महिलाओं मे पीआईडी रोग के लक्षण और उपचार

                                 
महिलाओं को पेड़ू यानी नाभि के नीचे के हिस्से में दर्द की शिकायत अक्सर होती है। पीरियड्स के दिनों में ये दर्द सामान्य है मगर सामान्य दिनों में यदि आपको पेड़ू में दर्द, पेशाब में जलन, अंगों में सूजन और योनि से रिसाव जैसी समस्याएं हो रही हैं, तो इसका कारण पेल्विक इंफ्लेमेट्री डिजीज (पीआडी) हो सकता है। महिलाओं के योनि में जब बैक्टीरिया के प्रवेश के कारण गंभीर संक्रमण हो जाता है, तो ये संक्रमण पेल्विक को भी प्रभावित करता है। पेल्विक (श्रोणि) महिलाओं के शरीर में पेट के निचले हिस्से में होता है (जिसे कुछ लोग पेड़ू कहते हैं) और फैलोपियन ट्यूब, ओवरी सर्विक्स और यूटेरस से बनता है। ये संक्रमण ही पेल्विक इंफ्लेमेट्री डिजीज का कारण बनता है।

क्या हैं पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज के लक्षण

पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज के लक्षण दूसरे यौन संचारित रोगों (जैसे यूटीआई) के समान ही होते हैं, इसलिए इसका आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता है।
पेट के निचले हिस्से में दर्द
मूत्र त्याग के समय असहनीय जलन
यौन संबंध के समय तेज दर्द और जलन
मासिक धर्म का अनियमित होना
थकान और आलस रहना
योनि से बदबूदार गाढ़ा या असामान्य स्राव
लंबे समय से हल्‍का-हल्‍का बुखार
अचानक तेज बुखार और उल्टी
यूरीन करने में असुविधा और दर्द
संभोग के दौरान परेशानी या दर्द
पीठ में दर्द की समस्या
किनको होता है ज्यादा खतरा
गर्भावस्था में किसी प्रकार के आईयूडी डिवाइस का इस्तेमाल
यौन रूप से ज्यादा सक्रिय रहने के कारण
एक से ज्यादा लोगों के साथ यौन संबध बनाने के कारण
यौन संबंध के समय कंडोम का इस्तेमाल न करने के कारण या असुरक्षित यौन संबंध के कारण
योनि में होने वाले अन्य किसी संक्रमण के कारण



कितना खतरनाक है पीआईडी


पीआईडी एक संक्रमण का परिणाम होता है जो योनि के आस-पास के अंग या ब्‍लड के माध्‍यम से फैल जाता है। आमतौर यौन संचारित रोगों के साथ महिलाओं को विशेष रूप से पीआईडी, गोनोरिया और क्लामिडिया के विकास के लिए बड़ा खतरा है। कई यौन साथी के साथ यौन सक्रिय किशोरों और महिलाओं में भी पीआईडी विकसित होने की संभावना अधिक रहती हैं।

कैसे होती है जांच

अभी तक पीआईडी के निदान के लिए कोई भी परीक्षण उपलब्‍ध नहीं है। फिर भी इसके लक्षणों का निदान स्त्री रोग चिकित्सक द्वारा होता है। सामान्यतः योनि और गर्भाशय ग्रीवा के अंदर रूई का इस्‍तेमाल करके नमूना लिया जाता है। इसके अलावा अल्ट्रासाउंड स्कैन भी रोग की पुष्टि के लिए आवश्यक हो सकता है।
योनि के भीतर हो सकती है सूजन
योनि के भीतर विकसित संक्रमण से ट्यूबों में गंभीर संक्रमण शुरू हो जाता है। समय पर इलाज न होने पर संक्रमण फैल जाता है और डिम्बवाही ट्यूबों की दीवारों में सूजन आ जाती है। इलाज न होने पर यह नलियों की बाहरी सतहें से आस-पास के अंगों जैसे मूत्राशय और मलाशय से चिपकना शुरू हो जाता है।

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कचनार के पेड़ के औषधीय गुण


कचनार का फूल जितना खूबसूरत होता है उतना ही यह सेहत के लिए भी गुणकारी होता है। मुंह में छाले आ गए हों या पेट में कीड़े हो गए हों, कचनार का फूल हर सूरत में कारगर उपचार है।
प्रकृति के पास औषधि का खजाना है जो युगों-युगों से जीवों के काम आते रहे हैं। इन्हीं में से एक कचनार का पेड़ भी है जो कई रोगों को जड़ से खत्‍म करने की क्षमता रखता है। इस पेड़ की पत्तियां, तना व फूल आदि सभी उपयोगी हैं। कचनार की गणना सुंदर व उपयोगी वृक्षों में होती है। इसकी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से गुलाबी कचनार का सबसे ज्यादा महत्‍व है। कचनार के फूल, कलियां और वृक्ष की छाल को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह शरीर के किसी भी भाग में ग्रंथि (गांठ) को गलाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा रक्त विकार व त्वचा रोग जैसे- दाद, खाज-खुजली, एक्जीमा, फोड़े-फुंसी आदि के लिए भी कचनार की छाल का उपयोग किया जाता है। यह वात रोगों के लिए भी बहुत लाभकारी है।
 

पेट के कीड़े


पीले कचनार के छाल को पानी में उबालकर ठंडा कर लें। दो से तीन दिन इसका सेवन करने से पेट के कीड़े मर जाएंगे और छाला समाप्त हो जाएगा।

बवासीर-

 कचनार की कलियों को सूखाकर उसका पाउडर बनालें और मक्खन के साथ 11 दिनों तक सेवन करें तो खूनी बवासीर से राहत मिलता है। 
कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप छांछ के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद होता है। 

सूजन

कचनार की जड़ को पानी में घिसकर लेप बना लें और इसे गर्म कर लें। इसके गर्म-गर्म लेप को सूजन पर लगाने से आराम मिलता है।

कब्ज


कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और मल साफ होता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले 2 चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।

कुबड़ापन

अगर कुबड़ापन का रोग बच्चों में हो तो उसके पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से कुबड़ापन दूर होता है। लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कुबड़ापन दूर होता है। कुबड़ापन के दूर करने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए।

घाव

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।

स्तनों की गांठ

कचनार की छाल को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गांठ ठीक होती है।

मुंह में छाले

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ा-सा कत्था मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है।

खांसी और दमा

शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से खांसी और दमा में आराम मिलता है।

दांतों के रोग

कचनार की छाल को पानी में उबाल लें और उस उबले पानी को छानकर एक शीशी में बंद करके रख लें। यह पानी 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में गर्म करके रोजाना 3 बार कुल्ला करें। इससे दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।

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सर्दी के मौसम मे लहसुन के स्वास्थ्य लाभ


                                              



सर्दी से बचाव-

लहसुन की तासीर गर्म होने के कारण यह ठण्‍ड को दूर करने का कुदरती उपाय है। कई शोध इस बात को साबित कर चुके हैं कि ठंड के दिनों में लहसुन के सेवन से सर्दी नहीं लगती। सर्दियों के मौसम में गाजर, अदरक और लहसुन का जूस बनाकर पीने से शरीर को एंटीबायोटिक्स मिलते हैं और ठंड कम लगती है। सर्दी-जुकाम में लहसुन रामबाण है, इसे दूध में उबालकर पिलाने से बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।


दिल के लिए फायदेमंद

उच्‍च रक्‍तचाप को दूर करने में भी लहसुन काफी फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद एलिसिन नामक तत्‍व उच्‍च रक्त
उच्‍च रक्‍तचापचाप को सामान्‍य करने में मदद करते है। उच्‍च रक्तचाप के मरीज अगर नियमित रूप से लहसुन का सेवन करते है तो इससे उनका रक्चाप नार्मल रहता है। 'जर्नल आफ न्यूट्रीशन' के अनुसार, रोजाना लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्राल में 10 फीसदी की गिरावट आती है, जिससे हृदयरोगों की संभावना कम हो जाती है।

गर्भावस्‍था के लिए उत्तम

गर्भावस्था के दौरान लहसुन का नियमित सेवन मां और शिशु, दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। यह गर्भ के भीतर शिशु के वजन को बढ़ाने में सहायक है। गर्भवती महिलाओं को लहसुन का सेवन नियमित तौर पर करना चाहिए। गर्भवती महिला को अगर उच्च रक्तचाप की शिकायत हो तो, उसे पूरी गर्भावस्था के दौरान किसी न किसी रूप में लहसुन का सेवन करना चाहिए। यह रक्तचाप को नियंत्रित रख कर शिशु को नुकसान से बचाता है। उससे भावी शिशु का वजन भी बढ़ता है और समय पूर्व प्रसव का खतरा भी कम होता है।


बालों की समस्याओं में-

बालों की किसी भी तरह की समस्या चाहे वों रूसी की हो या जूं कि या फिर बालों के झड़ने की, सभी के लिए लहसुन का जूस वरदान की तरह काम करता है। लहसुन में एलीसिन नाम का सल्फर कंपाउंड होता है जो बालों के झड़ने की समस्या को तो खत्म ही करता है, बाकि परेशानियों का भी इलाज माना जाता है। इसे दिन में दो बार कम बाल वाली जगह पर लगाकर सुखने तक रखना चाहिए। इससे न सिर्फ नए बाल उगते हैं बल्कि रुसी और जूं जैसी समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है।


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गुन गुने पानी से बीमारियाँ दूर करें//Warm water therapy

                           
  इस थेरेपी में मरीज को दिन भर में 8-10 बार केवल गुनगुना पानी पीने के लिए दिया जाता है। पानी हमेशा स्टील, पीतल या सेरेमिक के गिलास में ही पीने के लिए कहा जाता है। गुनगुना पानी पीने से शरीर में मौजूद टॉक्सिन बाहर निकल जाते हैं। इस थेरेपी से बलगम, गैस, एसिडिटी और शरीर में इकट्ठा हुई अतिरिक्त वसा की समस्या दूर होती है।

कैसे देते हैं यह थेरेपी

आथ्र्राइटिस के मरीज थोड़े-से गुनगुने पानी में कच्ची हल्दी का पेस्ट मिला लें। इस पानी को सुबह खाली पेट पिएं औैर शाम को डिनर से एक घंटा पहले पिएं। इससे जोड़ों के अंदर की अकड़न दूर होगी।
थाइरॉइड पीड़ित व्यक्ति रात को एक चम्मच साबुत धनिया एक गिलास पानी में भिगो दें। सुबह खाली पेट पानी को आधा रह जाने तक उबालें। इसे गुनगुना होने पर पी लें।
हाइपर एसिडिटी के मरीज को दिन भर में कम से कम 6 गिलास गर्म पानी पीने के लिए कहा जाता है। गुनगुना पानी पेट में जाकर इकट्ठी एसिडिटी को घोल देता है और 30 से 45 मिनट के भीतर एसिडिटी से आराम देता है।
मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति को दिन में कम से कम 10-12 गिलास गर्म पानी पीना चाहिए। उसमें नीबू, कच्ची हल्दी का पेस्ट, आंवले का रस, शुद्ध शहद भी मिला सकते हैं। मरीज डायबिटिक है तो उसे शहद नहीं देते। किडनी के मरीजों को पानी थोड़ा-थोड़ा करके देते हैं।



त्वचा की समस्या से पीड़ित मरीज को गुनगुने पानी में नीबू मिलाकर पीने के लिए दिया जाता है और नीम के पत्तों का पेस्ट नहाने के पानी में मिलाकर नहाने के लिए कहा जाता है।
उल्टी, खट्टी डकार आ रही हो, भूख नहीं लग रही हो, आंतों में सूजन हो तो पीड़ित व्यक्ति को गर्म पानी पिलाया जाता है।
वार्म वॉटर वॉश थेरेपी: 

इसमें मरीज को वार्म वॉटर में नहाने को कहा जाता है या वार्म वॉटर से प्रभावित जगह की क्लीनिंग की जाती है।
क्लीनिंग बाथ थेरेपी: 

इसके तहत नीम के गुनगुने पानी से एनीमा किया जाता है। इसमें नीम के पत्ते और थोड़ा कपूर मिलाकर बनाए गर्म एंटीफंगल पानी से योनि मार्ग की बाहर से सफाई की जाती है।
स्पंज बाथ थेरेपी: 

जोड़ों के दर्द या आथ्र्राइटिस में गुनगुने पानी से नहाना फायदेमंद होता है। चाहें तो गुनगुने पानी में नहाएं या पानी में तौलिया को भिगोकर शरीर को स्पंज करें। इससे मसाज भी हो जाएगी और जोड़ों की अकड़न धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी।


हाट फुट बाथ थेरेपी:

 जिन्हें पैरों में ठंड लगती है या जलन रहती है या सूजन रहती है, उन्हें हाट फुट बाथ देते हैं। मरीज को स्टूल पर बिठा कर टब में गुनगुना पानी दिया जाता है, जिसमें वो पैर डुबो कर बैठता है। सिर पर गीला तौलिया रखते हैं, ताकि कोई बुरा प्रभाव न हो। वार्म वॉटर चुंबक की तरह रक्त को खींचता है, रक्त संचार ठीक करता है और पैरों की परेशानी कम करता है।
स्पाइनल बाथ थेरेपी:

 अगर किसी मरीज को सिरदर्द, चक्कर या घबराहट की शिकायत हो तो उसे वार्म स्पाइनल बाथ दिया जाता है। गुनगुने पानी में तौलिये को भिगोकर थोड़ा निचोड़ कर जमीन पर बिछा देते हैं। मरीज को उस तौलिये पर पीठ के बल लेटने के लिए कहा जाता है। पानी की गर्मी या हीट से स्पाइन पर असर होता है, जिससे नर्वस सिस्टम संबंधी या न्यूरोलॉजिकल संबंधी बीमारियों में आराम मिलता है। इससे ठीक होने वाली समस्याओं में सिरदर्द, डिप्रेशन, मिर्गी, माइग्रेन आदि शामिल हैं।
इंटरनल स्टीम थेरेपी:

 अस्थमा, साइनस, गले का संक्रमण, थाइरॉइड के मरीज को यह थेरेपी दी जाती है। मुंह और नाक से स्टीमर, बॉयलर या पतीले से वार्म वॉटर स्टीम दी जाती है। मरीज सिर पर तौलिया या चादर लपेटकर स्टीम लेते हैं। पानी में युकेलिप्टस या अजवायन के पत्ते या युकेलिप्टस ऑयल की 4-5 बूंदे डाल कर स्टीम दी जाती है। स्टीम लेने से पहले मरीज को एक गिलास पानी पिलाया जाता है, ताकि उसे घबराहट न हो।

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हृदय रोगों के इलाज की जानकारी

                                                 

हृदय रोग के अंतर्गत हृदय वॉल्‍व सम्बन्धी बीमारियां, हृदय ताल और विशेषकर कोरोनरी धमनी की बीमारियां आदि रोग आते हैं। दुनिया भर के चिकित्‍सकों के लिए हृदय रोगों से निपटना अभी एक बड़ी चुनौती है। भारत में बड़ी संख्‍या में लोग हृदय रोग के कारण अपनी जान गवांते हैं।
विज्ञान ने चिकित्‍सा के क्षेत्र में बड़ी कामयाबियां हासिल की हैं, लेकिन बावजूद इसके हृदय रोगों पर पूरी तरह विजय नहीं प्राप्‍त की जा सकी है। लेकिन, अपनी जीवनशैली में सकारात्‍मक बदलाव, खान-पान में सुधार आदि से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। नीचे दिए गये उपायों को अपनाकर आप हृदय रोगों के संभावित खतरों से काफी हब तक बच सकते हैं-

जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन करें

अपने हृदय और हृदय प्रणाली को स्वस्थ रखने की दिशा में कुछ खास बदलाव करें। प्रतिदिन व्यायाम करें। ये तरीके हृदय को स्‍वस्‍थ रखते हैं और हृदय रोगों के खतरे को कम करने में मदद करते हैं। और साथ ही हृदय रोग होने की स्थिति में रोग को गंभीर होने से भी रोकते हैं। ये बदलाव करने से आपको कोई अन्य हृदय रोग होने से बचाव होगा और यदि रोग का उपचार चल रहा है तो उसमें जल्दी लाभ होने में भी सहायता होगी।

संतुलित आहार लें

एक स्वस्थ संतुलित आहार लें जिसमें सभी खाद्य समूहों से खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। वे भोजन जिनमें संतृप्त वसा, ट्रांस वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होती है, वे शरीर के नुकसानदेह होते हैं। यदि आप हृदय रोगों और समस्याओं से दूर रखना चाहते हैं तो आपको एल्कोहोल का इस्तेमाल भी कम करना होगा।

अन्य स्थितियों पर नजर रखें

हृदय रोग से ग्रसित रोगी अक्सर कुछ अन्य रोगों की निदान की प्रक्रियाओं जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल आदि से भी गुजर रहे होते हैं। इन सभी को नियमित जांच और नियंत्रण कर, आप ह्रदय रोगों के जोखिम कारकों से आसानी से मुकाबला कर पायेंगे। हृदय रोग के मरीजों को चाहिए कि वे अपना रक्त चाप 140/90 से कम रखें। इससे उन्हें हृदय रोग को काबू करने में मदद मिलती है। साथ ही वे रोगी जिन्हें हृदय रोग के साथ डाइबटीज है वे अपनी शुगर की नियमित जांच भी करें |

आवश्यक दवाएं भी लें

कभी-कभी जीवन शैली में बदलाव हृदय रोगों के निदान के लिए काफी नहीं होता है। दवाएं हृदय रोग के लक्षणों के कई प्रकार के इलाज के लिए एक कारगर तरीका है। कुछ दवाएं रक्त को पतला करने तथा कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने का कार्य करती हैं। आपके लिए यह जानना आवश्यक है कि जो दवा आप ले रहे हैं वह आपके दिल की बीमारी के इलाज के लिए कैसे काम करती है। यह दवाएं नीयमित रूप से व ठीक मात्रा और समय पर ली जानी जरूरी होती हैं। अपने डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं का सेवन कतई बंद ना करें, ऐसा करने से आपका रोग और गंभीर हो सकता है।
हृदय की चिकित्सा के निम्न प्रकार हो सकती हैं।
हार्ट वॉल्व सर्जरी,
इनफ्रेक्ट एक्सक्लूजन सर्जरी
हार्ट ट्रासप्लान्ट(ह्रदय प्रत्यारोपण)
बाईपास सर्जरी
हृदय के लिए अन्य भी कई सर्जरी होती हैं, जो पूरी तरह रोग की स्थिति और अवस्था पर निर्भर करता है।

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सूर्य स्नान करने की विधि और फायदे

                                                         
अग्नि तत्व जीवन का उत्पादक होता है। गर्मी के बिना कोई जीव या पौधा न तो उत्पन्न हो सकता है और न ही विकसित। चैतन्यता जहां कहीं भी दिखाई देती है, उसका मूल कारण गर्माहट ही है। गर्माहट के समाप्त होते ही क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। अगर शरीर की गर्मी का अंत हो जाये तो जीवन का अंत ही समझा जाता है। अग्नि तत्व को सर्वोपरि समझते हुए आदि वेद ऋग्वेद में सर्वप्रथम मंत्र अक्षर 'अग्नि' ही आया है। सूर्य अग्नि तत्व का मूर्तिमान स्वरूप है, इसीलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिन पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं को धूप पर्याप्त मात्र में मिलती है, वे स्वस्थ व निरोग रहते हैं। उसके विपरीत जहां सूर्य की जितनी कमी होती है, वहां उतनी ही अस्वस्थता रहती है। एक कहावत है-जहां धूप नहीं जाती, वहां डॉक्टर जाते हैं, अर्थात प्रकाश रहित स्थानों में बीमारियों का निवास हो जाता है। भारतीय तत्ववेत्ता अति प्राचीन काल से सूर्य के गुणों से परिचित हैं, इसीलिए उन्होंने सूर्य की उपासना की अनेक विधि-व्यवस्थायें प्रचलित कर रखी हैं। अब पाश्चात्य भौतिक विज्ञान द्वारा भी सूर्य के अद्भुत गुणों से परिचित होते जा रहे हैं।
 सूर्य की सप्त किरणों में 'अल्ट्रा वायलेट' और 'अल्फा वायलेट' किरणें उपस्थित रहती हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद होती हैं। आजकल इन किरणों को मशीनों के माध्यम से कृत्रिम रूप में भी पैदा किया जाने लगा है परंतु जितना लाभ सूर्य से आने वाली किरणों द्वारा होता है, उतना मशीन द्वारा कृत्रिम किरणों से नहीं होता। यूरोप एवं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी अब सूर्य किरणों द्वारा उपचार विधियों का चलन जोरों पर हो गया है। वहां अनेक ऐसे औषधालय हैं जो मात्र सूर्य शक्ति से बिना किसी अन्य औषधियों के प्रयोग किए जटिल रोगों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
'क्रोमोपैथी' नामक एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति का ही आविष्कार हो चुका है, जिसमें रंगीन कांच की सहायता से सूर्य की वांछित किरणों को आवश्यकता के अनुसार रोगी तक पहुंचाया जाता है। रोग के कीटाणुओं का नाश करने की जितनी क्षमता धूप में है, उतनी और किसी वस्तु में नहीं होती। क्षय के कीड़े जो बड़ी मुश्किल से नष्ट होते हैं, सूर्य के सम्मुख रखने से कुछ ही मिनटों में नष्ट हो जाते हैं। वेटिव, लुक्स, जानसन, रोलियर, लुईस, रेडोक, टाइरल आदि अनेक उच्च कोटि के सुप्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में सूर्य किरणों की सुविस्तृत महिमा का वर्णन किया है और बताया है कि 'सूर्य से बढ़कर अन्य किसी औषधि में रोग निवारक शक्ति है ही नहीं।
सूर्य किरणों से निरोग और रोगी सभी को समान रूप से फायदा होता है, इसलिए नित्य नियमित रूप से अगर 'सूर्य स्नान किया जाय तो स्वास्थ्य सुधार में आश्चर्यजनक रूप से सहायता मिल सकती है। सूर्य स्नान की
विधि:- नियमित रूप से सूर्य स्नान करते रहने से हर अवस्था के तथा हर रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरूष तथा बच्चे स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते है। सूर्य की किरणें शरीर में भीतर तक प्रवेश कर जाती है और रोग के कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। पसीने द्वारा शरीर में स्थित विकारों को बाहर निकालकर अपनी पोषक शक्ति से क्षत विक्षत एवं रूग्ण अंगों को बल प्रदान करना सूर्य-किरणों का प्रमुख कार्य होता है।
टूटी हुई हड्डियों को जोडऩे, घावों को भरने तक से सूर्य-स्नान से लाभ पहुंचता है। यूं तो सूर्य-स्नान किसी भी ऋतु में किया जा सकता है, परंतु इसके लिए शीत-ऋतु अत्यन्त लाभकारी मानी जाती है। सूर्य-स्नान के लिए प्रात: काल का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दूसरे दर्जे का समय संध्याकाल का होता है।
इसके लिए हल्की किरणें ही उत्तम होती है। तेज धूप में बैठने से अनेक त्वचा रोग हो सकते हैं। सूर्य-स्नान को आरंभ में आधे घंटे से ही शुरू करना चाहिए। फिर धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हुए एक डेढ़ घंटे तक ले जाना चाहिए।
 सूर्य-स्नान करते समय मात्र तौलिया पहनकर ही धूप में बैठना चाहिए। समस्त शरीर नंगा रहने पर सूर्य की किरणों को शरीर सोखता है। अगर एकांत व सुरक्षित स्थान हो तो तौलिया को भी हटाया जा सकता है। सूर्य-स्नान करते समय सिर को तौलिया या हरे पत्तों से ढक लेना चाहिए।
   केला एवं कमल जैसा शीतल प्रकृति वाला पत्ता मिल जाए तो अति उत्तम होता है। नीम के पत्तों का गुच्छा बनाकर भी सिर पर रखा जा सकता है। जितनी देर सूर्य-स्नान करें, उतने समय को चार भागों में बांटकर अर्थात् पेट का भाग, पीठ का भाग, दाई करवट तथा बाईं करवट को सूर्य की किरणों के सामने बारी-बारी से रखना चाहिए जिससे हर अंग में समान रूप से धूप लग जाये। धूप सेवन करने के बाद ताजे पानी में भिगोकर निचोड़े हुए मोटे तौलिए से शरीर के हर अंग को रगडऩा चाहिए जिससे गर्मी के कारण रोमकूपों द्वारा भीतर से निकाला हुआ विकार शरीर से ही चिपका न रह जाये।
  धूप का सेवन खाली पेट ही करना चाहिए। धूप सेवन के कम से कम दो घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक कुछ नहीं खाना चाहिए। सूर्य का स्थान ऐसा होना चाहिए जहां पर जोर से हवा के झोंके न आते हों। धूप सेवन के बाद स्वभावत: शरीर हल्का एवं फुर्तीला हो जाता है परंतु अगर ऐसा न हो तो देह और भारी मालूम पडऩे लगती है।
अगर ऐसी बात हो तो कुछ देर और धूप स्नान करना चाहिए। अगर स्थिति और ऋतु अनुकूल हो तो सूर्य स्नान के बाद ताजे जल से स्नान कर लेना चाहिए। जिस दिन बादल हों या तेज हवा चल रही हो, उस दिन सूर्य स्नान नहीं करना चाहिए।


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नाक, कान, गला के रोगों से निजात पाने के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपाय



ईएनटी (ईयर, नोज एंड थ्रोट) का संक्रमण किसी भी को हो सकता है। फिर चाहे वह बच्‍चा हो या बड़ा। आमतौर पर इस संक्रमण के लक्षण में ही दिखाई देते हैं। इस बीमारी के कुछ लक्षण हैं - गाल में दर्द के साथ नाक से गाढा बलगम निकलना, नाक बहना, सिरदर्द, बुखार और कुछ भी निगलने में परेशानी कान में इंफेक्‍शन होने से हमेशा तरल पदार्थ बाहर निकलता रहता है। सुनने में परेशानी होती है और संक्रमण की वजह से दर्द और सूजन भी हो जाती है।
ईएनटी के संक्रमण से बचने के उपाय –
इस संक्रमण की शुरूआत जुकाम से होती है। इसलिए जुकाम को शुरूआती स्‍तर पर ही पहचान लीजिए। इससे बचने के लिए जुकाम की शुरुआत में ही भाप लीजिए। जिससे संक्रमण नहीं होगा। और संक्रमित बलगम बाहर निकल जाएगा।
ईएनटी के संक्रमण से बचने के लिए तैराकी करते वक्‍त विशेष ध्‍यान देना चाहिए। तैराकी के दौरान कान को और आंख को संक्रमण से बचाने के लिए कान में ईयर प्‍लग और चश्‍मा लगाकर ही तैराकी कीजिए।
अगर गले में खराश हो तो हल्‍के गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारा कीजिए। इससे खराश में फायदा होता है। साथ ही गले का संक्रमण नहीं। दिन में कम से कम तीन से चार बार गरारा कीजिए। गरारा करने से रक्‍त संचार भी अच्‍छा होता है।
अगर आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तो लोगों के संपर्क में आने से बचने की कोशिश कीजिए। भीड़-भाड़ वाले इलाके में जाने से परहेज कीजिए। जिससे आपको संक्रमण न हो।
यदि जुकाम से ज्‍यादा परेशान हैं तो हवाई यात्रा नहीं करनी चाहिए। हवाई यात्रा करने से संक्रमण बढ कर साइनस का रूप ले सकता है और कान को भी प्रभावित कर सकता है।
मादक पदार्थों का सेवन करने से बचें। धूम्रपान और शराब पीने से सइनस का संक्रमण बढ जाता है।
फलों और सब्जियों का ज्‍यादा मात्रा में सेवन करें। डेयरी उत्‍पाद का सेवन कम कीजिए।
कान दर्द
कारण

कान इके अन्दर मैल फूल जाने, घाव हो जाने, कान में सूजन होने या संक्रमण के कारण कान में दर्द होता हैं। गले या नाक में संक्रमण होने पर समय रहते चिकित्सा न की जाए, तो उससे भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण
कान का सूजना, कान से मल निकलना, कानों में रूक – रूक कर दर्द होना आदि।

घरेलू चिकित्सा


तुलसी के पत्तों का रस निकलकर गुनगुना कर लें और दो – तीन बूँद सुबह – शाम डालें।

नींबू का रस गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
प्याज का रस निकालकर गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
बकरी का दूध उबाल कर ठंडा कर लें। जब गुनगुना रह जाएं, तो इसमें सेंधानमक मिलाकर 2 – 3 बूँद दोनों कानों में टपकाएं।
मूली के पत्तों को कूटकर उसका रस निकालें। रस की एक तिहाई मात्रा के बराबर तिल के तेल के साथ आग पर पकाएं। जब केवल तेल ही बचा रह जाए, तो उतार कर छान लें। कान में 2 -3 बूँद डालें।
कपूर व घी समान मात्रा में लेकर पकाएं। पकने पर उतार कर ठंडा कर लें व 2 – 3 बूँद कानों में डालें।
आक के पत्तों का रस, सरसों का या तिल का तेल तथा गोमूत्र या बकरी का मूत्र बराबर मात्रा में लेकर थोड़ा गर्म करें और कान में 2 – 3 बूँद डालें।
लहसुन की दो कलियाँ छीलकर सरसों के तेल में डाकार धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन जलकर काला हो जाए, तो उसे उतार कर ठंडा करें व छान कर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
अदरक का रस, सेंधानमक, सरसों का तेल व शहद बराबर मात्रा में लेकर गर्म करें और गुनगुना होने पर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आक की पकी हुई पीली पत्ती में घी लगाकर आग पर गर्म करें। इसे निचोड़कर रस निकालें व दो – तीन बूँद कानों में डालें।
आम की पत्तियों का रस निकालकर गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महत्पंचमूल सिद्ध तेल, सुरसादि पक्व तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं। रामबाण रस, लक्ष्मीविलास रस व संजीवनी वटी का प्रयोग खाने के लिए करें।

कान बहना

कारण

जुकाम, खांसी या गले के संक्रमण की चिकित्सा न की जाए, तो कान में भी संक्रमण हो जाता हैं। छोटे बच्चे जिनका गला खराब हो या खांसी हो, जब कान में मुंह लगाकर धीरे से कोई बात करते हैं, तो सांस के साथ रोग के जीवाणु कान में पहुँच जाते है। कान में फोड़ा – फुंसी हो, पानी, रूई या अन्य कोई बाहरी वस्तु कान मे रह जाए, तो भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

रोगी के कान से बदबूदार स्राव या मवाद बाहर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

लहसुन की दो कलियाँ व नीम की दस कोपलें तेल में गर्म करें। दो – दो बूँद दिन में तीन – चार बार डालें।
150 ग्राम सरसों का तेल किसी साफ़ बर्तन में डालकर गर्म करें और गर्म होने पर 10 ग्राम मोम दाल दें। जब मोम पिघल जाए तो आग पर से उतार लें और इसमें 10 ग्राम पिसी हुई फिटकरी मिला दें। 3 – 4 बूँद दवा सुबह – शाम कान में डालें।
2 पीली कौड़ी का भस्म 200 मिली ग्राम व दस ग्राम गुनगुने तेल में डालें। छानकर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नींबू के रस में थोड़ा सा सज्जीखार मिलाकर 2 – 3 बूँद कान में टपकाएं। आग से उतार कर ठंडा करें व छानकर रख लें। 2 – 3 बूँद कान में डालें।
10 ग्राम रत्नजोत को 100 ग्राम सरसों के तेल में जलाएं। ठंडा होने पर छानकर रखें और 2 – 3 बूँद कान में डालें।
धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर थोड़ा गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नीम की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
तुलसी की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आधा चमच् अजवायन को सरसों या तिल के तेल में गर्म करें। फिर आंच से उतार लें। गुनगुना रह जाने पर 2 – 3 बूँद डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आरग्वधादि क्वाथ से कान को धोएं। पंचवकल क्वाथ या पंचकषाय क्वाथ का प्रयोग भी किया जा सकता हैं। समुद्रफेन चूर्ण का प्रयोग भी लाभदायक होता है।

नासास्रोत शोथ

कारण

चेहरे की हड्डियों में स्थित गुहाएं (रिक्त स्थान) जोकि नाक से सम्बद्ध हैं, साइनस कहलाती हैं। ये स्लेश्म्कला से ढकी रहती हैं एवं चार प्रकार की होती हैं और जिस हड्डी में स्थित हैं, उनके अनुसार इनका नामकरण किया गया हैं। जुकाम या इन्फ्लुएंजा के उपद्रव के रूप में या संक्रमण के कारण इनमें सूजन आ जाने को साइनुसाइटिस या नासास्रोत शोथ कहते हैं।

लक्षण

किसी साइनस में शोथ होने पर एक ओर नासिका से स्राव होता हैं, साथ ही वेदना की शिकायत भी रहती हैं। जिस साइनस में शोथ हो, उसी के अनुसार वेदना की प्रतीति भी माथे व चेहरे के विभिन्न भागों में होती हैं।

घरेलू चिकित्सा
रोगी को पसीना आने वाली दवा दें, ताकि शोथ के कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद नासागुह के छिद्र खुल जाएं। इसके लिए रोगी को अदरक, लौंग, काली मिर्च, बनफशा की चाय पिलाएं।
एक ग्राम काली मिर्च को आधा चमच देसी घी में गर्म करें। ठंडा होने पर छान लें व दो – तीन बूँद नाक के दोनों छिद्रों में तीन बार डालें।
अदरक या सफेदे के पत्ते पानी में उबालकर भाप लें।
5 ग्राम अदरक घी में भूनकर सुबह – शाम लें।
5 ग्राम अदरक को पाव भर दूध में उबालें। यह दूध नाक के नासाछिद्रों में भर कर रखें।
जलनेति – 1 लीटर पानी को नमक डाल कर उबालें। गुनगुना रहने पर टोंटीयुक्त लोटे में भरकर बाएँ नाक से पानी लेकर दाएं से निकालें।फिर दाएं से लेकर बाएँ से निकालें। अंत मैं बारी – बारी से दोनों नाकों से पानी लेकर मुंह से निकालें।

पेटेंट दवाएं

चिरोटा के औषधीय गुण और उपयोग





यह पौधा हमारे आस-पास बहुत मात्रा में पाया जाता है मगर ज्यादातर लोग इसे खरपतवार समझकर उखाड़ कर फेंक देते हैं। आज के इस पोस्ट में हम आपको इसके बारे में संपूर्ण जानकारी देने वाले हैं तो चलिए जान लेते हैं इसके बारे में।
अगर किसी को दाद खाज खुजली जैसा कोई भी चर्म रोग है तो चिरोटा के बीज को पीसकर उनका लेप लगाने से कुछ ही दिनों में इन समस्या से राहत मिल जाती है।
अगर किसी को पेट के कीड़ों की समस्या है तो चिरोटा के 10 ग्राम बीजों को एक गिलास पानी में उबालकर पीने से पेट के कीड़े मर कर बाहर निकल जाएंगे।
 अगर किसी को पीलिया रोग की समस्या है तो चिरैता के 50 ग्राम पत्तियों को दो कप पानी में तब तक उबालें जब तक कि वह एक ना रह जाए और एक कप का सेवन करने से पीलिया रोग बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगा। और आयुर्वेद में तो इस नुस्खे का इस्तेमाल हड्डियों को जोड़ने के लिए भी किया जाता है।
चिरोटा की पत्तियों की सब्जी बनाकर खाने से शरीर ताकतवर और रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है क्योंकि इसकी पत्तियों के अंदर एंटीबैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं





ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) से भी हार्ट ब्लॉकेज का इलाज संभव और कारगर

                                  
हार्ट में ब्लॉकेज को हटाने की बजाय हृदय की क्षमता बढ़ाने का ट्रीटमेंट होने लगा है। इसमें ना एंजियोप्लास्टी और ना ही बायपास सर्जरी की जाती है। ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) में अधिकतम 35 दिन के ट्रीटमेंट से हृदय के सारे बायपास रूट खोले जाते हैं। अब तक प्रचलित एंजियोप्लास्टी और बायपास की बजाय ईसीपी से भी इलाज होने लगा है। इसमें ब्लॉकेज 80 फीसदी होने का इंतजार नहीं किया जाता है।
साओल के संस्थापक व कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल छाजेड़ बताते हैं कि थोड़े ब्लॉकेज में ही हृदय की क्षमता बढ़ाने का काम शुरू किया जाता है। इसमें प्राकृतिक तरीके से रक्त सप्लाई की मात्रा घटा-बढ़ाकर हृदय की क्षमता बढ़ाई जाती है। खिलाड़ियों के हृदय जितनी हार्ट की कैपेसिटी की जाती है। इसमें अधिकतम 30-35 दिन की सिटिंग में हृदय के सारे बायपास रूट खोल दिए जाते हैं।
वो सबकुछ जो नैचुरल बायपास में होता है
छोटी धमनियां करते हैं सक्रिय :

हृदय की कोई बड़ी धमनी के ब्लॉकेज होने पर छोटी-छोटी कई धमनियां उसका काम संभालती है। बड़ी धमनी के ब्लॉकेज पर इन छोटी धमनियों को खोला जाता है। हृदय के रक्त प्रवाह को सामान्य रखा जाता है। इसे नैचुरल बायपास कहते हैं।

रक्त स्टोरेज को पहुंचाते है दिल तक : इसमें मशीन से हाथ व पैरों में के उन भागों पर पट्टे बांधें जाते हैं जहां रक्त का स्टोरेज ज्यादा है। जब-जब सामान्य प्रक्रिया से रक्त हृदय तक पहुंचता है तब मशीन से दबाव बनाकर सामान्य से अधिक रक्त हृदय तक पहुंचाया जाता हैं। इससे हृदय की धमनियों की क्षमता बढ़ने लगती है।

नार्मल हार्ट अटैक

कारण -हृदय तक रक्त पहुंचाने का काम कोराेनरी आर्टरीज करती हैं। इसकी भीतरी सतह पर वसा के छोटे-छोटे कण एक साथ जमा होने से इसे संकरी कर देते हैं। इससे हृदय तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंचता और हार्ट अटैक की आशंका रहती है।

सलाह - 

कॉलेस्ट्रॉल मेंटेन रखने के लिए नियमित वर्कआउट जरूरी है। हर दिन कम से कम 30 मिनट वर्क आउट करना चाहिए। इसके लिए वॉकिंग, जॉगिंग, गार्डनिंग, स्विमिंग और साइकिलिंग कर सकते हैं।


3 तरह के कॉलेस्ट्रॉल जिनसे होता है हृदयाघात


1. एचडीएल :

यह गुड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी मात्रा 60 एमजीडीएल होनी चाहिए। शहर में इस कोलेस्ट्रोल के कम केस हैं।
2. एलडीएल : 

यह बेड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी सामान्य रेंज 100 एमजीडीएल से कम होती है। पश्चिमी देशों में ज्यादा होता है।

3. ट्राईग्लिसराइड :

इसकी मात्रा शरीर में 150 एमजीडीएल से कम होनी चाहिए। शहर में इसी के सबसे ज्यादा केस।
यहां है तकनीक
ईसीपी यूएसए के 200 हॉस्पिटल में है। चाइना में 10 हजार से ज्यादा सेंटरों पर इससे इलाज होता है। भारत में एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट, मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट आदि में इस मशीन से बीते दो-तीन साल से इलाज होने लगा है।
बदलती जीवनशैली से हृदय रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। गांवों में 15 तो शहरों में 30 फीसदी लोग हृदय के किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं। पिछले एक दशक में 4 गुना हृदय रोग बढ़ा है। इसमें भी युवाओं व महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
महिलाओं में 60 फीसदी हृ़दयाघात के मामलों में चेस्ट पैन महसूस ही नहीं होता है। महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले हृदय घात दबे पांव आता है। समय पर चिकित्सकीय सहायता लेने से 80 फीसदी मामलों में खतरा टाला जा सकता है।






मीठा नहीं खाने के स्वास्थ्य लाभ

                                           
                           

मीठे का शौकीन हर कोई होता है, कुछ लोग सेहत का ध्यान रखते हुए इसका कम सेवन करते हैं तो कुछ ज्यादा। मेहमानवाजी भी तब तक अधूरी समझी जाती है, जब तक खाने के बाद कुछ मीठा न परोसा जाए। मीठा मोटापा बढ़ाने के साथ-साथ डायबिटीज जैसी कई परेशानियों का कारण बनता है। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर 30 दिनों में मीठा न खाएं तो क्या होगा? इससे सेहत से जुड़े कई फायदे मिल सकते हैं। आइए जानें  एक महीना मीठा छोड़ने या कम करने के लाभ-

1. जोड़ों का दर्द

जिन लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत रहती हैं, उन्हें मीठा कम खाना चाहिए। 30 दिन मीठा छोड़ने से फर्क अपने आप महसूस होने लगेगा।


2. वजन कम


इससे कैलोरी कम होने लगेगी जिससे मोटापा अपने आप घटने लगेगा। इसके साथ ही दिल की कार्यप्रक्रिया में भी सुधार होगा।

3. प्रतिरोधक क्षमता मजबूत

मीठे का सेवन कम करने से इम्यूनिटी बढ़ने लगती है, जिससे सर्दी-खांसी जैसी छोटी-मोटी बीमारियों से बचाव रहता है।

4. पाचन क्रिया दुरुस्त

मीठा छोड़ने से खाना आसानी से पचना शुरू हो जाता है। इससे पेट और आंत को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

5. दांत और मसूढ़े स्वस्थ

ज्यादा मीठा कैविटी की परेशानी भी बढ़ाता है। इससे बचने के लिए 30 दिन मीठे का सेवन करना कम कर दें। इससे मसूढ़े भी स्वस्थ रहेंगे।


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6. डायबिटीज से बचाव

30 दिनों के लिए मीठे का सेवन कम करने से मधुमेह से भी बचाव रहता है। कभी अगर शूगर क्रेविंग महसूस करें तो इसे शांत करने के लिए ड्राई फ्रूट का सेवन कर सकते हैं।

7. ग्लोइंग स्किन 

मीठे का ज्यादा सेवन स्किन पर भी दिखाई देने लगता है। इससे मुंहासे, फाइन लाइंस,चेहरे के पोर्स का ओपन होना, ऑयली स्किन सहित कई तरह की परेशानियां आने लगती हैं। इनसे छुटकारा पाने के लिए अतिरिक्त मीठे का सेवन करना बंद कर दें। स्किन नेचुरल तरीके से ग्लो करने लगेगी।

8. अनिद्रा की छुट्टी

रात को ज्यादा मीठे का सेवन करने से अनिद्रा की परेशानी हो जाती है। इससे बचने के लिए मीठे का कम सेवन करें। अच्छी नींद आनी शुरू हो जाएगी।

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उँगलियों के दर्द और सूजन के उपचार


                                              


सूजन का उपचार -

सर्दी का मौसम में स्किन संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। इन दिनों में अधिकतर लोगों के हाथ-पैर की उंगलियां सूजने लगती हैं। उंगलियां सूजने पर काफी दर्द होता है और काम करने में भी मुश्किल आती है। कुछ लोगों की उंगलियां बहुत लाल हो जाती है स्किन उतरने लगती है। किचन में मौजूद चीजों से भी आप इस समस्या से छुटकारा पा सकते है।

1. मटर-

उंगलियों में सूजन आने पर मटर का इस्तेमाल करें। मटर को पानी में उबाल लें। इस पानी में कुछ देर अपनी उंगलियों को डालें। इससे सूजन कम होगी।

2. शलगम-

शलगम को पानी में उबाल लें। इसके पानी से उंगलियों को धोएं। इससे सूजन कम होगी और दर्द से राहत मिलेगी।

3. सरसों का तेल-

सरसों के तेल में नमक मिलाकर अपनी उंगलियों पर लगा लें। इस उपाय को रात में करें। तेल लगाकर उंगलियों को कवर कर लें। सुबह तक उंगलियों की सूजन कम हो जाएगी।

4. फिटकरी-

पानी में फिटकरी और नमक मिलाकर उबाल लें। इससे उंगलियों को धोएं। इससे सूजन कम होगी। सर्दियों में सूजन होने पर अपनाएं ये आसान तरीके

5. हल्दी और जैतून का तेल-

जैतून के तेल में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गर्म कर लें। इसे अपने पैरों की उंगलियों में लगाएं। इससे राहत मिलेगी।

6. नींबू का रस-

सूजन कम करने के लिए नींबू का इस्तेमाल किया जाता है। नींबू के रस को उंगलियों पर लगाएं। इससे सूजन कम होगी।
सर्दियों में बहुत से लोगों को पैरों में सूजन रहती है, जिस वजह से पैरों में दर्द भी होता है। इस सूजन से छुटकारा पाने के लिए लोग गर्म पानी से पैरों की सिंकाई तो करते ही है लेकिन कुछ लोगों को तो इससे आराम जल्द ही मिल जाता है, बहुत से लोगों को काफी समय तक इस दिक्कत का सामना करना पड़ता है। अगर आपक भी सर्दियों में पैरों की सूजन से परेशान रहते है तो इन घरेलू नुस्खों को इस्तेमाल करें। इनसे जल्द ही आराम मिलेगा।
पैरों की सूजन के उपचार


1. अदरक-

सोडियम के कारण पैरों में सूजन आ जाती है। अदरक सोडियम को पतला करने में मदद करता है। इसलिए दिन में 3-4 बार अदरक क तेल से पैरों की मालिश करें। इसके अलावा अपनी डाइट में भी अदरक का इस्तेमाल करें।

2. धनिया-

धनिए के बीजों से सूजन जल्दी गायब होती है। कप पानी में 2 से 3 चम्मच धनिए के बीज डालें। तब तक उबालें, जब तक कप का पानी आधा न हो जाएं। फिर इस काढ़े को धीरे-धीरे पीएं। इस काढ़े को दिन में 2 बार जरूर पीएं।

3. सिरका-

बराबर मात्रा में पानी और सिरका मिलाएं। फिर इसे कुछ समय तक गर्म करें। फिर इस सिरके में सूती कपड़ा डालकर सूजन और दर्द वाली जगह पर रखें। इस नुस्खे को दिन में 2-3 बार इस्तेमाल करें। उपयोग करने के बाद मॉइस्चराइजिंग क्रीम लगाएं।

4. आटा-

आटा गर्माहट देता है, इसकी गर्माहट से दर्द और सूजन वाली जगह की सिंकाई अच्छे से होती है। आटा और वाइन का पेस्ट बनाएं। फिर इसे दिन मिनट तक सूजन वाली जगह पर रखें। फिर बाद में गुनगुने पानी से इसे धोकर हल्की मसाज करें।

5. लहसुन-

रोज लहसुन या इसका तेल और कैप्सूल खाने से टखनों और पैरों की सूजन कम होने लगती है। इसके अलावा अपने खाने में लहसुन का अधिक सेवन करें। इससे सूजन कम होगी।

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अश्वगंधा दूध मे मिलाकर पीने के स्वास्थ्य लाभ


                                                                     

आयुर्वेद के मुताबिक अश्वगंधा को दूध के साथ लेना बहुत फायदेमंद होता है।
आयुर्वेद में किसी भी जड़ी बूटी को किसी ‘अनुपान’ यानी साधन के साथ लिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अनुपान जड़ी बूटी के असर को बेहतर बनाता है।
उसी प्रकार दूध को अश्वगंधा का अनुपान कहा गया है। इसी कारण से अश्वगंधा और दूध साथ लेने की बात कही जाती है।

दूध के औषधीय गुण

आयुर्वेद के प्राचीन लेख चरक संहिता के मुताबिक दूध हमारे दिमाग और शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है। दूध स्वाद में मीठा, ठंडा, कोमल और प्रसन्न होता है।
दूध के गुणों को शरीर के स्वास्थ्य के लिए बहुत उत्तम माना जाता है।
दूध को शरीर के लिए सबसे बेहतर अनुपान माना जाता है। यह खून, हड्डियां, कोशिकाओं, और अन्य अंगों के लिए बहुत फायदेमंद है
 आयुर्वेद के मुताबिक दूध सबसे उत्तम अनुपान है। ऐसे में किसी भी जड़ी बूटी के साथ इसे लिया जाना चाहिए।
दूध और औषधि का मिश्रण शरीर में ज्यादा असरदार होता है और इसका प्रभाव बहुत जल्द दिखने लगता है।
आयुर्वेद के लेख चरक संहिता में दूध और अश्वगंधा को साथ लेने की बात कही गयी है। 
आयुर्वेद में कहा गया है, ‘सर्वदा सर्व भावनाम सामन्यम वृद्धि कारनाम।’ इसका अर्थ है कि शरीर में यदि किसी पदार्थ की मात्रा बढ़ रही है, तो उससे सम्बंधित बाहरी पदार्थों की भी मात्रा बढ़ रही है
अश्वगंधा और दूध में ऐसी ही विशेषतायें हैं।
अश्वगंधा और दूध दोनों ही ओजस को पोषकता पहुंचाते हैं। दोनों एक दूसरे को ऊर्जा देते हैं।
जब कोई व्यक्ति इन्हें साथ लेता है, तब उसके शरीर में मौजूद कोई भी रोग दूर हो जाता है। इनका मिश्रण तीनों दोष में भी सहायक है।
टीबी जैसी बिमारी में अश्वगंधा और दूध साथ लेने से आराम मिलता है।
अश्वगंधा और दूध साथ लेने से शरीर हष्ट पुष्ट बनता है।
आयुर्वेद के साधु सुश्रुत ने कहा था कि अश्वगंधा को दूध के साथ लेने से वत्त दोष में आराम मिलता है।

अश्वगंधा और दूध के फायदे-

 दूध को गर्म ही पीना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि गर्म दूध आसानी से पच जाता है और यह कफ और पित्त दोष को ख़त्म कर देता है।



अश्वगंधा और दूध बांझपन के लिए-


बांझपन की समस्या में दूध के साथ अश्वगंधा का सेवन करें।
दो ग्राम अश्वगंधा चूर्ण को दिन में दो बार लें। इसी गर्म दूध और थोड़ी से मिश्री के साथ लें।

अश्वगंधा और दूध कमजोरी के लिए-

जैसा हमनें बताया कि अश्वगंधा और दूध साथ लेने से शरीर हष्ट पुष्ट बनता है। यदि आप कमजोर हैं, तो आपको इसका नियमित सेवन करना चाहिए।
इसके लिए दो ग्राम अश्वगंधा के चूर्ण को 125 ग्राम त्रिकाटू पाउडर के साथ लें। त्रिकाटू में सुखी असर्क, काली मिर्च और लम्बी मिर्च होती है, जो काफी फायदेमंद होती है। इन्हें दिन में दो बार दूध के साथ लें।

अश्वगंधा और दूध ऑस्टियोपोरोसिस में-

ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या काफी गंभीर होती है।
इसके लिए दो ग्राम अश्वगंधा चूर्ण को एक ग्राम अर्जुन छाल पाउडर के साथ दिन में दो बार लें। इनका सेवन दूध के साथ करें।

अश्वगंधा और दूध अस्थिसंधिशोथ में-

इसके लिए दो ग्राम अश्वगंधा चूर्ण, एक ग्राम मुलेठी को गर्म दूध के साथ लें।
अश्वगंधा और दूध बच्चों के लिए
बच्चों में पोषकता की कमी होने पर उन्हें यह दें।
इसके लिए आप अश्वगंधा की चाय बनाएं। अश्वगंधा की चाय बनाने के लिए आधा ग्लास पानी लें और आधा ग्लास दूध एक बर्तन में लें। इसमें एक ग्राम अश्वगंधा चूर्ण डालें और इसे उबाल लें। इसमें चीनी मिला लें और इसका सेवन करें।


उच्च रक्त चाप के लिए दूध और अश्वगंधा-


क्त रक्तचाप को सामान्य करने के लिए दो ग्राम अश्वगंधा चूर्ण को 125 ग्राम मोटी पिसती के साथ दिन में दो बार लें। इनका सेवन दूध के साथ करें।
साधारण जीवन में भी कर सकते हैं अश्वगंधा और दूध का सेवन
यदि आपको कोई बिमारी या समस्या नहीं है, तब भी आप अश्वगंधा को दूध के साथ ले सकते हैं।
इसके लिए रोजाना दिन में दो बार गर्म दूध में अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर लें।

सामग्री:

4 कप दूध
10 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण
1 चम्मच चीनी
4 कप दूध को 10 ग्राम अश्वगंधा में मिलाकर एक बर्तन में लें।
इस मिश्रण को धीमी आंच पर रखें और इसे तब तक हिलाएं जब तक एक गाढ़ा मिश्रण बन जाए। इसके बाद इसे आंच से हटा लें।
इसे अब 5 मिनट ठंडा होने दें।
इसके बाद एक चम्मच चीनी मिलाएं और सेवन करें।
इस अश्वगंधा और दूध की विधि को खाली पेट लेना चाहिए। खाली पेट लेने से इसका अवशोषण आसानी से हो सकेगा।


अश्वगंधा एक प्राकृतिक औषधि है, जो अपने शक्तिवर्धक गुणों के लिए जानी जाती है। आप चाहे तो इसकी पत्तियों को पीस कर या जड़ों को उबाल कर उपयोग में ला सकते हैं। अश्वगंधा का सेवन करने से थाइरॉइड की अनियमितता पर नियंत्रण होता है। इसके लिए 200 से 1200 मिलीग्राम अश्वगंधा चूर्ण को चाय के साथ मिला कर लें। चाहें तो इसे स्वादिष्ट बनाने के लिए तुलसी का प्रयोग भी कर सकते हैं। हायपोथायरायडिज्म के लिए आयुर्वेदिक इलाज में महायोगराज गुग्गुलु और अश्वगंधा के साथ भी इलाज किया जाता हैं। अश्वगंधा के नियमित सेवन से शरीर में भरपूर ऊर्जा बनी रहती है साथ ही कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है। साथ ही यह शरीर के अंदर का हार्मोन इंबैलेंस भी संतुलित कर देता है। यह टेस्टोस्टेरोन और एण्ड्रोजन हार्मोन को भी बढाता है।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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सूंघने की क्षमता बढ़ाने के उपाय//How to Improve Your Sense of Smell

                                                      
      आपके अपने सूंघने की शक्ति को बढ़ाने के कई कारण हो सकते हैं। एक कारण यह भी है कि यह स्वाद लेने वाली इन्द्रिय से काफी नजदीकी से जुड़ा है। अपनी नाक को दबाकर खाने को चखने की कोशिश करें। यह एक ज़रूरी हुनर है जो शराब, कॉफ़ी, बियर और चाय की सुगंध का वर्णन करने में मदद करती है। सामान्य रूप से अगर आप एक फूल की सुगंध में जटिलता को सूंघ पा रहे हैं तो यह एक गहरा आनंद देता है।
एक औसत इंसान की नाक तकरीबन 10,000 अलग प्रकार की गंध को पहचान सकती है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आपकी यह शक्ति कमजोर होने लगती हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि सूंघने की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाये।

*सूंघने की क्षमता बढ़ाने के उपाय-

क्या आप जानते हैं कि एक औसत इंसान की नाक तकरीबन 10,000 अलग प्रकार की गंध को पहचान सकती है? और सामान्य रूप से अगर आप एक फूल की सुगंध में जटिलता को सूंघ पा रहे हैं तो यह एक गहरा आनंद देता है। वैसे तो सूंघने की शक्ति बढ़ाने के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे अहम कारण यह है कि यह स्‍वाद लेने वाली इंद्रियों से काफी नजदीक से जुड़ा होता है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आपकी यह शक्ति कमजोर होने लगती हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि सूंघने की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाये।
आप जिस चीज़ को सूंघ पा रहे हैं उसपर ज्यादा ध्यान दें। लोग अक्सर मांसपेशियों के विषय में कहते हैं "इस्तमाल में लाओ या गंवाओ", पर यही बात इन्द्रियों के लिए भी सच साबित होती है। अधिक अभ्यास के लिए अपने आँखों में पट्टी बाँध कर, किसी को अपनी नाक के पास अलग अलग चीज़ों को लाने के लिए कहें और देखें कि आप उस चीज़ को पहचान पाते हैं या नहीं|

बलगम निर्माण वाले आहार से परहेज-

*क्‍या आपने इस बात को नोटिस किया है कि जुकाम में आपके सूंघने की क्षमता बहुत कम हो जाती है। नाक के झिल्ली में सकुंचन के कारण गंध पकड़ने वाली नसें कमजोर हो जाती है। इसलिए सूंघने के क्षमता को बढ़ाने के लिए आपको ऐसे भोजन से परहेज करना चाहिए जो अधिक बलगम का निर्माण करते हैं। ऐसा खाना जो घुटन को बढ़ावा देता है जैसे दूध, पनीर, दही और आइसक्रीम ऐसी स्थिति में छोड़ने से आपको काफी मदद मिल सकती है। 
*महक की समस्या को कैस्टर ऑयल की मदद से दूर किया जा सकता है। इसमें मौजूद एंटीइंफ्लेमेट्री, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं जो नाक को साफ करने में मदद करते है। इसका इस्तेमाल करने के लिए रोज सुबह और रात को सोने से पहले कैस्टर ऑयल को दोनों नॉस्ट्रिल में लगाएं।

*कुछ विशेष गंध से आपको कैसा महसूस होता है-

सूंघने की क्षमता को बढ़ाने के लिए आपको इस बात पर भी ध्‍यान देना होगा कि कुछ विशेष गंध आपको कैसा महसूस कराती हैं। जो नर्व गंध का अनुभव कराती है वह दिमाग के भावनात्‍मक हिस्‍से से सीधे तौर पर जुड़ी होती है, और यह आपके समझदारी को बाहर छोड़ देती है। अध्‍ययन के अनुसार, उदाहरण के लिए जहां एक फास्ट फूड के रैपर, ताजा रोटी या पेस्ट्री की गंध आपकी लालसा को जगा देती है, वहीं दूसरी ओर, पुदीना और दालचीनी एकाग्रता में सुधार और चिड़चिड़ापन दूर करने में मदद करती है और नींबू और कॉफी सामान्य रूप में स्पष्ट सोच और उच्च एकाग्रता के स्तर को बढ़ावा देने में मदद करती है।

*जिंक का सेवन करें-

ज्यादा से ज्यादा ज़िंक अपने खाने में शुमार करने की कोशिश करें। हायपोस्मिया नामक बीमारी ज़िंक की कमी से होती है। अपने सूंघने की शक्ति बढ़ाने के लिए, ऐसा खाना खाएं जिसमें ज़िंक की मात्रा पर्याप्त हो (जैसे घोंघा, मसूर दाल, सूरजमुखी के बीज और पीकन) और साथ में रोज़ मल्टी विटामिन टेबलेट्स लें जिसमें 7 मिलीग्राम जिंक हो।
*गंध को लहसुन की मदद से वापिस लाया जा सकता है। यह नाक को साफ करके बंद हुए नाक के मार्ग को खोलता है। इसके लिए आपको 2-3 लहसुन की कलियों की जरुरत होती है। इसे एक कप पानी में अच्छी तरह उबाल लें। जब एक बार यह उबल जाए तो इससे 10 मिनट तक भाप लें। या आप इस पानी को गर्म-गर्म पी सकते हैं। इस तरह से दिन में 2-3 बार करें

*दुर्गन्ध से दूर रहे-

सूंघने की क्षमता को बढ़ाने के लिए आप गंदी बदबू से बचने की कोशिश करें। क्‍योंकि काफी देर तक गन्दी बदबू सूंघने से भी आपकी सूंघने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। और वह धीरे-धीरे कम होने लगती है।

एक्‍सरसाइज करें-

फिट रहने के लिए एक्‍सरसाइज करने के लिए कहा जाता है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इससे हमारी सूंघने की क्षमता भी बढ़ती है। अध्ययन भी बताते हैं कि हमारी सूंघने की शक्ति एक्‍सरसाइज करने के बाद और ते हो जाती है। इसलिए अब आपको एक्‍सरसाइज द्वारा फिट रहने का एक और कारण मिल गया।
चीजों को धीरे-धीरे सूंघें
*जब आप किसी गंध को पहचानने की कोशिश कर रहे हों तो एक बार में गंध को अन्दर लेने से अच्छा है कि इसे धीरे-धीरे और छोटी मात्रा में लें। ऐसा करने से आपकी सूंघने की क्षमता बढ़ेगी। आपने देखा होगा कि कुत्ते भी कुछ सूंघते समय ऐसा ही करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि कुत्‍ते की सूंघने की क्षमता बहुत अधिक होती है।
सूंघने की क्षमता को प्रभावित करने वाली चीजों से बचें
*अदरक आपके स्वाद की तंत्रिका को सक्रिय करने और गंध की क्षमता को उत्तेजित करता है। आप इस समस्या को रोजाना अदरक खाकर या अदरक की चाय पीकर दूर कर सकते हैं
*ऐसी चीजों से बचें जो आपकी सूंघने की क्षमता को कम करने में योगदान देते हैं। कुछ ठंडे इलाज आपकी सूंघने की क्षमता को कम कर सकते हैं। इसके साथ ही धूम्रपान और शराब भी आपकी सूंघने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसलिए कम से कम शराब पीयें क्योंकि अगर आपके खून में अल्कोहल की मात्रा बढ़ने से आपके सूंघने की क्षमता कम हो सकती है।
*नींबू में मौजूद सिट्रस फ्लेवर स्वाद और गंध को पुन: प्राप्त करने में मदद करता है। नींबू में उच्च मात्रा में विटामिन सी होता है जो शरीर को इंफेक्शन से बचाकर इम्यूनिटी बूस्ट करने में मदद करता है। इसके लिए एक नींबू के जूस में 2 चम्मच शहद मिलाकर इसे गर्म पानी में मिलाकर दिन में 2 बार पिएं। या आप खाने के साथ नींबू का सेवन भी कर सकते हैं।
*जब आप खाने की खरीददारी कर रहे हों तो ध्यान रखें कि सबसे अच्छी खुशबू वाली चीज़ वही होंगी जिसकी ज़रुरत आपके शरीर को होगी। इसलिए जो खाना सबसे अच्छी खुशबू दे रहा हो उसे चुन लें। दवाइयों और विटामिन बोतल को सूंघ कर भी आप पता लगा सकते हैं कि किसकी खुशबू बेहतर है और कौन सी दवाई या विटामिन की ज़रुरत आपके शरीर को है।


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