21/4/17

संगृहणी(बार बार दस्त आना) के आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक उपचार




   यदि अतिसार के बाद व्यक्ति गरिष्ठ चीजें खा लेता है, तो वह ‘संग्रहणी’ रोग का शिकार हो जाता है। इसमें व्यक्ति के पेट की अग्नि मंद हो जाती है तथा पाचन शक्ति इतनी बिगड़ जाती है कि खाया गया अन्न, बिना पचे ही साबुत शौच में निकल जाता है। 

यह तीन प्रकार की होती है –
*वातज संग्रहणी
जो लोग बादी चीजें अधिक खाते हैं अथवा मैथुन अधिक करते हैं, उनकी वायु कुपित होकर पेट की आग को बिगाड़ देती है।
*पित्त की संग्रहणी
जो लोग मिर्च, गर्म वस्तुएं, तीखी, खट्टी तथा खारी चीजों का प्रयोग अधिक करते हैं, उनको नीले, पीले, पतले, कच्चे दस्त आने लगते हैं।
*कफ की संग्रहणी
भारी, चिकनी, तली हुई, शीतल वस्तुएं अधिक खाने तथा खाने के बाद तुरंत सो जाने के कारण अन्न पूरी तरह नहीं पचता है और आंव सहित मल आने लगता है।
संग्रहणी रोग के  लक्षण 
* कफज संग्रहणी में भोजन पूरी तरह नहीं पचता है। इसमें गला सूख जाता है, भूख व प्यास अधिक लगती है, कानों, पसली, जंघा, पेड़ू आदि में दर्द रहता है, जीभ का जायका बिगड़ जाता है। मिठाई खाने की इच्छा अधिक होती है तथा बार-बार टट्टी आती है।
संग्रहणी के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार
*शोधी हुई गंधक 2 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, पीपल 5 ग्राम, पांचों नमक 5 ग्राम, भुना हुआ अजमोद 5 ग्राम, भुना हुआ जीरा 5 ग्राम, भुना सुहागा 5 भाग, 2 ग्राम भुनी हुई भांग। इन सबको बारीक पीस लें। फिर इसमें से दो चुटकी दवा ठंडे पानी के साथ सेवन करें।
*यदि सन्निपात (तीनों दोषों-वात, पित्त, कफ़) की संग्रहणी हो, तो बेल की गिरी, गोचरस, नेत्रबाला, नागरमोथा, इन्द्र यव, कूट की छाल। सबको बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर महीन कर लें। फिर इसमें से चुटकी भर दवा बकरी के दूध के साथ लें।
*सोंठ, गुरच, नागरमोथा, अतीस। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा कूट लें। इसमें से 2 चम्मच दवा का काढ़ा बनाकर 15 दिन तक रोगी को निरंतर सुबह व शाम को पिलाएं। यह वात की संग्रहणी के लिए बहुत लाभदायक है।
*सोंठ, पिपलामूल, पीपल, चित्रक, चव्य। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा पीस लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मट्ठे के साथ पिलाएं। प्रतिदिन मट्टे का प्रयोग अधिक करें। यह दवा 20 दिन तक नित्य सेवन कराएं।
*अनारदाना 10 ग्राम, सोंठ 2 ग्राम, काली मिर्च 2 ग्राम, मिसरी 5 ग्राम। सबको कूट-पीसकर कपड़छान कर लें। यह सन्निपात संग्रहणी, आमातिसार, पसली चलना, शूल, अरुचि, गले के दर्द आदि के लिए बहुत उपयोगी दवा है।
*पित्त संग्रहणी होने पर रसौत, अवीस, इन्द्र यव, धाय के फूल। सबको समान मात्रा में लेकर महीन पीस लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण गाय के मट्ठे के साथ सेवन करें। 15 दिन तक यह दवा खाए।
*जायफल, चित्रक, सफेद चन्दन, बायबिडंग, इलायची, भीमसेनी कपूर, वंशलोचन, सफेद जीरा, सोंठ, काली *मिर्च, पीपल, तगर, लवंग। इन सबको बराबर मात्रा में लेकर महीन पीस लें। फिर इसमें 500 ग्राम मिसरी मिला लें या दवा की मात्रा से दोगुनी कच्ची खाण्ड मिलाएं। इस दवा में से चुटकी भर दवा गाय के मट्ठे के साथ 15 दिन तक सेवन करें।
*हरड़ की छाल, पीपल, सोंठ, काला नमक, काली मिर्च। इन सबको 10-10 ग्राम लेकर महीन पीस कर चूर्ण बना लें। फिर इसमें से एक चुटकी चूर्ण प्रतिदिन मट्ठे के साथ पंद्रह दिन तक सेवन करें। यह दवा कफ की संग्रहणी के लिए बहुत उपयोगी है।
*कैथ 8 भाग, मिसरी 8 भाग, पीपल 3 भाग, अजमोद 3 भाग, बेल की गिरी 3 भाग, धाय के फूल 3 भाग, अनारदाना 8 भाग, काला नमक 1 भाग, नागकेसर 1 भाग, पीपलामूल 1 भाग, नेत्रवाला 1 भाग, इलायची 1 भाग। इन सबको पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण मट्ठे के साथ नित्य सुबह-शाम सेवन करें।बेल की जड़, कैथ की जड़, सोनापाढ़ा की जड़, कटाई अरनी की जड़, छोटी कटाई, सहजन की जड़, सोंठ, पीपल, चक, भिलावां, अजवाइन, पीपलामूल, जवाखार, पांचों नमक। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण नित्य सुबह-शाम गाय के मट्ठे के साथ 15 दिन तक सेवन करें।
*सज्जीखार, जवाखार, खारा नमक, काला नमक, सेंधा नमक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, अजमोद, चित्रक, पीपलामूल, भुनी हुई हींग, झरबेरी के क्वाथ या मट्ठे के साथ सबको पीसकर आधा चम्मच चूर्ण प्रतिदिन सेवन करें। सभी दवाइयों की मात्रा बराबर की होगी।
*नागरमोथा, बेलगिरी, इन्द्र यव, सुगंध वाला तथा मोचरस। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को बकरी के दूध में डालकर पकाएं। इसके बाद इसमें से एक चम्मच चटनी का प्रतिदिन सेवन करें।
जातिफलादि चूर्ण या गंगाधर चूर्ण में से एक 3-6 ग्राम सुबह दोपहर शाम मट्ठे के साथ प्रयोग करें।
*वातानुलोमन के लिए तक्र (मट्ठे) के साथ हिंग्वाष्टक चूर्ण वात की संग्रहणी में, यवानी षाडव चूर्ण पित्त संग्रहणी में और लवण भास्कर चूर्ण कफ की संग्रहणी में उत्तम हैं। मात्रा आधा चम्मच दिन में तीन बार।
काली मिर्च, चीते की जड़ की छाल तथा सेंधा नमक। तीनों को बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा-आधा चम्मच चूर्ण सुबह-शाम मट्ठे के साथ सेवन करें।
*कच्चे बेल का गूदा तथा सोंठ, दोनों को बराबर की मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोट लें। इसमें दवा से दोगुनी मात्रा में पुराना गुड़ मिलाकर चने से तीन गुनी बड़ी गोली बना लें। इसमें से एक-एक गोली सुबह-शाम मट्ठे के साथ सेवन करें।
*इस रोग की उत्तम
 दवा पंचामृत पर्पटी  है  । इसे चिकित्सक की देख-रेख में लें।
संग्रहणी का होम्योपैथिक उपचार
*पेट में गड़बड़ी, खाना का बिना पचे ही निकलना, बदहजमी, पेट फूलना, अम्ल, मितली, वमन आदि लक्षणों में पापुलस ट्रिमुलायड्स दें।खाया हुआ भोजन न पचना, पेट में दर्द, ऐंठन, मरोड़, कब्ज, थोड़ी-थोड़ी देर बाद शौच लगना, पेट में मरोड़, पेट में वायु का इकट्ठी होना, मुंह में पानी आना आदि लक्षणों में नक्स वोमिका 2x, 6 दें।
थोड़ा-सा खाते ही शौच की इच्छा, खाई हुई वस्तु का न पचना, पाकस्थली में अग्नि मंद आदि लक्षणों में फेरम आयोड 3x दें।
*भोजन न पचता हो, मिचली आती हो, प्यास अधिक लगती हो, खाया अन्न बिना पचे ही निकल जाता हो। इन सब लक्षणों में सीपिया 30 का सेवन करें।
*तेल-घी, चर्बी आदि से पके पदार्थों को खाने से भोजन न पचता हो, खट्टी डकारें आती हों, वायु नीचे की ओर न जाती हो, तो पोडियम 12 का प्रयोग करें।
*बिना पचे खाद्य शौच में निकलना, वमन, अधिक प्यास लगती हो। इन लक्षणों में सोरियम आक्जैलिकम 1x वि. का प्रयोग करें।
*पाचन शक्ति की दुर्बलता के कारण भोजन बिना पचे ही दस्त से निकले, किसी भी भोज्य-पदार्थ का हजम न होना, सावधानी से खाने-पीने के बाद भी पेट का खराब होना, मुंह का स्वाद हर समय खट्टा रहे, पेट में दर्द, कब्ज की शिकायत। इन सब लक्षणो में हिपर सल्फर 3x, 30 दें

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