2/11/17

मोतियाबिंद के घरेलू प्राकृतिक उपचार



मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है।
कारण : 
मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्जमोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियाति‍बिंद को जन्म दे सकती हैं।
मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक  प्राकृतिक उपचार 
रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो।
सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है। पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है। कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है।
मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज::
आंखों में लगाने वाली औषधियाँ-
त्रिफला के जल से आंखें धोना::
आयुर्वेद में हरड़ की छाल (छिलका), बहेड़े की छाल और आमले की छाल - इन तीनों को त्रिफला कहते हैं । यह त्रिदोषनाशक है अर्थात् वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं उन सबको दूर करने वाला है । मस्तिष्क सम्बन्धी तथा उदर रोगों को दूर भगाता है तथा इन्हें शक्ति प्रदान करता है । सभी ज्ञानेन्द्रियों के लिये लाभदायक तथा शक्तिप्रद है । विशेषतया चक्षुरोग के लिये तो रामबाण है । कभी-कभी स्वस्थ मनुष्यों को भी त्रिफला के जल से अपने नेत्र धोते रहना चाहिये । नेत्रों के लिए अत्यन्त लाभदायक है । कभी-कभी त्रिफला की सब्जी खाना भी हितकर है ।
धोने की विधि - त्रिफला को जौ से समान (यवकुट) कूट लो और रात्रि के समय किसी मिट्टी, शीशे वा चीनी के पात्र में शुद्ध जल में भिगो दो । दो तोले वा एक छटांक त्रिफला को आधा सेर वा एक सेर शुद्ध जल में भिगोवो । प्रातःकाल पानी को ऊपर से नितारकर छान लो । उस जल से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धोवो । सारे जल का उपयोग एक बार के धोने में ही करो । इससे निरन्तर धोने से आंखों की उष्णता, रोहे, खुजली, लाली, जाला, मोतियाबिन्द आदि सभी रोगों का नाश होता है । आंखों की पीड़ा (दुखना) दूर होती है, आंखों की ज्योति बढ़ती है । शेष बचे हुए फोकट सिर पर रगड़ने से लाभ होता है ।
त्रिफला की टिकिया
(१) त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं ।
(२) हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है ।
* मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है।
* हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है।
* छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 ग्राम लें। इसे 200 ग्राम काले सुरमा के साथ 500 मिलीलीटर गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं।
* 10 ग्राम गिलोय का रस, 1 ग्राम शहद, 1 ग्राम सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है।

* मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है। सभी औषधियां परीक्षित हैं।
नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
1॰अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।
2 घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
3 सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।
4 विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।

5  आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० मिलि. ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।
6 भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।

7  भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।
मोतियाबिंद दो प्रकार का होता है।
8 लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
9 आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।
10 पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटीश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है।

11  एक और सरल उपाय बताते हैं- अपनी दोनों हथेलियां आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। मोतियाबिंद से लडाई का अच्छा तरीका है।
12  किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है।
13  500 ग्राम सूखे आँवले गुठली रहित, 500 ग्राम भृंगराज का संपूर्ण पौधा, 100 ग्राम बाल हरीतकी, 200 ग्राम सूखे गोरखमुंडी पुष्प और 200 ग्राम श्वेत पुनर्नवा की जड़ लेकर सभी औषधियों को खूब बारीक पीस लें। इस चूर्ण को अच्छे प्रकार के काले पत्थर के खरल में 250 मिलीलीटर अमरलता के रस और 100 मिलीलीटर मेहंदी के पत्रों के रस में अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इसमें शुद्ध भल्लातक का कपड़छान चूर्ण 25 ग्राम मिलाकर कड़ाही में लगातार तब तक खरल करें, जब तक वह सूख न जाए। इसके बाद इसे छानकर कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इसे रोगी की शक्ति व अवस्था के अनुसार 2 से 4 ग्राम की मात्रा में ताजा गोमूत्र से खाली पेट सुबह-शाम सेवन करें।

1.nuclear cataract.
2.cortical cataract.
उक्त दोनो तरह के मोतियाबिंद बनने से रोकने के लिये विटामिन ए तथा बी काम्प्प्लेक्स का दीर्घावधि तक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अगर मोतियाबिंद प्रारंभिक हालत में है तो रोक लगेगी।
व्यायाम व योगासन-
* औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें।
* आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें।
सावधानी-
* सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें।
* मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर  खाएं।
* वनस्पति घी, बाजार में मिलने वाले घटिया-मिलावटी तेल, मांस, मछली, अंडा आदि सेवन न करें। मिर्च-मसाला व खटाई का प्रयोग न करें। कब्ज न रहने दें। अधिक ठंडे व अधिक गर्म मौसम में बाहर न निकलें

23/10/17

शराब को शरीर पर रगड़ने से होते है कई फायदे



     एल्कोहल का नाम आते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले इससे होने वाले नुकसान घूमने लगते हैं। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इस बदनाम एल्‍कोहल को शरीर पर रगड़ने मात्र से ही कई बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। अगर विश्‍वास नहीं हो रहा है तो आइए जानें एल्‍कोहल को शरीर पर रगड़ने किन समस्‍याओं से छुटकारा पाया जा सकता है।
   बीमारियों को दूर करने के लिए आप हजारों रुपए खर्च करते हैं। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि सेहत के लिए बेहद खतरनाक मानी जाने वाली एल्कोहल भी आपके लिए फायदेमंद हो सकती है। दरअसल, शराब यानी एल्कोहल का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले इसके बुरा असर ही दिखाई देता है। आपको ये जानकर हैरानी जरूर होगी लेकिन वाकई ये बात सच है कि एल्कोहल को शरीर पर रगड़ने भर से कई बीमारियां हो जाती हैं छूमंतर।
कान में जब पानी चले जाए



अगर नहाते वक्त कान में पानी चला जाए तो बेचैनी होने लगती है। कान में पानी जाने से कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं, कान में एलर्जी हो जाना,ठीक तरह से सुनाई न देना और खुजली जैसी समस्या पैदा हो जाती है। लेकिन एल्कोहल और विनेगर से आप इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। इसके लिए आपको बस एक काम करना होगा। एल्‍कोहल की कुछ बूंदों को अपने कान के आस-पास रगड़ें। ऐसा करने से कान से पानी सूखता है और विनेगर इंफेक्‍शन को दूर करता है।

कोल्‍ड सोर की समस्‍या
ठंड के मौसम में अक्सर होंठ और नाक के आसपास लाल धब्बे पड़ जाते हैं। अधिकांश बार तो इस वजह से बुखार भी आ जाता है। इसे ही कोल्‍ड सोर कहते हैं। अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हो तो आप एल्कोहल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए जिस जगह को ठीक करना है उस जगह पर 10 मिनट तक एल्कोहल लगा लें। 10 मिनट बाद धो लें।
घाव भरने में सहायक
अगर आपको कहीं चोट लग जाए तो घबराएं नहीं फटाफट इसमें एल्कोहल लगा लें। 10 मिनट तक इसे ऐसे ही घाव पर लगा रहने दें। ऐसा करने पर आपको इंफेक्शन नहीं होगा। लेकिन ध्यान दें कि घाव पर एल्कोहल लगाने से आपको हल्का सा जलन होगा बाद में घाव खुद-ब-खुद ठीक हो जाएगा।
मसल्‍स पेन दूर करने में
एक्सरसाइज के दौरान अक्सर मसल्स में दर्द होने लगता है। अगर आप भी मसल्स के दर्द से राहत पाने के लिए दवाईयों का सेवन करते हैं तो अब सावधान हो जाएं। आप अपने मसल्स पर एल्कोहल लगा लें। करीब 1 घंटे तक ऐसे ही रहने दें।1 घंटे बाद पानी से धो लें। मसल्स पेन धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा।
इस तरह शराब को शरीर लगाने से बहुत फायदे होते है और बहुत सी बीमारियां दूर होती है।




21/10/17

भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे

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भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम -
 अगर आपको भूख कम लगती हो तो लहसुन का सेवन करना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। यह आपके डाइजेस्टिव सिस्टम को ठीक करता है जिससे आपकी भूख भी बढ़ा जाती है।
कॉलेस्ट्राल और ह्रदय - यह बढ़े हुए कॉलेस्ट्राल को कम करता है साथ ही ह्रदय के लिए फ़ायदेमंद है।
एसिडिटी - 
कभी-कभी आपके पेट में एसिड बनने लगता है, लेकिन इसका सेवन करने से यह पेट में एसिड बनने से रोकता है। जिससे आपको तनाव से भी निजात मिल जाता है।
मोटापा - रोजाना भुने हुए लहसुन का सेवन करने से हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ जाता है। जिससे बहुत ही जल्दी आपका फैट बर्न हो जाता है।
ब्लड प्रेशर - 
 भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
कैंसर -
भुने हुए लहसुन खाने से शरीर के अंदर उत्पन्न होने वाले कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती है।
भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
विषैले पदार्थ -
शरीर में मौजूद विषैले पदार्थों को मल या मूत्र मार्ग से बाहर करता है
हड्डियां मज़बूत करे -
शरीर की हड्डियां मजबुत होती है।
श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्या - 
लहसुन आपकी श्वसन तंत्र के लिए काफी फायदेमंद है। इसका सेवन करने से अस्थमा, निमोनिया, ज़ुकाम, ब्रोंकाइटिस, पुरानी सर्दी, फेफड़ों में जमाव और कफ आदि से निजात और बचाव होता है।
एनर्जी बढ़ाए -
शरीर में खास प्रकार की एनर्जी आती है। जिसके आपके अंदर का आलस्य खत्म हो जाता है।
संक्रमण को खत्म करे - भुने हुए लहसुन खाने के 6 घंटे के बाद हमारे रक्त में मौजूद संक्रमण को खत्म करने का काम करता है।



13/10/17

ग्रहणी रोग (IBS) के कारण,लक्षण और आयुर्वेदिक उपचार



    ग्रहनी (आई बी एस): इस रोग का कोई निश्चित कारण नही है. पाचाशय में विभिन्न प्रकार की किण्वक(enzymes) का समूह मौजूद है जिससे खाए हुए भोजन का पाचन किया जाता है (अग्नि) इसी को जठराग्नि भी कहा जाता है. इस पाचाशय का कार्य एक तरफ से भोजन को ग्रहण करना है और दूसरी ओर से ना पचने वाले तत्वों का निष्कासन करना है.
परंतु यदि यह तंत्र शक्ति विहीन पड़ जाए तो यह अनपचे भोजन को ही बाहर निकालने लग जाती है. इस कारण अनेक प्रकार की समस्याएँ एवम् रोग उतन्न हो जाते हैं. जिनमें से एक आई बी एस है. इस व्याधि में आँतों की गति सामान्य से अधिक हो जाती है. इस कारण पेट में दर्द, कब्जियत, पेचिश, अथवा अंतडियों में तनाव उत्पन्न हो जाता है.


विभिन्न प्रकार की ग्रहिणी एवं उनके लक्षण

इस रोग में पाचक तंत्र में क्रम से बारी-बारी से रोगी को कभी कब्जियत और कभी पेचिश हो जाती है. इस रोग में रोगी को प्यास अधिक लगती है, मुँह में बेस्वाद्पन, आँखों से सामने अंधेरा आना, पैरों में सूजन, जिससे अंतडियों के उपरी अथवा निचले भाग में विभिन्न रूप से वायु आदि विकार होते रहते हैं.
इस रोग में सिर में दर्द, कमर में दर्द, जोड़ों अथवा छाती में दर्द इत्यादि लक्षण सामने आते हैं.
कब्जियत-प्रधान वाला आइबेस वातज ग्रहनी आई बी एस)
पित्तज ग्रहिनि प्रधान (पेचिश की प्रधानता वाला आई बी एस)
कफज़ ग्रहनी प्रधान (दस्त-प्रधान आई बी एस)
त्रिदोष ग्रहनी प्रधान जटिल आई बी एस 
इसके अलावा आयुर्वेदीय शस्त्रों में दो अन्य प्रकार की ग्रहनी का भी उल्लेख है:
समग्रह ग्रहनी
घटियांत्र ग्रहनी  वातज ग्रहनी
इस रोग में त्वचा की रुक्षता, गले और मुख का सूखना इस प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं. रोगी को ज़्यादातर कब्जियत रहती है या फिर क़ब्ज़ के बाद दस्त, इस प्रकार का क्रम चलता रहता है. गॅस, खट्टे डकार, और अत्यधिक प्यास का लगना, हल्की ठंड महसूस होना, कमर में या कटी प्रदेश में दर्द, वज़न में गिरावट, अनिद्रा तथा घबराहट जैसे लक्षण इस रोग में पाए जाते हैं.
पित्तज ग्रहनी
अत्याधिक प्यास लगना, सीने में जलन, अधिक गर्मी लगना, चिड़चिड़ापन, बात-बात पर क्रोधित हो जाना, शरीर के अंगों में सूजन, बुखार आना, अत्यधिक पसीना आना, मल में अत्याधिक दुर्गंध का होना, डकार.
कफज ग्रहनी
वमन, अपच, मुख और कंठ प्रदेश में अत्यधिक लार का बनना, दुर्गंधयुक्त डकार, पेट पूरी तरह सॉफ ना हो पाना, छाती व पेट में भारीपन.
घटियांत्र ग्रहनी : इस प्रकार के रोग में प्रधान रूप से पेट में घरघराहट भरी आवाज़ के साथ-साथ आँतों का तेज़ी से गतिमान हो जाना है. यह रोग बच्चों में साध्य है, मध्यम आयु वालों के लिए आंशिक रूप से असाध्य एवं अंतिम अवस्था में पूर्णत्यः असाध्य माना जाता है.
आयुर्वेद अनुसार ग्रहनी का उपचा
आयुर्वेद में दोष की प्रधानता के अनुसार इसका इलाज किया जाता है. इस रोग के उपचार हेतु अनेकानेक वात हर औषधियों का प्रयोग किया जाता है. गर्म पानी का सेवन इस रोग में अत्यंत लाभदायक है.
चिकित्सा पद्धति
आयुर्वेद के अनुसार इस रोग की चिकित्सा हेतु रोगी की शरीर की संरचना, प्रधान दोष और उसका आहार-विहार, इन सब कारकों को ध्यान में रखा जाता है. दोष के अनुसार औषधि का प्रयोग किया जाता है. रोगी को जीवनचर्या में सुधार के लिए लाभदायक परामर्श भी दिया जाता है.
उपचार की पद्धति आँतों से निष्कासित मल में जीववीश की मौजूदगी पर भी निर्भर करती है.
यदि आँतों में विषाक्त पदार्थ मौजूद हैं और व्यक्ति अपच से ग्रस्त है तो सर्वप्रथम आँतों की सफाई हेतु रोगी को उपवास रखना चाहिए. साथ-ही साथ उसे पाचक एवं वातहर औषधियाँ भी दी जाती है.
वातज ग्रहनी में चित्रकादि वॅटी के प्रयोग द्वारा पाचन को प्रबल किया जाता है. शंख वॅटी के प्रयोग से आँतों में पड़े जीव विष को निकाला जाता है.
पाचक के उपरांत दशमूलादी घृत एवं त्रयुष्नदि घृत का प्रयोग लाभकर है.
कफज़ ग्रहनी में विरेचन विधि का प्रयोग अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होता है. रेचक औषधि के प्रयोग के उपरांत तीखे एवं खट्टे औषधियों का प्रयोग किया जाता है.
जटिल ग्रहनी का उपचार पंचकर्म की विधियों द्वारा किया जाता है जिसके पश्चात पाचक और वातहर औषधियों का प्रयोग हितकर सिद्ध होता है.
इस प्रकार में तीनों दोषों से उत्पन्न ग्रहनी के लक्षण पाए जाते हैं.
अन्य दो प्रकार की ग्रहिनि का उपचार
संग्रहणी ग्रहनी :
 यह रोग का अधिक घातक स्वरूप है. इसमें अधिकतर दिन में रोगी के पेट में आँतों के अत्यधिक आंदोलन के कारण घरघराहट होती है जिससे उसे बेचैनी का अनुभव होता है. यह रात्रि के समय शांत हो जाती है. रोगी को पीड़ाजनक पतला मल विसर्जन होता है जिसमे अनपचा भोजन भी रहता है.
घटियांत्र ग्रहनी
इस प्रकार की ग्रहिनी में पेट में अत्यंत घरघराने की आवाज़ आती है और आँतों में अत्यधिक आंदोलन पाया जाता है. विसरजित मल में अत्यधिक अनपचा पदार्थ की मौजूदगी पाई जाई है.
ग्रहिणी रोग में पथ्य एवं अपथ्य 
मुख्यतः साधारण भोजन ही खाया जाना चाहिए. परंतु जिन पदार्थों को खाकर गॅस बढ़ती हो, उन्हे भोजन में से निकाल देना हितकर है.
बीन्स, पत्तागोभी, आलू जैसे पदार्थ जिनसे अधिक वायु उत्पन्न होती , उन्हें ग्रहण ना करें. इसके अलावा सेब, अंगूर का रस, सूखे मेवे तथा केले का सेवन भी लाभकर सिद्ध होता है.
जिन रोगियों में लॅक्टोस से पाचक संबंधी समस्या पैदा होती है उन्हे दूध तथा दूध से बने पदार्थों का सेवन रोक देना चाहिए.
सोरबिटॉल (sorbitol), मान्निटॉल (mannitol) युक्त पदार्थों के सेवन से बचना सर्वथा उपयुक्त है.
इसके विपरीत लस्सी का प्रयोग इस रोग का निदान है. हींग, ज़ीरा, का तड़का लगाकर और सेंधा नमक युक्त लस्सी का सेवन इस रोग में अत्यंत लाभकारी और सरल उपाय है.
हल्का एवं सुपाच्य भोजन ही लें. बसी, तला हुआ, ठंडा, गरिष्ट भोजन, माँसाहार, इन सबका सेवन रोग में वृद्धि करता है.
पथ्य: पुराने चावल, तोराई, मुंग की डाल, अनार, लौकी, जवार, सोंठ, काली मिर्च, लस्सी, गर्म पानी
अपथ्य: मक्की, जौ, लोबिया, राजमा, पपीता, आलू, कचालू, प्याज़, सैन्जन (drumstick), साग, हरी पत्तियों वाली सब्जियाँ, माँस, अंडें, मदिरा, कद्दू, जिमिकन्द, आम, अनानास, तरबूज़, सेब, काजू.
कुछ असरदार घरेलू प्रयोग (Some Ayurvedic Home Remedies For IBS In Hindi)
जिन भोज्य पदार्थों से तकलीफ़ बढ़ जाती है, उन्हें पहचान कर अपने भोजन से निकाल दें.


आँतों की गतिशीलता को नियंत्रित करने वाले पदार्थों का सेवन हितकर है जैसे की इसबगोल क सेवन लाभ देता है. इसके साथ-साथ अधिक पानी पीना हितकर है.

सुनियमित जीवनचर्या को धारण करें, रात्रि को समय से शयन करना चाहिए, सोने से ३-४ घंटे पूर्व भोजन हो जाना चाहिए.
प्रातः काल जल्दी उठकर योगाभ्यास तथा प्राणायाम करने से यह प्राकृतिक रूप से पूर्णत्यः समाप्त हो जाती है.
ग्रहिणी में उपयुक्त आयुर्वेदीय प्रयोग
वातज ग्रहिणी:
अदरक, लोंग, मीठी सौंफ, ज़ीरा, एलाईची, दालचीनी इत्यादि से पाचन क्रिया में सुधार आता है.
हरतकी के उपयोग से शरीर में मौजूद अधिक वात बाहर निकल जाता है. पुरानी क़ब्ज़ को ठीक करने के लिए त्रिफला अत्यंत लाभकारी है. रात्रि को सोने से पूर्व इसका सेवन करना चाहिए.
शतावरी, अश्वगंधा, तिल तैल, ये तीनो ही वात को शांत करते हैं. अतएव इनका उपयोग लाभकारी है. स्नान से पूर्व तिल तेल से पेट पर हल्की मालिश करना अच्छा रहता है. मीठे, खट्टे और नमकीन तीनों तरह के भोजन का सेवन करना हितकर है.
पित्तज ग्रहिणी:
अम्लकि का प्रयोग रोगी के लिए हितकारक और पुष्टि प्रदयक है
धनिया और पुदीना युक्त पानी पीने से बढ़ा हुआ नियंत्रित होता है
चंदन को घी में सिद्ध कर उसमें मीठी सौंफ, काली मिर्च, लोंग, पिपल्ली मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है.
मुस्ता के सेवन से इस रोग से निवृत्ति प्राप्त होती है
घृत-कुमारी का रस, हल्दी, मंजिष्ठ, गुदुची, शतावरी ये सब पित्त को शांत कर पुष्टि प्रदान करते हैं.
मीठे, तिक्त (bitter) और कशाय(astringent) पदार्थों का सेवन अधिक करें.
कफज़ ग्रहिणी
अदरक, नींबू का रस, शहद द्वारा बढ़े हुए कफ को नियंत्रित किया जाता है.
त्रिकटु चूर्ण के प्रयोग से आँतों में फँसे विषैले मल के निकास में सहायक औषधि है.
हल्दी, एलाईची, दालचीनी, लोंग, ज़ीरा, जयफल, पिप्पली, सेंधा नमक का प्रयोग हितकर है.
गरम पानी के साथ आधा चम्मच हिंगवष्टक चूर्ण भोजन खाने के 1-2 घंटे पहले पाचक शक्ति को बढ़ाता है.
कटु, तिक्त और कशाय पदार्थों का सेवन अधिक करना चाहिए.
ग्रहिणी में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ 
दश्मूलादि घृत
पंचामृत परपाति
कुटज परपाति
बिल्वादि चूर्ण
चित्रकादि वॅटी
शंख वॅटी
रस-परपाति

दादिमास्तक चूर्ण
जतिफालादि चूर्ण




12/10/17

बेहतर सेक्स लाइफ के लिए क्या करें?// What to do for better sex life?


स्वस्थ और बेहतर सेक्स लाइफ का होना एक लंबे जीवन की निशानी मानी जाती है। बेहतर सेक्स लाइफ जहां इंसान को शारीरिक समस्याओं से दूर रखती है वहीं यह मानसिक अवसाद से भी दूर रखने में असरदार साबित होती है। आइए जानें कुछ ऐसे टिप्स (Sex tips) जिनसे आपकी सेक्स लाइफ बेहतर हो सकती है।
बेहतर सेक्स लाइफ के लिए टिप्स
किस करें -
सेक्स का अर्थ केवल इंटरकोर्स नहीं होता है। सेक्स से पहले मूड बनाने के लिए अपनी साथी को किस करना जरूरी है। यह अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से प्रदर्शित करने का भी एक तरीका होता है।
माहौल बनाएं -
आजकल मार्केट में कई ऐसे प्रोडक्ट्स आ चुके हैं जो आपके बेडरूम का माहौल बेहद रंगीन बना सकती हैं जैसे सुगंधित मोमबत्तियां, फ्लेवर्ड कंडॉम, सेक्स टॉय आदि। इनका प्रयोग करें और अपनी सेक्स लाइफ में थोड़ा तड़का लगाएं।
फोरप्ले करें -
सेक्स से पहले फोरप्ले के कई फायदे होते हैं। यह जहां महिलाओं को प्राकृतिक रूप से चिकनाहट लाने में मदद करता है वहीं पुरुषों को शीघ्रपतन की समस्या से भी बचाता है। इसमें किसिंग, लिकिंग, साथी को छूना, स्पाइसी टॉक करना आदि शामिल किया जा सकता है।
निडर बनें -
अकसर महिलाएं सेक्स के लिए पहल करने से बचती हैं ऐसे में पुरुषों को आगे आकर शुरुआत करनी चाहिए। हालांकि अगर महिलाएं पहल करती हैं तो यह एक बेहतर सेक्स लाइफ के लिए फायदेमंद हो सकता है।
सकारात्मक सोच- 
सेक्स को एक बड़ा इश्यू ना बनाएं। इसे नेचुरली लें, इसके प्रति सकारात्मक सोच रखें। यह रिश्ते के लिए जरूरी हो सकती है लेकिन प्राथमिक नहीं।
प्रयोग करें-
सेक्स के लिए कोई लिखित नियम नहीं हैं। यह तो बस मूड और सुविधा पर निर्भर करता है। इसलिए जरूरी नहीं है कि सेक्स केवल रात के समय या बेडरूम में ही किया जाए। साथ ही शायद एक ही पॉजिशन में सेक्स कर आप ऊब चुके हो, इसलिए कुछ नई सेक्स पॉजिशन भी ट्राई करें।  
अपने साथी को समझें-
कई बार ऑफिस की टेंशन के कारण या घर किसी समस्या के कारण हो सकता है आपके साथी का मन सेक्स के लिए राजी ना हो। ऐसे में उनपर दबाव ना डालें, अपने साथी की भावनाओं की कद्र करें। उनसे बात करें, उनके मूड को समझें, परेशानी को समझकर उन्हें इससे निकलने का रास्ता बताएं। ऐसा कर आप अपने साथी का टेंशन कम करते हैं जिससे उनका मन सेक्स से दूर नहीं भागता है और उन हसीन लम्हों के समय भटकता नहीं है।
एक अच्छी सेक्स लाइफ के लिए उपरोक्त टिप्स के साथ जरूरी है फिट बॉडी। फिट लोगों की सेक्स लाइफ के भी हिट होने के चांस अधिक होते हैं। इसलिए एक बैलेंस डाइट और डेली एक्सरसाइज को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।



11/10/17

कच्चे केले खाने के अनुपम फायदे //Unique Benefits of eating Raw Banana



   पके हुए केले के ढ़ेरो फायदों के बारे में आपको पता होगा और हो सकता है कि आप नियम से एक केला खाते भी हो. या फिर बनाना शेक पीते हों या स्मूदी. पका हुआ केला जहां चाव से खाया जाता है वहीं कच्चे केले का इस्तेमाल सिर्फ सब्जी और कोफ्ता बनाने में ही किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि आमतौर पर लोगों को इसके फायदों के बारे में पता ही नहीं होता.
कच्चा केला पोटैशियम का खजाना होता है जो इम्यून सिस्टम को तो मजबूत बनाता है ही साथ ही ये शरीर को दिनभर एक्टि‍व भी बनाए रखता है. इसमें मौजूद विटामिन बी6, विटामिन सी कोशिकाओं को पोषण देने का काम करता है. कच्चे केले में सेहतमंद स्टार्च होता है और साथ ही एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी. ऐसे में नियमित रूप से एक कच्चा केला खाना बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है.
कच्चा केला खाने के फायदे:<

1. मधुमेह को कंट्रोल करने में मददगार
अगर आपको मधुमेह की शिकायत है और ये अपने शुरुआती रूप में है तो अभी से कच्चा केला खाना शुरू कर दें. ये डायबिटीज कंट्रोल करने की अचूक औषधि है.
2. वजन घटाने में मददगार
वजन घटाने की कोशि‍श करने वालों को हर रोज एक केला खाने की सलाह दी जाती है. इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर्स पाए जाते हैं जो अनावश्यक फैट सेल्स और अशुद्धियों को साफ करने में मददगार होते हैं.



3. भूख को शांत करने में

कच्चे केले में मौजूद फाइबर्स और दूसरे कई पोषक तत्व भूख को नियंत्रित करने का काम करते हैं. कच्चा केला खाने से समय-समय पर भूख नहीं लगती है और हम जंक फूड और दूसरी अनहेल्दी चीजें खाने से बच जाते हैं.
4. पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मददगार
कच्चे केले के नियमित सेवन से पाचन क्रिया बेहतर होती है. कच्चा केला खाने से पाचक रसों का स्त्रावण बेहतर तरीके से होता है.
5. कब्ज की समस्या में राहत
कच्चे केले में फाइबर और हेल्दी स्टार्च होते हैं. जोकि आंतों में किसी भी तरह की अशुद्ध‍ि को जमने नहीं देते. ऐसे में अगर आपको अक्सर कब्ज की समस्या रहती है तो कच्चा केला खाना आपके लिए बहुत फायदेमंद रहेगा.
इसके अलावा कच्चा केला कई तरह के कैंसर से बचाव में भी सहायक है. कच्चे केले में मौजूद कैल्शियम हड्ड‍ियों को मजबूत बनाने में सहायक है और साथ ही ये मूड स्व‍िंग की समस्या में भी फायदेमंद है.



8/10/17

किशमिश का पानी पीने के अनुपम फायदे // Unique benefits of drinking raisin water



   किशमिश खाने के स्वाद को तो बढ़ाती ही है साथ ही यह आपकी सेहत का भी पूरा ध्यान रखती है. इसको पानी में डालकर अगर 20 मिनट तक उबाला जाए और पानी को रातभर रखने के बाद सुबह पीने से इसके कई लाभ होते हैं-
1. रोजाना सुबह के समय किशमिश के पानी का नियमित सेवन करने से कब्ज, एसिडि‍टी और थकान से निजात मिलती है
2॰ किशमिश का पानी पीने से कोलेस्ट्रॉल लेवल नॉर्मल हो जाता है. यह आपके शरीर में ट्राईग्लिसेराइड्स के स्तर को कम करने में मददगार है.
3. इसमें फ्लेवेनॉइड्स एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं जो त्वचा पर होने वाली झुर्रियों को तेजी से कम करने में सहायक है.
4. प्रतिदि‍न किशमिश का पानी पीने से लीवर मजबूत रहता है और यह मेटाबॉलिज्म के स्तर को नियंत्रित करने में भी सहायक है.
5.कब्ज या पाचन संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए किशमिश का पानी बेहद लाभदायक पेय है और इसे पीने से पाचन तंत्र भी ठीक र‍हता है.




बालों की समस्याओं का जादूई समाधान // Magic solution of hair problems



   आज कल लोग बालो कि समस्या से काफ़ी परेशान हैं। जैसे की बाल झड़ना या बाल रहना ही ना, गंजे हो जाना आदि तो उन सबके लिए एक बहुत ही आसान सा कारगर उपाय
बनाने की विधि –
कनेर के 60-70 ग्राम पत्ते (लाल या पीली दोनों में से कोई भी या दोनों ही एक साथ ) ले के उन्हें पहले अच्छे से सूखे कपडे से साफ़ कर लें ताकि उनपे जो मिटटी है वो निकल जाये.
अब एक लीटर सरसों का तेल या नारियल का तेल या जेतून का तेल ले कर उसमे पत्ते काट काट कर डाल दें.
तेल को गरम करनेके लिए रख दें.
जब सारे पत्ते जल कर काले पड़ जाएँ तो उन्हें निकाल कर फेंक दें और तेल को ठण्डा कर के छान लें और किसी बोतल में भर कर रख लें।
प्रयोग करने का तरीका-
रोज़ जहाँ जहाँ पर भी बाल नहीं हैं वहां वहां थोडा सा तेल बस 2 मिनट मालिश करनी है और बस फिर भूल जाएँ अगले दिन तक. ये आप रात को सोते हुए भी लगा सकते हैं और दिन में काम पर जाने से पहले भी।




3/10/17

अनचाहे मस्से और तिल को हटाने के घरेलू उपाय || Home remedies for removing unwanted wart and Mole



  मस्से शरीर पर कहीं भी हों खूबसूरती को कम कर देते हैं, विशेषकर चेहरे पर होने वाले मस्से। मस्सा (wart) शरीर पर कहीं कहीं काले रंग का उभरा हुआ मांस का छोटा दाना जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक प्रकार का चर्मरोग माना जाता है। यह प्रायः सरसों अथवा मूँग के आकार से लेकर बेर तक के आकार का होता है। यह प्रायः हाथों और पैर पर होता है किन्तु शरीर के अन्य अंगों पर भी हो सकता है।त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे खुरदरे कठोर गोल पिण्ड बन जाते हैं जिसे मस्सा कहते हैं।
     

vishमस्से विषाणु संक्रमण से पैदा होते हैं। प्रायः 'मानव पेपिल्लोमैविरस' नामक विषाणु की
कोई प्रजाति इसका कारण होती है। लगभग दस प्रकार के मस्से होते हैं। मस्से संक्रमण (छुआछूत) से हो सकते हैं और शरीर में वहाँ प्रवेश करते हैं जहाँ त्वचा कटी-फटी हो। प्रायः ये कुछ माह में स्वयं समाप्त हो जाते हैं किन्तु कभी-कभी वर्षों तक बने रह सकते हैं या पुनः हो सकते हैं।शरीर पर अनचाहे मस्सों के उग जाने से मन से बार बार यही आवाज आती है कि इन मस्सों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है। ये मस्से आपकी सुदरता में धब्बा बन कर आपको परेशान कर रहे हैं तो इन आसान उपायों की सहायता से आप इनसे छुटकारा पा सकते हैं। 
1.  मुहासे या मस्से हों तो फिटकरी और काली मिर्च आधा-आधा ग्राम पानी में पीसकर मुहा पर मलने से लाभ होता है।
2. शरीर की त्वचा पर यदि छोटे-छोटे काले मस्से हो गए हों तो उन पर काजू के छिलकों का लेप लगाने से मस्से साफ हो जाते हैं।
3. चूना और घी एक समान मात्रा में लेकर दोनों को खूब फेंटकर सुरक्षित रखें। उसे दिन में 3-4 बार मस्सों पर लगाएं। उससे मस्से जड़ से हट जाएंगे और दूबारा नहीं होंगे।
4.  बी काम्पलेक्स, विटामिन ए, सी, ई युक्तआहार के सेवन से मस्सों को दूर किया जा सकता है।मस्सों से छुटकारा पाने के लिए पोटेशियम बहुत लाभदायक है। पोटेशियम बहुत सी साग-सब्जी और फलों में पाया जाता है। जैसे - सेब, केला, अंगूर, आलू, मशरूम, टमाटर, पालक इत्यादि।
5.  खट्टी सेब का रस मस्सों पर लगाने से मस्सों के छोटे-छोटे टुकड़े होकर गिर जाएंगे।
6. कलौंजी के कुछ दाने सिरके में पीस कर मस्सों पर लगा कर सो जाए कुछ दिनों में मस्से
कट जायेंगे।
7. बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
8.  एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
9. . कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
10.  मस्सा खत्म करने के लिए एक अगरबत्ती जला लें और अगरबत्ती के जले हुए गुल को मस्से का स्पर्श कर तुरन्त हटा लें। ऐसा 8-10 बार करें, इस उपाय से मस्सा सूखकर झड़ जाएगा।
11. . ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे।


12.  अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
13. लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है।१७. एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे।
14.  बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें।
15. अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें।
16. ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर गुनगुने पानी से धो लें। मस्से खत्म हो जाएंगे।
17.  कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
18.  केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।


chitra19. थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं। -मस्सों पर अलो वेरा को दिन में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
20. रोज दो तीन बार प्याज का लेप मस्सों पर करने से ये मस्से जड़ से खत्म हो जाएंगे। प्याज को काट कर मस्से पर घिसना भी लाभप्रद है। 
21. बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।
22.  हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे रोजाना मस्सों पर लगाएं।
23.  चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं। दस मिनट बाद गर्म पानी से फेस धो लें। कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे।
24. रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
25. . ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएंगे।
26. सोडा कास्टिक 6 ग्राम को 250 ग्राम की बोतल में घोलकर सुरक्षित जगह पर रख दें। सावधानी से रूई की सहायता से मस्सों पर लगाएं। मस्सों को दूर करने के लिए यह रामबाण दवा है। 





24/9/17

नेफ़्रोटिक सिंड्रोम (गुर्दे के रोग )की जानकारी और आधुनिक चिकित्सा







नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक आम किडनी की बीमारी है। पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं।

किडनी के इस रोग की वजह से किसी भी उम्र में शरीर में सूजन हो सकती है, परन्तु मुख्यतः यह रोग बच्चों में देखा जाता है। उचित उपचार से रोग पर नियंत्रण होना और बाद में पुनः सूजन दिखाई देना, यह सिलसिला सालों तक चलते रहना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की विशेषता है। लम्बे समय तक बार-बार सूजन होने की वजह से यह रोग मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों के लिए एक चिन्ताजनक रोग है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी पर क्या कुप्रभाव पडता है?
सरल भाषा में यह कहा जा सकता है की किडनी शरीर में छन्नी का काम करती है, जिसके द्वारा शरीर के अनावश्यक उत्सर्जी पदार्थ अतिरिक्त पानी पेशाब द्वारा बाहर निकल जाता है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेद बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और उत्सर्जी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है।
पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की मात्रा के अनुसार रोगी के शरीर में सूजन में कमी या वृध्दि होती है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन होने के बाद भी किडनी की अनावश्यक पदार्थों को दूर करने की कार्यक्षमता यथावत बनी रहती है अर्थात किडनी ख़राब होने की संभावना बहुत कम रहती है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम किस कारण से होता है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाया है। श्वेतकणों में लिम्फोसाइट्स के कार्य की खामी (Auto Immune Disease) के कारण यह रोग होता है ऐसी मान्यता है। आहार में परिवर्तन या दवाइँ को इस रोग के लिए जिम्मेदार मानना बिलकुल गलत मान्यता है।
इस बीमारी के 90% मरीज बच्चे होते हैं जिनमें नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाता है। इसे प्राथमिक या इडीओपैथिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम भी कहते हैं।
प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम चार महत्वपूर्ण पैथोलाजिकल रोगों के कारण हो सकता है। मिनीमल चेन्ज डिजीज (MCD), फोकल सेग्मेंन्टल ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस (FSGS), मेम्ब्रेनस नेफ्रोपेथी और मेम्ब्रेनोप्रोलिफरेटिव ग्लोमेंरुलो नेफ्राइटिस (MPGN)। प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक विशेष निदान है जिससे सेकेंडरी करणों के एक-एक कर हटाने के बाद ही इनका निदान होता है।
इसके 10 % से भी कम मामलों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम वयस्कों में अलग-अलग बीमारियों/करणों की वजह से हो सकता है। जैसे संक्रमण, किसी दवाई से हुआ नुकसान, कैंसर, वंशानुगत रोग, मधुमेह, एस. एल. ई. और एमाइलॉयडोसिस आदि में यह सिंड्रोम उपरोक्त बीमारियों के कारण हो सकता है।
एम. सी. डी. अर्थात् मिनीमल चेन्ज डिजीज, बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का सबसे आम कारण है। यह रोग 35 प्रतिशत छोटे बच्चों में (छः साल की उम्र तक) और 65 % मामलों में बड़े बच्चों में इडियोपैथिक (बिना किसी कारण) नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में होता है।
एम. सी. डी. (मिनीमल चेन्ज डिजीज) के रोगी में रक्तचाप सामान्य रहता है, लाल रक्त कोशिकाएं, पेशाब में अनुपस्थित रहती है और सीरम क्रीएटिनिन और कॉम्प्लीमेंट C3 / C4 के मूल्य सामान्य रहते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सभी कारणों में एम. सी. डी सबसे कम खराब बीमारी है। 90 % रोगी स्टेरॉयड उपचार से ही ठीक हो जाते हैं।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मुख्य लक्षण :
यह रोग मुख्यतः दो से छः साल के बच्चों में दिखाई देता है। अन्य उम्र के व्यक्तियों में इस रोग की संख्या बच्चों की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है।
आमतौर पर इस रोग की शुरुआत बुखार और खाँसी के बाद होती है।
रोग की शुरुआत के खास लक्षणों में आँखों के नीचे एवं चेहरे पर सूजन दिखाई देती है। आँखों पर सूजन होने के कारण कई बार मरीज सबसे पहले आँख के डॉक्टर के पास जाँच के लिए जाते हैं।
यह सूजन जब मरीज सोकर सुबह उठता है तब ज्यादा दिखती है, जो इस रोग की पहचान है। यह सूजन दिन के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कम होने लगती है और शाम तक बिलकुल कम हो जाती है।
रोग के बढ़ने पर पेट फूल जाता है, पेशाब कम होता है, पुरे शरीर में सूजन आने लगती है और वजन बड़ जाता है।
कई बार पेशाब में झाग आने और जिस जगह पर पेशाब किया हो, वहाँ सफेद दाग दिखाई देने की शिकायत होती है।
इस रोग में लाल पेशाब होना, साँस फूलना अथवा खून का दबाव बढ़ना जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में कौन से गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में जो संभावित जटिलताएं होती है, जल्दी संक्रमण होना, नस में रक्त के थक्के जमना (डीप वेन थ्रोम्बोसिस), रक्ताल्पता, बढ़े हुए कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के कारण ह्रदय रोग होना, किडनी खराब होना आदि महत्वपूर्ण है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान :
उन रोगियों में, जिन्हें शरीर में सूजन है उनके लिए पहला चरण है नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान करना। प्रयोगशाला परीक्षण से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना
रक्त में प्रोटीन स्तर कम होना
कोलेस्ट्रोल के स्तर का बढ़ा होना
1. पेशाब की जाँच:
पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान की सबसे महत्वपूर्ण निशानी है।
पेशाब में श्वेतकणों, रक्तकणों या खून का नहीं जाना इस रोग के निदान की महत्वपूर्ण निशानी है।
24 घण्टों में पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की कुल मात्रा 3 ग्राम से अधिक होती है।
24 घंटे में शरीर से जो प्रोटीन कम हुआ है, उसका अनुमान 24 घंटे का पेशाब का संग्रह करके लगाया जा सकता है। इससे भी ज्यादा सरल है स्पॉट प्रोटीन/क्रीएटिनिन रेश्यो। इन परीक्षणों से प्रोटीन के नुकसान की मात्रा का सटीक माप प्राप्त होता है। इन परीक्षणों से पता चलता है की प्रोटीन का नुकसान हल्की, मध्यम या भारी मात्रा में हुआ है। इसके निदान के अलावा 24 घंटे की पेशाब में संभावित प्रोटीन की जाँच से इस बीमारी में उपचार के पश्चात् कितना सुधार हुआ है, यह भी जाना जा सकता है। उपचार के लिए इस पर नजर रखना अति उपयोगी है
पेशाब की जाँच सिर्फ रोग के निदान के लिए नहीं परन्तु रोग के उपचार कर नियमन के लिए भी विशेष महत्वपूर्ण है। पेशाब में जानेवाला प्रोटीन यदि बंद हो जाए, तो यह उपचार की सफलता दर्शाता है।1. खून की जाँच:
सामान्य जाँच:
अधिकांश मरीजों में हीमोग्लोबिन, श्वेतकणों की मात्रा इत्यादि की जाँच आवश्कतानुसार की जाती है।निदान के लिए जरुरी जाँच:
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान के लिये खून की जाँच में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) कम होना और कोलेस्ट्रोल बढ़ जाना आवश्यक है। सामान्यतः खून की जाँच क्रीएटिनिन की मात्रा सामान्य पाई जाती है।अन्य विशिष्ट जाँच:
डॉक्टर द्वारा आवश्कतानुसार कई बार करायी जानेवाली खून की विशिष्ट जाँचों में कोम्पलीमेंट, ए. एस. ओ. टाइटर, ए. एन. ए. टेस्ट, एड्स की जाँच, हिपेटाइटिस - बी की जाँच वगैरह का समावेश होता है।2. रेडियोलॉजिकल जाँच :
एस परीक्षण में पेट और किडनी की सोनोग्राफी, छाती का एक्सरे वगैरह शामिल होते हैं।
किडनी की बायोप्सी
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सही कारण और अंर्तनिहित प्रकार को पहचानने में किडनी की बायोप्सी सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। किडनी बायोप्सी में किडनी के ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में इसकी माइक्रोस्कोप द्वारा जाँच की जाती है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का उपचार :
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपचार का लक्ष्य है मरीज को लक्षणों से राहत दिलवाना, पेशाब में जो प्रोटीन का नुकसान हो रहा है, उसमें सुधार लाना, जटिलताओं को रोकना और उनका इलाज करना और किडनी को बचाना है। इस रोग का उपचार आमतौर पर एक लंबी अवधि या कई वर्षों तक चलता है।1. आहार में परहेज करना:
सुजन हो और पेशाब कम आ रहा हो, तो मरीज को कम पानी और कम नमक लेने की सलाह दी जाती है।
अधिकांश बच्चों को प्रोटीन सामान्य मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
आहार में सलाह
मरीज के लिए आहार में सलाह या प्रतिबंध लगाते जाते हैं वो विभिन्न प्रकार के होते हैं। प्रभावी उपचार एवं उचित आहार से सूजन खत्म हो जाती है।
सुजन कि मौजुदगी में
उन मरीजों को जिन्हें शरीर में सूजन है, उन्हें आहार में नमक में कमी और टेबल नमक में प्रतिबंध और वह भोज्य सामग्री जिसमें सोडियम की मात्रा अधिक हो, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिससे शरीर में सूजन और तरल पदार्थों को शरीर में जमा होने से रोका जा सके। वैसे इस बीमारी में तरल पदार्थों पर प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं ह
सूजन न होने वाले मरीज
जिन रोगियों को प्रतिदिन स्टेरॉयड की उच्च मात्रा की खुराक मिलती है, उन्हें नमक की मात्रा सिमित करनी चाहिए जिससे रक्तचाप बढ़ने का जोखिम न हो ।
जिन मरीजों को सूजन है उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दिया जाना चाहिए जिससे प्रोटीन का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई हो सके और कुपोषण से बचाया जा सके। पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और विटामिन्स भी मरीजों को देना चाहिए।
लक्षण मुक्त मरीज: (Remission)
लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।
आहार पर अनावश्यक प्रतिबंध हटाना चाहिए। नमक और तरल पदार्थ का प्रतिबंध न रखें। मरीज को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दें।
अगर किडनी डिजीज है तो प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखें। रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए आहार में वसा का सेवन कम करें।2. संक्रमण का उपचार एवं रोकथाम :
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का विशेष उपचार शुरू करने से पहले बच्चे को यदि किसी संक्रमण की तकलीफ हो, तो ऐसे संक्रमण पर नियंत्रण स्थापित करना बहुत ही आवश्यक है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों को सर्दी, बुखार एवं अन्य प्रकार के संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है।
उपचार के दौरान संक्रमण होने से रोग बढ़ सकता है। इसलिए उपचार के दौरान संक्रमण न हो इसके लिए पूरी सावधानी रखना तथा संक्रमण होने पर तुरंत सघन उपचार कराना अत्यंत आवश्यक है।3. दवाइँ द्वारा उपचार :
विशिष्ट दवा द्वारा इलाज -
स्टेरॉयड चिकित्सा
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में लक्षण मुक्त करने के लिए प्रेडनिसोलोन एक मानक उपचार है। अधिकांश बच्चों पर इस दवा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 1 से 4 हफ्ते में सूजन और पेशाब में प्रोटीन दोनों गायब हो जाते हैं। पेशाब जब प्रोटीन से मुक्त हो जाये तो उस स्थिति को रेमिषन कहते हैं।वैकल्पिक चिकित्सा
बच्चों का एक छोटा समूह जिन पर स्टेरॉयड चिकित्सा का अनुकूल प्रभाव नहीं हो पाता, उनकी पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में किडनी की आगे की जाँच की आवश्यकता होती है जैसे - किडनी की बायोप्सी। उन्हें लीवामिजोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, साइक्लोस्पेरिन, टेक्रोलीमस, माइकोफिनाइलेट आदि वैकल्पिक दवा दी जाती है। स्टेरॉयड के साथ-साथ वैकल्पिक दवा भी दी जाती है। जब स्टेरॉयड की मात्रा कम कर दी जाती है तो ये दवा रेमिषन को बनाये रखने में सहायक होती है।
सहायक दवा चिकित्सा
सूजन पर नियंत्रण पाने के लिए और पेशाब ज्यादा मात्रा में होने के लिए डाययुरेटिक्स दवा दी जाती है।
रक्तचाप पर नियंत्रण रखने और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा को कम करने के लिए विशेष दवाऐं, जैसे ए. सी. ई. अवरोधक और एंजियोटेनसिन रिसेप्टर अवरोधक दवायें दी जाती है।
संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवायें दी जाती हैं। (बैक्टीरियल सेप्सिस, पेरिटोनाइटिस, निमोनिया आदि संक्रमण के लिए)
कोलेस्टिरॉल और ट्राइग्लिसराइड को कम करने के लिए दवायें जैसे स्टैटिन (सिमवास्टैटिन, एटोरवास्टैटिन, रोस्युवास्टैटिन आदि) जो दिल और रक्त वाहिनियों की समस्या के जोखिम को रोक सके।
कैल्शियम, विटामिन डी और जिंक को पूरक दवा की तरह दी जाती है।अंर्तनिहित कारणों का उपचार
सेकेन्डरी नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के अंर्तनिहित कारणों जैसे- डायाबिटीक किडनी डिजीज, लूपस किडनी डिजीज, एमेलॉयडोसिस आदि का सावधानीपूर्वक उपचार करना महत्वपूर्ण है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम को नियंत्रित करने के लिए इन विकारों का उपचार आवश्यक है।सामान्य सलाह
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक ऐसी बीमारी है जो कई वर्षों तक रहती है। मरीज और उसके परिवार वालों (परिजनों) को इस बीमारी की प्रकृति और उसकी रोकथाम के लिए किया जाने वाला इलाज और उसके दुष्प्रभाव, संक्रमण की रोकथाम और जल्दी उपचार के लाभ के बारे में उचित एवं पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। रिलैप्स के दौरान जब शरीर में सूजन हो तब मरीज को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है।
इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है की बीमारी के दौरान मरीज से सामान्य बालक जैसा ही व्यवहार करना चाहिए।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मामले में स्टेराइड चिकित्सा शुरू करने के पहले पर्याप्त जाँच की जानी चाहिए।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।
संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।निगरानी और जाँच करना


संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है

मरीज को अपना वजन लेकर उसका रिकार्ड रखना चाहिए। वजन चार्ट, शरीर में पानी की मात्रा में वृध्दि या कमी पर नजर रखने में मदद करता है।
परिवार को नियमित रूप से घर में, प्रोटीन के लिए पेशाब परीक्षण करना सीखना चाहिए। इसके अलावा सभी पेशाब परीक्षण, उसके परिणाम और सभी दवाओं के विवरण और खुराक की विस्तृत जानकारी डायरी में रखने के लिए सिखाया जाना चाहिए। इससे बीमारी के पुनः बढ़ने का पहले से ही पता चल जाता है जो इलाज के लिए सहायक होता है।प्रेडनीसोलोन क्या काम करती है और उसे किस तरह दिया जाता है?
प्रेडनीसोलोन पेशाब में जानेवाले प्रोटीन को रोकने की एक कारगर दवा है। यह दवा कितनी देनी है, यह बच्चे के वजन और रोग की गंभीरता को ध्यान में रखकर डॉक्टर द्वारा निश्चित किया जाता है।
यह दवा कितने समय के लिए और किस तरह लेनी है, यह विशिष्ट डॉक्टर द्वारा तय किया जाता है। एस दवा के सेवन से ज्यादातर मरीजों में एक से चार सप्ताह के अंदर पेशाब में प्रोटीन जाना बंद हो जाता है।
बार-बार बीमारी के पुनः बढ़ने को रोकने के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दी गई दवा को पूरी अवधि तक लेना चाहिए।
डॉक्टरों की देखरेख में उचित उपचार लेने से प्रेडनीसोलोन के विपरीत असर को कम किया जा सकता है।
प्रेडनीसोलोन के दुष्प्रभाव के डर से इलाज को बीच में छोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए।प्रेडनीसोलोन दवा का कुप्रभाव (Side Effect) क्या होता है?
प्रेडनीसोलोन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार की प्रमुख दवा है, लेकिन इस दवा के कुछ दुष्प्रभाव भी हैं। इन दुष्प्रभाववों को कम करने के लिए इस दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह और देखरेख में ही करना उचित है।

कम समय में दिखने वाले कुप्रभाव / विपरीत असर:
अधिक भूख लगना, वजन बढ़ जाना, एसिडिटी होना, (पेट व् छाती में जलन होना), स्वभाव में चिड़चिड़ापन होना, संक्रमण होने की संभावना बढ़ना, खून का दबाव बढ़ना और शरीर में रोयें बढ़ना इत्यादि।

लम्बे समय बाद दिखने वाले विपरीत असर / कुप्रभाव :
बच्चों का विकास कम होना (लम्बाई कम बढ़ना), हड्डियाँ का कमजोर होना, चमड़ी खींचने से जांघ और पेट के नीचे के भाग में गुलाबी लकीरें पड़ना, मोतियाबिंद (Cataract) होने का भी होना इत्यादि।इतने अधिक विपरीत असरवाली प्रेडनीसोलोन दवा लेना क्या बच्चों के लिए फायदेमंद है?

हाँ, सामान्यतः जब यह दवाइँ ज्यादा मात्रा में, लम्बे समय तब ली जाये, तक दवाइँ का विपरीत असर होने का अधिक भय रहता है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित मात्रा में और कम समय के लिए दवा के सेवन से दवाई का विपरीत असर कम और थोड़े समय के लिए ही होता है। जब इस दवाई का सेवन डॉक्टर की देखरेख में किया जाता है, तब गंभीर एवं विपरीत असर का प्रारंभ में ही निदान हो जाने के कारण तुरन्त ही उपचार में उचित परिवर्तन द्वारा उसे रोका या कम किया जा सकता है।
अनुपचारित रोग के कारण कई जटिलतायें हो सकती है। जैसे - संक्रमण का खतरा, हाइपोवोलीमिया, थ्रोम्बोएम्बलजिम (जिसमें खून का थक्का, रक्त वाहिकाओं में बाधा डालकर स्ट्रोक, दिल का दौरा और फेफड़ों की बीमारी का कारण बनता हैं), लिपिड की असमान्यता, कुपोषण और एनीमिया। अनुपचारित नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण संक्रमण से अक्सर कई बच्चों की मृत्यु हो जाती है। बचपन में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के लिए कोर्टिकोस्टेराइड के उपयोग के कारण अब मृत्यु दर घटकर 3 % हो गयी है।
बच्चों में देखे जाते इस रोग में किडनी खराब होने की संभावना बहुत कम रहती है।
फिर भी, रोग के कारण होनेवाली तकलीफों और खतरों के मुकाबले दवाइँ का विपरीत असर कम हानिकारक है। इसलिए ज्यादा फायदे के लिए थोड़े विपरीत असर को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं है।अधिकांश बच्चों में उपचार के तीसरे या चौथे सप्ताह में पेशाब में प्रोटीन नहीं जाने के बावजूद, सूजन जैसी तकलीफ बनी रहती है। क्यों?
प्रेडनीसोलोन के सेवन करने से भूख बढ़ती है। अधिक खाने से शरीर में चर्बी जमा होने लगती है, जिसके कारण तीन-चार सप्ताह में फिर से सूजन आ गई है ऐसा लगने लगता है।रोग की सूजन और चर्बी जमा होने से सूजन जैसा लगना, दोनों के बीच का अंतर कैसे मालूम किया जा सकता है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग बढ़ने के कारण सूजन सामान्य रूप से आँखों के नीचे और चेहरे पर दिखाई देती है, जो सुबह ज्यादा और शाम को कम हो जाती है। इसके साथ-साथ पैरों में भी सूजन हो सकती है। दवाइँ लेने से अक्सर चेहरे, कंधे, और पेट पर चर्बी जमा होती है, जिससे वहाँ सूजन जैसा दिखने लगता है। इस सूजन का असर पुरे दिन के दौरान समान मात्रा में दिखाई देता है।
आँखों और पैरों पर सूजन का न होना और चेहरे की सूजन सुबह ज्यादा और शाम को कम न होना, ये लक्षण सूजन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण नहीं है यह दर्शाते हैंनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण होनेवाली सूजन और दवा के असर के कारण चर्बी होने से सूजन लगने के बीच अंतर जानना क्यों जरुरी है?
मरीज के लिए कौन सा उपचार उचित रहेगा यह निश्चित करने के लिए सूजन होने एवं सूजन जैसा लगने के बीच का अंतर जानना जरुरी है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण यदि सूजन हो, तो दवाइँ की मात्रा में बढ़ोतरी या परिवर्तन और साथ-साथ पेशाब की मात्रा बढ़ानेवाली दवाइयों की जरूरत पड़ती है।
चर्बी जमा होने के कारण सूजन जैसा लगना, प्रेडनीसोलोन दवा द्वारा नियमित उपचार का असर बताता है। जिससे रोग नियंत्रण में नहीं है या रोग बढ़ गया है, ऐसी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। समय के साथ-साथ प्रेडनीसोलोन दवा की मात्रा कम होने से, कुछ हप्तों में सूजन भी धीरे-धीरे कम होते हुए पूर्णतः ठीक हो जाती है। ऐसी दवा की वजह से उत्पन्न सूजन को तुरन्त कम करने के लिए किसी भी प्रकार की दवाइँ लेना मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग या दवाइँ की वजह से दिखनेवाली सूजन के बीच में अंतर करना जरुरी है।
बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावना कितनी है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावनाएं 50 - 75 % तक होती है। इसकी आवृत्ति हर रोगी में अलग-अलग होती है।प्रेडनीसोलोन का उपचार यदि सफल नहीं हो, तब उपयोग की जानेवाली अन्य दवाइयाँ कौन-कौन सी हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपयोग की जानेवाली अन्य दवाओं में 'लीवामिजोल' 'मिथाइल प्रेडनीसोलोन', 'साइक्लोफॉस्फेमाइड', एम. एम. एफ. (M.M.F.) इत्यादि दवाईयाँ हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के बच्चों में किडनी बायोप्सी कब कराई जाती है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी बायोप्सी की जरूरत निम्नलिखित परिस्थितियों में पड़ती है:
रोग पर नियंत्रण के लिए ज्यादा मात्रा में तथा लम्बे समय तक प्रेडनीसोलोन दवा लेनी पड़ रही हो।
प्रेडनीसोलोन लेने के बाद भी रोग नियंत्रण में नहीं आ रहा हो।
अधिकांश बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने के लिए जिम्मेदार रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' होता है। जिन बच्चों में यह रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' के कारण नहीं होने की शंका हो, (जैसे पेशाब में रक्तकणों की उपस्थिति, खून में क्रीएटिनिन की मात्रा ज्यादा होना, कोम्पलीमेंट (C-3) की मात्रा कम होना इत्यादि) तब किडनी की बायोप्सी कराना जरुरी होता है।
जब यह रोग वयस्कों में होता है, तब आमतौर पर उपचार किडनी बायोप्सी के बाद किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार का नियमन नेफ्रोलॉजिस्ट किस प्रकार करते हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार के नियमन के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा नियमित जाँच बहुत जरुरी है। इस जाँच में संक्रमण का असर, खून का दबाव, वजन, पेशाब में प्रोटीन की मात्रा और जरूरत के अनुसार खून की जाँच की जाती है। इस जानकारी के आधार पर डॉक्टर द्वारा दवा में जरुरी परिवर्तन किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम कब ठीक हो जाता है?
उचित उपचार से अधिकांश बच्चों के पेशाब में अलब्युमिन जाना बंद हो जाता है और यह रोग थोड़े समय में ही नियंत्रण में आ जाता है। परन्तु कुछ समय के बाद लगभग सभी बच्चों में यह रोग एवं सूजन फिर से दिखाई देने लगते है और ऐसी हालत में उपचार की फिर से जरूरत पड़ती है।
लम्बे समय- सालों तक चलने वाला यह रोग उम्र के बढ़ने के साथ-साथ पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे रोग पुनः होने की प्रक्रिया धीरे-धीरे कम हो जाती है। 11 से 14 साल की उम्र के बाद अधिकांश बच्चों में यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज को डॉक्टर से कब संपर्क स्थापित करना चाहिए?
जिस परिवार के बच्चे को नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की शिकायत हो उसे नीचे गये किसी भी लक्षण के दिखने पर डॉक्टर के पास तुरंत जाना चाहिए -


पेट में दर्द, बुखार, उल्टी होना।
सूजन, बिना किसी कारण के वजन में वृध्दि और पेशाब की मात्रा में उल्लेखनीय कमी होना।
बीमार होने के लक्षण दिखना जैसे अगर बच्चा खेलना बंद कर दे और निष्क्रिय हो जाये।
लगातार खाँसी के साथ बुखार या तेज सिरदर्द का होना।
चेचक या खसरा का होना।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।



संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।निगरानी और जाँच करना
संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है
मरीज को अपना वजन लेकर उसका रिकार्ड रखना चाहिए। वजन चार्ट, शरीर में पानी की मात्रा में वृध्दि या कमी पर नजर रखने में मदद करता है।
परिवार को नियमित रूप से घर में, प्रोटीन के लिए पेशाब परीक्षण करना सीखना चाहिए। इसके अलावा सभी पेशाब परीक्षण, उसके परिणाम और सभी दवाओं के विवरण और खुराक की विस्तृत जानकारी डायरी में रखने के लिए सिखाया जाना चाहिए। इससे बीमारी के पुनः बढ़ने का पहले से ही पता चल जाता है जो इलाज के लिए सहायक होता है।प्रेडनीसोलोन क्या काम करती है और उसे किस तरह दिया जाता है?
प्रेडनीसोलोन पेशाब में जानेवाले प्रोटीन को रोकने की एक कारगर दवा है। यह दवा कितनी देनी है, यह बच्चे के वजन और रोग की गंभीरता को ध्यान में रखकर डॉक्टर द्वारा निश्चित किया जाता है।
यह दवा कितने समय के लिए और किस तरह लेनी है, यह विशिष्ट डॉक्टर द्वारा तय किया जाता है। एस दवा के सेवन से ज्यादातर मरीजों में एक से चार सप्ताह के अंदर पेशाब में प्रोटीन जाना बंद हो जाता है।
बार-बार बीमारी के पुनः बढ़ने को रोकने के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दी गई दवा को पूरी अवधि तक लेना चाहिए।
प्रेडनीसोलोन के दुष्प्रभाव के डर से इलाज को बीच में छोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए।प्रेडनीसोलोन दवा का कुप्रभाव (Side Effect) क्या होता है?
प्रेडनीसोलोन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार की प्रमुख दवा है, लेकिन इस दवा के कुछ दुष्प्रभाव भी हैं। इन दुष्प्रभाववों को कम करने के लिए इस दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह और देखरेख में ही करना उचित है।कम समय में दिखने वाले कुप्रभाव / विपरीत असर:



अधिक भूख लगना, वजन बढ़ जाना, एसिडिटी होना, (पेट व् छाती में जलन होना), स्वभाव में चिड़चिड़ापन होना, संक्रमण होने की संभावना बढ़ना, खून का दबाव बढ़ना और शरीर में रोयें बढ़ना इत्यादि।
लम्बे समय बाद दिखने वाले विपरीत असर / कुप्रभाव :
बच्चों का विकास कम होना (लम्बाई कम बढ़ना), हड्डियाँ का कमजोर होना, चमड़ी खींचने से जांघ और पेट के नीचे के भाग में गुलाबी लकीरें पड़ना, मोतियाबिंद (Cataract) होने का भी होना इत्यादि।इतने अधिक विपरीत असरवाली प्रेडनीसोलोन दवा लेना क्या बच्चों के लिए फायदेमंद है?
हाँ, सामान्यतः जब यह दवाइँ ज्यादा मात्रा में, लम्बे समय तब ली जाये, तक दवाइँ का विपरीत असर होने का अधिक भय रहता है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित मात्रा में और कम समय के लिए दवा के सेवन से दवाई का विपरीत असर कम और थोड़े समय के लिए ही होता है। जब इस दवाई का सेवन डॉक्टर की देखरेख में किया जाता है, तब गंभीर एवं विपरीत असर का प्रारंभ में ही निदान हो जाने के कारण तुरन्त ही उपचार में उचित परिवर्तन द्वारा उसे रोका या कम किया जा सकता है।
अनुपचारित रोग के कारण कई जटिलतायें हो सकती है। जैसे - संक्रमण का खतरा, हाइपोवोलीमिया, थ्रोम्बोएम्बलजिम (जिसमें खून का थक्का, रक्त वाहिकाओं में बाधा डालकर स्ट्रोक, दिल का दौरा और फेफड़ों की बीमारी का कारण बनता हैं), लिपिड की असमान्यता, कुपोषण और एनीमिया। अनुपचारित नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण संक्रमण से अक्सर कई बच्चों की मृत्यु हो जाती है। बचपन में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के लिए कोर्टिकोस्टेराइड के उपयोग के कारण अब मृत्यु दर घटकर 3 % हो गयी है।
फिर भी, रोग के कारण होनेवाली तकलीफों और खतरों के मुकाबले दवाइँ का विपरीत असर कम हानिकारक है। इसलिए ज्यादा फायदे के लिए थोड़े विपरीत असर को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं है।अधिकांश बच्चों में उपचार के तीसरे या चौथे सप्ताह में पेशाब में प्रोटीन नहीं जाने के बावजूद, सूजन जैसी तकलीफ बनी रहती है। क्यों?
प्रेडनीसोलोन के सेवन करने से भूख बढ़ती है। अधिक खाने से शरीर में चर्बी जमा होने लगती है, जिसके कारण तीन-चार सप्ताह में फिर से सूजन आ गई है ऐसा लगने लगता है।रोग की सूजन और चर्बी जमा होने से सूजन जैसा लगना, दोनों के बीच का अंतर कैसे मालूम किया जा सकता है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग बढ़ने के कारण सूजन सामान्य रूप से आँखों के नीचे और चेहरे पर दिखाई देती है, जो सुबह ज्यादा और शाम को कम हो जाती है। इसके साथ-साथ पैरों में भी सूजन हो सकती है। दवाइँ लेने से अक्सर चेहरे, कंधे, और पेट पर चर्बी जमा होती है, जिससे वहाँ सूजन जैसा दिखने लगता है। इस सूजन का असर पुरे दिन के दौरान समान मात्रा में दिखाई देता है।
आँखों और पैरों पर सूजन का न होना और चेहरे की सूजन सुबह ज्यादा और शाम को कम न होना, ये लक्षण सूजन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण नहीं है यह दर्शाते हैंनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण होनेवाली सूजन और दवा के असर के कारण चर्बी होने से सूजन लगने के बीच अंतर जानना क्यों जरुरी है?
मरीज के लिए कौन सा उपचार उचित रहेगा यह निश्चित करने के लिए सूजन होने एवं सूजन जैसा लगने के बीच का अंतर जानना जरुरी है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण यदि सूजन हो, तो दवाइँ की मात्रा में बढ़ोतरी या परिवर्तन और साथ-साथ पेशाब की मात्रा बढ़ानेवाली दवाइयों की जरूरत पड़ती है।
चर्बी जमा होने के कारण सूजन जैसा लगना, प्रेडनीसोलोन दवा द्वारा नियमित उपचार का असर बताता है। जिससे रोग नियंत्रण में नहीं है या रोग बढ़ गया है, ऐसी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। समय के साथ-साथ प्रेडनीसोलोन दवा की मात्रा कम होने से, कुछ हप्तों में सूजन भी धीरे-धीरे कम होते हुए पूर्णतः ठीक हो जाती है। ऐसी दवा की वजह से उत्पन्न सूजन को तुरन्त कम करने के लिए किसी भी प्रकार की दवाइँ लेना मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग या दवाइँ की वजह से दिखनेवाली सूजन के बीच में अंतर करना जरुरी है।
बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावना कितनी है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावनाएं 50 - 75 % तक होती है। इसकी आवृत्ति हर रोगी में अलग-अलग होती है।प्रेडनीसोलोन का उपचार यदि सफल नहीं हो, तब उपयोग की जानेवाली अन्य दवाइयाँ कौन-कौन सी हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपयोग की जानेवाली अन्य दवाओं में 'लीवामिजोल' 'मिथाइल प्रेडनीसोलोन', 'साइक्लोफॉस्फेमाइड', एम. एम. एफ. (M.M.F.) इत्यादि दवाईयाँ हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के बच्चों में किडनी बायोप्सी कब कराई जाती है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी बायोप्सी की जरूरत निम्नलिखित परिस्थितियों में पड़ती है:
रोग पर नियंत्रण के लिए ज्यादा मात्रा में तथा लम्बे समय तक प्रेडनीसोलोन दवा लेनी पड़ रही हो।
प्रेडनीसोलोन लेने के बाद भी रोग नियंत्रण में नहीं आ रहा हो।
अधिकांश बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने के लिए जिम्मेदार रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' होता है। जिन बच्चों में यह रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' के कारण नहीं होने की शंका हो, (जैसे पेशाब में रक्तकणों की उपस्थिति, खून में क्रीएटिनिन की मात्रा ज्यादा होना, कोम्पलीमेंट (C-3) की मात्रा कम होना इत्यादि) तब किडनी की बायोप्सी कराना जरुरी होता है।
जब यह रोग वयस्कों में होता है, तब आमतौर पर उपचार किडनी बायोप्सी के बाद किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार का नियमन नेफ्रोलॉजिस्ट किस प्रकार करते हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार के नियमन के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा नियमित जाँच बहुत जरुरी है। इस जाँच में संक्रमण का असर, खून का दबाव, वजन, पेशाब में प्रोटीन की मात्रा और जरूरत के अनुसार खून की जाँच की जाती है। इस जानकारी के आधार पर डॉक्टर द्वारा दवा में जरुरी परिवर्तन किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम कब ठीक हो जाता है?
उचित उपचार से अधिकांश बच्चों के पेशाब में अलब्युमिन जाना बंद हो जाता है और यह रोग थोड़े समय में ही नियंत्रण में आ जाता है। परन्तु कुछ समय के बाद लगभग सभी बच्चों में यह रोग एवं सूजन फिर से दिखाई देने लगते है और ऐसी हालत में उपचार की फिर से जरूरत पड़ती है।
लम्बे समय- सालों तक चलने वाला यह रोग उम्र के बढ़ने के साथ-साथ पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे रोग पुनः होने की प्रक्रिया धीरे-धीरे कम हो जाती है। 11 से 14 साल की उम्र के बाद अधिकांश बच्चों में यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज को डॉक्टर से कब संपर्क स्थापित करना चाहिए?
जिस परिवार के बच्चे को नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की शिकायत हो उसे नीचे गये किसी भी लक्षण के दिखने पर डॉक्टर के पास तुरंत जाना चाहिए -
पेट में दर्द, बुखार, उल्टी होना।
सूजन, बिना किसी कारण के वजन में वृध्दि और पेशाब की मात्रा में उल्लेखनीय कमी होना।
बीमार होने के लक्षण दिखना जैसे अगर बच्चा खेलना बंद कर दे और निष्क्रिय हो जाये।
लगातार खाँसी के साथ बुखार या तेज सिरदर्द का होना।
चेचक या खसरा का होना।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक आम किडनी की बीमारी है। पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं।

किडनी के इस रोग की वजह से किसी भी उम्र में शरीर में सूजन हो सकती है, परन्तु मुख्यतः यह रोग बच्चों में देखा जाता है। उचित उपचार से रोग पर नियंत्रण होना और बाद में पुनः सूजन दिखाई देना, यह सिलसिला सालों तक चलते रहना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की विशेषता है। लम्बे समय तक बार-बार सूजन होने की वजह से यह रोग मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों के लिए एक चिन्ताजनक रोग है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी पर क्या कुप्रभाव पडता है?
सरल भाषा में यह कहा जा सकता है की किडनी शरीर में छन्नी का काम करती है, जिसके द्वारा शरीर के अनावश्यक उत्सर्जी पदार्थ अतिरिक्त पानी पेशाब द्वारा बाहर निकल जाता है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेद बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और उत्सर्जी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है।
पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की मात्रा के अनुसार रोगी के शरीर में सूजन में कमी या वृध्दि होती है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन होने के बाद भी किडनी की अनावश्यक पदार्थों को दूर करने की कार्यक्षमता यथावत बनी रहती है अर्थात किडनी ख़राब होने की संभावना बहुत कम रहती है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम किस कारण से होता है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाया है। श्वेतकणों में लिम्फोसाइट्स के कार्य की खामी (Auto Immune Disease) के कारण यह रोग होता है ऐसी मान्यता है। आहार में परिवर्तन या दवाइँ को इस रोग के लिए जिम्मेदार मानना बिलकुल गलत मान्यता है।
इस बीमारी के 90% मरीज बच्चे होते हैं जिनमें नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाता है। इसे प्राथमिक या इडीओपैथिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम भी कहते हैं।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम बच्चों में बार-बार सूजन आने का महत्वपूर्ण कारण है।
प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम चार महत्वपूर्ण पैथोलाजिकल रोगों के कारण हो सकता है। मिनीमल चेन्ज डिजीज (MCD), फोकल सेग्मेंन्टल ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस (FSGS), मेम्ब्रेनस नेफ्रोपेथी और मेम्ब्रेनोप्रोलिफरेटिव ग्लोमेंरुलो नेफ्राइटिस (MPGN)। प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक विशेष निदान है जिससे सेकेंडरी करणों के एक-एक कर हटाने के बाद ही इनका निदान होता है।
इसके 10 % से भी कम मामलों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम वयस्कों में अलग-अलग बीमारियों/करणों की वजह से हो सकता है। जैसे संक्रमण, किसी दवाई से हुआ नुकसान, कैंसर, वंशानुगत रोग, मधुमेह, एस. एल. ई. और एमाइलॉयडोसिस आदि में यह सिंड्रोम उपरोक्त बीमारियों के कारण हो सकता है।
एम. सी. डी. अर्थात् मिनीमल चेन्ज डिजीज, बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का सबसे आम कारण है। यह रोग 35 प्रतिशत छोटे बच्चों में (छः साल की उम्र तक) और 65 % मामलों में बड़े बच्चों में इडियोपैथिक (बिना किसी कारण) नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में होता है।
एम. सी. डी. (मिनीमल चेन्ज डिजीज) के रोगी में रक्तचाप सामान्य रहता है, लाल रक्त कोशिकाएं, पेशाब में अनुपस्थित रहती है और सीरम क्रीएटिनिन और कॉम्प्लीमेंट C3 / C4 के मूल्य सामान्य रहते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सभी कारणों में एम. सी. डी सबसे कम खराब बीमारी है। 90 % रोगी स्टेरॉयड उपचार से ही ठीक हो जाते हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मुख्य लक्षण :
यह रोग मुख्यतः दो से छः साल के बच्चों में दिखाई देता है। अन्य उम्र के व्यक्तियों में इस रोग की संख्या बच्चों की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है।
आमतौर पर इस रोग की शुरुआत बुखार और खाँसी के बाद होती है।
रोग की शुरुआत के खास लक्षणों में आँखों के नीचे एवं चेहरे पर सूजन दिखाई देती है। आँखों पर सूजन होने के कारण कई बार मरीज सबसे पहले आँख के डॉक्टर के पास जाँच के लिए जाते हैं।
यह सूजन जब मरीज सोकर सुबह उठता है तब ज्यादा दिखती है, जो इस रोग की पहचान है। यह सूजन दिन के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कम होने लगती है और शाम तक बिलकुल कम हो जाती है।
रोग के बढ़ने पर पेट फूल जाता है, पेशाब कम होता है, पुरे शरीर में सूजन आने लगती है और वजन बड़ जाता है।
कई बार पेशाब में झाग आने और जिस जगह पर पेशाब किया हो, वहाँ सफेद दाग दिखाई देने की शिकायत होती है।
सामान्यतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम दो से आठ साल की उम्र के बच्चों में ज्यादा पाया जाता है।
इस रोग में लाल पेशाब होना, साँस फूलना अथवा खून का दबाव बढ़ना जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में कौन से गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में जो संभावित जटिलताएं होती है, जल्दी संक्रमण होना, नस में रक्त के थक्के जमना (डीप वेन थ्रोम्बोसिस), रक्ताल्पता, बढ़े हुए कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के कारण ह्रदय रोग होना, किडनी खराब होना आदि महत्वपूर्ण है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान :
उन रोगियों में, जिन्हें शरीर में सूजन है उनके लिए पहला चरण है नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान करना। प्रयोगशाला परीक्षण से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना
रक्त में प्रोटीन स्तर कम होना
कोलेस्ट्रोल के स्तर का बढ़ा होना
1. पेशाब की जाँच:
पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान की सबसे महत्वपूर्ण निशानी है।
पेशाब में श्वेतकणों, रक्तकणों या खून का नहीं जाना इस रोग के निदान की महत्वपूर्ण निशानी है।
24 घण्टों में पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की कुल मात्रा 3 ग्राम से अधिक होती है।
24 घंटे में शरीर से जो प्रोटीन कम हुआ है, उसका अनुमान 24 घंटे का पेशाब का संग्रह करके लगाया जा सकता है। इससे भी ज्यादा सरल है स्पॉट प्रोटीन/क्रीएटिनिन रेश्यो। इन परीक्षणों से प्रोटीन के नुकसान की मात्रा का सटीक माप प्राप्त होता है। इन परीक्षणों से पता चलता है की प्रोटीन का नुकसान हल्की, मध्यम या भारी मात्रा में हुआ है। इसके निदान के अलावा 24 घंटे की पेशाब में संभावित प्रोटीन की जाँच से इस बीमारी में उपचार के पश्चात् कितना सुधार हुआ है, यह भी जाना जा सकता है। उपचार के लिए इस पर नजर रखना अति उपयोगी है।
शरीर में सूजन, पेशाब में प्रोटीन, खून में कम प्रोटीन और कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की निशानी है।
पेशाब की जाँच सिर्फ रोग के निदान के लिए नहीं परन्तु रोग के उपचार कर नियमन के लिए भी विशेष महत्वपूर्ण है। पेशाब में जानेवाला प्रोटीन यदि बंद हो जाए, तो यह उपचार की सफलता दर्शाता है।1. खून की जाँच:
सामान्य जाँच:
अधिकांश मरीजों में हीमोग्लोबिन, श्वेतकणों की मात्रा इत्यादि की जाँच आवश्कतानुसार की जाती है।निदान के लिए जरुरी जाँच:
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान के लिये खून की जाँच में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) कम होना और कोलेस्ट्रोल बढ़ जाना आवश्यक है। सामान्यतः खून की जाँच क्रीएटिनिन की मात्रा सामान्य पाई जाती है।अन्य विशिष्ट जाँच:
डॉक्टर द्वारा आवश्कतानुसार कई बार करायी जानेवाली खून की विशिष्ट जाँचों में कोम्पलीमेंट, ए. एस. ओ. टाइटर, ए. एन. ए. टेस्ट, एड्स की जाँच, हिपेटाइटिस - बी की जाँच वगैरह का समावेश होता है।2. रेडियोलॉजिकल जाँच :
एस परीक्षण में पेट और किडनी की सोनोग्राफी, छाती का एक्सरे वगैरह शामिल होते हैं।
किडनी की बायोप्सी
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सही कारण और अंर्तनिहित प्रकार को पहचानने में किडनी की बायोप्सी सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। किडनी बायोप्सी में किडनी के ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में इसकी माइक्रोस्कोप द्वारा जाँच की जाती है। (अधिक जानकारी के लिए अध्याय 4 पढ़ें)
पेशाब की जाँच नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान और उपचार के नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का उपचार :
टिक सिन्ड्रोम में उपचार का लक्ष्य है मरीज को लक्षणों से राहत दिलवाना, पेशाब में जो प्रोटीन का नुकसान हो रहा है, उसमें सुधार लाना, जटिलताओं को रोकना और उनका इलाज करना और किडनी को बचाना है। इस रोग का उपचार आमतौर पर एक लंबी अवधि या कई वर्षों तक चलता है।1. आहार में परहेज करना:
सुजन हो और पेशाब कम आ रहा हो, तो मरीज को कम पानी और कम नमक लेने की सलाह दी जाती है।
अधिकांश बच्चों को प्रोटीन सामान्य मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
आहार में सलाह
मरीज के लिए आहार में सलाह या प्रतिबंध लगाते जाते हैं वो विभिन्न प्रकार के होते हैं। प्रभावी उपचार एवं उचित आहार से सूजन खत्म हो जाती है।
सुजन कि मौजुदगी में
उन मरीजों को जिन्हें शरीर में सूजन है, उन्हें आहार में नमक में कमी और टेबल नमक में प्रतिबंध और वह भोज्य सामग्री जिसमें सोडियम की मात्रा अधिक हो, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिससे शरीर में सूजन और तरल पदार्थों को शरीर में जमा होने से रोका जा सके। वैसे इस बीमारी में तरल पदार्थों पर प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं ह
सूजन न होने वाले मरीज
जिन रोगियों को प्रतिदिन स्टेरॉयड की उच्च मात्रा की खुराक मिलती है, उन्हें नमक की मात्रा सिमित करनी चाहिए जिससे रक्तचाप बढ़ने का जोखिम न हो ।
जिन मरीजों को सूजन है उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दिया जाना चाहिए जिससे प्रोटीन का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई हो सके और कुपोषण से बचाया जा सके। पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और विटामिन्स भी मरीजों को देना चाहिए।
लक्षण मुक्त मरीज: (Remission)
लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज में लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।
आहार पर अनावश्यक प्रतिबंध हटाना चाहिए। नमक और तरल पदार्थ का प्रतिबंध न रखें। मरीज को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दें।
अगर किडनी डिजीज है तो प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखें। रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए आहार में वसा का सेवन कम करें।2. संक्रमण का उपचार एवं रोकथाम :
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का विशेष उपचार शुरू करने से पहले बच्चे को यदि किसी संक्रमण की तकलीफ हो, तो ऐसे संक्रमण पर नियंत्रण स्थापित करना बहुत ही आवश्यक है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों को सर्दी, बुखार एवं अन्य प्रकार के संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है।
उपचार के दौरान संक्रमण होने से रोग बढ़ सकता है। इसलिए उपचार के दौरान संक्रमण न हो इसके लिए पूरी सावधानी रखना तथा संक्रमण होने पर तुरंत सघन उपचार कराना अत्यंत आवश्यक है।3. दवाइँ द्वारा उपचार :
विशिष्ट दवा द्वारा इलाज -
स्टेरॉयड चिकित्सा
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में लक्षण मुक्त करने के लिए प्रेडनिसोलोन एक मानक उपचार है। अधिकांश बच्चों पर इस दवा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 1 से 4 हफ्ते में सूजन और पेशाब में प्रोटीन दोनों गायब हो जाते हैं। पेशाब जब प्रोटीन से मुक्त हो जाये तो उस स्थिति को रेमिषन कहते हैं।वैकल्पिक चिकित्सा
बच्चों का एक छोटा समूह जिन पर स्टेरॉयड चिकित्सा का अनुकूल प्रभाव नहीं हो पाता, उनकी पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में किडनी की आगे की जाँच की आवश्यकता होती है जैसे - किडनी की बायोप्सी। उन्हें लीवामिजोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, साइक्लोस्पेरिन, टेक्रोलीमस, माइकोफिनाइलेट आदि वैकल्पिक दवा दी जाती है। स्टेरॉयड के साथ-साथ वैकल्पिक दवा भी दी जाती है। जब स्टेरॉयड की मात्रा कम कर दी जाती है तो ये दवा रेमिषन को बनाये रखने में सहायक होती है।
संक्रमण की वजह से नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन बार-बार हो सकती है, इसलिए संक्रमण न होने की सावधानी महत्वपूर्ण है।
सहायक दवा चिकित्सा
सूजन पर नियंत्रण पाने के लिए और पेशाब ज्यादा मात्रा में होने के लिए डाययुरेटिक्स दवा दी जाती है।
रक्तचाप पर नियंत्रण रखने और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा को कम करने के लिए विशेष दवाऐं, जैसे ए. सी. ई. अवरोधक और एंजियोटेनसिन रिसेप्टर अवरोधक दवायें दी जाती है।
संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवायें दी जाती हैं। (बैक्टीरियल सेप्सिस, पेरिटोनाइटिस, निमोनिया आदि संक्रमण के लिए)
कोलेस्टिरॉल और ट्राइग्लिसराइड को कम करने के लिए दवायें जैसे स्टैटिन (सिमवास्टैटिन, एटोरवास्टैटिन, रोस्युवास्टैटिन आदि) जो दिल और रक्त वाहिनियों की समस्या के जोखिम को रोक सके।
कैल्शियम, विटामिन डी और जिंक को पूरक दवा की तरह दी जाती है।अंर्तनिहित कारणों का उपचार
सेकेन्डरी नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के अंर्तनिहित कारणों जैसे- डायाबिटीक किडनी डिजीज, लूपस किडनी डिजीज, एमेलॉयडोसिस आदि का सावधानीपूर्वक उपचार करना महत्वपूर्ण है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम को नियंत्रित करने के लिए इन विकारों का उपचार आवश्यक है।सामान्य सलाह
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक ऐसी बीमारी है जो कई वर्षों तक रहती है। मरीज और उसके परिवार वालों (परिजनों) को इस बीमारी की प्रकृति और उसकी रोकथाम के लिए किया जाने वाला इलाज और उसके दुष्प्रभाव, संक्रमण की रोकथाम और जल्दी उपचार के लाभ के बारे में उचित एवं पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। रिलैप्स के दौरान जब शरीर में सूजन हो तब मरीज को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है।
इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है की बीमारी के दौरान मरीज से सामान्य बालक जैसा ही व्यवहार करना चाहिए।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मामले में स्टेराइड चिकित्सा शुरू करने के पहले पर्याप्त जाँच की जानी चाहिए।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।
संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।निगरानी और जाँच करना
संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है
मरीज को अपना वजन लेकर उसका रिकार्ड रखना चाहिए। वजन चार्ट, शरीर में पानी की मात्रा में वृध्दि या कमी पर नजर रखने में मदद करता है।
परिवार को नियमित रूप से घर में, प्रोटीन के लिए पेशाब परीक्षण करना सीखना चाहिए। इसके अलावा सभी पेशाब परीक्षण, उसके परिणाम और सभी दवाओं के विवरण और खुराक की विस्तृत जानकारी डायरी में रखने के लिए सिखाया जाना चाहिए। इससे बीमारी के पुनः बढ़ने का पहले से ही पता चल जाता है जो इलाज के लिए सहायक होता है।प्रेडनीसोलोन क्या काम करती है और उसे किस तरह दिया जाता है?
प्रेडनीसोलोन पेशाब में जानेवाले प्रोटीन को रोकने की एक कारगर दवा है। यह दवा कितनी देनी है, यह बच्चे के वजन और रोग की गंभीरता को ध्यान में रखकर डॉक्टर द्वारा निश्चित किया जाता है।
यह दवा कितने समय के लिए और किस तरह लेनी है, यह विशिष्ट डॉक्टर द्वारा तय किया जाता है। एस दवा के सेवन से ज्यादातर मरीजों में एक से चार सप्ताह के अंदर पेशाब में प्रोटीन जाना बंद हो जाता है।
बार-बार बीमारी के पुनः बढ़ने को रोकने के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दी गई दवा को पूरी अवधि तक लेना चाहिए।
डॉक्टरों की देखरेख में उचित उपचार लेने से प्रेडनीसोलोन के विपरीत असर को कम किया जा सकता है।


प्रेडनीसोलोन के दुष्प्रभाव के डर से इलाज को बीच में छोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए।प्रेडनीसोलोन दवा का कुप्रभाव (Side Effect) क्या होता है?

प्रेडनीसोलोन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार की प्रमुख दवा है, लेकिन इस दवा के कुछ दुष्प्रभाव भी हैं। इन दुष्प्रभाववों को कम करने के लिए इस दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह और देखरेख में ही करना उचित है।कम समय में दिखने वाले कुप्रभाव / विपरीत असर:
अधिक भूख लगना, वजन बढ़ जाना, एसिडिटी होना, (पेट व् छाती में जलन होना), स्वभाव में चिड़चिड़ापन होना, संक्रमण होने की संभावना बढ़ना, खून का दबाव बढ़ना और शरीर में रोयें बढ़ना इत्यादि।लम्बे समय बाद दिखने वाले विपरीत असर / कुप्रभाव :
बच्चों का विकास कम होना (लम्बाई कम बढ़ना), हड्डियाँ का कमजोर होना, चमड़ी खींचने से जांघ और पेट के नीचे के भाग में गुलाबी लकीरें पड़ना, मोतियाबिंद (Cataract) होने का भी होना इत्यादि।इतने अधिक विपरीत असरवाली प्रेडनीसोलोन दवा लेना क्या बच्चों के लिए फायदेमंद है?
हाँ, सामान्यतः जब यह दवाइँ ज्यादा मात्रा में, लम्बे समय तब ली जाये, तक दवाइँ का विपरीत असर होने का अधिक भय रहता है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित मात्रा में और कम समय के लिए दवा के सेवन से दवाई का विपरीत असर कम और थोड़े समय के लिए ही होता है। जब इस दवाई का सेवन डॉक्टर की देखरेख में किया जाता है, तब गंभीर एवं विपरीत असर का प्रारंभ में ही निदान हो जाने के कारण तुरन्त ही उपचार में उचित परिवर्तन द्वारा उसे रोका या कम किया जा सकता है।
अनुपचारित रोग के कारण कई जटिलतायें हो सकती है। जैसे - संक्रमण का खतरा, हाइपोवोलीमिया, थ्रोम्बोएम्बलजिम (जिसमें खून का थक्का, रक्त वाहिकाओं में बाधा डालकर स्ट्रोक, दिल का दौरा और फेफड़ों की बीमारी का कारण बनता हैं), लिपिड की असमान्यता, कुपोषण और एनीमिया। अनुपचारित नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण संक्रमण से अक्सर कई बच्चों की मृत्यु हो जाती है। बचपन में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के लिए कोर्टिकोस्टेराइड के उपयोग के कारण अब मृत्यु दर घटकर 3 % हो गयी है।
बच्चों में देखे जाते इस रोग में किडनी खराब होने की संभावना बहुत कम रहती है।
फिर भी, रोग के कारण होनेवाली तकलीफों और खतरों के मुकाबले दवाइँ का विपरीत असर कम हानिकारक है। इसलिए ज्यादा फायदे के लिए थोड़े विपरीत असर को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं है।अधिकांश बच्चों में उपचार के तीसरे या चौथे सप्ताह में पेशाब में प्रोटीन नहीं जाने के बावजूद, सूजन जैसी तकलीफ बनी रहती है। क्यों?
प्रेडनीसोलोन के सेवन करने से भूख बढ़ती है। अधिक खाने से शरीर में चर्बी जमा होने लगती है, जिसके कारण तीन-चार सप्ताह में फिर से सूजन आ गई है ऐसा लगने लगता है।रोग की सूजन और चर्बी जमा होने से सूजन जैसा लगना, दोनों के बीच का अंतर कैसे मालूम किया जा सकता है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग बढ़ने के कारण सूजन सामान्य रूप से आँखों के नीचे और चेहरे पर दिखाई देती है, जो सुबह ज्यादा और शाम को कम हो जाती है। इसके साथ-साथ पैरों में भी सूजन हो सकती है। दवाइँ लेने से अक्सर चेहरे, कंधे, और पेट पर चर्बी जमा होती है, जिससे वहाँ सूजन जैसा दिखने लगता है। इस सूजन का असर पुरे दिन के दौरान समान मात्रा में दिखाई देता है।
आँखों और पैरों पर सूजन का न होना और चेहरे की सूजन सुबह ज्यादा और शाम को कम न होना, ये लक्षण सूजन नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण नहीं है यह दर्शाते हैंनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण होनेवाली सूजन और दवा के असर के कारण चर्बी होने से सूजन लगने के बीच अंतर जानना क्यों जरुरी है?
मरीज के लिए कौन सा उपचार उचित रहेगा यह निश्चित करने के लिए सूजन होने एवं सूजन जैसा लगने के बीच का अंतर जानना जरुरी है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के कारण यदि सूजन हो, तो दवाइँ की मात्रा में बढ़ोतरी या परिवर्तन और साथ-साथ पेशाब की मात्रा बढ़ानेवाली दवाइयों की जरूरत पड़ती है।
चर्बी जमा होने के कारण सूजन जैसा लगना, प्रेडनीसोलोन दवा द्वारा नियमित उपचार का असर बताता है। जिससे रोग नियंत्रण में नहीं है या रोग बढ़ गया है, ऐसी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। समय के साथ-साथ प्रेडनीसोलोन दवा की मात्रा कम होने से, कुछ हप्तों में सूजन भी धीरे-धीरे कम होते हुए पूर्णतः ठीक हो जाती है। ऐसी दवा की वजह से उत्पन्न सूजन को तुरन्त कम करने के लिए किसी भी प्रकार की दवाइँ लेना मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में रोग या दवाइँ की वजह से दिखनेवाली सूजन के बीच में अंतर करना जरुरी है।
बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावना कितनी है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की पुनरावृत्ति की संभावनाएं 50 - 75 % तक होती है। इसकी आवृत्ति हर रोगी में अलग-अलग होती है।प्रेडनीसोलोन का उपचार यदि सफल नहीं हो, तब उपयोग की जानेवाली अन्य दवाइयाँ कौन-कौन सी हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपयोग की जानेवाली अन्य दवाओं में 'लीवामिजोल' 'मिथाइल प्रेडनीसोलोन', 'साइक्लोफॉस्फेमाइड', एम. एम. एफ. (M.M.F.) इत्यादि दवाईयाँ हैं।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के बच्चों में किडनी बायोप्सी कब कराई जाती है?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी बायोप्सी की जरूरत निम्नलिखित परिस्थितियों में पड़ती है:
रोग पर नियंत्रण के लिए ज्यादा मात्रा में तथा लम्बे समय तक प्रेडनीसोलोन दवा लेनी पड़ रही हो।
प्रेडनीसोलोन लेने के बाद भी रोग नियंत्रण में नहीं आ रहा हो।
अधिकांश बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने के लिए जिम्मेदार रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' होता है। जिन बच्चों में यह रोग 'मिनीमल चेन्ज डिसीज' के कारण नहीं होने की शंका हो, (जैसे पेशाब में रक्तकणों की उपस्थिति, खून में क्रीएटिनिन की मात्रा ज्यादा होना, कोम्पलीमेंट (C-3) की मात्रा कम होना इत्यादि) तब किडनी की बायोप्सी कराना जरुरी होता है।
जब यह रोग वयस्कों में होता है, तब आमतौर पर उपचार किडनी बायोप्सी के बाद किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार का नियमन नेफ्रोलॉजिस्ट किस प्रकार करते हैं?
नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के उपचार के नियमन के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा नियमित जाँच बहुत जरुरी है। इस जाँच में संक्रमण का असर, खून का दबाव, वजन, पेशाब में प्रोटीन की मात्रा और जरूरत के अनुसार खून की जाँच की जाती है। इस जानकारी के आधार पर डॉक्टर द्वारा दवा में जरुरी परिवर्तन किया जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम कब ठीक हो जाता है?
उचित उपचार से अधिकांश बच्चों के पेशाब में अलब्युमिन जाना बंद हो जाता है और यह रोग थोड़े समय में ही नियंत्रण में आ जाता है। परन्तु कुछ समय के बाद लगभग सभी बच्चों में यह रोग एवं सूजन फिर से दिखाई देने लगते है और ऐसी हालत में उपचार की
लम्बे समय- सालों तक चलने वाला यह रोग उम्र के बढ़ने के साथ-साथ पूरी तरह से ठी
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे रोग पुनः होने की प्रक्रिया धीरे-धीरे कम हो जाती है। 11 से 14 साल की उम्र के बाद अधिकांश बच्चों में यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज को डॉक्टर से कब संपर्क स्थापित करना चाहिए?
जिस परिवार के बच्चे को नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की शिकायत हो उसे नीचे गये किसी भी लक्षण के दिखने पर डॉक्टर के पास तुरंत जाना चाहिए -
पेट में दर्द, बुखार, उल्टी होना।
सूजन, बिना किसी कारण के वजन में वृध्दि और पेशाब की मात्रा में उल्लेखनीय कमी होना।
बीमार होने के लक्षण दिखना जैसे अगर बच्चा खेलना बंद कर दे और निष्क्रिय हो जाये।
लगातार खाँसी के साथ बुखार या तेज सिरदर्द का होना।
चेचक या खसरा का होना।
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे रोग पुनः होने की प्रक्रिया धीरे-धीरे कम हो जाती है। 11 से 14 साल की उम्र के बाद अधिकांश बच्चों में यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज को डॉक्टर से कब संपर्क स्थापित करना चाहिए?
जिस परिवार के बच्चे को नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की शिकायत हो उसे नीचे गये किसी भी लक्षण के दिखने पर डॉक्टर के पास तुरंत जाना चाहिए -
पेट में दर्द, बुखार, उल्टी होना।
सूजन, बिना किसी कारण के वजन में वृध्दि और पेशाब की मात्रा में उल्लेखनीय कमी होना।
बीमार होने के लक्षण दिखना जैसे अगर बच्चा खेलना बंद कर दे और निष्क्रिय हो जाये।
लगातार खाँसी के साथ बुखार या तेज सिरदर्द का होना।
चेचक या खसरा का होना।
क हो जाता है।
फिर से जरूरत पड़ती है।