयती रक्षा करें |
गुरु कि शक्ति |
मेरी भक्ति |
फुरे मंत्र ईश्वरो वाचा |

इस मंत्र को 108 बार जाप करते हुए रोगी को झाड़ा देने से रोगी के समस्त रोग नष्ट हो जाते है ||
कुंदन



20/12/17

रोग व क्‍लेश दूर करने के आसान मंत्र// Easy spells to remove disease and suffering



    किसी भी बीमारी से ग्रसित होने पर अक्‍सर लोग डॉक्‍टर के पास जाते हैं और उनकी सलाह के अनुसार दवाएं आदि लेते हैं. परंतु कई बार इलाज के बावजूद रोग दूर नहीं होते. बीमारी की मूल वजह दूर किए बिना केवल बाहरी इलाज कराने से ही ऐसे प्रयास बेकार जाते हैं. ऐसे में कुछ मंत्र बेहद कारगर सिद्ध हो सकते है.
अगर आध्‍यात्‍म‍िक नजरिए से देखें, तो हर तरह के रोगों के मूल कारण इंसान के पूर्व जन्‍म या इस जन्‍म के पाप ही होते हैं. इसलिए आयुर्वेद में बताया गया है कि देवताओं का ध्‍यान-स्‍मरण करते हुए दवाओं के सेवन से ही शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं:
जन्‍मान्‍तर पापं व्‍याधिरूपेण बाधते।
तच्‍छान्तिरौषधप्राशैर्जपहोमसुरार्चनै:।।



आयुर्वेद की मान्‍यता है कि जप, हवन, देवताओं का पूजन, ये भी रोगों की दवाएं हैं. ऐसे में रोगों के नाश के लिए पूजा और देवताओं के मंत्र की उपयोगिता स्‍पष्‍ट है.

जो जटिल रोग से पीड़ि‍त हों, उन्‍हें हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए. वैसे तो श्रद्धालु पूरी हनुमानचालीसा का पाठ किया करते हैं. परंतु रोगनाश के लिए हनुमानचालीसा की इन चौपाइयों और दोहों को मंत्र की तरह जपने का विधान है:
1. बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहि हरहु कलेस बिकार।

2. नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।
इस दोहे के जप से हर तरह के रोग, शारीरिक दुर्बलता, मानसिक क्‍लेश आदि दूर होते हैं. खास बात यह है कि हनुमानजी के उपासक को सदाचारी होना चाहिए. सदाचार से वे प्रसन्‍न होते हैं और मनोकामनाओं को पूरा करते हैं.
इन मंत्रों का जप अनुष्‍ठान के साथ करने के भी तरीके हैं, पर वे थोड़े जटिल हैं. इनके जप का आसान तरीका भी है. किसी भी व्‍यक्ति को दिन या रात में, जब कभी भी मौका मिले, हनुमानजी को याद करते हुए इन मंत्रों का मानसिक जप (मन ही मन) करना चा‍हिए. चलते-फिरते, यात्रा करते हुए, कोई शारीरिक काम करते हुए भी इसे जपा जा सकता है. यह क्रम रोग दूर होने तक उत्‍साह के साथ जारी रखना चाहिए|




18/12/17

गाय के गोबर के अदभूत फायदे // miracle benefits of cow dung



    भारत में प्राचीन समय से ही गाय को पूजा जाता रहा है। और यही वजह भी रही ​है कि गाय में सभी देवी देवताओं का वास भी माना गया है। गाय से मिलने वाली हर चीज हमारे लिए फायदेमंद होती है। भले ही वह गोबर ही क्यों ना हो। गाय का मूत्र हमें कई भंयकर बीमारियों से बचाता है। तो वहीं गाय का घी, गाय का दूध सभी चीजें हमारी सेहत के लिए बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होती हैं। इस लेख में हम आपको गाय के गोबर के एैसे फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपके लिए बहुत ही अधिक फायदेमंद होते हैं।
     गाय का गोबर का सेवन करना भी बहुत ही अधिक फायदेमंद माना जाता है। क्योंकि यह हमारे शरीर को अंदर से मजबूती देने के साथ—साथ घातक संक्रमण रोगों से भी बचाता है। पश्चिमी देश के वैज्ञानिक गाय के गोबर पर विशेष शोध कर रहे हैं। जिसके आधार पर उन्होंने कई नतीजे निकाले हैं। खेतों के लिए गाय का गोबर बहुत लाभदायक है। यह एक उत्तम कीटनाशक भी है।
गाय भी कई तरह की होती है जिसमे से सबसे ज्यादा लाभकारी और सबसे अधिक गुणों वाली होती है भारतीय नस्ल की गाय। जी हां भारतीय नस्ल की गाय के गोबर में गंधक, सोडियम, मैगनीज, जिंक, फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे कई तत्व पाए जाते हैं। जो न सिर्फ हमारे खेतों के लिए लाभकारी होता है ​अपितु हमें स्वस्थ बनाने का भी काम करते हैं।
गाय के गोबर के फायदे हमारे स्वास्थ के लिए -
आपको ये जानकर हैरानी होगी की गाय का गोबर अकेला कई बीमारियों को खत्म कर देता है। अब आपको बता देते हैं कि कैसे गाय का गोबर इस्तेमाल करने से बीमारियां खत्म हो सकती हैं।


मच्छर भाग जाते हैं-

गाय के गोबर के उपले को जलाकर उसे घर में घुमाने से घर के अंदर के मच्छर खत्म हो जाते हैं।
अब आप जान चुके हैं कैसे गाय का गोबर आपको इन सभी समस्याओं से मुक्त कर सकता है। भारत के लोग इस बात को माने या ना माने लेकिन विदेशों में इसके परिणाम लोग मान चुके हैं।
यदि खुजली की समस्या हो-
खुजली एक एैसी समस्या है जो यदि हो जाती है तो एक गंभीर बीमारी का रूप तक ले सकती है। ऐसे में समय पर इसका इलाज करना बहुत जरूरी है। गोबर इस इसका इलाज संभव है। देसी गाय के गोबर को अपने शरीर पर मलें और दस मिनट के बाद गुनगुने पाने से स्नान कर लें। एैसा आप कम से कम पांच दिन करें। इससे ना सिर्फ खुजली दूर होगी अपितु आपकी स्किन भी ठीक हो जाएगी।
विषैले जानवरों के काटने पर-
गांव देहात में विषैले जीव जैसे ​बिच्छू, केकड़ा, सांप आदि से इंसान को खतरा रहता है। क्योंकि इन विषैले जीवों के डंक से इंसान की जान तक भी जा सकती है। यदि किसी इंसान को इनमें से किसी भी जीव ने काट लिया हो तो एैसे में शुद्ध गाय का गोबर पानी के साथ मिलाकर उस इंसान को बार—बार पिलाते रहें। और जहां पर काटा है वहां पर गाय के गोबर का पेस्ट लगा लें। एैसा करने से न सिर्फ इंसान की जान बच जाती है अपितु जहर का प्रभाव भी कम हो जाता है।
चर्म रोग ठीक होता है-
नियमित यदि आप चर्म रोग पर गाय के गोबर का लेप लगाते हैं तो इससे यह आसान से ठीक हो सकता है।


आग से जलने पर-

अक्सर माताओं व बहनों का हाथ चूल्हे पर काम करते हुए जल जाता है। यही नहीं छोटे बच्चों का भी हाथ कभी कबार आग से जल जाता है एैसे में यदि आप गाय के गोबर को जले हुए अंग पर दो तीन बार लगाते हो तो इससे आग की जलन कम होगी और आपको जलन से राहत भी मिल जाएगी।
दूर हो जाती है मिर्गी-
ये एक तरह की बीमारी होती है जिसका दौरा पड़ने पर रोगी को कई तरह की समस्या हो जाती है। एैसे में गाय का गोबर बहुत फायदेमंद हो सकता है।
गाय का ताजा गोबर लें और उसे सुखा लें। अब उस सूखे हुए गोबर से दाने अ​लग निकाल लें और फिर इन्हें जमा करके इनको पीसवाकर इसका आटा रख लें। नियमित दस से पंद्रह दिनों तक इस आटे से बनी रोटियों को मिर्गी से प्रभावित इंसान को खिलाएं इससे यह रोग जड़ से खत्म हो जाएगा।
गठिया रोग में हितकारी-
यदि आप या कोई और इंसान गठिया रोग और उससे होने वाले दर्द से परेशान है तो आप देसी गाय का गोबर लें और फिर इसे पानी के साथ मिलाकर उबालें। और जब यह ठंडा हो जाए तब इसका लेप गठिया वाले हिस्से पर लगाएं। इसका प्रयोग नियमित करते रहने से आप जल्द ही गठिया के दर्द से मुक्त हो जाओगे।


यदि बिजली का करंट लग जाए-

गलती से या कभी लापरवाही से बिजली का करंट किसी को भी लग सकता है। यदि शरीर के किसी अंग पर करंट लग जाए तो एैसे में आप तुरंत गाय के गोबर को लें और फिर इसका लेप उस अंग पर लगा लें जिस पर करंट लगा हो। इससे कंरट से होने वाला दर्द खत्म हो जाता है।
पानी की गंदगी से फैलने वाला हैजा-
वैसे तो इस बीमारी का उपचार अब मेडिकल दवाओं से आसानी से हो जाता है। क्योंकि एक समय में ये महामारी के नाम से जाना जाता था। इस बीमारी का उपचार गाय के गोबर से भी संभव है। हैजा कि ​शिकायत होने पर शुद्ध पानी में थोड़ा सा गाय का गोबर मिलाकर उसका सेवन करना चािहए। ये रोग पूरी तरह से ठीे हो जाएगा।
मोच व चोट का उपचार-
कई बार गिरने से हमें अंदरूनी चोट व मोच आ जाती है ऐसे में शरीर में काफी दर्द होता है। यदि आप गाय के गोबर को किसी कपड़े में रखकर उसकी पोटली तैयार कर लें। इसके बाद आप इसे तवे पर गर्म कर लें। और फिर इसे मोच व चोट वाली जगह पर लगाकर किसी सूती या किसी भी तरह के कपड़े से बांध लीजिए। इससे चोट अंदर से ठीक हो जाती है और उसका दर्द भी खत्म हो जाता है।
किसी भी तरह का बुखार होने पर-
बुखार यदि किसी भी तरह का हो जैसे मलेरिया, डेंगू आदि इनसे मुक्ती पाने के लिए आप देसी गाय के गोबर को सुखाकर उसका उपला बनाएं और उसकी गंध सूंघे इससे जल्द ही बुखार के वायरस खत्म हो जाते हैं। और आप स्वस्थ हो जाते हो।




17/12/17

स्वप्न दोष के अचूक उपचार //Perfect treatment of nightfall



    आज का युवा चाहे वो स्त्री हो या पुरुष उत्तेजक किताबे फिल्मे देख कर गर्त में डूब रहा हैं, अपनी बहुमूल्य शक्ति को हस्त मैथुन से या स्वप्न दोष से ज़रिये खत्म कर रहा हैं। और ऐसे लोगो को भविष्य में अनेका अनेक व्याधियों का सामना करना पड़ता हैं, जिसमे विशेषकर नपुंसकता, बांझपन इत्यादि हैं। ये हमारे देश का दुर्भाग्य ही हैं के एक समय में स्कूल और गुरुकुलों में ब्रह्मचर्य पर शिक्षा दी जाती थी, और आज उनको इसके विपरीत सेक्स के विषय में सिखाया जाता हैं। और ऐसे भांड कलाकार जो इसका प्रचार करते हैं वो आज युवाओ के रोल मॉडल हैं। अगर आप अपनी आने वाली पीढ़ी को बचाना चाहते हैं तो आपको बदलना होगा। उन सब युवाओ को अपने भविष्य को बचाने के लिए अपने जीवन आदर्श बदलने होंगे।
    इसी कड़ी में आज आपको बता रहे हैं स्वप्न दोष की बीमारी के बारे में, मगर एक बात ध्यान रखे के ये तभी संभव हो सकता हैं जब आप अपने मन में किन्ही उत्तेजक विचारो के बजाये सतोगुणी विचार रखे, अन्यथा ये उपाय निष्फल रहेंगे|
1. लहसुनः
एक कली लहसुन रात को सोते समय चबाते हुए ताज़े पानी से निगल जाएं। इसके तुरंत बाद कुछ भी नहीं खाना चाहिए। कुछ समय के बाद ही स्वप्नदोष की समस्या समाप्त हो जाएगी।
2. जौः त्रिफला
(हरड़, बहेड़ा तथा आंवला) और जौ को रात के समय भिगोकर रख दें। इसके बाद अगले दिन सुबह के समय इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर पी लें। इससे स्वप्नदोष के रोग दूर हो जाते हैं।


3. इमलीः

दूध में इमली के बीजों को भिगोकर इमली की निकाली हुई गिरियों में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर अच्छी तरह से कूट-पीसकर मटर के दाने की तरह गोलियां बनाकर अपने पास रख लें। इसके बाद समान मात्रा में 1-1 गोली कुछ दिनों तक प्रयोग करते रहने से स्वप्नदोष जैसी समस्या समाप्त हो जाती है। इस मिश्रण का सेवन करते रहने तक तले-भूने तथा अधिक मिर्च-मसालों वाले पदार्थों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
4. गाय का दूधः
लगभग आधा किलो गाय के दूध में 3 छुहारे लेकर उसमें जरूरत के अनुसार मिश्री मिलाकर इसे अच्छी तरह से पका लें। जब दूध केवल आधा रह जाए तो छुहारे की गुठली निकालकर छुहारे को खा लें और उस दूध को पी लें। इस तरह से इस दूध का कुछ दिनों तक सेवन करते रहने से स्वप्नदोष जैसे होने वाले रोग व सभी प्रकार के वीर्य के गिरने वाले रोगों की समस्या समाप्त हो जाती है और शरीर में वीर्य की भी बढ़ोत्तरी होती है।
नोटः- इस उपाय को सदा सर्दी के दिनों में ही करना चाहिए तथा विशेषरुप से कभी भी यह उपाय विद्यार्थियों को नहीं करना चाहिए।
5. केलेः
3-4 बूंदें असली शहद की पके केले की फली में डालकर सुबह सूर्योदय से पहले खाने से स्वप्नदोष के साथ अनेक वीर्य संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं और वीर्य भी अधिक मात्रा में गाढ़ा बन जाता है। इस मिश्रण का इस्तेमाल विस्तारपूर्वक करना चाहिए।
6. इलायचीः
आधा ग्राम छोटी इलायची के पीसे हुए दाने, 3 ग्राम सूखे हुए धनिये का चूर्ण और 2 ग्राम कूटी हुई बारीक मिश्री- इन सभी पदार्थों को अच्छी तरह से मिलाकर इसकी समान मात्रा में पुड़िया बना लें। इस मिश्रण को सुबह के समय ताजे पानी के साथ सेवन करते रहें। इसका सेवन करते रहने से स्वप्नदोष के रोग में जल्दी ही लाभ मिलता है।



पीपल की छालः

पीपल की छाल का चूर्ण 3 ग्राम, इलायची का चूर्ण आधा ग्राम और बंग भस्म चौथाई ग्राम- इन चारों को एक साथ मिलाकर नियमित रुप से इस्तेमाल करें। इसका प्रयोग करने से रात को होने वाले स्वप्नदोष खत्म हो जायेंगे।
8. चोबचीनीः
आधा चम्मच मिश्री, आधा चम्मच चोबचीनी का चूर्ण तथा आधा चम्मच देशी घी- इन सबको ठीक तरह से मिलाकर सुबह के समय खाली पेट इस्तेमाल करना चाहिए।
9. त्रिफलाः
शहद में त्रिफला का चूर्ण मिलाकर खाने से स्वप्नदोष जैसे रोग खत्म हो जाते हैं। लेकिन जिन लोगों का स्वभाव अधिक गर्म रहता हो उन लोगों को शहद की जगह पर मिश्री का इस्तेमाल करना चाहिए। अगर इसके अलावा चीनी मिला हुआ रस दे दिया जाए तो अधिक लाभ प्राप्त होगा।
10. सेमल की छाल :-
10 ग्राम सेमल की छाल दूध में पीसकर उसमे मिश्री मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से वीर्यदोष, स्वप्न दोष , दिमाग की कमज़ोरी सब दूर होती हैं।
11. बरगद का दूध :-
2 बूँद बरगद के पत्तो का दूध बताशे में मिला कर नियमित सेवन करने से स्वप्न दोष और वीर्य सम्बंधित अनेक रोग सही होते हैं।


12. नीम के पत्ते

हर रोज़ 2 पत्ते नीम के चबा चबा कर खाने से कभी स्वप्नदोष नहीं होगा.
13. देशी फूलः
देशी फूल की मुलायम कच्ची पत्तियों को लेकर छाया में सुखा लें। फिर इसमें इसके बराबर मिश्री मिला लें। इन सबको मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इसे एक कांच की शीशी में डालकर रख दें। इस चूर्ण को 5-6 ग्राम की मात्रा में लेकर ताजे पानी से सुबह-शाम के समय रोजाना सेवन करने से स्वप्नदोष दूर होता है।
14. धनियाः
धनिया व मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर बने हुए चूर्ण को 5 ग्राम की मात्रा में लेकर ताजा ठंडे पानी के साथ सुबह के समय रोजाना लगभग एक सप्ताह तक इस्तेमाल करने से रोजाना होने वाला स्वप्नदोष समाप्त हो जाता है तथा पेशाब करने वाली नली में दर्द होना, उपदंश और सूजाक आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
15. जामुनः
जामुन की गुठली का चूर्ण 4 ग्राम की मात्रा में लेकर शाम के समय लगभग 15 दिनों तक सेवन करते रहने से स्वप्नदोष के अधिक हो जाने के कारण शरीर में कमजोरी आ गई हो तो वह दूर हो जाती है। इस मिश्रण के सेवन करते रहने तक खट्टी चीजों का इस्तेमाल न करें।
16. गुलाब के फूलः
ताजे गुलाब के फूल की 5-6 पंखुड़ियां लेकर उसमें मिश्री को मिलाकर सुबह और शाम के समय चबाकर खा लें। फिर इसके ऊपर गाय का दूध पी लें। इस तरह से रोजाना सेवन करते रहने से स्वप्नदोष का रोग समाप्त हो जाता है।
17. बादामः
1 पीस बादाम गिरी, थोड़ा सा मक्खन तथा 3-3 ग्राम गिलोय- इन सभी को बराबर की मात्रा में मिलाकर इसमें 7-8 ग्राम शहद मिलाकर एक समान भाग बना लें। इस मिश्रण को 8 से लेकर 10 दिनों तक सुबह और शाम के समय प्रयोग करने से स्वप्नदोष के रोग समाप्त हो जाते हैं।
18. आंवलाः
स्वप्नदोष के रोग को दूर करने के लिए 6 ग्राम आंवले के चूर्ण में शहद मिलाकर खा लें। इसके बाद ऊपर से इसमें मिश्री मिलाकर पानी पी लेना चाहिए।



10/12/17

शकरकंद के इतने फायदे जानते हैं आप? //Do You know so many benefits of sweet potato


शकरकंद को स्वीट पोटैटो के नाम से भी जाना जाता है और इसमें ऊर्जा का खजाना होता है. अक्सर लोग इसे आलू से जोड़कर देखते हैं लेकिन पोषक तत्वों और स्वास्थ्य के लिहाज से इसके कई फायदे हैं. 
 * शकरकंद या स्वीट पोटैटो का सेवन सर्दियों में लाभदायक होता है. सर्दियों में कंद-मूल अधिक फायदेमंद रहते हैं, क्योंकि ये शरीर को गर्म रखते हैं. शकरकंद की गहरे रंग की प्रजाति में कैरोटिनॉयड जैसे, बीटा-कैरोटीन और विटामिन ए अधिक मात्रा में पाया जाता है. 100 ग्राम शकरकंद में 400 फीसदी से अधिक विटामिन ए पाया जाता है.
* शकरकंद में आयरन, फोलेट, कॉपर, मैगनीशियम, विटामिन्‍स आदि होते हैं, जिससे इम्‍यून सिस्‍टम मजबूत बनता है. इसको खाने से त्‍वचा में चमक आती है और चेहरे पर जल्‍दी झुर्रियां नहीं पड़ती. इसमें मौजूद विटामिन सी त्‍वचा में कोलाजिन का निर्माण करता है जिससे आप सदाबाहर जवां और खूबसूरत रहते हैं. 

* शकरकंद में भरपूर मात्रा में आयरन होता है. आयरन की कमी से हमारे शरीर में एनर्जी नहीं रहती, रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और ब्लड सेल्स का निर्माण भी ठीक से नहीं होता. शकरकंद आयरन की कमी को दूर करने में मददगार रहता है. 



* अगर आपको का ब्‍लड शुगर लेवल कुछ भी खाने से तुरंत ही बढ जाता है तो, शकरकंद खाना ज्‍यादा अच्‍छा होता है. इसे खाने से ब्‍लड शुगर हमेशा नियन्‍त्रित रहता है और इंसुलिन को बढने नहीं देता. 


 * शकरकंद पोटैशियम का एक बहुत अच्छा माध्यम है. यह नर्वस सिस्टम की सक्रियता को सही बनाए रखने के लिए आवश्यक है. साथ ही किडनी को भी स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता है.
* शकरकंद डायट्री फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है. शकरकन्‍द खाने में मीठा होता है. इसके सेवन से खून बढ़ता है, शरीर मोटा होता है साथ ही यह कामशक्ति को भी बढ़ाता है. नारंगी रंग के शकरकंद में विटामिन ए भरपूर मात्रा में पाया जाता है. शकरकंद में कैरोटीनॉयड नामक तत्व पाया जाता है जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है. वहीं इसमें मौजूद विटामिन बी6 डायबिटिक हार्ट डिजीज में भी फायदेमंद होता है
* यह उच्च मात्रा वाला स्टार्च फूड है, जिसके 100 ग्राम में 90 कैलोरीज होती हैं. शकरकंद खाने में मीठा होता है. इसके सेवन से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोगों और सम्पूर्ण तौर पर मृत्युकारक जोखिम कम होते हैं. यह आरोग्यवर्धक तथा ऊर्जा वर्धक होता है, पर वजन को कम करने में मददगार होता है. 

* शकरकंद विटामिन डी का एक बहुत अच्छा सोर्स है. यह विटामिन दांतों, हड्ड‍ियों, त्वचा और नसों की ग्रोथ और मजबूती के लिए आवश्यक होता है. शकरकंद विटामिन ए का बहुत अच्छा माध्यम है. इसके सेवन से शरीर की 90 प्रतिशत तक विटामिन ए की पूर्ति हो जाती है.
* शकरकंद में कैलोरी और स्टार्च की सामान्य मात्रा होती है. वहीं, सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा इसमें न के बराबर रहती है. इसमें फाइबर, एंटी-ऑक्सीडेंट्स, विटामिन और लवण भरपूर पाए जाते हैं. 

* शकरकंद में भरपूर मात्रा में विटामिन बी6 पाया जाता है, जो शरीर में होमोसिस्टीन नाम के अमीनो एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है. अगर इस अमीनो एसिड की मात्रा बढ़ने पर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है.


7/12/17

शीतकाल मे बढ़ाएं अपनी यौन शक्ति (पलंगतोड़ नुस्खे)

    

    आजकल युवा लोगों में सबसे बड़ी चिंता शीघ्रपतन को लेकर रहती है जाहिर है की नवविवाहित पुरषों में ये अधिक होती है अगर वो इन 10 घरेलू नुस्खों में से एक या दो को भी अपनी पाचन शक्ति के अनुसार अपना लेते है तो उनके जीवन में बहार आ जाएगी इन नुस्खों के इस्तेमाल में 2 या 3 बातो का विशेष ध्यान रखे एक तो कब्ज न रहने दे और कोई भी नुस्खा अपनाए तो अपनी पाचन शक्ति के अनुसार और सबसे बड़ी बात खान-पान का पूरा ध्यान रखे खट्टे व् मिर्च वाले भोजन न करें अनारदाना तो मनुष्य को नपुंसकता की और लेकर जाता है।


सेक्स पावर बढ़ाने के नुस्खे -

*सफेद मूसली का चूर्ण एक-एक चम्मच सुबह-शाम फांक कर ऊपर से एक गिलास मिश्री मिला दूध पी ले यह प्रयोग 12 महीने करें यह प्रयोग करने से शरीर कभी भी कमजोर  नहीं होगा और बल वीर्य बढ़ेगा और यौन शक्ति बनी रहेगी|
*आधा सेर दूध में चार छुहारे डाल कर उबाले जब खूब अच्छी तरह दूध उबलने लगे तो इसमें केसर की 5 -6 पंखुड़िया और 4 चम्मच मिश्री डाल दीजिये जब दूध उबालकर आधा रह जाये तो इस दूध को सोने से पहले घूंट-घूंट कर के पी जाये यह बहुत ही पोष्टिक प्रयोग है और शीतकाल में करने योग्य है|
मुलहठी का चूर्ण एक चम्मच (6 ग्राम ) और एक छोटा चम्मच देसी घी और दो चम्मच शहद मिलाकर चाट ले इसके बाद एक गिलास दूध में आधा चम्मच सौंठ और एक चम्मच मिश्री डालकर उबालकर थोड़ा ठंडा करके पिए यह प्रयोग शरीर की सभी धा-तुओं को बेहद पुष्ट कर देगा| इस प्रयोग को हर रोज सोने से पहले या सहवास के बाद करना चाहिए
*इमली के बीज चार दिन तक पानी में घोलकर रखे इसके बाद इनका छिलका हटाकर इसकी गिरी के दोगुने वजन के बराबर दो वर्ष पुराण गुड लेकर मिला ले अभी इनको पीसकर बराबर कर ले अभी इसकी छोटे बेर जितनी गोलिया बना ले और छाया में सुखा लीजिए सहवास करने से दो घंटे पहले पानी के साथ निगल ले यह धातु पोष्टिक नुस्खा है|
   


*असगंद और बिधारा दोनों को अलग-अलग कुट पिसकर महीन चूर्ण बना कर बराबर मात्रा में मिला लीजिए हर रोज सुबह एक चम्मच चूर्ण थोड़े से घी में मिलाकर चाट ले और ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले हर सर्दियों में यह प्रयोग 3 -4 महीने के लिए करें और इसके साथ नारियल तेल या नारायण तेल की मालिश शरीर पर करें फिर देखे इस नुस्खे का चमत्कार|

    *उड़द की दाल पिसवाले इसे शुद्ध देसी घी में सेंककर कांच के बर्तन में भरकर रख ले एक-एक चम्मच यह दाल थोड़े से घी में मिलाकर सुबह व रात को सोते समय खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले इससे धातु ,बल ,वीर्य स्तंभन  बढ़ेगी| अगर उड़द न पचा सके तो एक समय ही ले|
*कोंच के बीज 250 ग्राम ,ताल मखाना 100 ग्राम और मिश्री 350 ग्राम इन सबको अलग-अलग पीसकर चूर्ण कर ले और मिलाकर शीशी में भर ले सुबह-शाम इस चूर्ण को एक-एक चम्मच मिश्री वाले दूध के साथ पिए
*सफेद या लाल प्याज का रस ,शहद,अदरक का रस ,देसी घी 6 -6 मिलाकर नित्य चाटे एक महीने के सेवन से नपुंसक भी शक्तिशाली हो जाता है नित्य करने से सेक्स पावर बहुत बढ़ जाती है|
*सूखे सिंघाड़े पिसवा लीजिए इसके आटे का हलवा बनाकर सुबह नाश्ते में अपनी पाचन शक्ति के अनुसार खूब चबा-चबा कर खाये यह शरीर को पुष्ट और शक्तिशाली बनाता है नवविवाहित नोजवानो के लिए यह बहुत ही उपयोगी है इससे धातु पुषट होकर शरीर बलिष्ठ होता है|
*शकरकंदी का हलवा देसी घी में बनाकर हर रोज नाश्ते में खाये इसके गुण सिंघाड़े के आटे के हलवे के बराबर है हर रोज खाने वाला व्यक्ति कभी भी शीघ्र पतन का शिकार नहीं होता|



26/11/17

विटामिन बी कॉम्पलेक्स के फायदे और स्रोत

    स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी-12 एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।    विटामिन बी कॉम्पलेक्स जल में घुलनशील विटामिन है। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन है। विटामिन बी कॉम्पलेक्स की शरीर में कमी हो जाए तो स्मरण शक्ति कमजोर हो सकती है, आप अचानक थकान महसूस कर सकते हैं, डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।
स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी कॉम्पलेक्स एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।
क्यों है जरूरी विटामिन बी कॉम्पलेक्स
विटामिन बी कॉम्पलेक्स मेटॉबालिज्म बढ़ाता है। यह पोषण को ऊर्जा में बदलने के काम करता है। हमारी कोशिकाओं में पाए जाने वाले जीन डीएनए को बनाने और उनकी मरम्मत में सहायता करता है। यह ब्रेन, स्पाइनल कोर्ड और नसों के कुछ तत्वों की रचना में भी सहायक होता है। हमारी लाल रक्त कोशिशओं का निर्माण भी इसी से होता है। यह शरीर के सभी हिस्सों के लिए अलग-अलग तरह के प्रोटीन बनाने का भी काम करता है।
क्या हैं लक्षण-
विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी से हाथ-पैरों में झनझनाहट और जलन, जीभ में सूजन, कुछ भी याद रखने में परेशानी, त्वचा का पीला पड़ना, कमजोरी महसूस होना, चलने में कठिनाई, अनावश्यक थकान, डिप्रेशन आदि समस्याएं हो सकती हैं। अगर शरीर में विटमिन बी-12 की बहुत ज्यादा कमी हो जाए तो इससे स्पाइनल कोर्ड की नसें नष्ट होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पैरालिसिस का भी अटैक हो सकता है।
विटामिन बी कॉम्पलेक्स के स्रोत-
अक्सर यह सवाल उठता है कि हमें अपने खानपान में किन चीजों को शामिल करना चाहिए, ताकि शरीर में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी न हो। हालांकि मांसाहारी पदार्थों में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की भरपूर मात्रा होती है, परन्तु शाकाहारी लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए। विटामिन बी कॉम्पलेक्स के कुछ मुख्य स्रोत है। हमें डेरी उत्पादों का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए जैसे दूध, दही, पनीर, चीज, मक्खन, सोया मिल्क आदि। इसके अलावा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि में भी विटामिन बी आंशिक रूप से पाया जाता है।
विटामिन बी काम्पलेक्स के तत्व-
   विटामिन- बी कोई एक तत्व नहीं होता। यह कई रूपों में पाया जाता है। मुख्य रूप से इसकी संख्या चार है- बी-1, बी- 2, बी- 6 और बी- 16 इत्यादि। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘बी-कम्पलेक्स’ कहा जाता है। बी-कम्पलेक्स विटामिन-सी (एस्कॉर्बिक एसिड) की भांति जल में घुलनशील है।
विटामिन- बी समूह का पहले सदस्य ‘थाइमीन’ है। अत: इसे बी-1 कहा जाता है। यह स्नायु और पाचन-प्रणाली को स्वस्थ रखता है। रोगाणुओं से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी कमी से भूख कम लगती है। कमजोरी का अनुभव होता है। ‘बेरी-बेरी’ नामक रोग हो जाता है। मानसिक असंतुलन की समस्या पैदा होती है। यह हमे जौ, बाजरा, ज्वार, मैदा, चावल, सोयाबीन, गेहूं, अंकुरित अनाज, दलिया, मटर और मूंगफली से प्राप्त होता है।
विटामिन बी- 12 को ‘राइबो-फ्लोबिन’ भी कहते हैं। यह मुंह, जीभ और नेत्रों के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से जीभ लाल हो जाती है, मुंह में छाले पड़ जाते हैं। मुंह के कोण फट जाते हैं, नासिका द्वार पर पपड़ी हो जाती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। दूध, खमीर, अनाज, दालें, दही और हरी पत्तेदार सब्जियां इसके प्रमुख स्रोत हैं।
     विटामिन बी- 6 को रसायन विज्ञान की भाषा में ‘पाइरीडॉक्सीन’ कहते हैं। यह त्वचा के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से बुध्दि मंद पड़ जाती है। शरीर में एेंठन आती है। यह दूध, कलेजी, खमीर, मांस और अनाज में पाया जाता है।
विटामिन- बी12 का रासायनिक नाम ‘सायनोकाबालामीन’ है। यह त्वचा, तंत्रिका, उत्तक, हड्डियों और मांसपेशियों के लिए जरूरी है। इसकी कमी से एनीमिया रोग हो जाता है। यह मुख्यत: मांस, मछली, अंडा, दूध और पनीर से मिलता है।
बी- कम्पलेक्स में अन्य विटामिन इस प्रकार हैं- नाइकोटोनिक एसिड, बायोटीन, पैन्टोथेनिक एसिड और फालिक एसिड इत्यादि।
बी-कम्पलेक्स को दवा के रूप में भी सेवन कर सकते हैं। अधिकतर विटामिन की दवाइयों के साथ विटामिन- सी भी मिला हुआ रहता है। अनेक मशहूर ब्रांड के बी-कम्पलेक्स की दवाइयां मिलती है। जिनमें प्रमुख हैं- कोबाडेक्स फोर्ट कैप्सूल, बी- फ्लेक्स फोर्ट टेबलेट, पोली-विषयन सीरप व टेबलेट, बीको जाइमसी-फोर्ट टेबलेट, बेसीलेक इत्यादि।

शरीर के लिए विटामिन ई की उपयोगिता,फायदे


    शुरू मे ही बतादें कि हमारे शरीर के  लिए सभी विटामिन्स का अपना-अपना महत्व है, लेकिन उनमें कुछ की खास भूमिका होती है। ऐसे विटामिन्स में एक प्रमुख है विटामिन ई। चाहे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनाए रखने की बात हो या शरीर को एलर्जी से बचाए रखने की या फिर कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में प्रमुख भूमिका निभाने की, यह विटामिन बहुत जी जरूरी होता है। इसे प्राप्त करना भी बहुत मुश्किल नहीं है, बता रही हैं शमीम खान
     विटामिन ई हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। विटामिन ई वसा में घुलनशील विटामिन है। यह एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में भी कार्य करता है। इसके आठ अलग-अलग रूप होते हैं। कोशिकाएं एक दूसरे से इंटरएक्ट करने में विटामिन ई का उपयोग करती हैं और कई महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।
विटामिन ई के स्त्रोत-
अंडे, सूखे मेवे, बादाम और अखरोट, सूरजमुखी के बीज, हरी पत्तेदार सब्जियां, शकरकंद, सरसों, शलजम, एवोकेडो, ब्रोकली, कड लीवर ऑयल, आम, पपीता, कद्दू, पॉपकार्न।
शरीर के लिए कितनी मात्रा है उपयोगी-
आपको प्रतिदिन कितने विटामिन ई की आवश्यकता है, यह आपकी उम्र और लिंग पर निर्भर करता
है। इसके अलावा गर्भावस्था, स्तनपान और बीमारियां उस मात्रा को बढम देती हैं, जिसकी आपके शरीर को आवश्यकता होती है।
नवजात शिशु से छह माह: 4 मिलिग्राम / दिन
नवजात शिशु 7 से 12 माह: 5 मिलिग्राम / दिन
बच्चे 1 से 3 वर्ष: 6 मिलिग्राम / दिन
बच्चे 4 से 8 वर्ष: 7 मिलिग्राम / दिन
बच्चे 9 से 13 वर्ष: 11 मिलिग्राम / दिन
14 वर्ष और उससे बडे: 15 मिलिग्राम / दिन
स्तनपान कराने वाली महिलाएं: 17 मिलिग्राम / दिन
विटामिन ई की गंभीर कमी के लक्षण-
1 शरीर के अंगों का सुचारू रूप से कार्य न कर पाना।
2 मांसपेशियों में अचानक से कमजोरी आ जाना।
3 आंखों के मूवमेंट में असामान्य स्थिति पैदा हो जाना।
4 नजर कमजोर हो जाना। दिखने में झिलमिलाहट महसूस होना।
5 चलने में लड़खड़ाट होना। कई बार कमजोरी महसूस होना।
6 प्रजनन क्षमता कमजोर हो जाना। शरीर में कमजोरी महसूस होना।




आनुषंगिक  प्रभाव-
      विटामिन ई युक्त भोजन खाना खतरनाक या नुकसानदेह नहीं है। हालांकि सप्लीमेंट के रूप में विटामिन ई के हाई डोज लेना नुकसानदेह हो सकता है। इसकी अधिकता से ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है और मस्तिष्क में गंभीर ब्लीडिंग हो सकती है। गर्भवती महिला के शरीर में विटामिन ई की अधिक मात्रा से बच्चे में बर्थ डिफेक्ट भी हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि विटामिन ई के सप्लीमेंट बिना डॉक्टर की सलाह के न लें, खासतौर पर जब आप रक्त को पतला करने वाली दवाईयों जैसे एस्प्रिन ले रहे हों।
    उन लोगों को भी विटामिन ई का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए, जिनमें विटामिन के की कमी हो। इस बात के प्रमाण भी मिले हैं कि अगर नियमित रूप से अधिक मात्रा में विटामिन ई का सेवन किया जाए तो मृत्यु भी हो सकती है।
विटामिन ई के अन्य स्त्रोत-
   हमारा शरीर विटामिन ई का निर्माण नहीं कर सकता है, इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि आप इसे पर्याप्त मात्रा में लें। वैसे भोजन से विटामिन ई प्राप्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है। हम सभी खाना बनाने में तेल का उपयोग करते हैं, जो विटामिन ई के अच्छे स्त्रोत हैं। इसलिए तेल का नियमित सेवन करें।
विटामिन ई की उपयोगिता-
   विटामिन ई त्वचा की देखभाल करने और स्वस्थ रखने वाला विटामिन है। यह त्वचा को रूखेपन, झुर्रियों, समय से पहले बूढ़ा होने और सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाता है।
यह लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है।
कई अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि जिन लोगों के शरीर में विटामिन ई की मात्रा अधिक होती है, उनमें दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।
विटामिन ई मेनोपॉज के बाद महिलाओं में स्ट्रोक की आशंका को कम करता है।
विटामिन ई कैंसर से भी रक्षा करता है। कई शोधों में यह बात सामने आई है कि जिन लोगों को कैंसर होता है, उनके शरीर में विटामिन ई की मात्रा कम होती है।
2010 में हुए एक अध्ययन के अनुसार जो लोग विटामिन ई के सप्लीमेंट लेते हैं, उनमें अल्जाइमर्स होने का खतरा कम हो जाता है।
विटामिन ई दूसरे एंटी ऑक्सीडेंट्स के साथ मिलकर मैक्यूलर डीजनरेशन से बचाता है। यह रेटिना की सुरक्षा भी करता है।
यह महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द से भी बचाता है।
विटामिन ई की कमी डायबिटीज का खतरा बढ़ा देती है।
ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम में भी यह उपयोगी है।
इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है।
विटामिन ई बाल झड़ने के लिए ली जाने वाली दवाइयों के साइड इफेक्ट को भी कम करता है।
एलर्जी की रोकथाम में भी उपयोगी है।
बच्चों में यह कंकाल तंत्र के विकास के लिए जरूरी है।
शरीर में विटामिन ए और के के भंडारों का रखरखाव करता है।
यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करता है।
ज्ञातव्य-
विटामिन ई ब्लडप्रेशर की दवाइयों के अवशोषण को रोकता है।
शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने वाली दवाइयां विटामिन ई का स्तर कम करती हैं।
कैंसर की दवाइयां भी विटामिन ई के स्तर को प्रभावित करती हैं।
जिन लोगों के शरीर में वसा को अवशोषण करने में कठिनाई होता है, उनमें भी विटामिन ई की कमी हो जाती है।
विटामिन ई कीमोथेरेपी के लिए उपयोग की जाने वाली दवाइयों के प्रभाव को कम कर देता है।
समयपूर्व जन्मे बच्चे में जन्मजात ही विटामिन ई की मात्रा कम होती है।
विटामिन ई को अवशोषित करने के लिए हमारे पाचनतंत्र को वसा की आवश्यकता होती है।