31/5/17

विभिन्न बुखार के रामबाण उपचार





रिमझिम फुहारों के साथ बरसात का मौसम अपने साथ कई तरह की बीमारियां भी लाता है, जिनमें बुखार बड़ा कॉमन है। डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं। डेंगू, टायफाइड और मलेरिया के बारे में आइए विस्तार से जानें:-
क्या है बुखार-
जब हमारे शरीर पर कोई बैक्टीरिया या वायरस हमला करता है तो शरीर अपने आप ही उसे मारने की कोशिश करता है। इसी मकसद से शरीर जब अपना टेम्प्रेचर बढ़ाता है तो उसे बुखार कहा जाता है। अगर शरीर का तापमान सुबह के समय 99 डिग्री फारनहाइट से ज्यादा और शाम के वक्त 99.9 डिग्री फारनहाइट से ज्यादा है, तो बुखार माना जाता है। अब 98.4 नॉर्मल टेम्प्रेचर का कॉन्सेप्ट बदल चुका है। मलेरिया और डेंगू में बुखार 101 से लेकर 103 डिग्री फारनहाइट तक पहुंच जाता है, जबकि वायरल में बुखार की रेंज को बता पाना काफी मुश्किल होता है।
खुद क्या करें-
*बुखार अगर 102 डिग्री तक है और कोई और खतरनाक लक्षण नहीं हैं तो मरीज की देखभाल घर पर ही कर सकते हैं। इसमें तीन चार दिन तक इंतजार कर सकते हैं। मरीज के शरीर पर सामान्य पानी की पट्टियां रखें। पट्टियां तब तक रखें, जब तक शरीर का तापमान कम न हो जाए। अगर इससे ज्यादा तापमान है तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।
मरीज को एसी मे रखें तो अच्छा है नहीं तो पंखे की हवा मे रखें|कई मरीज चादर ओढ़कर लेट जाते हैं और सोचते हैं कि पसीना आने से बुखार कम हो जाएगा, लेकिन इस तरह चादर ओढ़कर लेटना सही नहीं है।
*मरीज को हर 6 घंटे में पैरासेटामॉल (Paracetamol) की एक गोली दे सकते हैं। यह मार्केट में क्रोसिन (crocin), कालपोल (calpol) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। दूसरी कोई गोली डॉक्टर से पूछे बिना न दें। बच्चों को हर चार घंटे में 10 मिली प्रति किलो वजन के अनुसार इसकी लिक्विड दवा दे सकते हैं। दो दिन तक बुखार ठीक न हो तो मरीज को डॉक्टर के पास जरूर ले जाएं।
* साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखें। मरीज को वायरल है, तो उससे थोड़ी दूरी बनाए रखें और उसके द्वारा इस्तेमाल की गई चीजें इस्तेमाल न करें। मरीज को पूरा आराम करने दें, खासकर तेज बुखार में। आराम भी बुखार में इलाज का काम करता है।
*मरीज छींकने से पहले नाक और मुंह पर रुमाल रखें। इससे वायरल होने पर दूसरों में फैलेगा नहीं।
*ज्वर आने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन सर्दी-खांसी ,थकावट,,चिंता, रोगाणुओं का संक्रमण और दिमागी तनाव प्रमुख कारण होते हैं। घरेलू चिकित्सा से ज्वर दूर करना प्रयोजनीय और हितकारी है।
*ललाट और सिर पर बर्फ़ या पानी की गीली पट्टी रखें। इससे आपके शरीर का तापमान शीघ्र ही नीचे आ जाएगा।
*बुखार में होने वाले शारीरिक दर्दों के निवारण के लिये हाथ ,पैर, ऊंगलियां गर्दन,सिर ,पीठ पर सरसों के तैल की मालिश करवानी चाहिये। इससे शारीरिक पीडा शांत होगी और सूकून मिलेगा।बिजली चलित मस्राजर का उपयोग भी किया जा सकता है
*शरीर पर मामूली गरम पानी डालते हुए स्नान करें इससे शरीर का तापमान बढेगा । शरीर का तापमान ज्यादा होने पर बुखार के रोगाणु नष्ट होंगे। यह प्रक्रिया ज्वर रहित अवस्था में करना है।
*बुखार अगर 102 डीग्री फ़ारेनहीट से ज्यादा न हो तो यह स्थिति हानिकारक नहीं है। इससे शरीर के विजातीय पदार्थों का निष्कासन होता है और शरीर को संक्रमण से लडने में मदद मिलती है।मामूली बुखार होते ही घबराना और गोली-केप्सूल लेना उचित नहीं है।
*बुखार की स्थिति में आईसक्रीम खाना उपयोगी है। इससे तापक्रम सामान्य होने में सहायता मिलती है।
बुखार मे अधिक पसीना होकर शरीरगत जल कम हो जाता है इसकी पूर्ति के लिये उबाला हुआ पानी और फ़लों का जूस पीते रहना चाहिये। नींबू पानी बेहद लाभकारी है।
*ज्वर के रोगी को अधिक मात्रा में उबला हुआ या फ़िल्टर किया हुआ पानी पीना चाहिये। इससे अधिक पेशाब और पसीना होकर शरीर की शुद्धि होगी।जहरीले पदार्थ बाहर निकलेंगे।
*चाय बनाते वक्त उसमें आधा चम्मच दालचीनी का पावडर,,दो बडी ईलायची, दो चम्मच सूखे अदरक(सोंठ) का पावडर डालकर खूब उबालें। दिन में2-3 बार यह काढा बनाकर पियें। बुखार का उम्दा ईलाज है।
*तुलसी के 10 पती और 4 नग काली मिर्च मुंह में भली प्रकार चबाकर खाएं। यह बहुत उपयोगी चिकित्सा है।
*रात को सोते वक्त त्रिफ़ला चूर्ण एक चम्मच गरम जल के साथ लें। त्रिफ़ला चूर्ण में ज्वर नाशक गुण होते हैं। इससे दस्त भी साफ़ होगा बुखार से मुक्ति का उत्तम उपचार है।



*बुखार के रोगी को भली प्रकार दो तीन कंबल ओढाकर पैर गरम पानी की बाल्टी में 20 मिनिट तक रखना चाहिये। इससे पसीना होने लगेगा और बुखार उतर जाएगा।
*संतरा ज्वर रोगियों के लिये अमृत समान है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है,तुरंत उर्जा मिलती है,और बिगडे हुए पाचन संस्थान को ठीक करता है।
*एक चम्मच मैथी के बीज के पावडर की चाय बनाकर दिन में २ बार पीने से ज्वर में लाभ होता है।
एक प्याज को दो भागों में काटें। दोनों पैर के तलवों पर रखकर पट्टी बांधें। यह उपचार रोगी के शरीर का तापमान सामान्य होने में मदद करता है।
    सभी बुखार जानलेवा या बहुत खतरनाक नहीं होते, लेकिन अगर डेंगू में हैमरेजिक बुखार या डेंगू शॉक सिंड्रोम हो जाए, मलेरिया दिमाग को चढ़ जाए, टायफायड का सही इलाज न हो, प्रेग्नेंसी में वायरल हेपटाइटिस (पीलिया वाला बुखार) या मेंनिंजाइटिस हो जाए तो खतरनाक साबित हो सकते हैं।
बच्चों का रखें खास ख्याल - बच्चों का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है इसलिए बीमारी उन्हें जल्दी जकड़ लेती है। ऐसे में उनकी बीमारी को नजरअंदाज न करें।
*खुले में ज्यादा रहते हैं इसलिए इन्फेक्शन होने और मच्छरों से काटे जाने का खतरा उनमें ज्यादा होता है।
*बच्चों को घर से बाहर पूरे कपड़े और जूते पहनाकर भेजें। मच्छरों के मौसम में बच्चों को निकर व टी-शर्ट न पहनाएं। रात में मच्छर भगाने की क्रीम लगाएं।
*बच्चा बहुत ज्यादा रो रहा हो, लगातार सोए जा रहा हो, बेचैन हो, उसे तेज बुखार हो, शरीर पर रैशेज हों, उलटी हो या इनमें से कोई भी लक्षण हो तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।
* आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ-पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं इसलिए उनके पेट को छूकर और रेक्टल टेम्प्रेचर लेकर उनका बुखार चेक किया जाता है। बगल से तापमान लेना सही तरीका नहीं है, खासकर बच्चों में। अगर बगल से तापमान लेना ही है तो जो रीडिंग आए, उसमें 1 डिग्री जोड़ दें। उसे ही सही रीडिंग माना जाएगा।
*10 साल तक के बच्चे को डेंगू हो तो उसे हॉस्पिटल में रखकर ही इलाज कराना चाहिए क्योंकि बच्चों में प्लेटलेट्स जल्दी गिरते हैं और उनमें डीहाइड्रेशन (पानी की कमी) भी जल्दी होता है।
बरतें ऐहतियात
* ठंडा पानी न पीएं, मैदा और बासी खाना न खाएं।
*खाने में हल्दी, अजवाइन, अदरक, हींग का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल करें।
* इस मौसम में पत्ते वाली सब्जियां, अरबी, फूलगोभी न खाएं।
* हल्का खाना खाएं, जो आसानी से पच सके।
*पूरी नींद लें।
*मिर्च मसाले और तला हुआ खाना न खाएं, भूख से कम खाएं, पेट भर न खाएं।
*खूब पानी पीएं। छाछ, नारियल पानी, नीबू पानी आदि खूब पिएं।
*नाक के अंदर की तरफ सरसों का तेल लगाकर रखें। इससे तेल की चिकनाहट बाहर से बैक्टीरिया को नाक के अंदर जाने से रोकती है।
1. डेंगू कैसे और कब डेंगू मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है। इन मच्छरों के शरीर पर चीते जैसी धारियां होती हैं। ये मच्छर दिन में, खासकर सुबह शरीर के निचले हिस्सों पैरों आदि पर काटते हैं। डेंगू बरसात के मौसम और उसके फौरन बाद के महीनों यानी जुलाई से अक्टूबर में सबसे ज्यादा फैलता है। काटे जाने के 3-5 दिनों के बाद मरीज में डेंगू बुखार के लक्षण दिखने लगते हैं। शरीर में बीमारी पनपने की मियाद 3 से 10 दिनों की भी हो सकती है।



डेंगू के 3 रूप

1. क्लासिकल (साधारण) डेंगू बुखार
2. डेंगू हैमरेजिक बुखार (DHF)
3. डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS)
इन तीनों में से दूसरे और तीसरे तरह का डेंगू सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। साधारण डेंगू बुखार अपने आप ठीक हो जाता है और इससे जान का खतरा नहीं होता लेकिन अगर किसी को DHF या DSS है और उसका फौरन इलाज शुरू नहीं किया जाता तो जान जा सकती है। इसलिए यह पहचानना सबसे जरूरी है कि बुखार साधारण डेंगू है, DHF है या DSS है।
लक्षण डेंगू बुखार
*ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार
*सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द -आंखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आंखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है।
*बहुत ज्यादा कमजोरी लगना, भूख न लगना और जी मिचलाना
*गले में हल्का-सा दर्द होना
*शरीर खासकर चेहरे, गर्दन और छाती पर, लाल-गुलाबी रंग के रैशेज
*क्लासिकल साधारण डेंगू बुखार करीब 5 से 7 दिन तक रहता है और मरीज ठीक हो जाता है। ज्यादातर मामलों में इसी किस्म का डेंगू बुखार होता है।
डेंगू हॅमरेजिक बुखार (DHF)
*नाक और मसूढ़ों से खून आना
*शौच या उलटी में खून आना
*स्किन पर गहरे नीले-काले रंग के छोटे या बड़े रैशेज पड़ जाना
*साधारण डेंगू बुखार के लक्षणों के साथ ये लक्षण भी दिखाई दें तो वह DHF हो सकता है। ब्लड टेस्ट से इसका पता लग सकता है।
डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS)
इस बुखार में DHF के लक्षणों के साथ-साथ 'शॉक' की अवस्था के भी कुछ लक्षण दिखाई देते हैं।
जैसे: - मरीज बहुत बेचैन हो जाता है और तेज बुखार के बावजूद उसकी स्किन ठंडी महसूस होती है।
*मरीज धीरे-धीरे होश खोने लगता है।
*मरीज की नाड़ी कभी तेज और कभी धीरे चलने लगती है। उसका ब्लडप्रेशर एकदम लो हो जाता है।
इलाज
*अगर मरीज को साधारण डेंगू बुखार है तो उसका इलाज व देखभाल घर पर की जा सकती है।
*डॉक्टर की सलाह लेकर पैरासेटामॉल (क्रोसिन आदि) दिन में तीन बार ले सकते हैं।
* एस्प्रिन (डिस्प्रिन आदि), ब्रूफेन, इबुबूफेन बिल्कुल न लें। इनसे प्लेटलेट्स कम हो सकते हैं।
*अगर बुखार 102 डिग्री फारनहाइट से ज्यादा है तो मरीज के शरीर पर पानी की पट्टियां रखें।
* सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें। बुखार की हालत में शरीर को और ज्यादा खाने की जरूरत होती है।
* मरीज में DSS या DHF का एक भी लक्षण दिखाई दे तो उसे जल्दी-से-जल्दी डॉक्टर के पास ले जाएं। DSS और DHF बुखार में प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं, जिससे शरीर के जरूरी हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। डेंगू बुखार के हर मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ डेंगू हैमरेजिक और डेंगू शॉक सिंड्रोम बुखार में ही जरूरत पड़ने पर प्लेटलेट्स चढ़ाई जाती हैं। अगर सही समय पर इलाज शुरू कर दिया जाए तो DSS और DHF का पूरा इलाज मुमकिन है। इलाज कराने और हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद मरीज को थोड़ी कमजोरी रहती है, जो 10 दिन में ठीक हो जाती है। पूरी तरह स्वस्थ होने में मरीज को 10 दिन लगते हैं।
एलोपैथी: इसकी दवाई लक्षण देखकर और प्लेटलेट्स का ब्लड टेस्ट कराने के बाद ही दी जाती है।
आयुर्वेद: आयुर्वेद में इसकी कोई पेटेंट दवा नहीं है, लेकिन डेंगू न हो, इसके लिए यह नुस्खा अपना सकते हैं। एक कप पानी में एक चम्मच गिलोय का रस (अगर इसकी डंडी मिलती है तो चार इंच की डंडी लें), दो काली मिर्च, तुलसी के पांच पत्ते और अदरक मिलाकर पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और 5 दिन तक लें। दिन में दो बार, सुबह नाश्ते के बाद और रात में डिनर से पहले लें।



>कौन-से टेस्ट-
अगर तेज बुखार हो, जॉइंट्स में तेज दर्द हो या शरीर पर रैशेज हों तो पहले दिन ही डेंगू का टेस्ट कराएं। लक्षण नहीं हैं, पर तेज बुखार है तो भी एक-दो दिन बाद फिजिशन के पास जाएं। शक होने पर डॉक्टर डेंगू की जांच कराएगा। डेंगू की जांच के लिए शुरुआत में एंटिजन ब्लड टेस्ट (एनएस 1) किया जाता है। इस टेस्ट में डेंगू शुरू में ज्यादा पॉजिटिव आता है, जबकि बाद में धीरे-धीरे पॉजिटिविटी कम होने लगती है। अगर तीन-चार दिन के बाद टेस्ट कराते हैं तो एंटिबॉडी टेस्ट (डेंगू सिरॉलजी) कराना बेहतर है। डेंगू की जांच कराते हुए वाइट ब्लड सेल्स का टोटल काउंट और अलग-अलग काउंट करा लेना चाहिए। इस टेस्ट में प्लेटलेट्स की संख्या पता चल जाती है।
बचाव-
*एडीज मच्छरों को पैदा होने से रोकना।
*एडीज मच्छरों के काटने से बचाव करना।
ऊपर लिखे दोनों उपायों को अपनाया जाए तो डेंगू का खतरा खत्म किया जा सकता है।
20 का फॉर्म्युला
डेंगू में कुछ एक्सपर्ट 20 के फॉर्म्युला की बात करते हैं। अगर धड़कन यानी पल्स रेट 20 बढ़ जाए, ऊपर का ब्लड प्रेशर 20 कम हो जाए, ऊपर और नीचे के ब्लड प्रेशर का फर्क 20 से कम हो जाए, प्लैटलेट्स 20 हजार से कम रह जाएं, शरीर के एक इंच एरिया में 20 से ज्यादा दाने पड़ जाएं- इस तरह का कोई भी लक्षण नजर आए तो मरीज को हॉस्पिटल में जरूर भर्ती करना चाहिए।
प्लेटलेट्स की भूमिका
*तंदुरुस्त आदमी के शरीर में डेढ़ से लेकर 4 लाख तक प्लेटलेट्स होते हैं।
* प्लेटलेट्स रक्त का वह हिस्सा है जो बॉडी की ब्लीडिंग रोकने का काम करता है।
*अगर प्लेटलेट्स एक लाख से कम हो जाएं तो उसकी वजह डेंगू हो सकता है। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि जिसे डेंगू हो, उसकी प्लेटलेट्स नीचे ही जाएं और प्लेटलेट्स कम होने का मतलब भी सिर्फ डेंगू नहीं है। प्लेटलेट्स कम होने की कई दूसरी वजह भी हो सकती हैं। कई बार मलेरिया में भी प्लेटलेट्स कम हो जाती हैं।
*प्लेटलेट्स अगर एक लाख से कम हैं तो मरीज को फौरन हॉस्पिटल में भर्ती कराना चाहिए। अगर प्लेटलेट्स गिरकर 20 हजार तक या उससे नीचे पहुंच जाएं तो प्लेटलेट्स
जाएं तो प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
*डेंगू का वायरस आमतौर पर प्लेटलेट्स कम कर देता है, जिससे बॉडी में ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। अगर प्लेटलेट्स तेजी से गिर रहे हैं, मसलन सुबह 1 लाख थे और दोपहर तक 50-60 हजार हो गए तो डॉक्टर प्लेटलेट्स का इंतजाम करने लगते हैं ताकि जरूरत पड़ते ही मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाए जा सकें।
*जहां तक प्लेटलेट्स के लिए किए जाने वाले टेस्ट का सवाल है तो यह बेहद आसान सा टेस्ट है जो सीबीसी के जरिए ही हो जाता है। बहुत महंगा भी नहीं है। लैब के हिसाब से आमतौर पर 200 या 250 रुपए में हो जाता है और उसी दिन रिपोर्ट मिल जाती है।
*अगर प्लेटलेट्स गिर रही हैं तो कितने समय अंतराल पर उनका टेस्ट कराना चाहिए, इसका फैसला मरीज की कंडिशन देखकर डॉक्टर करते हैं। वैसे गंभीर स्थिति में डॉक्टर दिन में 2 बार भी प्लेटलेट्स काउंट चेक करते हैं।
*जो भी व्यक्ति सामान्य ब्लड डोनेशन कर सकता है, वह प्लेटलेट्स डोनेट करने के योग्य भी है। इसके लिए अलग से कोई कंडिशन नहीं हैं।
*प्लेटलेट्स बैग्स दो तरह के होते हैं सिंगल डोनर और रैंडम डोनर। ब्लड से प्लेटलेट्स को अलग करने का खर्च प्रति बैग सिंगर डोनर के मामले में 6 से 7 हजार रुपए के बीच आता है।
2. मलेरिया-
'प्लाज्मोडियम' नाम के पैरासाइट से होने वाली बीमारी है मलेरिया। यह मादा 'एनोफिलीज' मच्छर के काटने से होता है जोकि गंदे पानी में पनपते हैं। ये मच्छर आमतौर पर सूर्यास्त के बाद काटते हैं।
किस सीजन में फैलता है: जुलाई से नवंबर के बीच में ज्यादा होता है।
लक्षण: तेज बुखार, सिर दर्द, शरीर दर्द, उलटी, जी मिचलाना, कमजोरी। इसमें आमतौर पर एक दिन छोड़कर बुखार आता है और मरीज को बुखार के साथ कंपकंपी (ठंड) भी लगती है।
एलोपैथी: chloroquine, primaquine, mefloquine (इन दवाइयों के साइड-इफेक्ट्स हो सकते हैं, इसलिए इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के न लें)। इसमें ऐंटि-बायोटिक नहीं, ऐंटि-मलेरियल दवा दी जाती है।



होम्योपैथी: chininum sulph 3x, cinchona 30, malaria officinalis 30

डोज: 30 नंबर की 5-5 गोली दिन में चार बार लें।
आयुर्वेद: महासुदर्शन चूर्ण और मृत्युजंय रस (गोली)
डोज: आधा चम्मच चूर्ण और 1 गोली, सुबह-शाम गरम पानी के साथ, 5 दिन तक लें।
घरेलू नुस्खा : गिलोय की डंडी (चार इंच की), 20 ग्राम गुड़ , एक बड़ी इलायची और एक लौंग को उबालकर उसका काढ़ा बनाकर 5 दिन तक पीएं।
डोज: दिन में दो बार। सुबह नाश्ते के बाद और रात में डिनर से पहले लें। यह इम्युनिटी भी बढ़ाता है।
3. वायरल बुखार -
किसी भी वायरस की वजह से होने वाला बुखार वायरल होता है। वायरल होने के कई कारण हो सकते हैं जिनमें से मुख्य कारण सीवर के पानी का, पीने के पानी में मिलना (जोकि अक्सर बारिश के दिनों में हो जाता है) और इन्फेक्शन वाले आदमी और उसके संपर्क में आई चीजों को छूना।
टेस्ट
95 फीसदी मामलों में किसी टेस्ट की जरूरत नहीं होती। बुखार कम/खत्म नहीं होता तो डॉक्टर सीबीसी यानी कंप्लीट ब्लड काउंट टेस्ट की मदद से जांचते हैं कि ब्लड में कोई इन्फेक्शन तो नहीं है। सीबीसी कम होंगे तो वायरल होगा और बढ़े हुए होंगे तो बैक्टीरियल फीवर होगा। सीबीसी से स्थिति साफ न हो या किसी खास वायरस का खतरा नजर आता है तो डॉक्टर वायरल ऐंटिजन टेस्ट (वीएटी) या पॉलीमरेज चेन रिएक्शन टेस्ट (पीसीआर) कराने की सलाह देते हैं।
कब फैलता है
यह आमतौर पर मौसम बदलने पर होता है लेकिन मॉनसून में लोग इसके ज्यादा शिकार होते हैं।
कितने दिन रहता है
3 से 4 दिनों तक



लक्षण

बुखार, सिर दर्द, नाक बहना, जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में दर्द।
इलाज
एलोपैथी: इसमें ऐंटिबायोटिक नहीं दी जाती। तापमान 102 डिग्री तक रहता है तो हर 6 घंटे में पैरासेटामॉल की 1 गोली मरीज को दे सकते हैं। बच्चों को हर 4 घंटे में दवा दे सकते हैं। बच्चों को 10 मिली प्रति किलो वजन के अनुसार पैरासेटामॉल सिरप दे सकते हैं। दो-तीन दिन तक बुखार ठीक न हो तो डॉक्टर के पास जाएं।
होम्योपैथ: gelsemium 30, Arsenicum Album30 30 नंबर की 5-5 गोली दिन में चार बार लें। आप इन्हें तीन दिन तक ले सकते हैं।
आयुर्वेदिक: त्रिभुवन कीर्ति और आनंद भैरव की 1-1 गोली सुबह-शाम गरम पानी के साथ लें।
4. टायफाइड-
इसे एंट्रिक फीवर और मियादी बुखार भी कहते हैं। यह सेल्मोनिया नाम के बैक्टीरिया से होता है, जिससे आंत में जख्म (अल्सर) हो जाता है, जो बुखार की वजह बनता है।
कैसे फैलता है
पीने के पानी में सीवर का पानी मिलना इसके होने का सबसे बड़ा कारण है।
कब होता है
वैसे तो यह कभी भी हो सकता है लेकिन बरसात के मौसम में यह सबसे ज्यादा होता है क्योंकि ज्यादातर इसी समय सीवेज सिस्टम खराब होता है।
तेज बुखार, सिर दर्द, शरीर दर्द, उलटी, जी मिचलाना। हालांकि यह बुखार कंपकंपी के साथ नहीं आता लेकिन इस बार मौनसून के दिनों देखा गया है कि यह कंपकंपी के साथ आ रहा है।
एलोपैथी: olfoxacin, levofloxacin, pyrogenium इसमें ऐंटिबायोटिक दवा दी जाती है।
होम्योपैथी: Baptisia 30, Bryonia, pyrogenium 30
डोज: 30 नंबर की 5-5 गोली दिन में चार बार ले। (सभी दवाएं टेस्ट कंफर्म होने के बाद ही लें)
आयुर्वेद: प्रवाल पिष्टी 250 द्वद्द, मोती पिष्टी 250 द्वद्द और सिद्ध मकरध्वज 125 द्वद्द तीनों की एक-एक गोली को पीसकर मिला लें, फिर शहद के साथ दिन में दो बार, सुबह-शाम 15 दिन तक लें।
जरूर ध्यान रखें
-बुखार है (खासकर डेंगू के सीजन में) तो एस्प्रिन (Asprin) बिल्कुल न लें। यह मार्केट में इकोस्प्रिन (Ecosprin)आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। ब्रूफेन (Brufen), कॉम्बिफ्लेम (combiflame) आदि एनॉलजेसिक से भी परहेज करें क्योंकि अगर डेंगू है तो इन दवाओं से प्लेटलेट्स कम हो सकती हैं और शरीर से ब्लीडिंग शुरू हो सकती है। किसी भी तरह के बुखार में सबसे सेफ पैरासेटामॉल लेना है।
-झोलाछाप डॉक्टरों के पास न जाएं। अक्सर ऐसे डॉक्टर बिना सोचे-समझे कोई भी दवाई दे देते हैं। डेक्सामेथासोन (Dexamethasone) इंजेक्शन और टैब्लेट तो बिल्कुल न लें। अक्सर झोलाछाप डॉक्टर मरीजों को इसका इंजेक्शन और टैब्लेट दे देते हैं, जिससे नुकसान हो जाता है।
बुखार में कॉमन गलतियां
*डेंगू में अक्सर तीमारदार या डॉक्टर प्लेटलेट्स चढ़ाने की जल्दी करने लगते हैं। यह सही नहीं है। इससे उलटे रिकवरी में वक्त लग जाता है। जब तक प्लेटलेट्स 20 हजार या उससे कम न हों, प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं होती।
*कई बार परिजन मरीज से खुद को चादर से ढककर रखने को कहते हैं, ताकि पसीना आकर बुखार उतर जाए। इसकी बजाय उसे खुली और ताजा हवा लगने दें। उसके शरीर पर सादा पानी की पट्टियां रखें।
*बुखार में मरीज या उसके परिजन पैनिक करने लगते हैं और आनन-फानन में तमाम टेस्ट (मलेरिया, डेंगू, टायफायड आदि के लिए) कराने लगते हैं। दो दिन इंतजार करने के बाद डॉक्टर के कहे मुताबिक टेस्ट कराना बेहतर है।
खाने में हल्दी का इस्तेमाल ज्यादा करें। सुबह आधा चम्मच हल्दी पानी के साथ या रात को आधा चम्मच हल्दी एक गिलास दूध के साथ लें। लेकिन अगर आपको नजला, जुकाम या कफ आदि है तो दूध न लें। तब आप हल्दी को पानी के साथ ले सकते हैं।
*8-10 तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10 पत्तों को पौने गिलास पानी में उबालें, जब वह आधा रह जाए तब उस पानी को पीएं।
* विटामिन-सी से भरपूर चीजों का ज्यादा सेवन करें जैसे: एक दिन में दो आंवले, संतरे या मौसमी ले सकते हैं। ये चीजें हमारे इम्यून सिस्टम को सही रखती हैं।
* कई बार लोग खुद और कभी-कभी डॉक्टर भी बुखार में फौरन ऐंटि-बायोटिक देने लगते हैं। सच यह है कि टायफायड के अलावा आमतौर पर किसी और बुखार में ऐंटि-बायोटिक की जरूरत नहीं होती।
* ज्यादा ऐंटि-बायोटिक लेने से शरीर इसके प्रति इम्यून हो जाता है। ऐसे में जब टायफायड आदि होने पर ऐंटि-बायोटिक की जरूरत होगी तो वह शरीर पर काम नहीं करेगी। ऐंटि-बायोटिक के साइड इफेक्ट भी होते हैं। इससे शरीर के गुड बैक्टीरिया मारे जाते हैं।
मच्छरों से बचाव के तरीके-
*मच्छरों को भगाने और मारने के लिए मच्छरनाशक क्रीम, स्प्रे, मैट्स, कॉइल्स आदि इस्तेमाल करें। गुग्गुल के धुएं से मच्छर भगाना अच्छा देसी उपाय है।
*घर के अंदर सभी जगहों में हफ्ते में एक बार मच्छरनाशक दवा का छिड़काव जरूर करें। यह दवाई फोटो-फ्रेम्स, पर्दों, कैलेंडरों आदि के पीछे और घर के स्टोर-रूम और सभी कोनों में जरूर छिड़कें। दवाई छिड़कते वक्त अपने मुंह और नाक पर कोई कपड़ा जरूर बांधें। साथ ही, खाने-पीने की सभी चीजों को ढककर रखें।
*पीने के पानी में क्लोरीन की गोली मिलाएं और पानी उबालकर पीएं।
*घर या ऑफिस के आसपास पानी जमा न होने दें, गड्ढों को मिट्टी से भर दें, रुकी नालियों को साफ करें।
* अगर पानी जमा होने से रोकना मुमकिन नहीं है तो उसमें पेट्रोल या केरोसिन ऑइल डालें।
*रूम कूलरों, फूलदानों का सारा पानी हफ्ते में एक बार और पक्षियों को दाना-पानी देने के बर्तन को रोज पूरी तरह खाली करें, उन्हें सुखाएं और फिर भरें। घर में टूटे-फूटे डिब्बे, टायर, बर्तन, बोतलें आदि न रखें। अगर रखें तो उलटा करके रखें।
* लहसुन का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें। इसकी गंध से मच्छर दूर भागते हैं।
*लैवेंडर ऑइल को त्वचा पर लगाने से मच्छर दूर रहते हैं।
*नीम का तेल भी मच्छर भगाने में बड़ा उपयोगी है। सोने से पहले थोड़ा सा नीम का तेल शरीर पर लगा लेने से मच्छर नहीं काटते।
*डेंगू के मच्छर साफ पानी में पनपते हैं, इसलिए पानी की टंकी को अच्छी तरह बंद करके रखें।
* मुमकिन हो तो खिड़कियों और दरवाजों पर महीन जाली लगवाकर मच्छरों को घर में आने से रोकें।
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